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Showing posts from 2013

ग्यारह बजे का अपॉइंटमेंट

बिटिया बहुत दिनों से शिकायत कर रही थी की उसके बाल बहुत झड़ रहे हैं। कई शैम्पू बदल लिए खाने पीने में सुधार तो माना नहीं जा सकता था दो दिन बादाम खाईं चार दिन की छुट्टी ,धुन तो ये सवार थी कि किसी अच्छे डॉक्टर को क्यों नहीं दिखाया जा रहा है खैर उसकी तसल्ली के लिए एक स्किन स्पेशलिस्ट से आज सुबह ग्यारह बजे का अपॉइंटमेंट लिया गया और ग्यारह बज कर तीन मिनिट पर क्लिनिक में पहुँच भी गए। (अब तीन मिनिट की देरी तो हम भारतियों का हक़ है )खैर ,वहाँ जा कर अपना नाम बताया विज़िटर्स स्लिप भरी फीस जमा की और अपनी बारी का इंतज़ार करने लगे। डॉक्टर के क्लिनिक में कोई पेशेंट था तो सोचा शायद हमसे पहले वाले का नंबर चल रहा होगा। 
थोड़ी देर इंतज़ार के बाद किसी और महिला को अंदर जाने का कहा गया ,मैंने रिसेप्शन पर बैठे लडके से पूछा "हमारा ग्यारह बजे का टाइम था" तो जवाब मिला "जी मेम उनका भी ग्यारह बजे का ही टाइम था। " "आप एक टाइम कितने लोगो को देते है ?" "चार लोगों को " बिना किसी झिझक के जवाब मिला।  अब हमारा चौकना स्वाभाविक था। "ग्यारह से साढ़े ग्यारह तक का एक स्लॉट होता है जिसमे सभी …

हिन्दी विकास यात्रा के गड्ढे …।

गर्भनाल पत्रिका के ८५ वें अंक में मेरा आलेख। ।कोशिशो के बाद भी उसका लिंक नहीं लगा पा रही हूँ। लेख आप यहाँ पढ़ सकते 

कॉलेज में कोई फार्म भरे जा रहे थे  जिसमे सबको अपने  नाम हिंदी और अंग्रेजी दोनों में लिखने थे। कई बच्चे अपना फार्म लगभग पूरा भर कर  भी जमा नहीं करवा रहे थे क्योंकि उन्होंने अपने नाम हिंदी में नहीं लिखे थे। कुणाल ने बहुत संकोच से कहा मुझे पता है मेरे नाम में वो अलग वाला 'न' आता है लेकिन उसे लिखते कैसे है मुझे याद नहीं आ रहा है।  यही हाल अथर्व ,प्रणव ,गार्गी ,कृति आदि का भी था , उन्हें ये तो पता था कि उनके नाम में र कि रफ़ार ,अलग वाला न ,या ऋ आता है लेकिन लिखना कैसे है ये याद नहीं।  ऐसा नहीं है उन्होंने अपना नाम हिंदी में लिखना सीखा नहीं था लेकिन कई सालों से हिंदी में नाम लिखा ही नहीं इसलिए भूल गए।  

ये हालत है हमारी आज की शहरी पीढ़ी की और ये कोई मनगढंत बात नहीं है बल्कि मेरी बेटी के कॉलेज़ में घटी सच्ची घटना है जिसने आने वाले समय में शहरी क्षेत्रों में हिंदी की क्या स्थिति होने वाली है उस के दर्शन करवा दिए। 
आज के समय के आधुनिक सी बी एस ई स्कूल में बच्चे दसवीं तक हिंदी…

