Monday, December 23, 2013

ग्यारह बजे का अपॉइंटमेंट

बिटिया बहुत दिनों से शिकायत कर रही थी की उसके बाल बहुत झड़ रहे हैं। कई शैम्पू बदल लिए खाने पीने में सुधार तो माना नहीं जा सकता था दो दिन बादाम खाईं चार दिन की छुट्टी ,धुन तो ये सवार थी कि किसी अच्छे डॉक्टर को क्यों नहीं दिखाया जा रहा है खैर उसकी तसल्ली के लिए एक स्किन स्पेशलिस्ट से आज सुबह ग्यारह बजे का अपॉइंटमेंट लिया गया और ग्यारह बज कर तीन मिनिट पर क्लिनिक में पहुँच भी गए। (अब तीन मिनिट की देरी तो हम भारतियों का हक़ है )खैर ,वहाँ जा कर अपना नाम बताया विज़िटर्स स्लिप भरी फीस जमा की और अपनी बारी का इंतज़ार करने लगे। डॉक्टर के क्लिनिक में कोई पेशेंट था तो सोचा शायद हमसे पहले वाले का नंबर चल रहा होगा। 
थोड़ी देर इंतज़ार के बाद किसी और महिला को अंदर जाने का कहा गया ,मैंने रिसेप्शन पर बैठे लडके से पूछा "हमारा ग्यारह बजे का टाइम था" तो जवाब मिला "जी मेम उनका भी ग्यारह बजे का ही टाइम था। "
"आप एक टाइम कितने लोगो को देते है ?"
"चार लोगों को " बिना किसी झिझक के जवाब मिला। 
अब हमारा चौकना स्वाभाविक था। "ग्यारह से साढ़े ग्यारह तक का एक स्लॉट होता है जिसमे सभी को ग्यारह बजे का टाइम दिया जाता है जो पहले आ जाये वह पहले जाता है। "
"ऐसे में आप दस दस मिनिट बाद का टाइम दिया करिये जिससे किसी का टाइम ख़राब ना हो, कल मेरा एग्जाम है हमें भी जल्दी है।"बिटिया बोली। 
मेम उन्हें भी बाहर जाना है everybody has their reasons . 
ya exactly ,thats what i want to say ,everybody has their reasons thats why they are taking appointment .you are professionals so be professional. 
"मेम आप अंदर डॉक्टर से बात कर लीजिये। "
" जरूर "
क्लिनिक में रिसेप्शन पर एक लड़की और एक लड़का बैठे थे ,उसके पीछे एक काउंटर था जिस के पीछे मेडिकल स्टोर था जिस पर तीन लड़कियां बैठी थीं।  सारा काम कंप्यूटर पर इंटर कनेक्टेड था। डॉक्टर के केबिन के बगल में एक और केबिन था जिसमे उनकी श्रीमती जी जो स्त्री रोग विशेषज्ञ है बैठी थीं। 
दस मिनिट बाद हमारा नंबर आ गया। हमारे वहाँ जाकर बैठते ही इण्टरकॉम पर फोन आया और डॉक्टर को बाहर हुए वाकये की खबर दे दी गयी। 
खैर डॉक्टर ने बालों की जाँच की फिर बोले की कोई खास प्रॉब्लम नहीं है कुछ दवाइयां लिख देता हूँ बाकी बाहर काउंटर पर आपको समझ दिया जायेगा। उनका इतना कहते ही एक लड़की अंदर आ गयी और प्रिस्क्रिप्शन उठा कर हमें बाहर ले जाने के लिए खड़ी हो गयी। मैंने खाने पीने के बारे में एक दो बातें की और हम बाहर आ गए। 
हमारे पहुंचते ही लड़कियों ने फटाफट दवाईयाँ निकाल दी साथ ही एक शैम्पू शैम्पू के बाद लगाने के लिए एक फोम फिर एक लोशन। वहाँ कुछ स्लिप्स रखीं थीं जिन पर प्रिंट था एक गोली रात में, एक गोली दिन में,रात में सोते समय ,खाने के बाद ,लड़की ने प्रिस्क्रिप्शन के हिसाब से फटा फट स्लिप्स चिपकाईं दूसरी लड़की ने झट से कंप्यूटर से बिल निकाला २३०२ रुपये। मन तो हुआ जाकर डॉक्टर से पूछूं कि जब कोई खास प्रॉब्लम नहीं है तो फिर इतनी महंगी दवाइयां और  शैम्पू क्यों ?लेकिन बात बिटिया का मन रखने की थी इसलिए चुपचाप बाहर आ गए ,अरे हाँ एक बात बताना तो भूल ही गयी उसने २५०० में से २०० रुपये वापस कर दिए यानि पूरे दो रुपये का डिस्काउंट। 
बाहर निकलते ही सबकी हँसी छूट गयी मैंने कहा "बेटा तेरे बालों का इलाज़ करवाते तो पापा के सारे बाल उड़ जायेंगे। "
 इस तरह २६५० रुपये खर्च करके हम जब बाहर आये तो मुन्नाभाई एम बी बी एस के डॉक्टर रस्तोगी की तरह हंसते हुए घर आये। 
अब इन २६५० रुपयों के खर्च को जस्टिफाय करना था ,बिटिया के पिताजी ने कहा ठीक है चार लड़कियों एक लडके का खर्च निकलने के लिए इतना तो करेगा ही ना। 
मैंने कहा देख बेटा डॉक्टर ने तुम्हारे बाल खींच कर देखे जैसे ऐश्वर्या राय एक शैम्पू के एड में दिखती है तो ऐश्वर्या राय की बराबरी करने के लिए इतना खर्च जायज़ है। 
पता नहीं इतनी सीरियस बातों के बीच ऐसा क्या था की हम सब नमस्ते लंदन के ऋषि कपूर और अक्षय कुमार की तरह बस हँसते रहे। हाँ अभी दवाई और शैम्पू का उपयोग शुरू नहीं किया है उसके परिणामो के बारे में बताने एक महीने बाद जाना है। फिर मिलेंगे। 

Wednesday, December 11, 2013

हिन्दी विकास यात्रा के गड्ढे …।

गर्भनाल पत्रिका के ८५ वें अंक में मेरा आलेख। ।कोशिशो के बाद भी उसका लिंक नहीं लगा पा रही हूँ। लेख आप यहाँ पढ़ सकते 


कॉलेज में कोई फार्म भरे जा रहे थे  जिसमे सबको अपने  नाम हिंदी और अंग्रेजी दोनों में लिखने थे। कई बच्चे अपना फार्म लगभग पूरा भर कर  भी जमा नहीं करवा रहे थे क्योंकि उन्होंने अपने नाम हिंदी में नहीं लिखे थे। कुणाल ने बहुत संकोच से कहा मुझे पता है मेरे नाम में वो अलग वाला 'न' आता है लेकिन उसे लिखते कैसे है मुझे याद नहीं आ रहा है।  यही हाल अथर्व ,प्रणव ,गार्गी ,कृति आदि का भी था , उन्हें ये तो पता था कि उनके नाम में र कि रफ़ार ,अलग वाला न ,या ऋ आता है लेकिन लिखना कैसे है ये याद नहीं।  ऐसा नहीं है उन्होंने अपना नाम हिंदी में लिखना सीखा नहीं था लेकिन कई सालों से हिंदी में नाम लिखा ही नहीं इसलिए भूल गए।  

ये हालत है हमारी आज की शहरी पीढ़ी की और ये कोई मनगढंत बात नहीं है बल्कि मेरी बेटी के कॉलेज़ में घटी सच्ची घटना है जिसने आने वाले समय में शहरी क्षेत्रों में हिंदी की क्या स्थिति होने वाली है उस के दर्शन करवा दिए। 

आज के समय के आधुनिक सी बी एस ई स्कूल में बच्चे दसवीं तक हिंदी पढते हैं उसके बाद भाषा के एक विषय के लिए 99 % बच्चे इंग्लिश ही लेते हैं इस तरह दसवीं के बाद उनका हिंदी से नाता लगभग टूट सा जाता है। इंग्लिश मीडियम के स्कूलों में ज्यादातर पत्र पत्रिकायें भी इंग्लिश की मंगवाई जाती हैं और बच्चों को वही पढने को प्रोत्साहित भी किया जाता है ,बचपन से घर में इंग्लिश सिखाने के लिए इंग्लिश अखबार ही मंगवाए जाते हैं और अगर मम्मी पापा थोड़े देसी हुए तो हिंदी अख़बार मँगवा लिए जाते हैं लेकिन बच्चे को उन्हें पढ़ने के लिए कितना प्रोत्साहित किया जाता है ये प्रश्न ही शायद अर्थ हीन है। 

बिटिया ने ही बताया कि एक लडके ने अतिरिक्त विषय के रूप में ग्यारहवीं में हिंदी विषय लिया उसके सभी विषयों में अच्छे नंबर थे लेकिन हिंदी में बहुत कम नंबर थे जिसके कारण उसका रिज़ल्ट खराब हो गया। अब या तो उसने हिंदी विषय ये सोच कर लिया होगा कि हिंदी पढ़ना सरल है ज्यादा मेहनत नहीं लगेगी ,या हो सकता है उसे सच में हिंदी अच्छी लगती हो लेकिन चूंकि बहुत कम बच्चे ग्यारहवीं बारहवीं में हिंदी लेते हैं इसलिए ठीक से पढ़ाने वाले टीचर्स ही ना हों।  कारण चाहे जो हो लेकिन उससे हिंदी कि स्थिति नहीं बदलती वो दिनों दिन शोचनीय होती जा रही है।  

ऐसा नहीं है ये बच्चे समाज में हो रही घटनाओं से वाकिफ नहीं हैं या उन पर चिंतन मनन नहीं करते जरूर करते है उन के बारे में जानते हैं जानकारी जुटाते हैं उन पर चर्चा करते हैं लेकिन उनकी जानकारियों का स्त्रोत क्या होता है ? सोशल मीडिया पर लोगों के स्टेटस ,उनके विचार, उनकी टिप्पणियाँ  या किसी अंग्रेजी अखबार की क्लिपिंग उसका लिंक। ऐसे में हिंदी से उनका संपर्क लगभग कट ही जाता है पेपर होर्डिंग्स भी अब युवाओं को लुभाने के लिए ज्यादा तर  इंग्लिश या हिंग्लिश में होते हैं ,ऐसे में अधिकतर उपयोग होने वाले शब्द तो आँखों के सामने आ जाते हैं लेकिन कम प्रयोग होने वाले अक्षर जैसे थ ,ध, ढ़ ,ण ,ऋ ड़ ,ष ,त्र ,ज्ञ धीरे धीरे बच्चों के दिमाग से ओझल होते जाते हैं और जब कभी किसी वाक्य में ऐसे अक्षर आते हैं तो उन्हें ऐसा लगता है जैसे चीनी भाषा का कोई अक्षर उनके सामने रख दिया हो।  

उच्च शिक्षा हिंदी में एक हास्यास्पद विचार लगता है और अब जब हम  हिंदी को इतने पीछे छोड़ आये हैं तब उसका हाथ थाम विदेशों तक अपनी शिक्षा का परचम लहराना एक असम्भव सोच ही लगती है लेकिन इससे अलग भी क्या हिंदी को उसके अपने घर में अपने लोगों के बीच में इस तरह पराया किया जाना ठीक है ? 

