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अलमस्त

घर से निकलते हुए ठिठक कर वह सामने से जाते उस लड़के को ध्यान से देखने लगा। कान में हेड फोन लगाये सीटी बजाता वह लापरवाही से जेब में हाथ डाले टहलता हुआ लगभग रोज़ ही निकलता था और वह रोज़ ही उसे एक नज़र देख ही लेता था। वह खुद भी तो ऐसा ही था चंद सालों पहले अलमस्त सा। अब वह उसे देख कर उन दिनों की याद कर एक उसाँस भर कर रह जाता है। पढाई पूरी होते ही एक बड़ी कंपनी के लाखों के पैकेज की नौकरी के एवज़ में उसने वे दिन कहीं खो जो दिए थे।  कविता वर्मा

गहरे हैं रंग ' कैनवास पर प्रेम ' के

विमलेश त्रिपाठी जी का उपन्यास 'कैनवास पर प्रेम ' के नाम ने ही मुझे आकर्षित किया था। नाम से कहानी का जो कुछ अंदाज़ा हुआ था वो ठीक ठीक होते हुए भी उससे बहुत अलग भी था।  कहानी अपने आप में ढेर सारी त्रासदियों घटनाओं दुविधाओं और दुश्चिंताओं को समेटे एक सम्मोहक माया जाल सा बुनती है जिसमे आप कभी कहीं खो जाते है तो कभी किसी पल पर ठिठक कर उसे महसूस करते रह जाते हैं।  कहीं एक बच्चे के दुःख से उपजते कलाकार को धीरे धीरे बड़ा होते देखते हैं तो कभी उस कलाकार को मौत की ओर कदम बढ़ाते देख काँप जाते हैं इस आशंका में कि ये कहानी पूरी होगी भी या नहीं। कई बार कहानी के अधूरा रह जाने की आशंका जल्दी जल्दी पढ़ कर तसल्ली कर लेना चाहती है लेकिन यकीन मानिये कि उस पल की कशिश आपको एक साथ कई पन्ने पलटने से रोक भी लेती है।  इसमें एक मासूम से प्यार की दास्ताँ है ,तो एक ऐसे दोस्त की कहानी जो बिना कहे सब समझ जाता है तो बिना पूछे सब कर भी जाता है। दोस्ती का ऐसा विश्वास है कि पढ़ते पढ़ते रुक कर आप अपने दोस्तों की फेहरिस्त पर एक नज़र डाल कर उनमे एक ऐसा दोस्त जरूर ढूंढेंगे।  वैसे जिंदगी में कई लोग ऐसे भी होते हैं जिन्हे हम अप…

देहरी

पढाई ख़त्म होते ही सोचा था कही अच्छी सी नौकरी कर के परिवार से रूठी खुशियों को वापस मना लाएगी लेकिन बिना अनुभव बिना सिफारिश कोई नौकरी आसानी से मिलती है क्या ?महीनो ठोकरे खाने के बाद आखिर उसने वह राह पकड़ी। कॉल सेंटर पर काम करने का कह कर शाम ढले घर से निकलती और पैर में घुँघरू बांधे अपने दुःख दरिद्र को पैरों से रौंदते अपने समय के बदलने की राह तकती। पैरों की हर थाप पर मन आशंकित रहता कहीं माँ बाबा को पता ना चल जाये नहीं तो वो जीते जी मर जायेंगे। मन खुद को ही समझाता कि वो जो कर रही है मज़बूरी में और परिवार के लिए ही कर रही है। लेकिन मन ही मानने को तैयार नहीं होता तो माँ बाबा कैसे समझेंगे यह आशंका सदा बनी रहती। मैं उन्हें कभी पता नहीं चलने दूँगी वह खुद से प्रण करती पर उनसे झूठ बोलने की कसक हमेशा बनी रहती। 
ऐसे ही एक शाम खबर आई बाबा को कुछ हो गया है होश ही कहाँ रहा उसे जैसी थी वैसे ही दौड़ पड़ी घर को। यहाँ उसने घुँघरू बंधे पैरो से देहरी लांघी वहाँ बाबा ने आखिरी हिचकी ली। वह वहीं थम गई समझ नहीं पाई उसने अभी देहरी लांघी है या बाबा ने उसी दिन दम तोड़ दिया था जिस दिन उसने घुँघरू बांधे थे। 
कविता वर्मा