'सगा सौतेला 'का पॉडकास्ट

मेरी कहानी 'सगा सौतेला 'का पॉडकास्ट अर्चना चावजी कि आवाज़ में

http://archanachaoji.blogspot.in/2013/11/blog-post_19.html

चीनी वितरण

एक बड़ी सी बस्ती में कई सारे लोग रहते थे।  उनमे थे एक मिस्टर अ। मिस्टर अ को चीनी बांटने का अधिकार था। उन्होंने एक बार बस्ती की ही मिस एम को खुश हो कर एक कटोरी चीनी दे दी।  सारी बस्ती ही बड़ी खुश थी क्योंकि मिस एम बहुत भली और होनहार थीं और सभी चाहते थे कि उन्हें एक कटोरी चीनी दी जाना चाहिए।  मिस एम अपने एक जान पहचान वाले मिस्टर सी को भी चीनी दिलवाना चाहती थीं उन्होंने कई बार दबी जुबान से इसका जिक्र किया लेकिन कुछ दूसरे लोग मिस्टर सी को चीनी पाने का हक़दार नहीं मानते थे इसलिए बात बनी नहीं ,बस विचार चलता रहा।  
उसी बस्ती में एक थे मिस्टर ब। न जाने किन कारणों से मिस्टर अ और ब के बीच बनती नहीं थी।एक बार जब बस्ती कि चौपाल में सभी इकठ्ठे थे मिस एम ने मिस्टर अ के सामने मिस्टर ब कि तारीफ कर दी  . बस फिर क्या था मिस्टर अ आगबबूला हो गए और उन्होंने आव देखा न ताव और सभी के सामने मिस एम से उनकी दी हुई एक कटोरी चीनी वापस मांग ली।  ये सुन कर सभी दंग रह गए और इस बात की सभी ने बहुत आलोचना की।  खुद मिस्टर अ के घरवाले भी उनकी इस बात पर उनसे नाराज़ हुए। 
मिस्टर अ को लगा इस तरह उनकी बहुत बदनामी होगी और हो सकत…

व्यथा

प्रारब्ध ने चुना मुझे  चाहर दीवारी से घिरा बचपन  बिना दुःख क्या मोल सुखका  बिना संग क्या ज्ञान अकेलेपन का।  
तुम रहीं नाराज़ चला गया  बिना कहे  न सोचा एक बार  क्या कह कर जाना था आसन?  मुझे जाना था  क्योंकि प्रारब्ध ने था चुना मुझे।  
ज्ञान प्राप्ति की राह में  किसी कमज़ोर क्षण  हो जाना चाहा होगा  एक बेटा, पिता ,पति  क्यों नहीं समझा कोई ?
मैंने कब चाही थी यह राह आसान  होना चाहा था एक आम इंसान  संघर्ष ,सुख दुःख जिजीविषा जी कर  वंचित किया गया मुझे  क्योंकि प्रारब्ध ने चुना मुझे।  
देवों की श्रेष्ठ कृति इंसान  तभी तो लोभ संवरण नहीं कर पाए  अवतरित होते रहे धरती पर  बन कर मानव अवतार 
फिर क्यों चुना मुझे  बनने को भगवान  मैंने भी कभी चाह होगा  बनना एक आम इंसान।  
कविता वर्मा  

मेला दिलों का …

कल फेस बुक पर दशहरा मेले का एक फोटो  डाला बहुत सारे लोगों ने इसे पसंद  किया।  अपने बचपन  को  याद करते हुए  बचपन के मेलों को याद किया। कुछ लोगों ने तुलना  कर डाली  उस समय के मेले , उनकी बात ही कुछ और थी , इसी बात ने सोचने को मजबूर कर दिया। 

उस समय के मेले मतलब बीस पच्चीस साल पहले के मेले जिनमे  हिंडोले थे ,चकरी वाले झूले थे। गुब्बारे चकरी वाले ,प्लास्टिक के मिट्टी के खिलोने वाले ,मिट्टी  के बर्तन , नकली फूल ,छोटे मोटे बर्तनों वाले, सस्ते कपड़ों वाले ,खाने पीने की दुकानों में जलेबी इमरती मालपुए वाले ,गुड़िया के बाल ,सीटी, कार्ड बोर्ड पर रंगीन पन्नी लगा कर बनाये गयीं तलवार ,गदा, धनुष बाण वाले। यही सब तो था।  आज भी कमोबेश वही सब है दूरदराज़ के गावों में तो बहुत कुछ नहीं बदला , बड़े शहरों के पास वाले गाँवों में आधुनिकता का असर पड़ा है लोगों की रुचियाँ बदली हैं इसीलिए मेलों का स्वरुप भी बदला है। यही बात शहरों के मेलों के साथ है।   माल संस्कृति के चलते शहरी बच्चों में मेलों का बहुत ज्यादा आकर्षण नहीं रह गया है। मॉल में गाहे बगाहे कई इवेंट्स होते रहते हैं जिनमें बच्चे मेलों की तरह ही शामिल होते …