हिंदी सिर्फ उच्च तकनीकी शिक्षा के क्लिष्ट शब्द नहीं है न ही हिंदी साहित्य की पुस्तकों में अमूर्त बिम्बों और उपमानों में अपने अर्थ को तलाशती बूझ अबूझ के बीच वाहवाही पाती देव भाषा है। हिंदी दिल से दिल को जोड़ने वाली अपने से अपनी पहचान करवाने वाला सेतु है इसे तोड़ने का अर्थ है गाँवों से शहरों का भाषाई संपर्क तोड़ देना ,इंग्लिश न जानने वाली एक पीढ़ी का अगली पीढ़ी से नाता तोड़  देना , एक संस्कृति का अपनी जमीन से टूट कर बिखर जाना।   

मैंने खुद देखा है बच्चे हिंदी शब्दों के अर्थ नहीं समझते क्योंकि उन्हें उसके अर्थ रटवाए जाते हैं उन शब्दों का वाक्यों में प्रयोग करके उसके अर्थ समझाए नहीं जाते।  इसलिए उनका ज्ञान सिर्फ परीक्षा देने तक ही सीमित होता है।  

एक और बात पर मेरा ध्यान गया है ,हिन्दी को यह धीमी मौत देने में इतनी चालाकी और शांति से काम किया जा रहा है जिसे हम  देख सुन कर भी समझ नहीं पा रहे हैं। हिंदी सीरियल और सिनेमा में चरित्रों के नामों के उच्चारण पर कभी ध्यान दिया है। राठौड़  राठौर होते हुए राथोर हो गया ,थोडा थोडा ,थोरा थोरा हो गया ,रावण रावना हुआ ,ऐसे ही हिंदी के कुछ अक्षर धीरे धीरे न सिर्फ लिखने में बल्कि बोल चाल से भी विलुप्त होते जा रहे हैं।  

बच्चे हिंदी नहीं जानते उसके अक्षर ,शब्द भूलते जा रहे हैं ,अपना नाम तक हिंदी में नहीं लिख पाते। हिंदी की विकास यात्रा में ये बहुत बड़े बड़े गड्ढे  है जिसे भरे बिना आगे बढ़ना सम्भव नहीं है। 
कविता वर्मा 

Friday, November 22, 2013

'सगा सौतेला 'का पॉडकास्ट


मेरी कहानी 'सगा सौतेला 'का पॉडकास्ट अर्चना चावजी कि आवाज़ में

http://archanachaoji.blogspot.in/2013/11/blog-post_19.html

Saturday, November 16, 2013

चीनी वितरण

 
एक बड़ी सी बस्ती में कई सारे लोग रहते थे।  उनमे थे एक मिस्टर अ। मिस्टर अ को चीनी बांटने का अधिकार था। उन्होंने एक बार बस्ती की ही मिस एम को खुश हो कर एक कटोरी चीनी दे दी।  सारी बस्ती ही बड़ी खुश थी क्योंकि मिस एम बहुत भली और होनहार थीं और सभी चाहते थे कि उन्हें एक कटोरी चीनी दी जाना चाहिए।  मिस एम अपने एक जान पहचान वाले मिस्टर सी को भी चीनी दिलवाना चाहती थीं उन्होंने कई बार दबी जुबान से इसका जिक्र किया लेकिन कुछ दूसरे लोग मिस्टर सी को चीनी पाने का हक़दार नहीं मानते थे इसलिए बात बनी नहीं ,बस विचार चलता रहा।  

उसी बस्ती में एक थे मिस्टर ब। न जाने किन कारणों से मिस्टर अ और ब के बीच बनती नहीं थी।एक बार जब बस्ती कि चौपाल में सभी इकठ्ठे थे मिस एम ने मिस्टर अ के सामने मिस्टर ब कि तारीफ कर दी  . बस फिर क्या था मिस्टर अ आगबबूला हो गए और उन्होंने आव देखा न ताव और सभी के सामने मिस एम से उनकी दी हुई एक कटोरी चीनी वापस मांग ली।  ये सुन कर सभी दंग रह गए और इस बात की सभी ने बहुत आलोचना की।  खुद मिस्टर अ के घरवाले भी उनकी इस बात पर उनसे नाराज़ हुए। 

मिस्टर अ को लगा इस तरह उनकी बहुत बदनामी होगी और हो सकता है उनका चीनी बांटने का अधिकार ही छीन लिया जाये। वे बड़े परेशान हुए। तभी पता चला मिस्टर सी बस्ती से जाने वाले हैं और बस्ती के कई लोग इस बात से बहुत दुखी हैं। बस मिस्टर अ ने सोचा कि इस मौके को भुनाना चाहिए ताकि वे बस्ती वालों की नज़रों में अपनी गिरी हुई इज्ज़त को वापस पा सके और इस बहाने शायद उनका चीनी बांटने का अधिकार बचा रह जाये।  

तो जिस दिन मिस्टर सी जाने वाले थे मिस्टर अ ने उन्हें हाथों हाथ लिया उन्हें बहुत प्रेम से भावुक हो कर एक कटोरी चीनी अपने हाथ से भेंट करने का एलान किया। 
अब बस्ती वाले खुश है इतने खुश कि जो लोग मिस्टर सी को चीनी का हकदार नहीं मानते थे वे भी फीकी सी मुस्कान के साथ चीनी दिए जाने का कारण समझने की  कोशिश करते हुए विदाई समारोह में शामिल हो गए है।  
कविता वर्मा 

Wednesday, October 16, 2013

व्यथा

 
प्रारब्ध ने चुना मुझे 
चाहर दीवारी से घिरा बचपन 
बिना दुःख क्या मोल सुख का 
बिना संग क्या ज्ञान अकेलेपन का।  

तुम रहीं नाराज़ चला गया 
बिना कहे 
न सोचा एक बार 
क्या कह कर जाना था आसन? 
मुझे जाना था 
क्योंकि प्रारब्ध ने था चुना मुझे।  

ज्ञान प्राप्ति की राह में 
किसी कमज़ोर क्षण 
हो जाना चाहा होगा 
एक बेटा, पिता ,पति 
क्यों नहीं समझा कोई ?

मैंने कब चाही थी यह राह आसान 
होना चाहा था एक आम इंसान 
संघर्ष ,सुख दुःख जिजीविषा जी कर 
वंचित किया गया मुझे 
क्योंकि प्रारब्ध ने चुना मुझे।  

देवों की श्रेष्ठ कृति इंसान 
तभी तो लोभ संवरण नहीं कर पाए 
अवतरित होते रहे धरती पर 
बन कर मानव अवतार 

फिर क्यों चुना मुझे 
बनने को भगवान 
मैंने भी कभी चाह होगा 
बनना एक आम इंसान।  

कविता वर्मा  

Tuesday, October 15, 2013

मेला दिलों का …

कल फेस बुक पर दशहरा मेले का एक फोटो  डाला बहुत सारे लोगों ने इसे पसंद  किया।  अपने बचपन  को  याद करते हुए  बचपन के मेलों को याद किया। कुछ लोगों ने तुलना  कर डाली  उस समय के मेले , उनकी बात ही कुछ और थी , इसी बात ने सोचने को मजबूर कर दिया। 

उस समय के मेले मतलब बीस पच्चीस साल पहले के मेले जिनमे  हिंडोले थे ,चकरी वाले झूले थे। गुब्बारे चकरी वाले ,प्लास्टिक के मिट्टी के खिलोने वाले ,मिट्टी  के बर्तन , नकली फूल ,छोटे मोटे बर्तनों वाले, सस्ते कपड़ों वाले ,खाने पीने की दुकानों में जलेबी इमरती मालपुए वाले ,गुड़िया के बाल ,सीटी, कार्ड बोर्ड पर रंगीन पन्नी लगा कर बनाये गयीं तलवार ,गदा, धनुष बाण वाले। यही सब तो था। 
आज भी कमोबेश वही सब है दूरदराज़ के गावों में तो बहुत कुछ नहीं बदला , बड़े शहरों के पास वाले गाँवों में आधुनिकता का असर पड़ा है लोगों की रुचियाँ बदली हैं इसीलिए मेलों का स्वरुप भी बदला है। यही बात शहरों के मेलों के साथ है।  
माल संस्कृति के चलते शहरी बच्चों में मेलों का बहुत ज्यादा आकर्षण नहीं रह गया है। मॉल में गाहे बगाहे कई इवेंट्स होते रहते हैं जिनमें बच्चे मेलों की तरह ही शामिल होते हैं झूले लगाने की जगह वहाँ नहीं है उनकी जगह हवा भरी जंपिंग माउस ,छोटे से टब में चलती नाव, रेसिंग कार आदि ने ले ली  हैं जो सारे साल उपलब्ध हैं।  
कपडे सिर्फ त्योहारों पर खरीदे जायेंगे वाली बात अब नहीं रही।  वैसे भी ब्रांडेड कपडे जूते पहनने वाली पीढ़ी मेलों की दुकानों से कपडे खरीदने से रही और तो और उनके माता पिता जिन्होंने पूरा बचपन मेलों से खरीदे कपडे पहन कर बिताया होगा वे भी ऐसे कपडे मेलों में देख कर नाक भोंह सिकोड़ लेंगे , इसलिए इन दुकानों का तो मेलों से बाहर होना निश्चित ही था। मिठाई के बारे में पसंद अब बदलती जा रही है इसलिए जलेबी, इमरती बाहर ,वैसे भी लोग खुद की साफ़ सफाई के बारे में सजग हुए हैं इसलिए धूल  भरे माहौल में बिकने वाली मिठाइयाँ खाना पसंद नहीं करेंगे हाँ इसकी जगह चाट ,भेल जैसी चीज़ें पसंद की जाती हैं ये पूरी तरह साफ़ सुथरी तो नहीं कही जा सकती लेकिन फिर भी कुछ हद तक , फिर जबान के चटकारे के सामने सब ताक पर। 
कुल मिला कर देखा जाये तो मेले आधुनिक हो गए हैं वृहद हो गए हैं , उनमे वही परिवर्तन आ रहे हैं जो लोगों को पसंद हैं फिर क्या है ऐसा जिसके लिए लोग नॉस्टेलजिक हो जाते हैं ?
वह है मेलों में मौजूद अजनबीपन। जी यही वह बात है जो आधुनिक हो रहे मेलों में है जो उस जमाने के मेलों में नहीं थी और जो लोगों के सर चढ़ जाती है। आपके बगल में खड़ा परिवार शायद शहर के दूसरे कोने से आया हो और आप उसे नहीं जानते , दो घंटे मेले में घूमने के बाद भी आपको शायद ही कोई रिश्तेदार या परिचित दिखाई देता है। इस बड़े से मेले में आपका छोटा सा परिवार कुल जमा तीन चार लोग आपमें अकेलापन भर देते हैं। ऐसे में अगर आपके बगल में कोई संयुक्त परिवार खड़ा हो या कुछ लोग जो अपने ढेर सारे रिश्तेदारों या मित्रों के साथ आये हों हंसी ठिठोली चल रही हो तो आप एक सौ एक फुट के रावन के बजाय उनकी और ही देखते रह जाते हैं।  
मेलों से आकर लोग अपने ज़माने के मेलों को याद नहीं करते बल्कि अकेलेपन से घिर कर उस अपनेपन को याद करते हैं और इसीलिए उस ज़माने के मेले बहुत याद आते हैं।  