इरादा

उसकी सारी कोशिशे सारी जिद अनसुनी कर दी गईं। लाख सिर पटकने पर भी उसकी माँ ने उसे तैरना सीखने की अनुमति नहीं दी। मछुआरे का बेटा तैरना ना जाने , बस्ती के लोग हँसते थे पर वो डरी हुई थीं। ये समुन्द्र उनके जीवनसाथी को निगल चुका था अब वो अपने बेटे को उसके पास भेजने से भी डरती थीं।उसके साथी बच्चे जब लहरों की सवारी करते वह गुमसुम सा उन्हें देखा करता। एक दिन शायद समुन्द्र ही उसकी उदासी से पिघल गया और ऐसा बरसा कि उसके आँगन तक पहुँच गया। उसने भी कहाँ देर की कूद पड़ा उथले पानी में और लगा हाथ पैर चलाने। समुन्द्र और मछुआरे का मिलन हो ही गया। 
कविता वर्मा

जमींदार

मॉल में घूमते हुए चकाचौंध देखते उसके मुँह से एक आह निकल गई। कितना पैसा होता है इन शहर के लोगो के पास। 
वैसे तो गाँव में भी कुछ लोगो के पास बहुत पैसा है। उसे गाँव के जमींदार के ठसके याद आ गए। 
बचपन में एक बार उसने अपने दादाजी से पूछा था, "दादाजी जमींदारो के पास इतना पैसा कहाँ से आता है ?" 
दादाजी ने ठंडी सांस भरकर जवाब दिया था ,"बेटा गरीबो का खून बहुत कीमती होता है अमीर चूसते हैं तो सोना बन जाता है। "खून सोना कैसे बनता है वह समझ न सका था। 
माल से बाहर आते हुए उसकी नज़र सड़क किनारे रेहड़ी लगाये खड़े मैले कुचैले आदमी पर पड़ी। दो अौरतें उससे पाँच रुपये के लिए मोलभाव कर रही थीं। उसने एक नज़र मॉल पर डाली दूसरे ही पल खून का सोना बनना , समझते हुए वह शहरी जमींदारों की संख्या का अनुमान लगाता घर की ओर चल दिया। 
कविता वर्मा

पत्थरों में फूल

छोटे से गाँव की छोटी सी सीमा सी ही तो सोच थी उसके माता पिता की जब उन्होंने आठवी के बाद उसे आगे पढ़ाने से मना  कर दिया था। किसी तरह खुद को बाल विवाह की त्रासदी से बचा कर वह शहर भाग गई थी। कितनी जद्दोजहद कितने संघर्ष के बाद वह अपनी पढ़ाई पूरी कर पाई। माँ बाबा का लाड पीछे खींचता ज्ञान की रोशनी आगे। पत्थर ही तो कर लिया था उसने अपने मन को जिसपर प्यार का कोई अंकुर न फूटने पाये सारे नाते तोड़ दिए ताकि उन पहाड़ों से , ताकि अपना सर ऊँचा उठा सके, लेकिन पहाड़ों से ऊँचे पत्थर हो सके है भला ? आज पत्थरों को भी पहाड़ों की गोद याद आ गई मन दौड़ कर वहाँ पहुँचा लेकिन वक्त के थपेड़ों ने सब छितरा दिया। बचे है तो सिर्फ खंडहर वह अपनी रुलाई ना रोक पाई। समझ नहीं पा रही है ऊपर उठने की चाह गलत थी या आगे बढ़ने की। बेड़ियाँ तोड़ने की या नई मंजिल पाने की ?  सूनी आँखों से एक बार फिर देखा पत्थरों में भी कोपले फूटी हुई हैं। उसके होंठों पर एक मुस्कान आई एक नए संकल्प के साथ वह उठ खड़ी हुई।   कविता वर्मा

