Posts

Showing posts from 2012

क्षणिकाएं

आज एक सहेली के आग्रह पर स्कूल के नाटक के लिए कुछ लाइन लिखी थी।।

लड़कियों की शिक्षा 
बेटियां भी है आपकी बगिया की फुलवार 
उन्हें भी है पनपने का पूरा अधिकार।  उचित देखभाल,भोजन और पढाई  लड़कियों की उन्नति से ही  दोनों घरों में खुशहाली है छाई।। 
भ्रूण हत्या 
बाबा मैं भी हूँ तुम्हारा ही अंश  मानों तो चलाऊँगी तुम्हारा ही वंश।  करुँगी जग में रोशन नाम तुम्हारा  न रोको  इस दुनिया में आने से  पाने दो मुझे भी प्यार तुम्हारा।।

दहेज़ 
ना तौलो मान मेरा सोने-चांदी से  बड़ी आस से आयी हूँ अपना नैहर छोड़ के।  अपना लो मुझे अपनी बेटी समझ के पा जाऊं तुममे मेरे माँ-बाबा प्यारे से।  बन जाये फिर इक संसार प्यारा प्यारा  जो हो कीमती हर इक दहेज़ से। 
बाल विवाह 
बचपन के झूले, गुड़ियों के खेल,  अम्मा की गोदी, सखियों का मेल,  भाई का प्यार, बाबा  का दुलार,  सुख की नींद, भोला संसार,  न छीनो मुझसे करके बचपन में ब्याह  अम्मा ये है मेरी छोटी सी चाह।।
पर्यावरण पर मेरी एक पोस्ट यहाँ भी ...
http://www.parikalpnaa.com/2012/12/3_11.html

http://alpanadeshpande.blogspot.in/2011/04/blog-post_15.html
गर्भनाल पत्रिका के दिसंबर 2012..73अंक में मेरा आलेख पेज नंबर 16

http://www.garbhanal.com/Garbhanal%2073.pdf




जिंदगी

जाने किसमे क्या  तलाशती है जिंदगी  एक अनबुझी प्यास सी जिंदगी  प्यास में भी आस को  तलाशती है जिंदगी। 
मिले जो राहों में  ठिठक कर उनका  साथ चाहती है जिंदगी  चलते चार कदम साथ उनके  उन्हें अपना सा ढालना  चाहती है जिंदगी।
ढले जो मन के अक्स में  उस पर इठलाती है जिंदगी  फिर क्यों बदलने की  शिकायत करती है जिंदगी 
बदलती राहों में  साथ पुराना चाहती है जिंदगी  फिर क्यों हर नयी राह  पर  बदलाव चाहती है जिंदगी 
मेरा नया ब्लॉग  कहानी kahani  http://kahanikahani27.blogspot.in/

लड़कों में आत्मघाती प्रवृत्ति

आज सुबह का अखबार पढ़ते ही मन दुखी हो गया।मेडिकल फाइनल के एक छात्र ने इसलिए फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली क्योंकि उसकी प्रेमिका की सगाई कहीं और हो गयी थी।उस छात्र के जीजाजी जो की खुद मेडिकल ऑफिसर है ने एक दिन पहले उसे इसी बारे में समझाइश भी दी थी लेकिन रात  वह होस्टल के कमरे में अकेला था और उसने इसी अवसाद में फांसी लगा ली।  इसी के साथ एक और खबर थी की मेडिकल के जुड़ा के अध्यक्ष ने दो महीने पहले इसी कारण  की उसकी प्रेमिका की किसी और के साथ शादी हो गयी आत्महत्या की कोशिश की थी और वह अभी तक कोमा में है। वैसे भी आजकल आये दिन अखबार में युवा लड़कों द्वारा आत्महत्या किये जाने की ख़बरें आम हो गयीं हैं।ये लड़के अवसाद की किस गंभीर स्थिति  में होंगे की उनके लिए उनके माता पिता भाई बहन परिवार जिम्मेदारी कोई चीज़ मायने नहीं रखती और वे इस तरह का आत्म घाती  कदम उठा लेते हैं। 