कविता वर्मा 

Saturday, October 12, 2013

अभ्यस्त

 

घनघोर अँधेरे पथ पर 
कुछ बिखरे काँटे , कुछ 
फूलों जैसे पल 
अटपटी राह 
पर बढ़ते अकेले कदम।  

कठिन राह, घनघोर अन्धकार 
संवेदनाओं से रीता संसार 
मन ढूँढ रहा एक किरण 
एक आस , कोई एहसास 
टटोलते हाथ 
टकराते सघन निरास 
ठोकर खाते गिरते 
भीगते जज़्बात। 

नहीं समय करने का 
भोर का इंतज़ार 
न ही कोई साथ 
उठ खड़ा हो मिचमिचा कर आँख 
हो अभ्यस्त साध अन्धकार 
बढ़ा कदम न कर इंतज़ार।  

कविता वर्मा 

Friday, October 4, 2013

शक्ति पूजा


नवरात्री शुरू होने वाली हैं सीमा घर की साफ़ सफाई में लगी है। कल शक्ति स्वरूपा  देवी जी की स्थापना का दिन है उनके स्वागत में वह कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती। 
बचपन से सुनती आयी है नारी ही शक्ति है जो सृष्टि के निर्माण की सामर्थ्य रखती है। शक्ति की उपासना के द्वारा नारी शक्ति को शशक्त किया जाता है जिससे विश्व निर्माण और सञ्चालन सुचारू रूप से चल सके।  
फोन की घंटी ने उसके हाथों और दिमाग की गति को रोक दिया।  बाहर उसके ससुर जी फोन सुन रहे थे घर में अचानक जैसे सन्नाटा पसर गया।  उसके ससुर जी बहुत धीमी आवाज़ में कह रहे थे " बेटी तू ही बता मैं और पैसा कहाँ से लाऊँ ? पहले ही दस लाख रुपये दामाद जी को दे चूका हूँ ,रिटायर आदमी हूँ ,तेरे भाई की तनख्वाह से उसके खर्चे ही जैसे तैसे पूरे हो पाते हैं। तू दामाद जी को समझा न अगर दे सकता तो जरूर दे देता बेटी। " 
फोन रख कर ससुरजी निढाल से पलंग पर बैठ गए और दोनों हाथों से माथा थाम लिया।  "क्या करूँ कहाँ फेंक दिया मैंने अपनी बेटी को ,जानती हो सुनील की माँ आज तो वो रो रो कर कह रही थी ,पापा मुझे यहाँ से ले जाओ आप इनका पेट कभी नहीं भर सकोगे ,मुझे जिन्दा देखना चाहते हो तो यहाँ से ले जाओ। "
उसे ले भी आऊं लेकिन इतनी बड़ी जिंदगी अकेले कैसे और किसके भरोसे काटेगी ? हम कब तक बैठे रहेंगे ? " 
सीमा चुपचाप अपने काम में लग गयी। देवी स्थापना का दूसरे दिन दोपहर का मुहूर्त था । सीमा सुबह ही बाज़ार जाने का कह कर घर से निकल गयी।  
मुहूर्त का समय निकला जा रहा था सीमा का कहीं अता पता नहीं था। घर की बहू के बिना शक्ति पूजा कैसे हो ? तभी घर के सामने ऑटो आ कर रुका और उसमे से सीमा के साथ उतरी उसकी ननद।  सब अवाक उसे देखने लगे , ननद दौड़ कर अपनी माँ के गले लग कर फूट फूट कर रो पड़ी। सबकी प्रश्न वाचक दृष्टी सीमा की ओर उठ गयीं।  
माँ जी नारी ही शक्ति स्वरूप है और शक्ति सबके साथ से मिलती है हम शक्ति पूजा के इस मौके पर घर की बेटी को कैसे अकेला छोड़ सकते हैं ? आज से हम सब उसके साथ रहेंगे और अन्याय के खिलाफ लड़ेंगे। यही देवी की सच्ची उपासना होगी।  
माँ जी ने सीमा को गले लगा लिया।  


Saturday, September 28, 2013

डर या रोमांच

 
साहित्य के नव रसों में भय का अपना स्थान है। भय ,डर ,रोमांच जीवन की स्थिरता को गति प्रदान करते हैं।  हमारे यहाँ तो बहुत छोटे बच्चों में भी डर भरा जाता है ,बचपन से हौया है ,साधू बाबा पकड़ ले जायेगा जैसी बातें उनके जेहन में शायद डर से परिचय करवाने के लिए भरी जाती हैं।  बच्चों के ग्रुप में भी एकाध बच्चा तो ऐसे परिवार से होता ही है जहाँ बच्चों के सामने इस तरह की बाते करने से परहेज़ नहीं किया जाता।  
मुझे याद है डर से मेरा पहला परिचय हुआ था जब मैं शायद दूसरी या तीसरी में पढ़ती  थी। उस समय ये अफवाह जोरो से फैली थी कि कुछ लोग आँखों में देख कर सम्मोहित कर लेते है और फिर व्यक्ति उसके अनुसार काम करता है या उसके पीछे पीछे चला जाता है। बहुत डर लगा था इस बात से। 

इसके बाद भूत चुड़ैल जैसी कहानियों से परिचय हुआ ,एक कहानी तो मैंने अपने बचपन के बहुत सालों बाद किसी बच्चे के मुँह से सुनी कि एक बच्चे की माँ मरने के बाद रोज़ रात में घर आ कर उस बच्चे के लिए खाना बना कर रख जाती है। मुझे यकीन है आपमें से कईयों ने ये कहानी सुनी होगी।  
इस तरह डर को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढाया जाता है।  

मम्मी बताती थीं कि उन्हें जासूसी उपन्यास पढ़ने का बहुत शौक था। तीन मंजिला पुराने ढंग के बने मकान में रात में अकेले जब वो जासूसी उपन्यास पढ़तीं तो घर के सन्नाटे में कभी किसी साए को भागता देखतीं , तो कभी किसी दरवाजे के पीछे किसी को छुपा हुआ। वो बताती थी कि तीसरी मंजिल से नीचे बाथरूम जाने में या दूसरी मंजिल पर पानी पीने जाने में भी उन्हें डर लगता था। वो दादी से कहतीं आप रात में पड़ोस में मत जाया करो हमें अकेले डर लगता है। फ़िर क्या पता बढ़ती जिम्मेदारियों ने या शायद दादी की डांट ने उनका जासूसी उपन्यास पढ़ना छुड़वा दिया।  मुझे भी जासूसी उपन्यास पढ़ने का बहुत शौक लगा था। राजन इकबाल सिरीज़ के कई नोवेल्स पढ़े लेकिन वयस्कों के जासूसी उपन्यास मम्मी ने कभी नहीं पढ़ने दिए। बल्कि उपन्यास ही नहीं पढ़ने दिए ये कह कर की जब तक ख़त्म नहीं हो जाते छोड़ते नहीं बनता।  

बचपन में डर को मात देने के लिए कई बेवकूफाना हरकतें की है जैसे कुँए की जगत पर चलना , साईकिल के ऊपर से ऊँची कूद करना ,आधी रात को अकेले छत पर चले जाना। 
बचपन के बाद तो सपने देखने की उम्र आ जाती है तो कुछ साल इन सब पर रोक सी लगी रही।  

उस समय होरर मूवीज सिर्फ थियेटर में आती थीं , फिर जमाना आया वी सी आर पर फिल्म देखने का।  उस समय "एविल डेड " फिल्म की सीरिज़ आयी थी बहुत डरावनी। जिसमे वीभत्स तरीके से डर पैदा किया गया था। चीखें, खून,अविश्वनीय दृश्य। एक दृश्य तो अब भी जिज्ञासा जगाता है 'हिरोइन आईने में अपना अक्स देखती है और अपना हाथ आईने को छूने को बढाती है और उसका हाथ खून से भरे मर्तबान में डूब जाता है।  एविल डेड घर पर वी सी आर मंगवा कर देखी गयी थी इसके साथ रेखा की खूबसूरत फिल्म भी मंगवाई थी ताकि डर का असर कम किया जा सके।  फिल्म देखने के बाद बाहर गार्डन में बैठे थे कि बिजली चली गयी। घर के बगल में पुराना आम का बगीचा, सामने बैंक की सुनसान बिल्डिंग,होरर फिल्म के भुतहा बंगले से कम नहीं था वह मकान , उस पर एविल डेड देखने के बाद बिजली चली जाना।  सब लोग एक दूसरे से अन्दर जा कर मोमबत्ती जलाने को कहते रहे लेकिन अकेले जाने की हिम्मत किसी की नहीं हुई।