अभ्यस्त

घनघोर अँधेरे पथ पर  कुछ बिखरे काँटे , कुछ  फूलों जैसे पल  अटपटी राह  पर बढ़ते अकेले कदम।  
कठिन राह, घनघोर अन्धकार  संवेदनाओं से रीता संसार  मन ढूँढ रहा एक किरण  एक आस , कोई एहसास  टटोलते हाथ  टकराते सघन निरास  ठोकर खाते गिरते  भीगते जज़्बात। 
नहीं समय करने का  भोर का इंतज़ार  न ही कोई साथ  उठ खड़ा हो मिचमिचा कर आँख  हो अभ्यस्त साध अन्धकार  बढ़ा कदम न कर इंतज़ार।  
कविता वर्मा

शक्ति पूजा

नवरात्री शुरू होने वाली हैं सीमा घर की साफ़ सफाई में लगी है। कल शक्ति स्वरूपा  देवी जी की स्थापना का दिन है उनके स्वागत में वह कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती। 
बचपन से सुनती आयी है नारी ही शक्ति है जो सृष्टि के निर्माण की सामर्थ्य रखती है। शक्ति की उपासना के द्वारा नारी शक्ति को शशक्त किया जाता है जिससे विश्व निर्माण और सञ्चालन सुचारू रूप से चल सके।   फोन की घंटी ने उसके हाथों और दिमाग की गति को रोक दिया।  बाहर उसके ससुर जी फोन सुन रहे थे घर में अचानक जैसे सन्नाटा पसर गया।  उसके ससुर जी बहुत धीमी आवाज़ में कह रहे थे " बेटी तू ही बता मैं और पैसा कहाँ से लाऊँ ? पहले ही दस लाख रुपये दामाद जी को दे चूका हूँ ,रिटायर आदमी हूँ ,तेरे भाई की तनख्वाह से उसके खर्चे ही जैसे तैसे पूरे हो पाते हैं। तू दामाद जी को समझा न अगर दे सकता तो जरूर दे देता बेटी। "  फोन रख कर ससुरजी निढाल से पलंग पर बैठ गए और दोनों हाथों से माथा थाम लिया।  "क्या करूँ कहाँ फेंक दिया मैंने अपनी बेटी को ,जानती हो सुनील की माँ आज तो वो रो रो कर कह रही थी ,पापा मुझे यहाँ से ले जाओ आप इनका पेट कभी नहीं भर सकोगे ,मुझे जिन…

डर या रोमांच

साहित्य के नव रसों में भय का अपना स्थान है। भय ,डर ,रोमांच जीवन की स्थिरता को गति प्रदान करते हैं।  हमारे यहाँ तो बहुत छोटे बच्चों में भी डर भरा जाता है ,बचपन से हौया है ,साधू बाबा पकड़ ले जायेगा जैसी बातें उनके जेहन में शायद डर से परिचय करवाने के लिए भरी जाती हैं।  बच्चों के ग्रुप में भी एकाध बच्चा तो ऐसे परिवार से होता ही है जहाँ बच्चों के सामने इस तरह की बाते करने से परहेज़ नहीं किया जाता।  
मुझे याद है डर से मेरा पहला परिचय हुआ था जब मैं शायद दूसरी या तीसरी में पढ़ती  थी। उस समय ये अफवाह जोरो से फैली थी कि कुछ लोग आँखों में देख कर सम्मोहित कर लेते है और फिर व्यक्ति उसके अनुसार काम करता है या उसके पीछे पीछे चला जाता है। बहुत डर लगा था इस बात से। 
इसके बाद भूत चुड़ैल जैसी कहानियों से परिचय हुआ ,एक कहानी तो मैंने अपने बचपन के बहुत सालों बाद किसी बच्चे के मुँह से सुनी कि एक बच्चे की माँ मरने के बाद रोज़ रात में घर आ कर उस बच्चे के लिए खाना बना कर रख जाती है। मुझे यकीन है आपमें से कईयों ने ये कहानी सुनी होगी।   इस तरह डर को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढाया जाता है।  
मम्मी बताती थीं कि उन्हें जासू…

