Sunday, May 25, 2014

यादों का स्वाद

बचपन में झाबुआ जिले में रहते थे वहाँ आदिवासी जंगल से टोकनी भर भर केरियाँ  लाते थे और बहुत सस्ते में टोकरी का सौदा कर जाते थे।  गाँव का बहुत लम्बा चौड़ा मकान था। एक कमरे में पापा घास का पुआल बिछा कर वो कच्ची केरियाँ उस में रख देते थे कमरा बिलकुल बंद रहता था वह कमरा बार बार खोलने की मनाही थी( उसे पाल कहते थे ) .  दो चार दिन में केरियाँ पक कर आम बन जाती थीं। सुबह सुबह पापा उसमे से पके आम निकालते और आँगन में रख देते थे। मैं और दोनों भाई तालाब में तैरना सीखने जाते थे वहाँ से आ कर तेज़ भूख लगती थी तो आम खाने बैठ जाते थे, दादी आम का रस बनाती थीं ,खाने के लिए। उसके बाद जो आम बच जाते थे उसका रस थालियों में रख कर धूप  में सुखा  लिया जाता था आम पापड़ बनाने के लिए। उसमे कुछ आम उतर (ज्यादा पक कर स्वाद ख़राब हो जाना ) जाते थे। 
उस समय एक आदिवासी नौकर पीने का पानी नदी किनारे बने कुँए से लाता था। मम्मी ने उससे कहा , ये आम किसी के यहाँ ढोर डंगर हों तो उनके यहाँ दे दो वो खा लेंगे।  
उसने आम देखे और कहने लगा बाई साब ये तो अच्छे आम हैं मैं मामा लोगों (भील भीलाले ) को बेच दूँगा कुछ पैसे आ जाएँगे। 
मम्मी हैरान ,  ये सड़े आम कौन खरीदेगा ?
वो बोला यहाँ दूर गाँव के जो गरीब आदिवासी आते हैं वो अच्छे आम तो खरीद नहीं पाते वो ऐसे ही आम खरीद के खाते  हैं। यहाँ गाँव के बनिया लोग जो पाल लगाते हैं  उसमे से निकले ख़राब आम बेच देते हैं। वाकई मैंने गाँव के बड़े बड़े साहूकारों के अौटले पर ऐसे ख़राब आम की ढेरी बिकते देखी है। 
मम्मी ने कहा तुम ये आम ठेले पर रख लो और नदी पर जाते समय जो गरीब लोग मिले उन्हें बाँटते जाना। फिर ये रोज़ का क्रम बन गया था।  ( सन १९७८/८० ) ( बिटिया के संग आम खाते पुरानी यादों का स्वाद .)

Wednesday, May 14, 2014

समीक्षा :'परछाइयों के उजाले '

ड़ॉ वीरेंद्र स्वर्णकार निर्झर , सेवा सदन कॉलेज बुरहानपुर के हिंदी विभागाध्यक्ष ने मेरे कहानी संग्रह 'परछाइयों के उजाले ' की समीक्षा भेजी है।