केबल के साथ हर तरह की फिल्मे घर के ड्राइंग रूम तक पहुँच गयीं। जब स्टार मूवी जैसे चेनल शुरू हुए थे तब मैं बहुत खुश नहीं थी लेकिन उस पर सबसे ज्यादा फिल्मे भी मैं ही देखती थी।  रात में होरर मूवीज आतीं जिसे अकेले बैठ कर देखना रोमांच को दुगना कर देता था।  एक रात मैं अकेले बैठे फिल्म देख रही थी किसी सुपर नेचरल पॉवर पर थी तभी फोन की घंटी बजी ,फोन उठाया तो किसी की फुसफुसाती आवाज़ आयी "आप अभी तक जाग रही हैं। "  हेल्लो हेल्लो कह कर फोन रख कर दोबारा फिल्म को पकड़ा क्लाइमेक्स चल रहा था रोमांच चरम पर था कि फोन फिर बजा , अन्दर तक काँप गयी ,फिर वही आवाज़ फुसफुसाती हुई। तीसरी बार हसबेंड को जगाया देखो किसी का फोन है मुझे डर लग रहा है कह कर फिल्म देखने बैठ गयी। अच्छा हुआ उस मूवी के डायरेक्टर को कभी ये वाकया पता नहीं चला वर्ना तो वह आत्महत्या कर लेता कि उसकी फिल्म से ज्यादा लोग आधी रात में आने वाले अनजान फोन्स से डर जाते हैं। 

आजकल तो कई बड़े निर्माता होरर मूवी बना रहे है एक फिल्म आये थी 13 B जिसने आदि से अंत तक बांधे रखा राज़ ,आत्मा ,एक थी डायन जैसी कई फिल्मे डर तो पैदा करती है लेकिन उनमे  कोई  तथ्य नहीं होते हैं। कई बार बहुत आधारहीन तरीके से डर पैदा किया जाता है , अब या तो दिमाग अलग रख कर फिल्म देखो या झींकते रहो ये क्या है।  कल एक फिल्म देखी रात के सन्नाटे में बिना किसी चीख पुकार ,खून खराबे के जिसने डर के बजाय रोमांच पैदा किया और वह अब तक जेहन में है। 
आप कह सकते हैं क्या जरूरत है ऐसी फिल्मे देखने की , लेकिन ये भी तो एक महत्वपूर्ण रस है जीवन का,  इसे महसूस किये बिना कैसे छोड़ दिया जाए। वैसे आज़मा कर देखिये इसका रोमांच कुछ देर के लिए सारी चिंता परेशानियों को भुला देता है। 
कविता वर्मा 



Friday, August 9, 2013

पागल

हाथ में पत्थर उठाये वह पगली अचानक गाड़ी के सामने आ गयी तो डर के मारे मेरी चीख निकल गयी. बिखरे बाल, फटे कपडे, आँखों में एक अजीब सी क्रूरता पत्थर लिए हाथ ऊपर ही रह गया.लेकिन जाने क्यों वह ठिठक गयी पत्थर फेंका नहीं उसने .गाड़ी जब उसके बगल से गुजरी खिड़की के बहुत पास से उसके चेहरे को देखा.अब वहां एक अजीब सा सूनापन था.
कार के दूसरी ओर से एक ट्रक निकल गया. वह कार के पीछे की ओर भागी और ट्रक पर पत्थर फेंक दिया.आसपास दुकानों पर खड़े लड़के हंस रहे थे.वह पगली थी घोषित पगली.ना जाने किस ट्रक या ट्रक वाले ने उसके साथ कुछ बुरा किया था की वह हर ट्रक को अपना निशाना बनाती थी.लेकिन उसकी नफरत पर नियंत्रण था .ट्रक के सामने आ खडी हुई कार को उसने कोई नुकसान  नहीं पहुँचाया था.
युवाओं की भीड़ शहर की मुख्य सड़क पर जुलुस की शक्ल में चली जा रही थी. महंगाई के विरोध में आज भारत बंद का आव्हान है.रास्ते में खुली मिली हर दुकान में ये युवा तोड़ फोड़ लूटपाट करते चले जा रहे थे. सच तो ये है कि इनका आक्रोश किसके विरुद्ध  है ये नहीं जानते ना इन्हें अपना लक्ष्य पता है ना ही इस आक्रोश पर कोई नियंत्रण है. रास्ते में आने वाला हर व्यक्ति,दुकान ,सामान इनका निशाना बन रहे हैं.
पता नहीं पागल कौन है? 
कविता वर्मा 

Thursday, July 25, 2013

ऑनरकिलिंग

बेटी के शव को पथराई आँखों से देखते रहे वह.बेटी के सिर पर किसी का हाथ देख चौंक कर नज़रें उठाई तो देखा वह था. लोगों में खुसुर पुसुर शुरू हो गयी कुछ मुठ्ठियाँ भींचने लगीं इसकी यहाँ आने की हिम्मत कैसे हुई. ये देख कर वह कुछ सतर्क हुए आगे बढ़ते लोगों को हाथ के इशारे से रोका और उठ खड़े हुए. वह चुपचाप एक किनारे हो गया.
तभी अचानक उन्हें कुछ याद आया और वह अन्दर कमरे में चले गए. बेटी की मुस्कुराती तस्वीर को देखते दराज़ से वह कागज़ निकाला और आँखों को पोंछ पढने लगे. पापा मै ऐसे अकेले विदा नहीं लेना चाहती थी. बिटिया की आँखों में उन्हें आंसू झिलमिलाते नज़र आये.
चिता पर बिटिया को देख उनकी आँखे भर आयीं उसे इशारा कर उन्होंने अपने पास बुलाया और जेब से सिन्दूर की डिबिया निकाल कर उसकी ओर बढ़ा दी. हतप्रभ से डबडबाई आँखों से उसने डब्बी लेकर उसकी मांग में सिन्दूर भरा और रोते हुए उसके चेहरे पर झुक कर उसका माथा चूम लिया. उन्होंने जलती लकड़ी उसे थमा दी और बिटिया से माफ़ी मांगते हुए उसके सिरहाने वह कागज़ रख दिया. जलते हुए कागज़ के साथ उन्होंने ऊँची जाती का अभिमान भी जला डाला था.
 कविता वर्मा 

Wednesday, July 10, 2013

हिस्सा

माथुर साहब बड़े सुलझे हुए आदमी है ।जीवन की संध्या में वे आगे की सोच रखते हैं । इसलिए उन्होंने उनके बाद उनके मकान के बंटवारे के लिए अपने दोनों बेटों और बेटी को बुला कर बात करने की सोची ताकि उनके दिल में क्या है ये जान सकें । 
 
बेटों ने सुनते ही कहा पापा आप जो भी निर्णय करेंगे हमें मंजूर होगा । लेकिन बेटी ने सुनते ही कहा हाँ पापा मुझे इस मकान में हिस्सा चाहिए ।माथुर साहब और उनके दोनों बेटे चौंक गए । माथुर साहब की बेटी की शादी बहुत बड़े घर में हुई थी । उसके लिए उनके मकान का हिस्सा बहुत मायने नहीं रखता था । फिर भी उसकी हिस्से की चाह? स्वाभाविक था एक कडवाहट सी उनके मुंह में घुल गयी । साथ ही ये ख्याल आते ही उनकी नज़रें झुक गयीं की उनकी तथाकथित प्रगतिशीलता बेटी के हिस्सा माँगते ही बगलें झांकने लगी थी।
फिर भी प्रकट में उन्होंने कहा हाँ बेटी बता तुझे इस मकान में कौन सा हिस्सा चाहिए?
पापा मुझे इस मकान का सबसे बड़ा हिस्सा चाहिए । आप अपनी वसीयत में लिखियेगा की मेरी पूरी जिंदगी इस घर के दरवाजे मेरे लिए हमेशा खुले रहें । 
माथुर साहब मुस्कुरा दिए और दोनों भाइयों ने बहन को गले लगा लिया । जरूर बहना तेरा ये हिस्सा हमेशा बना रहेगा । अब बंटवारे की जरूरत नहीं थी । 
कविता वर्मा 

Thursday, June 27, 2013

रजिस्ट्रेशन या लूट ???


बारहवीं की पढाई के साथ  हो जाती है जद्दोजहद आगे की पढ़ाई की .आज के समय में कई प्रोफेशनल कोर्स हैं जिनमे बच्चे अपनी रूचि अनुसार जा सकते हैं इनमे कई जाने माने  कोर्स जैसे इंजिनीअरिंग ,मेडिकल, सी ए ,सी एस ,एम् बी ए, के बारे में जानकारी हर कहीं उपलब्ध है लेकिन फिर भी कई कोर्स ऐसे हैं जिनके बारे में जानकारी तो फिर भी जुटाई  जा सकती है लेकिन उसके लिए अलग अलग राज्यों में कोई तालमेल नहीं है .

आर्किटेक्चर कॉलेज में एडमिशन के लिए आई आई टी की में एग्जाम के साथ ही सेकंड पेपर होता है जिसकी मेरिट लिस्ट बारहवीं के मार्क्स के साथ बनती है .देश में सिर्फ दो आई आई टी हैं जिनमे आर्किटेक्चर के कोर्स हैं रुड़की और खड़गपुर जिनमे अस्सी अस्सी सीट्स हैं .आई आई टी का पहला पेपर पंद्रह अप्रेल को हुआ था और बारहवीं का रिजल्ट चौबीस मई को आ गया इसके बावजूद भी अब तक आई आई टी का रिजल्ट घोषित नहीं हुआ .इसलिए बच्चे राज्य के कॉलेज में रजिस्ट्रेशन करवाने को विवश हैं . 

इसी रिज़ल्ट पर नॅशनल कॉलेज में एडमिशन मिलेंगे .सिर्फ सात नॅशनल कॉलेज में आर्किटेक्चर का कोर्से है हमीरपुर ( हिमाचल प्रदेश ) ,जयपुर ( राजस्थान ), पटना ( बिहार), नागपुर ( महाराष्ट्र) भोपाल ( मध्य प्रदेश) और कोझिकोडा (केरल) .जिन बच्चों को आई आई टी में प्रवेश नहीं मिलेगा उन्हें नॅशनल कॉलेज में प्रवेश मिलेगा .
राज्यों  के कॉलेज में एडमिशन के लिए या तो वहां की कॉमन एंट्रेंस एग्जाम देना होती है या नॅशनल एप्टी  टेस्ट फॉर आर्किटेक्चर (NATA ) .
अलग अलग राज्यों में इस कोर्स के लिए रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया आपको बताना चाहती हूँ .
मध्य प्रदेश : यहाँ पी एम् टी देने वालों को NATA देना जरूरी होता है .तभी आर्किटेक्चर कॉलेज में एडमिशन मिलता है .इसके लिए रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया 22 जून को ख़त्म हो गयी .इसी के साथ अपने पसंद के कॉलेज को लॉक करने के लिए हर पसंद के लिए 1100 रुपये का डिमांड ड्राफ्ट देना था .मतलब यदि आपने पांच कॉलेज लॉक किये तो 5500 रुपये . काउंसलिंग की प्रक्रिया अभी शुरू होना है .

