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रंगो का त्यौहार होली

रीमा का मन आज बहुत उदास था। पति और बच्चों के जाने के बाद वह अनमनी सी काम निबटा रही थी। ऊब गई थी वह अपनी रूटीन जिंदगी से। तभी फोन की घंटी बजी। शहर के दूसरे छोर पर रहने वाली उसकी मौसेरी बहन का फोन था। क्या कर रही है सब काम छोड़ और जल्दी से घर आ जा। लेकिन किन्तु परन्तु सुनने के मूड में वह नहीं थी। इतनी दूर जाना। और  हाँ ऑरेंज साडी या सूट पहन कर आना ,कह कर उसने फोन रख दिया। पता नहीं क्या है अब मना भी नहीं किया जा सकता। वहाँ रीमा का स्वागत हंसी ठहाकों से हुआ। सारी मौसेरी ममेरी बहनें और भाभियाँ वहाँ इकठ्ठी थीं। सारा दिन हंसी ठहाकों खाने पीने और फोटो खींचने में निकल गया। सब एक रंग में रंगी थीं ऑरेन्ज और प्यार के रंगों में। शाम को जब रीमा घर लौटी वह रिश्तों के रंग में सराबोर थी उसकी उदासी गायब हो चुकी थी।   जब से  नीलू की नानीजी का देहावसान हुआ वह बचपन की उन यादों से ही बाहर नहीं आ पा रही थी। उसके मूड को देखते हुए घर में सब कुछ खामोश सा था। उस दिन उसकी बेटी कॉलेज से आ कर किचन में घुस गई। लाख कहने पर भी नीलू को न कुछ बताया और ना किचन में आने दिया। शाम की चाय के साथ उसने रंग बिरंगी भेल और हरे भ…