पागल

हाथ में पत्थर उठाये वह पगली अचानक गाड़ी के सामने आ गयी तो डर के मारे मेरी चीख निकल गयी. बिखरे बाल, फटे कपडे, आँखों में एक अजीब सी क्रूरता पत्थर लिए हाथ ऊपर ही रह गया.लेकिन जाने क्यों वह ठिठक गयी पत्थर फेंका नहीं उसने .गाड़ी जब उसके बगल से गुजरी खिड़की के बहुत पास से उसके चेहरे को देखा.अब वहां एक अजीब सा सूनापन था. कार के दूसरी ओर से एक ट्रक निकल गया. वह कार के पीछे की ओर भागी और ट्रक पर पत्थर फेंक दिया.आसपास दुकानों पर खड़े लड़के हंस रहे थे.वह पगली थी घोषित पगली.ना जाने किस ट्रक या ट्रक वाले ने उसके साथ कुछ बुरा किया था की वह हर ट्रक को अपना निशाना बनाती थी.लेकिन उसकी नफरत पर नियंत्रण था .ट्रक के सामने आ खडी हुई कार को उसने कोई नुकसान  नहीं पहुँचाया था. युवाओं की भीड़ शहर की मुख्य सड़क पर जुलुस की शक्ल में चली जा रही थी. महंगाई के विरोध में आज भारत बंद का आव्हान है.रास्ते में खुली मिली हर दुकान में ये युवा तोड़ फोड़ लूटपाट करते चले जा रहे थे. सच तो ये है कि इनका आक्रोश किसके विरुद्ध  है ये नहीं जानते ना इन्हें अपना लक्ष्य पता है ना ही इस आक्रोश पर कोई नियंत्रण है. रास्ते में आने वाला हर…

ऑनरकिलिंग

बेटी के शव को पथराई आँखों से देखते रहे वह.बेटी के सिर पर किसी का हाथ देख चौंक कर नज़रें उठाई तो देखा वह था. लोगों में खुसुर पुसुर शुरू हो गयी कुछ मुठ्ठियाँ भींचने लगीं इसकी यहाँ आने की हिम्मत कैसे हुई. ये देख कर वह कुछ सतर्क हुए आगे बढ़ते लोगों को हाथ के इशारे से रोका और उठ खड़े हुए. वह चुपचाप एक किनारे हो गया. तभी अचानक उन्हें कुछ याद आया और वह अन्दर कमरे में चले गए. बेटी की मुस्कुराती तस्वीर को देखते दराज़ से वह कागज़ निकाला और आँखों को पोंछ पढने लगे. पापा मै ऐसे अकेले विदा नहीं लेना चाहती थी. बिटिया की आँखों में उन्हें आंसू झिलमिलाते नज़र आये. चिता पर बिटिया को देख उनकी आँखे भर आयीं उसे इशारा कर उन्होंने अपने पास बुलाया और जेब से सिन्दूर की डिबिया निकाल कर उसकी ओर बढ़ा दी. हतप्रभ से डबडबाई आँखों से उसने डब्बी लेकर उसकी मांग में सिन्दूर भरा और रोते हुए उसके चेहरे पर झुक कर उसका माथा चूम लिया. उन्होंने जलती लकड़ी उसे थमा दी और बिटिया से माफ़ी मांगते हुए उसके सिरहाने वह कागज़ रख दिया. जलते हुए कागज़ के साथ उन्होंने ऊँची जाती का अभिमान भी जला डाला था.  कविता वर्मा