महाराष्ट्र :  यहाँ MCET और NATA से एडमिशन मिलता है .NATA से एडमिशन के लिए 1500 रुपये का डिमांड ड्राफ्ट के साथ फॉर्म जमा करवाने की आखरी तारिख थी पंद्रह जून . इसकी मेरिट लिस्ट आ चुकी है और एक जुलाई से काउंसलिग शुरू होने वाली है . 

गुजरात : यहाँ के लिए 350  रुपये के डिमांड ड्राफ्ट के साथ रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया पूरी हो गयी है .लिस्ट का ? है . 

 राजस्थान :- यहाँ का प्रोसिजर बड़ा विचित्र है .राजस्थान PET (RPET) के नाम से 11000 रुपये का डिमांड ड्राफ्ट बनवाना है .इसके बाद काउंसलिंग शुरू होगी इसमें अगर किसी कॉलेज में आपको एडमिशन मिलता है तो आप के 10000 रुपये फीस में जमा हो जायेंगे सिर्फ एक हज़ार रुपये राजिस्त्रशन के है .लेकिन अगर एडमिशन मिल रहा है और आप नहीं लेना चाहते तो पूरे रुपये मतलब ग्यारह हज़ार डूब जायेंगे . मतलब अगर आपने रजिस्ट्रेशन करवा लिया तो एडमिशन लेना ही है . 

MATA आर्किटेक्चर की ही एग्जाम है इसके बाद ओन लाइन रजिस्ट्रेशन के लिए एक छोटा मोटा अमाउंट तो ठीक है लेकिन मध्य प्रदेश और राजस्थान की रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया तो हद से ज्यादा व्यावसायिक प्रक्रिया है .मध्य प्रदेश में कुल ४ कॉलेज हैं जिनमे ये कोर्स है .इनके कट ऑफ़ भी किसी वेब साईट पर नहीं मिलते जिसके आधार पर बच्चे या पालक अंदाज़ा लगा सके की उनके स्कोर पर उन्हें कौन सा कॉलेज मिल जायेगा या कितने कॉलेज लॉक करना चाहिए . 

महाराष्ट्र CET से सिर्फ सरकारी कॉलेज ही मिल सकते है जिनकी फीस कम या कहें नहीं के बराबर है . जे जे स्कूल ऑफ़ आर्किटेक्चर जो सबसे विख्यात कॉलेज है की फीस वहां के प्रायवेट कॉलेज से पांच गुना तक कम है .

इसके अलावा एनी राज्यों में भी प्रक्रिया इससे बहुत अलग तो क्या होगी ? 

गुजरात के किसी कॉलेज की फीस उसकी वेब साईट पर नहीं दी है .यही हाल मध्य प्रदेश और राजस्थान का भी है .न ही फोन पर ऐसी जानकारी दी जाती है .
व्यावसायिक शिक्षा के लिए पूरे देश के कॉलेज की रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया काउंसलिंग की तारीख में समानता होनी चाहिए जिससे बच्चे जहाँ चाहे एडमिशन ले सकें .रजिस्ट्रेशन की फीस कहीं तो न्याय सांगत होनी चाहिए ताकि हर स्तर के बच्चे उनमे रजिस्ट्रेशन करवा सकें . 
 कविता वर्मा 

Thursday, June 20, 2013

केदारनाथ आपदा ..सूक्ष्म कारण भी है प्रभावी

केदारनाथ आपदा ..सूक्ष्म कारण भी है प्रभावी


केदारनाथ में आयी विपदा ने भारतीय जन मानस को हिला  दिया .अभी सही आंकड़ा प्राप्त नहीं हुआ है लेकिन हज़ारों लोग लापता है और सेंकडों मृत .अलग अलग राज्य सरकारे अपने यात्रियों की सुरक्षा के लिए मदद भेज रही हैं केंद्र ने भी त्वरित मदद दी है सेना के जवान जान पर खेल कर लोगों की मदद कर रहे हैं .जिन लोगों को मदद मिल चुकी है और जो सुरक्षित हैं वे सरकार और व्यवस्था को कोस रहे हैं .मीडिया ने अपनी कमर कस कर जवानों को तैनात कर दिया है जो लोगों के आक्रोश को आम लोगों तक पहुँचाये जिसके कोई सार्थक परिणाम नहीं आने वाले हैं . 
एक बात बार बार कही जा रही है कि मौसम विभाग ने दो दिन पहले ही भारी बारिश की चेतावनी दे दी थी मानसून और पश्चिमी विक्षोभ के कारण बादल फटने की कोई चेतावनी नहीं दी गयी थी ये अचानक आयी विपदा है जो तीन साल पहले लेह में आयी थी और अब उत्तराखंड में . बादल फटने जैसे हालात बने कैसे ?पहले इस तरह की विपदा यदा कदा आती थीं अब इनकी आवृति अचानक कैसे बढ़ गयी ? इसके पीछे कुछ सूक्ष्म कारण हैं जिन पर गौर किया जाना जरूरी है . 
हमारे कई धार्मिक स्थल सुदूर पहाड़ों पर हैं इसे आमजन की आस्था कहें यात्रा का जूनून या सैर सपाटे के साथ पूण्य प्राप्ति की चाह धार्मिक स्थलों पर हर साल श्रद्धालुओं की भीड़ बढती जा रही है .बढ़ी भीड़ के साथ ही इन स्थानों पर सुविधाओं की चाह भी बढ़ गयी है .पहाड़ काट कर होटल बनाये जा रहे हैं होटल के कमरों में टी वी, ए सी जैसी सुविधाओं की मांग भी बढ़ गयी है .लोग इन सुविधाओं के लिए पैसा देने को तैयार हैं और लोग कमाने को राजी  है लेकिन किस कीमत पर ? 
पहाड़ों पर बने होटल्स से गंदे पानी की निकासी के लिए कोई समुचित व्यवस्था नहीं है ये पानी पहाड़ों से बहता हुआ नीचे घाटी में कहीं किसी नदी नाले में मिल जाता है इस गंदे पानी से उत्पन्न अम्ल पहाड़ियों का क्षरण करता है .ठण्ड से बचने के लिए ए सी लगातार गर्मी उत्पन्न करने वाली गैसे उत्सर्जित करते हैं जिससे पहाड़ों के मौसम पर धीमा लेकिन खतरनाक प्रभाव पड़ रहा है . 
सुविधा के नाम पर पहाड़ों पर रास्ते बन गए हैं जिन पर लगातार गाड़ियाँ दौड़ती रहती हैं जिससे होने वाला कम्पन चट्टानों को भी हिला देता है नतीजतन भूस्खलन तेज़ और अधिक होने लगा है . 
याद करें मैहर के मन्दिर की पहाड़ी को .पहले वहाँ ऊपर तक जाने के लिए सड़क बनाई गयी लेकिन गाड़ियों के कम्पन से उस पहाड़ी को खतरा होने लगा फिर उस सड़क को बंद किया गया अब वहाँ रोप वे बनाया गया जिस पर लोग घूमने मज़े लेने के लिए आते हैं .आखिर को रोप वे भी चलता तो मोटर से ही है उससे भी तो कम्पन पैदा होता ही है जिसके दूरगामी परिणाम अभी आने बाकी हैं . होना तो ये चाहिए की ये सुविधा वृद्ध अशक्त बीमार लोगों के लिए मुहैया करवाई जानी चाहिए बाकी लोग तो श्रद्धा की शक्ति से ऐसे ही चढ़ सकते हैं . 
तीसरा बड़ा कारण है धार्मिक स्थलों पर मोबाइल फोन का उपयोग .सभी जानते हैं मोबाइल फोन के उपयोग से इलेक्ट्रो मेग्नेटिक तरंगें  निकलती हैं जिनसे उत्पन्न गर्मी से मौसम पर असर पड़ता है . मानते हैं अपनों से संपर्क रखना जरूरी है लेकिन क्या पर्यावरण की कीमत पर अपनी जान की कीमत पर ? होना तो ये चाहिए की पहाड़ों पर मोबाइल फोन का उपयोग बिलकुल बंद किया जाए इसके बजाय राज्य सरकार वहां अपनी फोन सुविधा प्रदान करे .स्थानीय लोगों के लिए पेजर या वायरलेस सिस्टम जैसी सुविधा सीमित रूप में दी जा सकती है जो मोबाइल से कम नुकसानदेह है . 
हमारे देश के पर्यावरण मंत्रालय को इस दिशा में कठोर कदम उठा कर एक कठोर गाइड लाइन बनाने की जरूरत है जिसमे नदियों के मुहाने पर निर्माण ,उत्सर्जित ग्रीन हाउस गैसों की मोनिटरिंग कर सड़क पर आवागमन पर कंट्रोल, यात्रियों की संख्या का निर्धारण जैसे कदम उठाने की आवश्यकता है इसके लिए जरूरी है की राजनैतिक पार्टियाँ कोई अड़ंगे न डालें क्योंकि जब विपदा आती है तो वह सबको सामान रूप से प्रभावित करती है। 
कविता वर्मा 

Wednesday, June 19, 2013

उत्तराखंड यात्रा ..एक याद

      (केदारनाथ की ताज़ा तस्वीरें देख कर मन द्रवित हो गया .मंदिर के आस पास बने मकान उन पंडों पुजारियों के है जो पीढ़ियों से कुटुंब विशेष के पुरोहित हैं उनके पास कई पीढ़ियों के यजमानों का लेखा जोखा  है बिना किसी कम्पूटर के चंद  मिनिटों में आपके कुटुंब का पुरोहित आप के पास पहुँच कर अपनी बही में केदारनाथ आये आपके पूर्वजों के नाम,स्थान गोत्र सब बता देते हैं .
इस तबाही में कई ( या सभी ) कुटुम्बों के पीढ़ियों के ये रिकॉर्ड भी नष्ट हो गए होंगे ,लगभग हर भारतीय की विरासत है ये . )

लगभग पच्चीस साल पहले की बात है उत्तराखंड के चारों  धाम यमुनोत्री गंगोत्री केदारनाथ बद्रीनाथ जाने का प्रोग्राम बना . लम्बा सफ़र पंजाब की गर्मी ,आतंकवाद का डर सब पार करके हरिद्वार पहुंचे .मई के महीने में भी गंगा के बर्फ जैसे ठन्डे पानी में स्नान करके मन आध्यात्मिक आस्था से भर गया . शाम के समय घाट पर गंगा जी की आरती धर पर तैरते दीपक जैसे आँखों में स्थायी रूप से बस गये . 
ऋषिकेश का लक्ष्मण झूला पार करते मन जहाँ रोमांचित था वहीं थोडा डरा हुआ भी . 