जिंदगी की ताल

जिंदगी की ताल 
ऐय लड़कियों सही संझा घर से बाहर ना निकरो ,ज्यादा जोर से न हँसों , आग लगे तोहरे गले में जब देखो फूटे बाँस सो बजत रहत है ,पाँव में तो घूमर पड़े हैं सीधे एक जगह बैठो नहीं जात दिन भर नचती रहती हो। गाँव के हर घर में सुबह से शाम तक हर लड़की यही बातें सैकड़ों बार सुन लेती थी। और बातें सुनाई भी क्यों ना जाएँ आये दिन तो खेत खलिहानों की मेढ़ पर बेटियों की आबरू लूटी जाती थी। पता नहीं ये दरिंदे खेत से ही पैदा हो कर खलिहानों में ही कहाँ गायब हो जाते थे। कभी लड़की की जिन्दा लाश मिलती तो कभी किसी पेड़ से लटकी हैवानियत की दास्ताँ मिलती।
लड़कियों का घर से निकलना पढ़ना लिखना सब बंद हो चुका था .हर तीसरे घर में जिंदगी को लाश की तरह ढोती और लाश बनने से डरती जिंदगियाँ सिसक रहीं थीं। तीज त्यौहार शादी ब्याह सभी तो डर के साये में गुजरते थे।
एक दिन कुछ जिन्दा लाशों ने खुद में दबी पड़ी चिंगारी को फूंक मार कर सुलगाया और प्रण किया की अब और नहीं। नन्ही कलियों को खिलने खिलखिलाने से अब नहीं रोका जायेगा। हम इनकी रक्षा करेंगे उस दिन जब इन लाशों में प्राण फुंके इनके हाथों में चूड़ियों की जगह बंदूकें आ गई कई कद्दवारों …

सपनों के परिंदे

मैं तुम्हे बहुत प्यार करता हूँ जी चाहता है तुम्हे अपनी पलकों में छुपा कर रखूँ सिर्फ मैं ही तुम्हे देखूँ और कोई ना देख सके। तुम्हारी नीली आँखों में सिर्फ मेरा ही अक्स हो सिर्फ मेरा। तुम भी मुझे इतना ही प्यार करती हो न ? उसके प्यार के इस इज़हार में उसकी भावनाओं का ज्वार उमड़ रहा था। प्यार तो मैं भी करती हूँ लेकिन क्या सच में इतना ? मैं तो ऐसा कुछ नहीं सोचती तो क्या मेरा प्यार कुछ कम है ?जाने क्यों एक अपराध बोध सा भर गया था मुझमे। तुमने फिर मुझे झकझोरा था बोलो ना।  मैं अभिभूत सी तुम्हारी बाँहों में समां गई थी खुद के भाग्य पर इठलाती।  अपने प्यार का विस्तृत आसमान पा कर मेरे सपनों के छोटे छोटे परिंदे पंख फड़फड़ाने लगे।  तुम्हारे प्यार का स्वर्ण महल मुझे खूब भाया और मैं उसमे खो गई। मेरे सपनों के परिंदे मुझे खुश देख कर कुछ समय तक अपनी उड़ान की आकांक्षा को मन के कोने में दबाये बैठे मुझे निहारते रहे  लेकिन कब तक ? धीरे धीरे एक एक करके उन्होंने पंख फड़फड़ाने शुरू किये उनकी उड़ने की बैचेनी ने मुझे भी बैचेन कर दिया। मैं भी तो उन स्वप्न परिंदों के साथ उड़ना चाहती थी लेकिन तुम्हारे प्यार ने मुझे कैद कर लिया था…

नेपथ्य

नेपथ्य 
तेल चाल उखड़ी सांसे थकित तन और डूबता मन लिए वह चला जा रहा था कहाँ खुद भी नहीं जानता। उदासी ज्यादा गहरी थी या अन्धकार ये सोचने का ध्यान कहाँ था। आगे रास्ता है या नहीं ये समझने की कोशिश ही कहाँ की बस चलता रहा मानो मन की गति को मात देने भाग रहा हो बिना रुके बिना सोचे। मन छले जाने से व्यथित था या कुछ न कर पाने से ये भी तो नहीं पता। जीवन के झंझावातों से थक चुका था वह और अब तो उसके पैरों के नीचे से जमीन ही छीन ली गई थी। मन की गति ने थका दिया तो पैरों की गति अपने आप थम गई सामने अपार विस्तार सागर लहरा रहा था। लहरें किनारे पर सर पटक पटक ना जाने किस परेशानी को सुलझाने की कोशिश में लगी थीं।
किनारे खड़ा प्रकाश स्तम्भ पूरी ताकत से दूर तक रौशनी बिखेर रहा था वह वहीँ किनारे बैठ गया। लहरों पर पड़ती प्रकाश किरणे झंझावातों के कारण द्विगुणित हो कर ज्यादा चमक बिखेर रही थीं। बादलों की कालिमा के नेपथ्य में रोशनी की चमक कई गुना बढ़ कर ज्यादा दूर तक भटकों को राह दिखा रही थी।
इस विचार ने मानों उसके मन को प्रकाशित कर दिया।