हिस्सा

माथुर साहब बड़े सुलझे हुए आदमी है ।जीवन की संध्या में वे आगे की सोच रखते हैं । इसलिए उन्होंने उनके बाद उनके मकान के बंटवारे के लिए अपने दोनों बेटों और बेटी को बुला कर बात करने की सोची ताकि उनके दिल में क्या है ये जान सकें ।  बेटों ने सुनते ही कहा पापा आप जो भी निर्णय करेंगे हमें मंजूर होगा । लेकिन बेटी ने सुनते ही कहा हाँ पापा मुझे इस मकान में हिस्सा चाहिए ।माथुर साहब और उनके दोनों बेटे चौंक गए । माथुर साहब की बेटी की शादी बहुत बड़े घर में हुई थी । उसके लिए उनके मकान का हिस्सा बहुत मायने नहीं रखता था । फिर भी उसकी हिस्से की चाह? स्वाभाविक था एक कडवाहट सी उनके मुंह में घुल गयी । साथ ही ये ख्याल आते ही उनकी नज़रें झुक गयीं की उनकी तथाकथित प्रगतिशीलता बेटी के हिस्सा माँगते ही बगलें झांकने लगी थी। फिर भी प्रकट में उन्होंने कहा हाँ बेटी बता तुझे इस मकान में कौन सा हिस्सा चाहिए? पापा मुझे इस मकान का सबसे बड़ा हिस्सा चाहिए । आप अपनी वसीयत में लिखियेगा की मेरी पूरी जिंदगी इस घर के दरवाजे मेरे लिए हमेशा खुले रहें ।  माथुर साहब मुस्कुरा दिए और दोनों भाइयों ने बहन को गले लगा लिया । जरूर बहना तेरा ये…

रजिस्ट्रेशन या लूट ???

बारहवीं की पढाई के साथ  हो जाती है जद्दोजहद आगे की पढ़ाई की .आज के समय में कई प्रोफेशनल कोर्स हैं जिनमे बच्चे अपनी रूचि अनुसार जा सकते हैं इनमे कई जाने माने  कोर्स जैसे इंजिनीअरिंग ,मेडिकल, सी ए ,सी एस ,एम् बी ए, के बारे में जानकारी हर कहीं उपलब्ध है लेकिन फिर भी कई कोर्स ऐसे हैं जिनके बारे में जानकारी तो फिर भी जुटाई  जा सकती है लेकिन उसके लिए अलग अलग राज्यों में कोई तालमेल नहीं है .
आर्किटेक्चर कॉलेज में एडमिशन के लिए आई आई टी की में एग्जाम के साथ ही सेकंड पेपर होता है जिसकी मेरिट लिस्ट बारहवीं के मार्क्स के साथ बनती है .देश में सिर्फ दो आई आई टी हैं जिनमे आर्किटेक्चर के कोर्स हैं रुड़की और खड़गपुर जिनमे अस्सी अस्सी सीट्स हैं .आई आई टी का पहला पेपर पंद्रह अप्रेल को हुआ था और बारहवीं का रिजल्ट चौबीस मई को आ गया इसके बावजूद भी अब तक आई आई टी का रिजल्ट घोषित नहीं हुआ .इसलिए बच्चे राज्य के कॉलेज में रजिस्ट्रेशन करवाने को विवश हैं . 
इसी रिज़ल्ट पर नॅशनल कॉलेज में एडमिशन मिलेंगे .सिर्फ सात नॅशनल कॉलेज में आर्किटेक्चर का कोर्से है हमीरपुर ( हिमाचल प्रदेश ) ,जयपुर ( राजस्थान ), पटना ( बिहा…

केदारनाथ आपदा ..सूक्ष्म कारण भी है प्रभावी

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केदारनाथ आपदा ..सूक्ष्म कारण भी है प्रभावी
केदारनाथ में आयी विपदा ने भारतीय जन मानस को हिला  दिया .अभी सही आंकड़ा प्राप्त नहीं हुआ है लेकिन हज़ारों लोग लापता है और सेंकडों मृत .अलग अलग राज्य सरकारे अपने यात्रियों की सुरक्षा के लिए मदद भेज रही हैं केंद्र ने भी त्वरित मदद दी है सेना के जवान जान पर खेल कर लोगों की मदद कर रहे हैं .जिन लोगों को मदद मिल चुकी है और जो सुरक्षित हैं वे सरकार और व्यवस्था को कोस रहे हैं .मीडिया ने अपनी कमर कस कर जवानों को तैनात कर दिया है जो लोगों के आक्रोश को आम लोगों तक पहुँचाये जिसके कोई सार्थक परिणाम नहीं आने वाले हैं . 
एक बात बार बार कही जा रही है कि मौसम विभाग ने दो दिन पहले ही भारी बारिश की चेतावनी दे दी थी मानसून और पश्चिमी विक्षोभ के कारण बादल फटने की कोई चेतावनी नहीं दी गयी थी ये अचानक आयी विपदा है जो तीन साल पहले लेह में आयी थी और अब उत्तराखंड में . बादल फटने जैसे हालात बने कैसे ?पहले इस तरह की विपदा यदा कदा आती थीं अब इनकी आवृति अचानक कैसे बढ़ गयी ? इसके पीछे कुछ सूक्ष्म कारण हैं जिन पर गौर किया जाना जरूरी है .  हमारे कई धार्मिक स्थल सुदूर पहाड़ों पर…