मैदानी इलाका पार करके जब यमुनोत्री जाने के लिए सफर शुरू हुआ जानकी चट्टी पहुँचते हम लोग बुरी तरह भीग गए थे वहाँ लगभग हर रोज़ शाम को बारिश हो जाती है .दूसरे दिन सुबह से बारिश हो रही थी भीगते हुए चढ़ाई शुरू की रास्ते बहुत संकरे और खतरनाक थे .मम्मी के लिए एक टट्टू किया था लेकिन उस पर बैठना भी आसान नहीं था .रास्ते भर सड़क के ऊपर निकले चट्टानों के नुकीले सिरों से बचते दम निकल गया . बारिश और ठण्ड से टट्टू पर बैठे वे अकड़ सी गयीं . यमुनोत्री के गर्म पानी के कुंद में डुबकी लगा कर राहत मिली .लौटते हुए फिर बारिश शुरू हो गयी किसी तरह एक बसेरा मिला .
दूसरे दिन सुबह गंगोत्री की यात्रा शुरू की .ये यात्रा खतरनाक रास्तों से होती हुई लेकिन मंदिर तक पहुँची .सुबह से चले हम अँधेरा घिरने पर पहुँचे . उस समय वहाँ बिजली नहीं थी .दूसरे दिन सुबह जब दुबकी लगाई बर्फ से पानी में मानों रक्त जम गया एक के बाद दूसरी दुबकी लगाने की हिम्मत ही नहीं हुई . मंदिर के दर्शन करके वह से चले तो हमारे पास गीले कपड़ों का ढेर था जिन्हें गाड़ी में सुखाते जा रहे थे . रास्ते में एक जगह मोड़ पर एक गाडी सामने  आ गयी . उसका ड्राईवर अड़ गया कि उसकी गाडी चढ़ रही है इसलिए हमें अपनी गाडी पीछे लेना होगी .हमारे पीछे तीखा मोड़ था और सैकड़ों मीटर गहरी खाई इसलिए उससे कहा तुम थोडा सा पीछे ले लो तुम्हारे पीछे सीधी सड़क है लेकिन वह तस से मास नहीं हुआ . ट्राफिक काफी कम था इसलिए दोनों अड़े खड़े रहे .हमने गीले कपडे निकाल लिए और हवा में लहरा कर सुखाने लगे साथ लाया नाश्ता निकाल कर पिकनिक का मज़ा लेने लगे . कुछ देर में एक दो गाड़ियाँ और आ गयीं तब लोगों ने उस ड्रायवर को समझाया तब गाड़ियाँ निकली . 
 रात्रि विश्राम कर दूसरे दिन सुबह केदारनाथ के लिए चढ़ाई शुरू की 
गौरी कुंड से केदारनाथ का रास्ता बहुत खूबसूरत है ( अब था ) हरी भरी पहाड़ियाँ रस्ते के किनारे पर उगे फूल दूर तक फैली चोटियाँ .ऐसे ही किसी चोटी पर धूप देखा कर हम सब ख़ुशी से चिल्लाने लगे तीन दिन लगभग गीले रहने से ये धूप  लग रही थी . केदारनाथ से करीब दो तीन किलोमीटर पहले से कुछ स्थानीय लोगों ने पूछना शुरू कर दिया की आप लोग कहाँ से आये हैं .हमने इसे मजाक में लिया किसी को इंदौर किसी को मद्रास किसी को बम्बई बताया .थोड़ी ही देर में चार पांच पंडों ने हमें घेर लिया तब हमें समझ आया कि ये पण्डे कुटुंब विशेष के हैं तब हमने अपने पैतृक गाँव का नाम और अपना गोत्र बताया चंद मिनिटों में हमारे खानदान का पंडा  हम तक पहुँच गया . ( उस समय मोबाइल नहीं हुआ करते थे ) वह हमें अपने साथ अपने घर ले गया हमारी रहने खाने सोने की व्यवस्था की फिर हमारे परिवार की बही खोल कर बताया कि आज से बारह साल पहले मेरी दादी केदारनाथ आयीं थीं उसके बाद मेरे ताऊ जी अपने बेटे बहू के साथ आये थे .उस बही में सबके नाम और तारीख लिखी थी . उसने बताया की हर कुटुंब गोत्र के अलग अलग पण्डे हैं और कोई किसी दूसरे के यजमान से बात नहीं करते .यहाँ पीढ़ियों का हिसाब दर्ज है .इतना तो शायद परिवार में नहीं रहता होगा . और ये फूलप्रूफ व्यवस्था है .हमारे आश्चर्य का ठिकाना नहीं था . 
शाम होने में कुछ ही देर थी .दोनों भाई सामने दिख रहे पहाड़ पर चढने की जिद करने लगे उनकी उम्र होगी 15-17 साल .उन्हें पहाड़ों की बर्फ लुभा रही थी .मम्मी ने तो साफ़ मना  कर दिया पापा असमंजस में थे और मैं सोच रही थी की यहाँ बार बार थोड़ी आना है .पापा को थोड़ा सा मनाया और दोनों को जाने की इजाज़त मिल गयी . मैं और पापा मंदिर के दर्शन करने चले गये और मम्मी आराम करने लगीं .जब हम लौटे तो मम्मी ने दोनों भाइयों का पूछा तो हम चौंक गए वे अभी तक वापस नहीं आये अँधेरा घिरने लगा था .घबराहट के कारन मेरी और पापा की हालत खराब हो गयी मम्मी तो रोने लगीं .हमने लोगों से पूछना शुरू किया तो जवाब मिला की आसपास दिखने वाली पहाड़ियाँ बहुत खतरनाक हैं जरा फिसले की   हजारों फीट नीचे खाई में यहाँ तो लाश भी कोई नहीं निकालता क्योंकि पत्थरों से टकराने के बाद वो निकालने लायक ही नहीं रहती . 
मैं लगातार भगवान् से मनाती रही की वे सही सलामत हों .करीब आठ बजे दोनों लौटे .उन्होंने बताया की वे बहुत ऊपर तक चले गए थे वहाँ एक पगडण्डी सी बनी थी उसपर आगे बढ़ते उन्हें एक गुफा मिली .उसपर एक बोर्ड लगा था की ये गुफा अभिमंत्रित है बिना इज़ाज़त प्रवेश न करें .तभी उन्हें वहाँ एक साधू दिखा उससे परमिशन ले कर वे अन्दर गये वहाँ एक साधु ध्यान मग्न थे इतनी ठण्ड में भी वे सिर्फ एक भगवा पहने थे .उन्हें देख कर उन्हें इतनी श्रध्दा उमड़ी की उन लोगों ने अपनी जेब में जो भी था वहीँ चढ़ा दिया . 
ये सुन कर विश्वास हुआ की सच में हिमालय में साधू तपस्या करते हैं . दूसरे दिन सुबह केदारनाथ मंदिर के दर्शन किये सामने दूर आदि शंकराचार्य की समाधी थी वहां तक जाने आने में बहुत समय लग जाता इसलिए दूर से दर्शन करके वापस आ गए . हमारे पण्डे को हमारा वर्तमान पता लिखवाया उसकी बही में हमारा नाम लिखवाया और वापसी की .रास्ते में खिले फूलों को इकठ्ठा किया ताकि अपनी हरबेरिअम की फ़ाइल में लगा सकूँ . 
अगले पूरे दिन का सफर करके बद्रीनाथ पहुँचे .बद्रीनाथ तक बस जाती है .केदारनाथ और बद्रीनाथ में सांस लेने में थोड़ी तकलीफ होती है .सुबह गर्म कुंड में स्नान कर मंदिर में दर्शन  किया फिर वही नदी किनारे दादा दादी का तर्पण किया .बद्रीनाथ आखरी धाम है यहाँ से होकर ही युधिष्ठिर स्वर्ग के लिए गए थे . यहाँ से कुछ दूरी पर इस सीमा का आखरी गाँव है माणा जहाँ सेना की चौकियाँ हैं .वहाँ सैनिकों से बात की वे यात्रियों के आवाजाही से खुश थे की कोई तो दिख रहा है बारिश होते ही सब चले जायेंगे गाँव खली हो जायेंगे फिर वे अकेले अपने टेंट में या ड्यूटी पर .सुन कर उनकी कठिन जिंदगी का अंदाज़ा हुआ . 

इस तरह ये यात्रा पूरी हुई . उन आठ दिनों में हम कम से कम अस्सी किलोमीटर पैदल चले होंगे लेकिन मज़ा बहुत आया .मैदानों में रहने वालों के लिए वो जगह स्वर्ग है ये अलग बात है की वहाँ की दुश्वारियाँ अपनी जगह हैं . 

अभी उत्तराखंड में भारी बारिश और बादल फटने से जो तबाही हुई है उसे देख कर मन काँप गया और सालों पुरानी यादों ने फिर अंतस से झाँका . 