अगर इस बारे में गंभीरता से सोचा जाये तो हमारे यहाँ का पारिवारिक सामाजिक ढांचा इस स्थिति के लिए बहुत हद तक जिम्मेदार है। हमारे यहाँ लड़कों को बहुत ज्यादा संवेदनशील न समझा जाता है न उनका संवेदनशील होना प्रशंशनीय बात मानी जाती है। बचप…

समझा जो होता

समझा जो होता 
मेरी विवशता और 
उलझनों को 
जाना जो होता 
मेरी सीमा और 
बंधनों को 
थमा जो होता 
मेरी ख्वाहिशों और
अरमानों को 
पाया जो होता 
मेरे मन की
गहराइयों को
सोचा जो होता
मेरी धडकनों और
सांसों को
महसूस जो होता
मेरे प्यार और
भावनाओं को
यूं चले न जाते
इक पुकार के इंतजार में
पलटकर देखते तो पाते
ठिठके पड़े शब्द
विवशताओं के उलझे धागे में फंसे।

कहानी

कहानी  चूल्हे पर चढ़ी खाली हांड़ी से  कुछ दाने पके चावल के  बच्चे को खिलाते  हुए  माँ का मन कसमसाया होगा  भूखे बच्चे को थपक सुलाते हुए  भरे पेट का एहसास कराने  कहानी में रोटी को  चाँद से भरमाया होगा। 
दिला दो नए कपडे माँ  बेटी की जिद पर  माँ को गुस्सा आया होगा  लगा दो चांटे उसे चुप कराया होगा  फटे आँचल से पोंछते आँसू  बिटिया को बहलाया होगा  कात रही है सूत बूढी माँ  तेरी फ्राक बनाने को  बेटी को सुलाते हुए ये  सपना उसके मन जगाया होगा। 
खिलौने,कपडे ,रोटी,मिठाई  झूले,गुब्बारे,दूध की मलाई  पूरे न हो सकें जो कभी  लेकिन बनें रहें उनके ख्यालों में  ताकि उन्हें पाने की आस में  बच्चे करते रहें कोशिशें  ऐसे ही किसी ख्याल ने  माँ के मन में  कहानी को उपजाया होगा। 

आँगन की मिट्टी

कुछ सीली नम सी
माँ  के हाथों के  कोमल स्पर्श  सी
बरसों देती रही सोंधी महक
जैसे घर में बसी माँ की खुशबू
माँ और आँगन की मिट्टी

जानती है 
जिनकी जगह न ले सके कोई और
लेकिन फिर भी रहती चुपचाप
अपने में गुम
शिव गौरा की मूर्ति से तुलसी विवाह तक
गुमनाम सी उपस्थित
एक आदत सी जीवन की
माँ और आँगन की मिट्टी

कभी खिलोनों में ढलती
कभी माथा सहलाती
छत पर फैली बेल पोसती
कभी नींद में सपने सजाती
कभी जीवन की धुरी कभी उपेक्षित
माँ और आँगन की मिट्टी

उड़ गए आँगन के पखेरू
बन गए नए नीड़
अब न रही जरूरी
बेकार, बंजर, बेमोल
फिंकवा दी गयी किसी और ठौर
माँ और आँगन की मिट्टी।






यूं विलुप्त हो जाने देना...

http://lalitdotcom.blogspot.in/2012/09/blog-post_17.html?showComment=1347968550352#क८८६१५१९९४७९१३८६६१९०
ललित शर्मा जी का ये आलेख पढ़ कर आज एक घटना याद आ गयी.स्कूल में महिलाओं का पसंदीदा विषय होता है साड़ियाँ..हंसिये मत ये बहुत संजीदा विषय है और इसकी संजीदगी आपको ये घटना पढ़ कर समझ आएगी. तो हुआ ये की मेरी एक साड़ी जिसमे बहुत ही खूब सूरत कढ़ाई थी उसका कपडा ख़राब हो गाया.लेकिन उसकी कढाई का कुछ नहीं बिगड़ा .इतना सुन्दर हाथ का काम उसे यूं ही फेंक देने की इच्छा ही नहीं हुई.कई साल तक उसे पेटी में रखे रही फिर एक आइडिया आया क्यों ना इसका काम किसी और साड़ी पर लगा कर इसे फिर नया कर दूं.बस फिर क्या था एक दो सहेलियों से इस बारे में सलाह  की और फिर उस के मेचिंग की साड़ी ढूँढने में लग गयी. जल्दी ही खोज पूरी हुई ओर उस पर काम शुरू हुआ.नया हो कर वह काम खिल उठा  और सबके आकर्षण का केंद्र भी बना.जो भी उसे देखता उस काम की साड़ी की तारीफ किये बिना नहीं रह पता और में भी गर्व से बताती की इसमें क्या समझदारी दिखाई है मैंने. ऐसे ही एक दिन एक कलीग को जब अपनी कलाकारी बताई तो वह बोली ऐसी ही एक साड़ी मेरे पास भी है कश्…