उत्तराखंड यात्रा ..एक याद

(केदारनाथ की ताज़ा तस्वीरें देख कर मन द्रवित हो गया .मंदिर के आस पास बने मकान उन पंडों पुजारियों के है जो पीढ़ियों से कुटुंब विशेष के पुरोहित हैं उनके पास कई पीढ़ियों के यजमानों का लेखा जोखा  है बिना किसी कम्पूटर के चंद  मिनिटों में आपके कुटुंब का पुरोहित आप के पास पहुँच कर अपनी बही में केदारनाथ आये आपके पूर्वजों के नाम,स्थान गोत्र सब बता देते हैं .
इस तबाही में कई ( या सभी ) कुटुम्बों के पीढ़ियों के ये रिकॉर्ड भी नष्ट हो गए होंगे ,लगभग हर भारतीय की विरासत है ये . )
लगभग पच्चीस साल पहले की बात है उत्तराखंड के चारों  धाम यमुनोत्री गंगोत्री केदारनाथ बद्रीनाथ जाने का प्रोग्राम बना . लम्बा सफ़र पंजाब की गर्मी ,आतंकवाद का डर सब पार करके हरिद्वार पहुंचे .मई के महीने में भी गंगा के बर्फ जैसे ठन्डे पानी में स्नान करके मन आध्यात्मिक आस्था से भर गया . शाम के समय घाट पर गंगा जी की आरती धर पर तैरते दीपक जैसे आँखों में स्थायी रूप से बस गये .  ऋषिकेश का लक्ष्मण झूला पार करते मन जहाँ रोमांचित था वहीं थोडा डरा हुआ भी . 
मैदानी इलाका पार करके जब यमुनोत्री जाने के लिए सफर शुरू हुआ जानकी चट्टी पहुँचते हम लो…

एंजोलिना ...एक खबर कई कोण

एंजोलिना जोली अमेरिका की एक ख्यातनाम अभिनेत्री है उन्होंने एक परिक्षण में पाया की उनके  शरीर में एक  जीन बी आर सी १ है जिसकी वजह से उन्हें ब्रेस्ट केंसर की सम्भावना 87% तक बढ़ गयी है उन्होंने मेस्तेक्टोमी ( स्तन हटवाने की शल्य क्रिया ) द्वारा स्तन हटवा लिया जिससे उनमे केंसर की सम्भावना ५% रह गयी . 
इस बात को लेकर सिर्फ अमेरिका में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में एक बहस शुरू हो गयी की उनका ये निर्णय सही है या गलत . न्यूयार्क टाइम्स के संपादक ने भी लिखा है की ये उनका निर्णय है जो पूरे अमेरिका की महिलाओं का सच नहीं बन सकता . दरअसल एंजोलिना एक अमीर महिला हैं उन्होंने अपनी माँ को केंसर से लड़ते और मरते देखा जिसने स्वाभाविक  रूप से उन  गहरा प्रभाव छोड़ा अब वे अपने बच्चों के लिए चिंतित हैं और नहीं चाहतीं कि उनके बच्चों की माँ उन्हें वक्त से पहले छोड़ कर चली जाए .अपने बच्चों की स्वाभाविक जिंदगी सुनिश्चित करने के लिए ही उन्होंने इतना बड़ा कदम उठाया .  अब इस बात पर बहस छिड़ी हुई है की उनका ये कदम सही है ,प्रचार पाने का जरिया है या उस महंगा इलाज़ को अफोर्ड कर पाने का तमाशा उन लाखों करोड़ों महिलाओं का…

मील का पत्थर

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वनिता अप्रेल अंक में मेरी कहानी "परछाइयों के उजाले"...