बलि

आज ग्यारह तारीख हो गयी तनख्वाह नहीं मिली कर्मचारियों में बैचेनी थी धीमे स्वर में सुगबुगाहट फ़ैल रही थी लेकिन कोई खुल  कर सामने नहीं आ रहा था। विजया के मन में भी भारी उथल पुथल चल रही थी। आज सुबह ही उसने पति से कुछ पैसे मांगे थे जिसके बदले उसे झिड़की सुनने को मिली थी और मिले थे जरूरत से काफी कम रुपये एक एहसान सा जताते हुए। उसका मन विद्रोह कर उठा इच्छा तो हुई पैसे वापस कर दे लेकिन उसके बाद जो तूफ़ान उठ खड़ा होता उसे टालना ही ठीक था इसलिए चुपचाप रख लिए।  हमेशा के इस अपमान से छुटकारा पाने के लिए ही वह नौकरी करने निकली थी सोचा था जब नौकरी करेगी तो उसके हाथ में खुद के कुछ पैसे होंगे और वह सम्मान से जीने की उम्मीद तो क्या करती लेकिन हाँ उस हद तक तिरस्कार से शायद बच सकेगी।   लेकिन इस नौकरी में जहाँ लगभग सभी महिला कर्मचारी है उनको उनकी मेहनत का पैसा देने में भी कोताही। छुट्टी से कुछ ही पहले एक एक को बुला कर तनख्वाह दी गयी लेकिन वह तय शुदा से काफी कम थी। विजया  के मन में असमंजस गहरा गया क्या करे इतने इंतज़ार के बाद मिले इन पैसों पर अपने सम्मान को कुर्बान कर के इन्हे रख ले या अपने आत्म सम्मान पर कुछ दिन…

सबसे बड़ी ख़ुशी

पापा आज फिर आप मेरे लिये उड़ने वाला फाइटर प्लेन नहीं लाये नन्हे रोहित ने ठुनकते हुए कहा तो छोटी मुनिया कैसे पीछे रहती वह भी पापा के पैरों से लिपट कर गुड़िया ना लाने लिए उलाहना देने लगी। शशांक ने बेबसी से अपनी पत्नी की ओर देखा। अपने नन्हे बच्चों की छोटी छोटी ख्वाहिशे पूरी न कर पाने का दर्द उसकी आँखों में झलक आया था। शोमा क्या कहती समझती तो वह भी थी शशांक का दर्द उसकी मजबूरी। अचानक नौकरी छूट जाने की वजह से जीवन की गाड़ी पटरी से उत्तर गयी थी लेकिन नन्हे बच्चों को कैसे समझाया जाये ?शशांक सारा दिन दफ्तरों की खाक छानता शाम को जब उदास सा घर लौटता बच्चों की मासूम इच्छाए पूरी न कर पाने का दर्द नौकरी न मिलने के दर्द से मिल कर कई गुना हो जाता।
शशांक ने मुंह हाथ धोने के बहाने अपना दर्द धोने की कोशिश की और पत्नी से रोहित और मुनिया को तैयार करने को कहा।
"लेकिन कहाँ ले जाओगे उन्हें ?और अभी इतना खर्च कहाँ से करोगे पता नहीं अभी और कितने दिन …। "कहते कहते शोमा ने बात अधूरी छोड़ दी।
ये हमारे जिंदगी के संघर्ष हैं लेकिन बच्चों को खुश रखने की जिम्मेदारी मेरी है पिता हूँ मैं उनका। उन्हें खुशियां देना मेर…

हिस्सा ( लघुकथा )