Sunday, May 4, 2014

समीक्षा :एक देश और मरे हुए लोग - विमलेश त्रिपाठी

कविता संग्रह - एक देश और मरे हुए लोग - विमलेश त्रिपाठी


एक देश और मरे हुए लोग 
विमलेश त्रिपाठी जी का काव्य संग्रह ' एक देश और मरे हुए लोग'  हाथ में आने से पहले ही उनकी कई रचनाओं से फेस बुक के माध्यम से रूबरू हो चुकी थी।  उनकी कविताओं के विषय और उनका प्रस्तुतीकरण कवि की व्यवस्थाओं से उत्पन्न छटपटाहट का ताना बाना खींच देता है।  
पूरा संग्रह पाँच खण्डों मे बंटा है हर खंड में कमोबेश एक मिज़ाज़ की रचनाओं का संकलन है।  
पहला खंड 'इस तरह मैं ' में एक आदमी के आदमी होने की मज़बूरी , जिजीविषा और कसक को उकेरा गया है। कोलकाता जैसे बड़े शहर मे रहने के बावज़ूद भी अपनी जमींन से दूर होने और उनकी यादों से जुड़े होने का नॉस्टेलजिया छलक पड्ता है।  
पाठशाला का हुआ है विस्तार पास के कुऐं मे भर गई है मिट्टी / जिसके होने के निशान बाक़ी हैं मेरे अन्दर। 
'एक गॉँव हूँ ' में गाँव छोड़ कर आने की मज़बूरी एक कसक के साथ उभरी है। 
पत्थर बनते रहे धीरे धीरे पत्थरों बीच /सपने में कोई शहर नहीं आया क़भी  / नींद जब खुली तो हर बार गाँव से शहर आया। 
लुप्त होती पर्यावरणीय चेतना ,प्रक़ृति ,पंछी का छूटता साथ , उनसे टूटते रिश्तों की कसक लेकिन फ़िर भी पृथ्वी से जुड़ाव, यहीं रहने की ललक को सुन्दर और सरल शब्दों मे उकेरती रचनाएँ हैँ 'कहीं जाऊँगा नहीं ', 'मैं एक पेड़ ', 'पेड़ से कहता हूँ ', 'खिड़की पर फरगुदिया ' आदि।  
रिश्तों को करीब से देखते उनकी छटपटाहट को समझते हुए कुछ न कर पाने का दुख और उसे बाँट ना पाने का अफ़सोस, रोज़ी रोटी की मज़बूरी में अपनी जडें छोङ ज़मीन तलाशने की जद्दोजहद सोचने को विवश कर जाती है।  
अपने ही अन्दर जमीन का  कोई टुकङा बीनता सोचता हूँ मैं। 
कला जगत की दुश्वारियों पर व्यंग करते हुए उन्होने सहज शब्दों मे स्वीकार किया है कि वह अपनी नियति खुद चुनना चाहते हैं। ईमानदारी और सच्चाई की दुरुहता कुछ  तरह प्रकट हुए है ,
मैं हर बार सच बोलता / इस आशा मे / कि एक न एक दिन उसे / सच समझा जायेगा।  
इस दौर में सिर्फ इंसान बन कर रहना कितना मुश्किल है जबकि हर कोई ख़ास बनने क़ी कोशिश में और खास दिखने क़ी ख्वाहिश मे अपने अन्दर के इन्सान को पराजित करता जा रहा है। यह छटपटाहट और बैचेनी कई कविताओँ मे उभर कर आई  है जो कवि के सरल मन के दर्शन करवातीं है।  
ग्रामीण जीवन की त्रासदी, विकास का वहाँ ना पहुँच पाना, रोज़गार की तलाश में खाली होते गाँव , बाट जोहते भीख माँग  कर गुज़ारा करते बूढ़े और औरतें , सूखती नदियाँ , नहरें , पीछे छूटती अमराई , भगुआ चैता , कज़री जंतसार क़ी कसक के साथ मज़बूरियों को शब्द देती ये दो पंक्तियाँ अंतस को हिला देती हैं।  
इस तरह मैं कि बिना किसी  तर्क के बाजार मे खड़ी वह लङकी / जिसके लिए पेट ओर पेट के निचले हिस्से मे फर्क नहीं कोई।  

दूसरा खण्ड 'बिना नाम की नदियाँ ' में स्त्री होने की विवशता और अभिशप्त उनके भाग्य को बयान करती ये पंक्तियाँ 
पिता कहते अपना भाग्य लेकर आईं थीं साथ / इस तरह किसी दूसरे से नहीं जुड़ा था उनका भाग्य / सबका होकर रहना था पूरी उम्र अकेले हीं / उन्हें अपने हिस्से के भाग्य के साथ। 
दुखों से सामंजस्य की उनकी  क्षमता कुछ ऐसे बन पडी है 
उनके पास अपना कुछ नहीं था / सिवाय लड़की जात के उलाहने के / फिर भी खूब हँसती थीं वे। 
इन कविताओं मे तमाम बंधनों के बावज़ूद समय से थोड़ा वक्त अपने लिये चुराकर अपने सपनों को ज़ी लेने की जद्दोजहद करती लड़की, अपने दुःखों को हँसी ओर कहकहे क़ी चादर तले छुपा कर अपने अनुत्तरित प्रश्नों के साथ सदियों से जीती चली आ रही बेटियों के दुख को बख़ूबी शब्द दिये हैं।  भाइयों के प्रति उनके स्नेह ,क़भी कभी ईर्ष्या और पूरी उम्र निकलते इस प्रेम को समझ पाना  ए असफल की कहानी  'प्रेम ' की याद दिला देता है।  

तीसरा खण्ड 'दुःख सुख का संगीत' बचपन की सहेजी यादों से आज जमाने के सपनों और हकीकतों के अन्तर पर चुभती हुए दृष्टि डालता है। 
इसी खण्ड समाज़ मे व्याप्त जाति धर्म कि दीवारों पर चोट करतीं , अंतस के प्रेम और विश्वास को पोसती कई रचनाऐं हैं 
संबंधों  को नदी के पानी की तरह बचाना /सहेजना एक एक उसे प्रेम पत्रों की तरह 
या कि , मेरी ख़ुशी मे शामिल रहे तुम हमेंशा /तुम्हारे डर में शामिल रहा हमेशा मेरा डर