जब तुम लौटोगे

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जब तुम लौटोगे  खिले फूल बेरंग हो मुरझा चुके होंगे। 
अठखेलियाँ करती नदी थक कर  किनारों पर सर रखे सो गयी होगी।  तुम्हारे इंतज़ार में खड़ा चाँद  गश खाकर गिर पड़ा होगा  धरती और आसमान के बीच गड्ढ़ में।  
आँखों की नमी सूख चुकी होगी  चहकते महकते कोमल एहसास  बन चुके होंगे पत्थर। 
लेकिन तुम एक बार आना जरूर  देखने तुम्हारे बिना  कैसे बदल जाता है संसार।

छोटी कहानियाँ

कुछ छोटी छोटी कहानियाँ जो अपने आप में बहुत गहरे अर्थ समेटे हुए हैं ....
छुपम छई खेलते  वह उसे ढूँढने के लिए आवाज़ देती और वह उसका जवाब, और पकड़ा जाता। उसके दोस्त उसकी बेवकूफी पर बहुत हँसते।  एक बार उसने उसकी पुकार का कोई जवाब नहीं दिया और वह उसे ढूँढते ढूँढते खुद खो गयी।                                            * * *  बिना प्यार के इस दुनिया में कुछ नहीं । तुमने मुझे प्यार करना सिखा दिया। पत्नी की आँखों में डूबते हुए उसने कहा।  बाहर आँगन में बूढी माँ अकेली पड़ी खाँस रही थी।                                          * * *  तुम रोज़ पेन पेंसिल,पुस्तक माँगते हो खुद की क्यों नहीं लाते?उसने झुंझलाते हुए कहा।  हौले से मुस्कुरा कर उसने पेंसिल ले ली और अपना पेंसिल बॉक्स चुपके से दोस्त को दे दिया।                                         * * * कक्षा से सबके जाने के बाद उसने उसका नाम ब्लेक बोर्ड पर लिख कर दिखाया। यह उसके पहले प्यार का पहला इज़हार था।                                         * * *  ये दिखाने के लिए कि उसकी कोई परवाह नहीं ,उसने उसे देखते ही मुंह फेर लिया।  और उसने ये सोच कर लम्बी सांस भरी कम से…

नंबर का चक्कर

बहुत दिनों से बिना काम की व्यस्तता ने पुरानी यादों को कही गहरे दफ़न कर दिया था। आज यूँ ही सी मिली फुर्सत में एक पुरानी घटना याद आ गयी जिससे जुडी थी एक मीठी सी याद तो एक कड़वी सी बात। वैसे तो कडवाहट देर तक अपना असर रखती है लेकिन मिठास कुछ ज्यादा है शायद इसलिए कड़वी याद को भी एक मुस्कान के साथ याद कर लेती हूँ .  बात होगी यही कोई १३- १४ पुरानी हमने अपना घर शिफ्ट किया इससे हमारा लैंड लाइन फोन का नंबर भी बदल गया .नया नंबर पहले किसी मुथु साहब (परिवर्तित नाम ) का था जो शायद किसी बड़े सरकारी महकमे में रहे होंगे तो हमारा फोन शुरू होते ही उनके लिए फोन आने लगे जब तक लोकल फोन आते रहे तब तक कोई बात नहीं थी लेकिन कई बार बंगलोर, चेन्नई,कोयम्बतूर से फोन आते तो बड़ा अफ़सोस होता की लोगों का पैसा बेकार बर्बाद हो रहा है. ऐसे ही एक दिन इंदौर से ही किसी महिला का फोन आया वे किसी स्कूल की रिटायर्ड प्रिंसिपल थीं .जब मैंने उन्हें बताया की मुथु साहब का ये नंबर मुझे मिला है और उनके लिए बहुत सारे फोन आते हैं अगर आपको उनका नंबर कहीं से मिले तो प्लीज़ मुझे भी बता दीजियेगा ताकि में लोगों को उनका नंबर बता दूँ .
ये सुन …