सूखी रेत के निशान

उठ कर चल दिए
 मुझे छोड़ कर यूँ  बिना अलविदा कहे  दूर तक दिखता रहा  तुम्हारा धुंधलाता अक्स  सोचती रही क्या होंगे  उन आँखों में आंसूं  या एक खुश्क ख़ामोशी  जैसे कुछ हुआ ही ना हो.
बिखरी पड़ी यादों को  अकेले संभालना है मुश्किल  एक गठरी में बाँध  लोटना चाहती हूँ तुम्हे  कि ये शिकवा ना कर सको  चुपके से रख लीं मैंने 
रास्ते पर ढूँढती हूँ  तुम्हारे कदमों के निशान  लेकिन मिलते है  सूखे पानी के रेले रेत पर 
आंसुओं के निशान पर चल कर  यादों कि गठरी लौटाई नहीं जाती  अब भी सहेजे हुए हूँ उसे  उस दिन के इंतजार में  जब तुम आ कर ले जाओगे अपनी यादें  ओर कौन जाने मेरी यादें  तुम भी सहेजे रखे  हो अब तक.

मन का क्लेश

ये कविता मेरे भाई योगेश वर्मा ने अपने कौलेज के दिनों में लिखी थी


मन का क्लेश  समाप्त हुआ अब वह अध्याय नित-सौरभ-संचन औ' काव्य व्यवसाय  नूतन से विषयों ने आज किया है मन व्यथित और प्रिय यायावरी से भी हुआ अब तन थकित 
तब लेखनी में भी हुआ करती थी एक पावन रसधार  और हम स्वप्नों को बुनते थे लेकर मन के तार|  क्या कविता महज तुकबंदी थी और गीतों में शेष तान ही था?  शब्दों का वह खेल भावुक मन का गान नहीं था?
अब भुला चला वो प्रेम स्मृतियाँ -घुटनों पर है सिर रखा  पर्वत हिलाने में सक्षम मनुष्य हिय बोझ से है थका अनुभूति गयी,आल्हाद गया,अब अश्रु रह गए शेष! स्नेह क्षणिक तड़ित था मन में,स्थाई है क्लेश!

कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन -36- कविता वर्मा की कहानी...

कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन -35- कविता वर्मा की कहानी

असंवेदनशील आस्था

आज एक न्यूज़ चेनल पर शनि को प्रसन्न करने का एक उपाय बताया जा रहा था.१०८ मदार या आंकड़े के पत्तों कि माला बना कर हनुमानजी को चढ़ाई जाये जिससे शनि कि शांति होती है साथ ही हनुमानजी प्रसन्न होते हैं. हमारे देश में भगवान को प्रसन्न करके अपना काम निकलवाने कि मानसिकता बहुत आम है ओर इसके लिए भगवान को चढ़ावे के रूप में रूप में फल फूल,मिठाई मेवे पूजा कि अन्य सामग्री चढाने का आम रिवाज़ है.पता नहीं इस चढ़ावे से भगवान कितने खुश होते है लेकिन इस तरह के कर्मकांडों से प्रकृति को जो नुकसान होता है उसकी पूर्ति सालों में भी संभव नहीं हो पाती. 
समय समय पर इस तरह के नए नए कर्म काण्ड कि हवा चलती है ओर लोग बिना सोचे विचारे उन पर अमल करने लगते हैं फिर चाहे वह गणेशजी को दूध पिलाने कि बात हो या मदार के पत्तों कि माला बनाना ,श्री कृष्ण जी पर १००८ तुलसी पत्र चढ़ाना. तुलसी के १०८ या १००८ पत्ते रोज़ श्रीकृष्ण जी को चढाने से मनोकामना पूरी होती हो या ना होती हो लेकिन ये तय है कि अगर एक मोहल्ले के ५-७ लोग इस तरह का संकल्प ले लें तो उस मोहल्ले या कालोनी के सभी तुलसी के पौधे उजड़ जाते हैं.क्योंकि पूजा के नाम पर या संबंधो…