मैरिज हाल के बाहर लगभग रोज़ ही जूठन का ढेर लगता था। आसपास की बस्तियों के बच्चे बूढ़े अौरतें बाहर खड़े हो कर इंतज़ार ही करते  थे कि कब अंदर खाना पीना शुरू हो कब ख़त्म हो और कब वे अपनी क्षुधा शांत करने के लिए जूठन पाएं जो कि उनके लिए बहुत बड़ी नेमत थी। जूठन के लिए यदा कदा उन लोगों में झगड़ा मारपीट तक हो जाती;  इसलिए जिसके हाथ जो आ जाता उसे लेकर वहां से दूर भागता ताकि ठीक से खा सके।  वह बच्चा उस दिन शायद बहुत भूखा था लेकिन अकेला था बहुत कोशिशों के बाद भी वह भीड़ को चीर कर खाने के लिए कुछ नहीं जुटा पाया तो रुआँसा सा भीड़ से दूर गली के कोने पर जा कर खड़ा हो गया और ललचाई दृष्टी से छीना झपटी करते लोगों को देखने लगा।  एक बारगी तो लगा कि उस को आज भूखे ही रहना होगा। भगवान के इंसाफ पर शक होने लगा एक बेबस की भूख के लिए कोई जुगाड़ नहीं। तभी गली के छोर से दो लड़के हाथ में खाने का पैकेट लेकर गुजरे उनका पेट भर चुका था उन्होंने बचा हुआ खाना गली में फेंक दिया। वह बच्चा तुरंत उस पर झपटा और मिटटी पड़े खाने को वहीँ से खाने लगा।  एक बारगी भगवान के इन्साफ पर यकीन हुआ  कि हर भूखे के लिए भोजन मुक़र्रर किया है ये बात अलग है  …

यादों का स्वाद

बचपन में झाबुआ जिले में रहते थे वहाँ आदिवासी जंगल से टोकनी भर भर केरियाँ  लाते थे और बहुत सस्ते में टोकरी का सौदा कर जाते थे।  गाँव का बहुत लम्बा चौड़ा मकान था। एक कमरे में पापा घास का पुआल बिछा कर वो कच्ची केरियाँ उस में रख देते थे कमरा बिलकुल बंद रहता था वह कमरा बार बार खोलने की मनाही थी( उसे पाल कहते थे ) .  दो चार दिन में केरियाँ पक कर आम बन जाती थीं। सुबह सुबह पापा उसमे से पके आम निकालते और आँगन में रख देते थे। मैं और दोनों भाई तालाब में तैरना सीखने जाते थे वहाँ से आ कर तेज़ भूख लगती थी तो आम खाने बैठ जाते थे, दादी आम का रस बनाती थीं ,खाने के लिए। उसके बाद जो आम बच जाते थे उसका रस थालियों में रख कर धूप  में सुखा  लिया जाता था आम पापड़ बनाने के लिए। उसमे कुछ आम उतर (ज्यादा पक कर स्वाद ख़राब हो जाना ) जाते थे। 
उस समय एक आदिवासी नौकर पीने का पानी नदी किनारे बने कुँए से लाता था। मम्मी ने उससे कहा , ये आम किसी के यहाँ ढोर डंगर हों तो उनके यहाँ दे दो वो खा लेंगे।   उसने आम देखे और कहने लगा बाई साब ये तो अच्छे आम हैं मैं मामा लोगों (भील भीलाले ) को बेच दूँगा कुछ पैसे आ जाएँगे।  मम्मी हैरान , …

समीक्षा :'परछाइयों के उजाले '

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ड़ॉ वीरेंद्र स्वर्णकार निर्झर , सेवा सदन कॉलेज बुरहानपुर के हिंदी विभागाध्यक्ष ने मेरे कहानी संग्रह 'परछाइयों के उजाले ' की समीक्षा भेजी है।



समीक्षा :एक देश और मरे हुए लोग - विमलेश त्रिपाठी

कविता संग्रह - एक देश और मरे हुए लोग - विमलेश त्रिपाठी


एक देश और मरे हुए लोग 
विमलेश त्रिपाठी जी का काव्य संग्रह ' एक देश और मरे हुए लोग'  हाथ में आने से पहले ही उनकी कई रचनाओं से फेस बुक के माध्यम से रूबरू हो चुकी थी।  उनकी कविताओं के विषय और उनका प्रस्तुतीकरण कवि की व्यवस्थाओं से उत्पन्न छटपटाहट का ताना बाना खींच देता है।   पूरा संग्रह पाँच खण्डों मे बंटा है हर खंड में कमोबेश एक मिज़ाज़ की रचनाओं का संकलन है।   पहला खंड 'इस तरह मैं ' में एक आदमी के आदमी होने की मज़बूरी , जिजीविषा और कसक को उकेरा गया है। कोलकाता जैसे बड़े शहर मे रहने के बावज़ूद भी अपनी जमींन से दूर होने और उनकी यादों से जुड़े होने का नॉस्टेलजिया छलक पड्ता है।   पाठशाला का हुआ है विस्तार पास के कुऐं मे भर गई है मिट्टी / जिसके होने के निशान बाक़ी हैं मेरे अन्दर।  'एक गॉँव हूँ ' में गाँव छोड़ कर आने की मज़बूरी एक कसक के साथ उभरी है।  पत्थर बनते रहे धीरे धीरे पत्थरों बीच /सपने में कोई शहर नहीं आया क़भी  / नींद जब खुली तो हर बार गाँव से शहर आया।  लुप्त होती पर्यावरणीय चेतना ,प्रक़ृति ,पंछी का छूटता साथ , उनसे टूटते …