यादों का अंकुश

मन की गलियों में भटकते कई बातें याद आती है तो कभी ऐसा कुछ घटित होता है की उसके बहाने कोई पुरानी बात याद आ जाती है तो कभी किसी पुरानी बात के बहाने कोई काम करते हाथ या कहें मन ठिठक जाता है। कुछ बाते बहुत बहुत पुरानी होकर भी मानों पुरानी नहीं होती उनकी स्मृति मन पटल पर कल की घटना सी ताज़ा होती है। वह कचोटती भी है और कुछ करने से या तो रोकती है या कहीं अंकुश लगाती है। वह खुद से कुछ नहीं कहती लेकिन उस स्मृति की छाप इतनी मजबूती से मन पर पड़ी होती है की वह अपने मौन से भी बहुत कुछ कह जाती है। ये अलग बात है की कभी कभी उस अदृश्य रोक को नज़रंदाज़ करके वही किया जाता है जो करना होता है लेकिन उसके बाद भी वह जेहन में अपनी उपस्थिति दर्ज तो करवा ही देती है। 

एक समय था जब बाज़ार किसी खास मौके पर ही जाना होता था। नए कपडे सिलवाना या लेने जाना किसी अवसर विशेष पर ही होता था। अब तो बोरियत दूर करने के लिए भी लोग खरीदी करने निकल जाते हैं। एक नया चलन आया है विंडो शोपिंग का जिसमे खरीदना कुछ खास नहीं होता बस मार्केट में घूम कर मन को बहला लिया जाता है और कुछ पसंद आये तो खरीद लो मनाही तो कोई है नहीं। माल संस्कृति ने…

मील का पत्थर

समाज कल्याण विभाग की पत्रिका में मेरा ये लेख पेज़ नो 11 से 14


https://docs.google.com/viewer?a=v&pid=gmail&attid=0.1&thid=13c3ce98b2c1ddc6&mt=application/pdf&url=https://mail.google.com/mail/u/0/?ui%3D2%26ik%3D1127ee4a6f%26view%3Datt%26th%3D13c3ce98b2c1ddc6%26attid%3D0.1%26disp%3Dsafe%26realattid%3Dfile0%26zw&sig=AHIEtbSIQeSrZ3wul21RKalgaXcZsPr-MQhttps://docs.google.com/viewer?a=v&pid=gmail&attid=0.1&thid=13c3ce98b2c1ddc6&mt=application/pdf&url=https://mail.google.com/mail/u/0/?ui%3D2%26ik%3D1127ee4a6f%26view%3Datt%26th%3D13c3ce98b2c1ddc6%26attid%3D0.1%26disp%3Dsafe%26realattid%3Dfile0%26zw&sig=AHIEtbSIQeSrZ3wul21RKalgaXcZsPr-MQ


उठो जागो

जो टूट चुका है समझौता,  तुम उसकी लाश क्यों ढोते हो? धोखा तुम्हारे साथ हुआ है  क्यों शराफत का लबादा ओढ़े रहते हो? बन्दूक,गोली, बम, हथगोले देकर  चलाने की इजाजत नहीं देते हो? क्यों अपनी इक इक जान को  उनकी दस जान से कम लेते हो?  वो घर में घुसकर ललकारते हैं,  तुम नियमों की दुहाई देते हो। प्रतिबंधों, नाराजी के डर से  तुम अपना सम्मान खोते रहते हो।  वक्त आ गया है अब  उन्हें सबक सिखाने का। देखें वो आँख तरेर हमें  आँख ही नोच ले आने का।  वो चार कदम जो घर में घुसे,  उन्हें दूर तक खदेड़ आने का। क्रिकेट, व्यापार और हर द्वार बंद कर, आर पार भिड़ जाने का।  क्या है औकात उनकी ये,  उनकी धरती पर बताने का। उठो अब कुछ तो निर्णय लो,  ये समय नहीं बतियाने का।   बहुत हुई वार्ता, चेतावनी  कुछ जमीनी काम कर जाने का।  अपनी भलमनसाहत पर,  अपनी दृढ़ता दिखलाने का।  उठो,जागो और लक्ष्य धरो  ससम्मान जीने                 या मर जाने का।