प्राकृतिक संसाधनों का नियंत्रित दोहन जरूरी है.

आज समाचार पत्र में दो ख़बरें पढ़ीं .दोनों ही ख़बरें अगर सोचा जाये तो बहुत गंभीर चेतावनी देती हैं नहीं तो सिर्फ ख़बरें हैं. 
पहली खबर है नॅशनल जियोग्राफिक सोसायटी के एक सर्वे के बारे में है जो बताती है कि हमारी सनातनी परंपरा के चलते हम भारतीय पर्यावरण को होने वाले नुकसान के लिए खुद को जिम्मेदार मानते हैं ओर अपराधबोध से ग्रस्त होते हैं.१७ देशों में करवाए गए सर्वेक्षण में भारतीय सबसे ऊपर थे.लेकिन इसका दुखद पहलू ये है कि इसके बावजूद भी हम लोगों को इस बात का सबसे कम यकीन है कि व्यक्तिगत प्रयासों से पर्यावरण को सुधारने में मदद मिल सकती है. 
दूसरी खबर ये है कि मध्यप्रदेश कि जीवन दायनी रेखा नर्मदा नदी में रेत कि मात्रा लगातार खनन के चलते कम हो रही है. इसका कारण नर्मदा नदी कि सहायक नदियों पर बनने वाले बाँध कि वजह से नर्मदा के प्रवाह में लगातार कमी आयी है जिससे बलुआ पत्थरों से बनने वाली रेत में कमी आयी है ओर रही सही कसर रेत के अति दोहन से नर्मदा का रेत का भंडार ज्यादा से ज्यादा दो साल ओर चलेगा. ये कहना है खनिज अधिकारी श्री खेतडिया  का. हमारे देश में प्राकृतिक संसाधनों का अथाह भंडार है.ये संसाधन है…

ये भी तो जरूरी है

वैसे तो अभी तक स्कूल कि छुट्टियाँ चल रहीं थीं लेकिन स्कूल दिमाग से निकलता थोड़े ही है.बल्कि छुट्टियों में और ज्यादा समय मिलता है स्कूल कि बातें सोचने उन पर नए सिरे से विचार करने का. रोज़ कि पढाई के साथ एक अतिरिक्त जिम्मेदारी टीचर्स पर होती है और वह है किसी टीचर के अनुपस्थित होने पर उसकी क्लास लेना.वैसे तो इस पीरियड में पढाई ही होनी होती है लेकिन बच्चे सच पढ़ना नहीं चाहते.बड़ी मुश्किल से तो उन्हें कोई फ्री पीरियड मिलता है. तो जैसे ही क्लास में पहुँचो पहली ख़ुशी उनके चेहरे पर दिखती है कि चलो आज पढना नहीं है.लेकिन जल्दी ही ये ख़ुशी काफूर हो जाती है जब उन्हें पता चलता है कि ये फ्री पीरियड फ्री नहीं है बल्कि इसमें भी पढना ही है.और सच बताऊ मुझे इसमें बहुत तकलीफ होती है.बच्चों को इस फ्री पीरियड में अपने मन का काम करने की ,अपने दोस्तों से बात करने कि आज़ादी होना ही चाहिए.आखिर ये भी तो सीखने का एक तरीका हो सकता है.अपने दोस्तों से बात करना या उनके साथ बैठ कर अपनी पढाई कि मुश्किलों को हल करना या अपना अधूरा काम पूरा करना या फील्ड में जाना खेलना वगैरह.लेकिन स्कूल में खेलने और लायब्रेरी के पीरियड …