कविता वर्मा 

Thursday, May 23, 2013

एंजोलिना ...एक खबर कई कोण

एंजोलिना जोली अमेरिका की एक ख्यातनाम अभिनेत्री है उन्होंने एक परिक्षण में पाया की उनके  शरीर में एक  जीन बी आर सी १ है जिसकी वजह से उन्हें ब्रेस्ट केंसर की सम्भावना 87% तक बढ़ गयी है उन्होंने मेस्तेक्टोमी ( स्तन हटवाने की शल्य क्रिया ) द्वारा स्तन हटवा लिया जिससे उनमे केंसर की सम्भावना ५% रह गयी . 
इस बात को लेकर सिर्फ अमेरिका में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में एक बहस शुरू हो गयी की उनका ये निर्णय सही है या गलत . न्यूयार्क टाइम्स के संपादक ने भी लिखा है की ये उनका निर्णय है जो पूरे अमेरिका की महिलाओं का सच नहीं बन सकता .
दरअसल एंजोलिना एक अमीर महिला हैं उन्होंने अपनी माँ को केंसर से लड़ते और मरते देखा जिसने स्वाभाविक  रूप से उन  गहरा प्रभाव छोड़ा अब वे अपने बच्चों के लिए चिंतित हैं और नहीं चाहतीं कि उनके बच्चों की माँ उन्हें वक्त से पहले छोड़ कर चली जाए .अपने बच्चों की स्वाभाविक जिंदगी सुनिश्चित करने के लिए ही उन्होंने इतना बड़ा कदम उठाया . 
अब इस बात पर बहस छिड़ी हुई है की उनका ये कदम सही है ,प्रचार पाने का जरिया है या उस महंगा इलाज़ को अफोर्ड कर पाने का तमाशा उन लाखों करोड़ों महिलाओं का उपहास है जो इसे अफोर्ड नहीं कर पातीं और सालों केंसर से जूझते या कम उम्र में ही दम तोड़ देती है . 
एंजोलिना के दिल में जो था उन्होंने उसे सबसे बांटा लेकिन उसकी प्रतिक्रिया बहुत अलग अलग तरीके से सामने आयी है . हर नजरिया कुछ सोचने को ही मजबूर करता है . 
अपने शरीर का कोई अंग कटवा कर निकलवाने का फैसला आसन नहीं होता अगर एंजोलिना ने ऐसा किया है तो हमें ये समझाना होगा की उन पर अपनी माँ की  मौत का कितना गहरा असर हुआ है .माँ के न रहने से उनकी जिंदगी में जो बदलाव जो खालीपन आये थे वे किस कदर भयावह रहे होंगे कि उन्होंने ये फैसला लिया . 
कई लोग इसे पैसों वाले का तमाशा कह रहे है .एंजोलिना के पास पैसों की कमी नहीं है इसलिए वे तकनीक का उपयोग कर भविष्य की आशंका को मिटा देना चाहती हैं . इसके तर्क में कई उदाहरण भी सामने आये जिनमे लोगों ने ये तक कहा कि सिर्फ आशंका के चलते तकनीक का इस्तेमाल करके शरीर का अंग कटवाना ठीक नहीं है . केंसर से जूझती या इससे दो चार हो चुकी कई महिलाओं का कहना है कि ये खबर उन लोगों के साथ एक क्रूर मजाक है जो इसे अफोर्ड नहीं कर सकते . 
अगर इस नज़रिए से सोचा जाए तो कुछ अमीर लोग जो दुनिया की हर शानो शौकत का अपने पैसों के दम पर उपयोग करते हैं वो भी गरीबों के साथ एक मजाक ही है  .लेकिन उसके लिए तर्क ये है की उनके कमाए पैसे का वो जैसे चाहे जहाँ चाहे उपयोग करें . 
लेकिन मुझे लगता है ये करके एंजोलिना ने फेमिनिटी के स्थापित ढांचे को तोड़ने का अभूतपूर्व काम किया है . उसने उन महिलाओं को खुद की और दूसरों की नज़रों में सम्मान दिलाने की कोशिश की है जो ब्रेस्ट केंसर से लड़ते हुए अपने ब्रेस्ट हटवा देने के बाद जिंदगी भर एक अवसाद भरी जिंदगी जीती हैं . 
एक महिला होते हुए उन्होंने स्त्री अंग की उपस्थिति विशेष को नज़र अंदाज़ करके अपनी जिंदगी की कीमत को अपने और अपने बच्चों के लिए सर्वोपरि माना है जो एक इंसान के नाते उनका अधिकार है . 
उन्होंने स्त्री समाज को खुद के स्वास्थ्य के प्रति जागरूक होने का सन्देश दिया है .हर देश हर समाज में स्त्रियों की दशा लगभग एक सी है .अपने स्वास्थ्य अधिकारों के प्रति उदासीनता हर समाज में व्याप्त है एंजोलिना ने इस उदासीनता को तोड़ कर सजगता लाने का सराहनीय प्रयास किया है . 

इस सब से सर्वोपरी ये निर्णय उनका व्यक्तिगत निर्णय है और उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता के चलते सारे इफ बट्स के बावजूद हमें इसका सम्मान करना चाहिए . 
कविता वर्मा 

Friday, April 12, 2013

मील का पत्थर

वनिता अप्रेल अंक में मेरी कहानी "परछाइयों के उजाले"...
1




2
3



4

Tuesday, April 9, 2013

जब तुम लौटोगे




जब तुम लौटोगे 
खिले फूल बेरंग हो मुरझा चुके होंगे। 

अठखेलियाँ करती नदी थक कर 
किनारों पर सर रखे सो गयी होगी। 
तुम्हारे इंतज़ार में खड़ा चाँद 
गश खाकर गिर पड़ा होगा 
धरती और आसमान के बीच गड्ढ़ में।  

आँखों की नमी सूख चुकी होगी 
चहकते महकते कोमल एहसास 
बन चुके होंगे पत्थर। 

लेकिन तुम एक बार आना जरूर 
देखने तुम्हारे बिना 
कैसे बदल जाता है संसार। 

Friday, March 15, 2013

छोटी कहानियाँ


कुछ छोटी छोटी कहानियाँ जो अपने आप में बहुत गहरे अर्थ समेटे हुए हैं ....

छुपम छई खेलते  वह उसे ढूँढने के लिए आवाज़ देती और वह उसका जवाब, और पकड़ा जाता। उसके दोस्त उसकी बेवकूफी पर बहुत हँसते। 
एक बार उसने उसकी पुकार का कोई जवाब नहीं दिया और वह उसे ढूँढते ढूँढते खुद खो गयी।  
                                         * * * 
बिना प्यार के इस दुनिया में कुछ नहीं । तुमने मुझे प्यार करना सिखा दिया। पत्नी की आँखों में डूबते हुए उसने कहा। 
बाहर आँगन में बूढी माँ अकेली पड़ी खाँस रही थी। 
                                        * * * 
तुम रोज़ पेन पेंसिल,पुस्तक माँगते हो खुद की क्यों नहीं लाते?उसने झुंझलाते हुए कहा। 
हौले से मुस्कुरा कर उसने पेंसिल ले ली और अपना पेंसिल बॉक्स चुपके से दोस्त को दे दिया। 
                                       * * *
कक्षा से सबके जाने के बाद उसने उसका नाम ब्लेक बोर्ड पर लिख कर दिखाया।
यह उसके पहले प्यार का पहला इज़हार था। 
                                       * * * 
ये दिखाने के लिए कि उसकी कोई परवाह नहीं ,उसने उसे देखते ही मुंह फेर लिया। 
और उसने ये सोच कर लम्बी सांस भरी कम से कम वह अब तक पहचानता तो है। 
                                       * * * 
वह बहुत बदल गया है उसके हाव भाव, बात करने का तरीका, उसका  अंदाज़ उसके दोस्त उसकी पहचान सब कुछ,
लेकिन फिर भी उसकी आँखे वैसी की वैसी क्यों हैं ????
                                      * * * 
बेहतर है तुम मुझे भूल जाओ मैंने तुम्हे अपनी जिंदगी से निकाल दिया है। 
ओह ये अचानक बादल क्यों बरस पड़े? 
                                      * * * 

प्यार जब हद से ज्यादा बढ़ जाये तो क्या बोझ हो जाता है? उसने कोई जवाब नहीं दिया। 
आज जाने से पहले उसने कहा में बहुत हल्का महसूस कर रहा हूँ।उसे जवाब मिल गया। 
                                             * * *
अच्छा बताओ दुःख का रंग गहरा होता है या उदासी का? 

जब अपनों का साथ न हो उस समय आयी ख़ुशी का रंग सबसे स्याह होता है .

उसने कहीं दूर देखते हुए जवाब दिया
                                                                  * * * 

Thursday, March 7, 2013

नंबर का चक्कर



बहुत दिनों से बिना काम की व्यस्तता ने पुरानी यादों को कही गहरे दफ़न कर दिया था। आज यूँ ही सी मिली फुर्सत में एक पुरानी घटना याद आ गयी जिससे जुडी थी एक मीठी सी याद तो एक कड़वी सी बात। वैसे तो कडवाहट देर तक अपना असर रखती है लेकिन मिठास कुछ ज्यादा है शायद इसलिए कड़वी याद को भी एक मुस्कान के साथ याद कर लेती हूँ . 
बात होगी यही कोई १३- १४ पुरानी हमने अपना घर शिफ्ट किया इससे हमारा लैंड लाइन फोन का नंबर भी बदल गया .नया नंबर पहले किसी मुथु साहब (परिवर्तित नाम ) का था जो शायद किसी बड़े सरकारी महकमे में रहे होंगे तो हमारा फोन शुरू होते ही उनके लिए फोन आने लगे जब तक लोकल फोन आते रहे तब तक कोई बात नहीं थी लेकिन कई बार बंगलोर, चेन्नई,कोयम्बतूर से फोन आते तो बड़ा अफ़सोस होता की लोगों का पैसा बेकार बर्बाद हो रहा है. ऐसे ही एक दिन इंदौर से ही किसी महिला का फोन आया वे किसी स्कूल की रिटायर्ड प्रिंसिपल थीं .जब मैंने उन्हें बताया की मुथु साहब का ये नंबर मुझे मिला है और उनके लिए बहुत सारे फोन आते हैं अगर आपको उनका नंबर कहीं से मिले तो प्लीज़ मुझे भी बता दीजियेगा ताकि में लोगों को उनका नंबर बता दूँ .

ये सुन कर वे बहुत खुश हुईं और कहने लगीं में पता करती हूँ .आप उन लोगों की मदद करना चाहते हैं जिन्हें जानते भी नहीं और उनकी परेशानी दूर करना चाहते हैं ये बहुत अच्छी बात है. उन्होंने अपना नंबर भी मुझे दिया .
मैं उनके फोन का इंतजार करती रही और कुछ दिनों बाद उनका फोन आया भी और मुझे मुथु साहब का नंबर मिल गया . मैंने उस नंबर पर फोन किया तो मुथु साहब ने ही फोन उठाया . मैंने उन्हें बताया की उनके पुराने नंबर पर बहुत लोगों के फोन आते हैं और वह भी एस टी डी .ये आपका ही नंबर है न ये जानने के लिए फोन किया था मैंने आपका ये नया नंबर में उन लोगों को दे दूं?? 
वे साहब जाने किस अकड़ फूँ  में थे कहने लगे कोई जरूरत  नहीं है जिसे जरूरत होगी वो खुद पता कर लेगा ,और फोन काट दिया . 
मैं सिर्फ फोन को देखती रह गयी .
शाम को जब ये बात अपने पतिदेव को बताई और बताया की उन्होंने किस लहज़े में मुझसे बात की तो उन्हें बड़ा गुस्सा आया .  कहने लगे अब जिसका भी फोन आये उसे ये नंबर जरूर देना और वह नंबर लिख कर फोन के पास ही रख दिया . 
खैर कुछ दिनों में ही लगभग सभी लोगों तक वह नंबर पहुँच गया और फिर उनके लिए फोन आने बंद हो गए .