खण्ड 'कविता नहीं ' में कवि होने की आचार संहिता और जिजीविषा को ककहरे और जीवट के साथ उभारा है।  कविता कागज़ पर उकेरे कुछ अक्षर कुछ वाक्य नहीं हैं बल्कि पूरे समाज के साथ इंसान की इन्सान होने की जद्दोज़हद है। 
महज़ लिखनी नहीं होती है कविताएँ / बोलना ओर चलना होता है चार नहीं तो दो कदम ही /आदमी की तरह आदमी के लिये। 
बिना महसूस किये सिर्फ़ लिखने के लिये लिखने वालों पर एक मीठा व्यंग है जिसे यूँ तो मीठी गोली समझ कर निगला जा सकता है पर जब धीरज के साथ चूसा जाता है तो व्यंग  क़ी तल्ख़ी अंतस को चीर  देतीं है।  

' एक देश और मरे हुए लोग ' खण्ड की कविताएँ देश की दुर्दशा और आम आदमी की बेबसी को रोज़मर्रा क़ी छोटी छोटी  घटनाओं के गहन चिन्तन के साथ प्रस्तुत करती हैं। आम आदमी कब, कहाँ, क्यों किसी को गालियाँ देता है जैसी छोटी सी बात का विस्तृत विश्लेषण करती कई रचनाऐं लेखक की गहन गंभीर सोच को प्रस्तुत करतीं हैं।  क्या आम आदमी की नपुंसक क्रोध के प्रकटीकरण का दूसरा हथियार कविता है ? 
मैं अकेले घर मे बैठ कर / देता हूँ गालियाँ / इन सबके लिये जिम्मेदार लोगों को / और किसी को नहीं जानता।  
हर खण्ड मे एक शीर्षक से कई कई रचनाऐं हैं जो उस विचार को विस्तार देती हैं लेकिन उसे दुहराव से बचाते हुए हर बार उसे एक नये आयाम से देखते हुए। 'एक पागल आदमी की चिठ्ठी ', 'पानी ', 'आदमी की कविता ', में ये आयाम आपको हैरान कर देते हैं।  
पागल आदमी की चिठ्ठी मे /नींद नहीं होती /असंभव सपने होते हैं।  
या , पागल आदमी की चिठ्ठी मे रँग नहीं लिखे होते / हर रंग को समझता बूझता हुआ /जीवन भर वह बेरंग ही रहता है।  
शीर्षक कविता एक कहानी की तरह उत्सुकता जगाती आगे बढ़ती है जिसमे मरे हुए लोगों का प्रतिमान मरी सडी गली व्यवस्थाओं और उसे उसी तरह ढोते ओर ढोना चाहते लोगों के लिये किंचित व्यंग , आक्रोश और चिंता प्रतिपादित करते हैं।  यह कविता मरे लोगों के समाज मे जिन्दा व्यक्ति की त्रासदी और उसकी बैचेनी को जिस संवेदना के साथ बयान करती है उसमे इतिहास से लेकर वर्तमान तक को जिस खूबी के साथ समेटे है , कईं  ऐतिहासिक व्यक्तियों और  घटनाओं को बिना नाम लिये कह जाती है वह पढ़ना और समझना अभिभूत कर देता है। 
विमलेश जी की कवितायें सिर्फ़ पढनें के लिये नहीं हैं ,ना ही एक बैठक मे पूरी किताब खत्म कर देना कोई जीत या समझदारी है।  ये कवितायें सतत बहती हैं लेकिन आपको एक एक कविता पर ठहर कर उसे बार बार पढ़ने   समझने  और आत्मसात करने को विवश करती हैं। आगे बढ़कर बार बार पीछे लौटने को पुकारती ये रचनाऐं अपने सरल सहज शब्दों , सामान्य होते हुए भी गहरी संवेदनात्मक अनुभूति से विशेष  बन गयी छोटी छोटी बातों को सँजोये आपको हतप्रभ कर जाती हैं कि ये सब तो हमने भी देखा सुना था फ़िर इसे ऐसे महसूस क्यों नहीं कर पाये ? उत्तर बहुत आसान  है एक देश ओर मरे हुए लोग मे।  
कविता वर्मा 


वह अनजान औरत

पार्क में सन्नाटा भरता जा रहा था मैं अब अपनी समस्त शक्ति को श्रवणेन्द्रियों की ओर मोड़ कर उनकी बातचीत सुनने का प्रयत्न करने लगा। पार्क...