अलीबाग यात्रा २

Image
आज सोमवार है सुबह शांत थी जब हम बीच पर पहुंचे ज्यादा भीड़ भाड़ वहां नहीं थी.रविवार सुबह एक अलग नज़ारा वहां देखा था,जो समुद्र में जाने के उत्साह में ध्यान में कम रहा.सुबह सुबह करीब २०-२५ लोगों की टोली हाथ में बेलचे फावड़े लिए झाड़ियों में अटके कागज़ पुलिथीं निकल कर जला रहे थे. ये यहाँ के स्थानीय निवासी थे जो इस बीच से आने वाली पीढ़ी के लिए ना सिर्फ रोज़गार की सम्भावना देख रहे थे बल्कि अपनी प्राकृतिक विरासत को सहेज रहे थे. देख कर अच्छा लगा लेकिन एक विचार ये भी मन में आया की इस काम के लिए हमारे यहाँ सुविकसित तंत्र कब होगा? इतना टेक्स देने के बावजूद भी अगर हर काम हमें ही हाथ में लेना है .क्या सरकारी मशीनरी काम के हिसाब से स्टाफ की नियुक्ति नहीं कर सकती? या नियुक्त लोगो को काम के लिए जरूरी सुविधा मुहैया करवा कर काम की सुनिश्तित्ता नहीं करवा सकती? ये तो अच्छा है की स्थानीय लोग शुरू से जागरूक है अन्यथा यह बीच जल्दी ही मुंबई के जुहू जैसे गंदे बीच में बदल जायेगा. वैसे भी यहाँ का मुख्य बीच अलीबाग बीच की गन्दगी का आलम देख कर उसमे जाने का मन नहीं हुआ था. अलीबाग बीच से अलीबाग फोर्ट ओर जंजीरा किला …

अलीबाग यात्रा

Image
इस साल छुट्टियों में घूमने जाने का कार्यक्रम बना अलीबाग का .वही समय की कमी इसलिए ज्यादा दूर जा नहीं सकते.अचानक के प्रोग्राम में रिजर्वेशन  नहीं मिलता इसलिए कार से ही जाना तय हुआ.(वैसे भी न रिजर्वेशन की कोशिश की न ट्रेन से जाने का सोचा).बस तय हुआ की शनिवार की शाम निकलेंगे रात नाशिक में रुकेंगे .फिर आगे का कार्यक्रम..
बच्चों ने ट्रेवल xp पर नासिक में सुला वाइनरी देखी थी और उन्हें वहां जाना था. रोमांच इस बात का की हम वो जगह देखेंगे जो ट्रेवल xp पर देखी है .वैसे तो वहा उनका रेसोर्ट भी है लेकिन वहां रुकना बहुत महंगा था. इसलिए नेट पर रुकने के लिए होटल्स ढूँढना शुरू हुआ.और जल्दी ही एक होटल मिल भी गया. फिर अलीबाग की व्यवस्था के लिए ट्रेवल एजेंट के पास गए उसने जो रेसोर्ट बताये वो बहुत ही महंगे थे .लौटते में पूना जाना था वहां कजिन सिस्टर रहती हैं और जिस दिन हमारा कार्यक्रम बना उसी दिन वो लोग भी अलीबाग में थे. जीजाजी ने कहा अरे आप लोगो की आराम से रुकने की व्यवस्था हो जाएगी में एक दो नंबर देता हूँ . बस फिर क्या था बात बन गयी. तो शुक्रवार शाम हमने अपनी यात्रा शुरू की.नासिक ४३० किलोमी…

खुशियों का खज़ाना.