एक दिन एक फोन आया किसी राजपुरवाला साहब के लिये. स्वाभाविक था मैंने कहा रॉंग नंबर तो कहने लगे नंबर तो यही है. लेकिन यहाँ तो कोई राजपुरवाला  साहब नहीं रहते .खैर फोन बंद हो गया .  अब ये सबके लिए कौतुहल हो गया की मुथु साहब के बाद किसी और के फोन .बच्चे तो कहने लगे मम्मी बड़ा मज़ा आयेगा . 

अब तो ये सिलसिला भी चल निकला हफ्ते में कम से कम ३- ४ फोन आ ही जाते थे राजपुरवाला साहब के लिये. हर बार लोग मायूस होते थे कहते नंबर तो यही है .एक दिन ऐसे ही बात करते अचानक मैंने पूछ लिया की ये राजपुरवाला साहब रहते कहाँ हैं ? 
पता चला उज्जैन मे. 
अब सारा माज़रा समझ में आया की उनका और हमारा नंबर तो सामान था लेकिन लोग उज्जैन के कोड की जगह इंदौर का कोड लगा देते थे और फोन हमारे यहाँ लग जाता था . 
एक दिन मैंने उज्जैन का कोड लगा कर अपना ही नंबर डायल किया और राजपुरवाला साहब से बात की और उनसे कहा की वे अपने रिश्तेदारों और मित्रों को सही कोड लगाने को कहें ताकि उनका समय और पैसे बर्बाद ना हों .उन्होंने मुझे अनेकों धन्यवाद दिए और एक मीठी सी मुस्कान के साथ फोन बंद किया गया .
हालांकि बाद में भी राजपुरवाला साहब के लिए फोन आते रहे लेकिन सिर्फ एक बात की उज्जैन का कोड लगाइए के साथ हम हंसते हुए फोन बंद करते रहे. 

Thursday, January 17, 2013

यादों का अंकुश




मन की गलियों में भटकते कई बातें याद आती है तो कभी ऐसा कुछ घटित होता है की उसके बहाने कोई पुरानी बात याद आ जाती है तो कभी किसी पुरानी बात के बहाने कोई काम करते हाथ या कहें मन ठिठक जाता है। कुछ बाते बहुत बहुत पुरानी होकर भी मानों पुरानी नहीं होती उनकी स्मृति मन पटल पर कल की घटना सी ताज़ा होती है। वह कचोटती भी है और कुछ करने से या तो रोकती है या कहीं अंकुश लगाती है। वह खुद से कुछ नहीं कहती लेकिन उस स्मृति की छाप इतनी मजबूती से मन पर पड़ी होती है की वह अपने मौन से भी बहुत कुछ कह जाती है। ये अलग बात है की कभी कभी उस अदृश्य रोक को नज़रंदाज़ करके वही किया जाता है जो करना होता है लेकिन उसके बाद भी वह जेहन में अपनी उपस्थिति दर्ज तो करवा ही देती है। 

एक समय था जब बाज़ार किसी खास मौके पर ही जाना होता था। नए कपडे सिलवाना या लेने जाना किसी अवसर विशेष पर ही होता था। अब तो बोरियत दूर करने के लिए भी लोग खरीदी करने निकल जाते हैं। एक नया चलन आया है विंडो शोपिंग का जिसमे खरीदना कुछ खास नहीं होता बस मार्केट में घूम कर मन को बहला लिया जाता है और कुछ पसंद आये तो खरीद लो मनाही तो कोई है नहीं। माल संस्कृति ने इस विंडो शौपिंग को बहुत बढ़ावा दिया है। खरीदो तो खरीदो घूमो खाओ पियो और अपनी बोरियत माल के किसी कोने में फेंक कर वापस घर आ जाओ। 

कभी कभी तो मन ऐसा बन जाता है की अरे इतना घूमे है तो कुछ तो खरीद लें,फिर भले घर आ कर खरीदी हुई चीज़ देखने का मन ही न हो या लगे अरे बेकार खरीद लिया। ऐसे समय में उन बुजुर्ग का चेहरा आँखों के आगे घूम जाता है। उनकी बेबस निगाहें कांपते हाथ और मायूस आवाज़, उनका अचानक दूकान से बाहर चले जाना और अपनी बेबसी। 

बात करीब 20 साल पुरानी है शादी के बाद नयी नयी आज़ादी, हाथ में पहली बार अपना पैसा, अकेले खरीदी करने का उत्साह,या घूमने के बहाने घर से बाहर अपनी दुनिया में अकेले रहने का सुख जो भी कहें। बस बाज़ार में घूमते हुए कहीं कुछ खाते पीते छोटी मोटी चीज़े खरीदते हुए हम अपने आप में मस्त रहते थे। कई बार बाज़ार की चमक इतना आकर्षित करती थी की कुछ चीज़े जरूरत न होने पर भी खरीदने का मन हो जाता था। हाँ ये चीज़ें छोटी छोटी ही होती थीं क्योंकि बहुत पैसा तो पास होता नहीं था। 

ऐसे ही एक दिन किसी दुकान पर अपने लिए हेयर क्लिप्स खरीदने रुक गयी। नयी नयी शादी हुई थी इसलिए ऐसी चीज़ों की कमी नहीं थी लेकिन बस यूं ही। उसी दूकान पर एक बुजुर्ग सज्जन एक बटुआ देख रहे थे। उम्र होगी यही कोई 60-65, सामान्य से कपडे पैरों में हवाई चप्पल उन्होंने उसे खोल कर उलट पलट कर देखा और उसका दाम पूछा। 

दुकानदार ने जो दाम बताया तो एक बार तो उन्होंने बटुआ काउंटर पर रख दिया लेकिन फिर उसे उठा कर देखने लगे। फिर उसका दाम पूछा। फिर बहुत धीमी आवाज़ में पूछा कुछ कम नहीं हो सकता? 
जाने क्यों उनकी और ध्यान अटक गया और अपनी खरीदी छोड़ कर मैं उन्हें देखने लगी। 
दुकानदार ने कहा नहीं कम का चाहिए तो ये देखिये उसने दूसरा बटुआ काउंटर पर रख दिया लेकिन उन्हें तो पहले वाला ही पसंद था। वे उसी को अपने कांपते हाथों से उलटते पलटते रहे। वो तो कहिये दुकानदार सज्जन था की धीरज से उन्हें देखते रहने दिया कोई और होता तो शायद झिड़क देता। उन्होंने आखरी बार उसे देखा फिर काउंटर पर रखते हुए बड़ी मायूस आवाज़ में कहा रहने दो और धीरे से दुकान से बाहर निकल गए। 

अब दुकानदार मुझसे मुखातिब हुआ कौन सी हेयर क्लिप दूं मेडम ? ये देखिये लेकिन मेरे कान तो उस आवाज़ की मायूसी से सुन्न से हो गए थे और नज़रें उनका पीछा कर रही थीं। मन उन्हें आवाज़ दे रहा था अंकल जी आप ये बटुआ ले लीजिये बाकि पैसे मैं दे देती हूँ लेकिन न आवाज़ बाहर निकल सकी न वे वहां रुके और अपनी बेवजह की खरीदी पर खुद से शर्मिंदा सी होती मैं दुकान से बाहर आ गयी। 

Tuesday, January 15, 2013

मील का पत्थर

समाज कल्याण विभाग की पत्रिका में मेरा ये लेख पेज़ नो 11 से 14


https://docs.google.com/viewer?a=v&pid=gmail&attid=0.1&thid=13c3ce98b2c1ddc6&mt=application/pdf&url=https://mail.google.com/mail/u/0/?ui%3D2%26ik%3D1127ee4a6f%26view%3Datt%26th%3D13c3ce98b2c1ddc6%26attid%3D0.1%26disp%3Dsafe%26realattid%3Dfile0%26zw&sig=AHIEtbSIQeSrZ3wul21RKalgaXcZsPr-MQhttps://docs.google.com/viewer?a=v&pid=gmail&attid=0.1&thid=13c3ce98b2c1ddc6&mt=application/pdf&url=https://mail.google.com/mail/u/0/?ui%3D2%26ik%3D1127ee4a6f%26view%3Datt%26th%3D13c3ce98b2c1ddc6%26attid%3D0.1%26disp%3Dsafe%26realattid%3Dfile0%26zw&sig=AHIEtbSIQeSrZ3wul21RKalgaXcZsPr-MQ


Saturday, January 12, 2013

उठो जागो



जो टूट चुका है समझौता, 
तुम उसकी लाश क्यों ढोते हो?
धोखा तुम्हारे साथ हुआ है 
क्यों शराफत का लबादा ओढ़े रहते हो?
बन्दूक,गोली, बम, हथगोले देकर 
चलाने की इजाजत नहीं देते हो?
क्यों अपनी इक इक जान को 
उनकी दस जान से कम लेते हो? 
वो घर में घुसकर ललकारते हैं, 
तुम नियमों की दुहाई देते हो।
प्रतिबंधों, नाराजी के डर से 
तुम अपना सम्मान खोते रहते हो। 
वक्त आ गया है अब 
उन्हें सबक सिखाने का।
देखें वो आँख तरेर हमें 
आँख ही नोच ले आने का। 
वो चार कदम जो घर में घुसे, 
उन्हें दूर तक खदेड़ आने का।
क्रिकेट, व्यापार और हर द्वार बंद कर,
आर पार भिड़ जाने का। 
क्या है औकात उनकी ये, 
उनकी धरती पर बताने का।
उठो अब कुछ तो निर्णय लो, 
ये समय नहीं बतियाने का।  
बहुत हुई वार्ता, चेतावनी 
कुछ जमीनी काम कर जाने का। 
अपनी भलमनसाहत पर, 
अपनी दृढ़ता दिखलाने का। 
उठो,जागो और लक्ष्य धरो 
ससम्मान जीने 
               या मर जाने का। 

दो लघुकथाएँ

जिम्मेदारी  "मम्मी जी यह लीजिये आपका दूध निधि ने अपने सास के कमरे में आते हुए कहा तो सुमित्रा का दिल जोर जोर से धकधक करने लगा। आज वे...