'परछाइयों के उजाले' का विमोचन

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मेरे कहानी संग्रह 'परछाइयों के उजाले' का विमोचन वरिष्ठ चर्चाकार श्रीं जीवन सिंह ठाकुर और रंगकर्मी श्री ओम द्विवेदी के हाथों सम्पन्न हुआ।



"परछाइयों के उजाले " का लोकार्पण

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मेरी पुस्तक "परछाइयों के उजाले " का लोकार्पण


बातें-कुछ दिल की, कुछ जग की: “परछाइयों के उजाले” – आईना ज़िंदगी का

बातें-कुछ दिल की, कुछ जग की: “परछाइयों के उजाले” – आईना ज़िंदगी का: कविता वर्मा जी के कहानी लेखन से पहले से ही परिचय है और उनकी लिखी कहानियां सदैव प्रभावित करती रही हैं. उनका पहला कहानी संग्रह “परछाइयों क...

"परछाइयों के उजाले " प्रतिक्रिया

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मेरे प्रथम कहानी संग्रह "परछा इयों के उजाले " पर "बेअदब साँसे "के रचयिता श्री राहुल वर्मा जी कि प्रतिक्रिया अभी अभी प्राप्त हुई जिसे मैं आप सभी के साथ साझा कर रही हूँ।


मेरी कहानी वनिता फरवरी अंक में …

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मेरी कहानी वनिता फरवरी अंक में  … 

पीड़ा

कहाँ थीं तुम सारी रात ?जलते हुए प्रश्न में किसी अनहोनी की चिंता के स्थान पर अविश्वास की छाया पा कर सुराली के कदम एक पल को ठिठके। मन में क्षोभ उत्पन्न हुआ बीस बरस के साथ का विश्वास एक रात में चुक गया। मन हुआ एक तीखा सा उत्तर दे लेकिन फिर खुद को रोक लिया और अंदर चली गयी। 
अविश्वास की जिस कटार से उसका दिल छलनी हुआ है जवाब ना मिलने से उपजी आशंका की पीड़ा उसे भी तो झेलने दो ,फिर तो अभी भाई आ कर बता ही देंगे कि माँ के पास हॉस्पिटल में थी वह सारी रात।
कविता वर्मा 



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भास्कर मधुरिमा पेज़ २ पर मेरी कहानी 'शॉपिंग '…
http://epaper.bhaskar.com/magazine/madhurima/213/19022014/mpcg/1/

ऐसा भी होता है

गली के नुक्कड़ पर जब से पान की दुकान खुली है मोहल्ले के लड़कों को ठिया मिल गया। सुबह से शाम तक मज़मा लगा रहता ,बातें और ठहाके गूंजते रहते। हालांकि किसी ने कोई ऐसी वैसी बात या हरकत नहीं की थी लेकिन फिर भी लड़कियाँ और औरतें वहाँ से गुज़रते हुए सिर और नज़रें झुका लेतीं। मोहल्ले के बड़े बूढ़े उनकी हँसी पर कुढ़ते रहते।  एक सुनसान दोपहर किसी लड़की की चीख़ के साथ दौड़ने भागने चिल्लाने की आवाज़ें सुनाई दीं तो लोग दरवाज़े खोल कर बाहर आ गये, सभी को आशंका थी कि इन लड़कों ने किसी को छेड़ा होगा ,ये तो होना ही था।  तभी एक लड़का मोहल्ले की एक लड़की को उसके घर तक छोड़ कर तेज़ी से वापस भागा। लड़की ने रोते हुए बताया बाज़ार से एक लड़का उसका पीछा करते हुए मोहल्ले तक आ गया। नुक्कड़ पर खड़े लड़कों ने उसे फब्तियाँ करते सुना तो सबने मिलकर उसकी पिटाई कर दी और उन्ही में से एक भैया उसे हिफाज़त से घर तक छोड़ने आये। सब हतप्रभ थे।  कविता वर्मा