आज एक शादी में अपनी एक कलीग की बेटी से मिली. नाम सुनते ही वह पहचान गयी अरे आप वही है ना जो ब्लॉग लिखती है.में आपको पढ़ती हूँ .सच कहूँ अभी कुछ समय से लेखन से खास कर ब्लॉग लेखन से एक दूरी सी बन गयी थी.वैसे लेखन जारी है .आजकल कुछ कहानियों पर काम कर रही हूँ.सोचती हु उन्हें ही धारावाहिक के रूप में ब्लॉग पर डालूँ लेकिन खैर ये सब समय की बात है .आज सच में मन हुआ की कुछ लिखू.पता नहीं ऐसा सबके साथ होता है या सिर्फ मेरे साथ .जब भी लेखन की एक विधा छोड़ दूसरे पर जाती हूँ पहली विधा कहीं पीछे छूट जाती है. बहुत दिनों से कोई संस्मरण लिखने की सोच रही थी लेकिन क्या ??
कल अलमारी जमाते हुए एक पुरानी डिब्बी खोल के देखी तो उसमे एक छल्ला निकला.उसे उंगली में डालते मन २५ साल पीछे पहुँच गया .ये छल्ला मेरी बुआ की बेटी का था.बस यूं ही बात करते करते उसकी उंगली से निकाल लिया ओर कह दिया मुझे बहुत पसंद है उसने भी कह दिया तो आप रख लो. जिस प्यार ओर अपनेपन से उसने दे दिया था उसे उतने ही प्यार ओर सम्हाल के साथ मैंने बरसों उंगली में डाले रखा. यहाँ तक की जब उतार कर रखा तब भी उसे अपने प्यार में लपेट कर रख दिया. कल उसे उंगली…

आफरीन

में आई इस जहाँ में  बिना तुम्हारी इच्छा या मर्जी के  अपनी जिजीविषा के दम पर 
सहा तुम्हारा हर जुल्म निशब्द  पर तोड़ नहीं पाए तुम मुझे  ये तुम्हारी हार थी.
अपनी हार पर संवेदनाओं का मलहम लगाते तुम  हंसती रही में तुम्हारी बचकानी मानसिकता पर  दर्द दे कर कन्धा देने से शायद मिलता हो  बल तुम्हारे पौरुष को 
माँ के आंसुओं ने विवश किया मुझे  ओर में कर बैठी विद्रोह  की क्यों दूं में अपनी मुस्कान तुम्हे  क्यों रोशन करूँ तुम्हारी जिंदगी  जो ना कम हो सकी सदियों में  क्या इससे कम होगी तुम्हारी दरिंदगी 
में अस्वीकार करती हूँ तुम्हे  धिक्कारती हूँ तुम्हारी हर कोशिश को  मेरे जाने के बाद  शायद तुम महसूस कर सको  कितने आदिम हो तुम 
ओर रखो हमेशा याद  आई थी में अपने दम पर ओर  जा रही हूँ अपनी इच्छा से  तुम जीवित रहोगे जब तक  मुझे याद रखना तुम्हारी मजबूरी होगी  पर में तुम्हारी नहीं  अपनी माँ की स्मृतियों को ले जा रही हूँ  ओर मेरे साथ हैं माँ के आंसू  बेहतरीन तोहफे की तरह .

दोस्ती

आजकल इंडियन आइडल का एक विज्ञापन आ रहा है जिसमे एक कालेज का लड़का खुद शर्त लगा कर हारता है किसी ओर लडके की आर्थिक मदद के लिए. वैसे तो टी वी पर कई विज्ञापन रोज़ ही आते है लेकिन कुछ विज्ञापन दिल को छू जाते है.खास कर दोस्ती वाले विज्ञापन.अभी कुछ दिनों पहले एक मोबाईल कम्पनी का जिंगल हर एक फ्रेंड जरूरी होता है सबकी जुबान पर था.  दोस्ती दुनिया का सबसे खूबसूरत रिश्ता है एक ऐसा रिश्ता जिसमे एक दोस्त दूसरे दोस्त की भावनाओ को, मन की बातों को बिना कहे जान लेता है. जब दोस्त कहे मुझे अकेला छोड़ दो तब उसके कंधे से कन्धा मिला कर खड़ा हो जाता है.ओर जब दोस्त कहे सब ठीक है तब बता ना क्या बात है पूछ पूछ कर सब उगलवा लेता है.  जब भी इस विज्ञापन को देखती हूँ मन २३ साल पीछे अपने कोलेज की लैब में पहुँच जाता है जब फ्री पीरियड में हम समोसे खाने का प्रोग्राम बनाते थे अब उस समय कोई भी इतना धन्ना सेठ तो था नहीं की सिर्फ अपनी अकेले की जेब से सबको खिला सके .इसलिए पैसे इकठ्ठे होते थे.हमारा एक साथी हमेशा दो लोगो के पैसे मिलता था एक खुद के ओर दुसरे उसके दोस्त जग्गू के .मजे की बात ये थी की हम में से कोई भी जग्गू से पैसे…

मुस्कान से मुस्कान तक

गुलाब की पंखुरियों से होंठों पर
नन्ही किरण सी वह मुस्कान 
आई थी जन्म के साथ  जन्म भर साथ रहने को.

अपनी मासूमियत के साथ  बढ़ती रही वह मुस्कान  पल पल खिलखिलाते इठलाती रही  होंठों से आँखों तक  ओर पहुंचती रही दिल तक.
समय के उतार चढ़ावों में  सिमटती रही करती रही संघर्ष  किसी तरह बचाने अपना अस्तित्व 
उम्र के तमाम पड़ावों पर  यूं तो कभी ना छोड़ा साथ  लेकिन भूली बिसरी किसी सखी ने  याद किया कुछ इस तरह  'वह 'जो बहुत हंसती थी  अब वही चहरे ओर नाम के साथ  पहचान नहीं आती. 
 पोपले मुंह ओर बिसरती याददाश्त के साथ  फिर आ बैठी है अपने पुराने ठिकाने पर  अपने उसी मासूमियत को पाने में  तमाम उम्र गंवाकर.

एहसास

उस पुरानी पेटी के तले में 
बिछे अख़बार के नीचे  पीला पड़ चुका वह लिफाफा.
हर बरस अख़बार बदला  लेकिन बरसों बरस  वहीँ छुपा रखा रहा वह लिफाफा.
कभी जब मन होता है  बहुत उदास  कपड़ों कि तहों के नीचे  उंगलियाँ टटोलती हैं उसे 
उसके होने का एहसास पा  मुंद जाती है आँखे  काँधे पर महसूस होता है  एक कोमल स्पर्श  कानों में गूंजती है एक आवाज़  में हूँ हमेशा तुम्हारे साथ 
बंद कर पेटी  फिर छुपा दिया जाता है उसे  दिल कि अतल गहराइयों में  फिर कभी ना खोलने के लिए  उसमे लिखा रखा है  नाम पहले प्यार का.

यूं मन का बागी हो जाना...

आज सुबह स्कूल में टी टाइम में एक कलीग आये ओर कहने लगे मैडम प्रसार भारती तीन दिवसीय साहित्यिक कार्यक्रम कर रहा है वासांसि के नाम से जिसमे कई नामी साहित्यकार आ रहे है.अगर हो सके तो आप भी आइये.कई अच्छे रचनाकारों को सुनने का मौका मिलेगा. अभी दो दिन पहले ही तो मैंने अपनी एक कविता उन्हें सुनाई थी.स्कूल में काम के बीच में अपनी रची दो पंक्तियाँ कभी में कभी वो एक दूसरे को सुना देते है जिससे दिन भर काम के बाद सृजन का उत्साह बाकी बच रहता है. कहने लगे उसके पास तो में आज नहीं लाया लेकिन कल ला दूंगा पर आप आज भी जाइये .इंदौर में साहित्यिक कार्यक्रम होते रहते है जिनमे जाने कि इच्छा कभी अकेले होने के संकोच में तो कभी दूर ,रात का समय या किन्ही ओर कारणों से टल जाता है.फिर भी मैंने कहा जी सर में जरूर जाउंगी. हालाँकि ये भी पूछने का समय नहीं मिला कि कार्यक्रम का स्वरुप होगा कैसा?? बस यूंही कह दिया कि जाउंगी लेकिन तब भी ये ना मालूम था कि चली ही जाउंगी.   
शाम साढ़े छ बजे उन्हें फ़ोन करके पूछा कार्यक्रम कितने बजे से है?जवाब मिला ठीक सात बजे से ओर प्रसार भारती के कार्यक्रम समय से शुरू होते है तो आप ठीक टाइम से…