पहली समीक्षा और प्रतिक्रिया कहानी संग्रह 'परछाइयों के उजाले

मेरे कहानी संग्रह 'परछाइयों के उजाले 'कि पहली समीक्षा और प्रतिक्रिया।

Upasna Siag लेखिका कविता वर्मा जी की कहानियों की मैं बहुत प्रशंशक हूँ। सबसे पहले मैंने उनकी लिखी कहानी वनिता पत्रिका में पढ़ी। मुझे बहुत पसंद आई। कहानी का नाम था " परछाइयों के उजाले " !
जब मुझे मालूम हुआ कि उनका प्रथम कहानी संग्रह "परछाइयों के उजाले" के नाम से प्रकाशित हुआ है तो मुझे बहुत ख़ुशी हुई। मैंने कविता जी से यह संग्रह भिजवाने का आग्रह किया। अभी कुछ दिन हुए मुझे यह मिला।
कविता जी कि लेखनी में एक जादू जैसा कुछ तो है जो कि पाठक को बांध देता है कि आगे क्या हुआ। लेखन शैली इतनी उम्दा है कि जैसे पात्र आँखों के सामने ही हों और घटनाएं हमारे सामने ही घटित हो रही हो।
बारह कहानियों का यह संग्रह सकारात्मकता का सन्देश देता है। इनके प्रमुख पात्र नारियां है। नारी मनोविज्ञान को उभारती बेहद उम्दा कहानियाँ मुझे बहुत पसंद आया। मेरी सबसे पसंद कि कहानियों में है ,' जीवट ' , 'सगा सौतेला ', 'निश्चय ',' आवरण ' और 'परछाइयों के उजाले '। बाकी सभी कहानियां भी बहुत अच्छी है।
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परछाइयों के उजाले

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'Parchhaiyon ke Ujale', a book by Kavita Verma .Stories are describing human behavior,women psychology ,their pressure and difficulties in taking decisions in day to day life and when pressure is in its extreme how they come up with strength to take decisions .

परछाइयों के उजाले लेखिका कविता वर्मा  सामाजिक कहानियाँ  मूल्य १२० रुपये (२४ फरवरी के पहले ऑर्डर पर ) फ्री पोस्टल  आर्डर via  ई मेल kvtverma27@gmail.com

देसी पीसा की मीनार हुमा टेम्पल

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यात्रा पर जाने का असली रोमांच होता है अजनबियों से मिलना ,बातें करना नयी नयी जानकारियाँ हासिल करना। पुरी से वापसी में ट्रेन में किसी कपल से मुलाकात हुई ,उन्होंने बताया कि सम्भलपुर के पास एक बहुत पुराना शिव मंदिर है जो तिरछा बना है जैसे की 'पीसा की मीनार ' य़ह मंदिर बहुत पुराना है और कई सालों से जस का तस है। ना ज्यादा झुका न गिरा। उन्होंने बहुत आग्रह करके कहा कि हम वह मंदिर जरूर देखें।  सुनकर बहुत उत्सुकता हुई लेकिन वहाँ जाने का रास्ता ,साधन की कोई जानकारी नहीं थी। 

खैर झारसुगुड़ा से हम पहले रेलवे स्टेशन पहुँचे लेकिन सम्भलपुर के लिए कोई ट्रेन अगले दो घंटे तक नहीं थी इसलिए वहाँ से बस स्टैण्ड गए। वहाँ हर आधे घंटे में सम्भलपुर के लिए बस मिलती है तो जो बस सामने दिखी उसी में बैठ गए। गाँवों कस्बों में चलने वाली गंतव्य तक पहुँचा देने वाली बस। रुकते रुकाते सवारियाँ चढ़ाते उतारते डेढ़ घंटे में उसने हमें सम्भलपुर में उतार दिया। यहाँ ऑटो वालों ने हमें घेर लिया। जैसे किसी विदेशी फ़िल्म में किसी भारतीय का चेहरा देखते ही हम चिंहुक जाते हैं वैसे ही ये ऑटो वाले पर्यटकों को देखते ही। मज़े की बात तो ये …