Tuesday, June 28, 2011

कुछ ....


.सूरज की सुनहरी धुप
 छूती  है जो गालों को 
 पर कुनकुनी नहीं लगती
 कुछ सर्द सा है. 

बारिश की रिमझिम बूँदें
 पड़ती जो तन पर 
पर मन को नहीं भिगोती
 कुछ सूखा सा है. 

भीड़ भरे बाज़ार में 
चीखती आवाजें
 कुछ सुनाई नहीं देता
 कुछ सूना सा है. 

दोस्ती प्रेम प्यार के
 एहसासों से भरे जीवन में
 नहीं होता कोई एहसास 
कुछ रीता सा है. 

एक तुम्हारा स्पर्श
 एक  तुम्हारी नज़र 
 जो मिल जाये मुझे
फिर सब अपना सा है. 

Tuesday, June 21, 2011

किन्नर

कल दो खबरे सुनी और पढ़ीं उनसे  मन  विचलित हो गया .
एक  घटना हमारे घर के पास ही हुई ,किसी के नए मकान का गृहप्रवेश था मेहमान खाना खा रहे थे तभी वहां किन्नर आ गए और नेग के रूप में ११,००० रुपये माँगने लगे. स्वाभाविक ही था की इतनी बड़ी रकम सिर्फ नेग के नाम पर देना किसी को भी नागवार गुजरता सो गृह स्वामी ने मना कर दिया और कुछ कम का प्रस्ताव रखा .लेकिन वह राशी उन किन्नरों  को बहुत कम लगी और फिर उन्होंने सभी मेहमानों के सामने हील हुज्जत और अपनी चिर परिचित आखरी धमकी के रूप में अश्लील हरकते शुरू कर दी.आखिर गृह स्वामी को ८,००० रुपये दे कर उन्हें विदा करना पड़ा. पैसे गए बिना बात का मेहमानों के सामने नाटक हुआ और गृह प्रवेश जैसी एक ख़ुशी का क्षण हमेशा के लिए एक कड़वी याद के लिफाफे में बंद हो गया. 
दूसरी  खबर अख़बार( नईदुनिया १८ जून  )  में पढ़ने को मिली की राउरकेला में  एक व्यक्ति से किसी किन्नर ने शादी का प्रस्ताव रखा जिसे उसने मना कर दिया तो उस किन्नर ने उस व्यक्ति पर कांच की बोतल से हमला कर दिया. जब उसने इसकी रिपोर्ट पुलिस में की तो उस किन्नर को पकड़ा गया लेकिन कोर्ट ने आदेश दिया की किन्नर को जेल में नहीं रखा जा सकता ,इसलिए उस किन्नर  को छोड़ना पड़ा. 
इन दो घटनाओं ने बहुत कुछ सोचने को मजबूर कर दिया. एक समय था जब साल में दो बार सिर्फ होली और दिवाली पर किन्नर त्यौहार का ईनाम माँगने आते थे. प्रकृति की जिस क्रूरता ने इनसे जीवन की सामान्य खुशियाँ छीनी है उसे महसूस करते हुए उन्हें इन त्योहारों के मौकों पर नेग दे कर अपने लिए दुआएं लेना शायद ही किसी को बुरा लगता हो. इसके बाद बच्चे के जन्म के अवसर पर या शादी ब्याह के मौकों पर इनका आना आम बात होने लगी. लेकिन उसमे भी इनके मुंह से निकली दुआएं असर करती है,और इनके जीवन में जो खुशियाँ नहीं आ सकती वह खुशियाँ हमारे आँगन में देख कर ये खुश हो लेते है जैसी भावना बलवती थी इसलिए नेग देने का ये सिलसिला चल निकला. उस समय इन लोगो के लिए पढाई लिखाई नौकरी रोजगार के अवसर भी नहीं के बराबर थे .फिर ऐसी भी ख़बरें सुनने को मिलती रही की  नेग के लिए इलाके पर अपने वर्चस्व के लिए किन्नरों के गुट में संघर्ष हुआ .कई बार तो एक ही त्यौहार पर दो तीन बार किन्नर आने लगे. तब उनसे कहना पड़ता था की हम तो नेग दे चुके.और वो अपनी पहचान बता कर जाते थे की इस इलाके में में ही आती हूँ  किसी और को नेग मत देना. धीरे धीरे इनकी जनसँख्या बढ़ती गयी और इनका नेग लेने का चलन किसी त्यौहार या ख़ुशी विशेष से न हो कर एक तरह की हफ्ता वसूली हो गयी. अब तो किन्नर ट्रेन में, बस स्टैंड पर ,बाज़ार में कहीं भी ,और कभी भी मिल जाते है और अब उनको मिलने वाला नेग या ईनाम सामने वाली की ख़ुशी पर नहीं उनकी मर्जी पर होने लगा. नेग की राशी ये ही लोग तय करते है और उसे देना सामने वाले की मजबूरी बन जाती है. 
मेरी छोटी बेटी के जन्म के ५-६ दिन बाद किन्नर मेरे घर आये. सुबह का समय था दरवाजा खुला था और बिटिया पलंग पर लेटी थी. बिना पूछे घर में घुसे और सबसे पहले एक ने बिटिया को अपनी गोद में उठा लिया. और तुरंत २१०० रुपये की मांग कर दी. अब बताइए अपनी ५ दिन की बेटी को उनकी गोद में देख कर किस माँ बाप की हिम्मत होगी की उन्हें मना करे .जैसे तैसे उन्हें समझा बुझा कर उन्हें नेग दिया और  बिटिया को उनसे लिया ,लेकिन इतनी देर सांस मानों रुकी ही रही .
आज इन दो तीन घटनाओं के बहाने जब सोचती हूँ  तो कई  सवाल मन में उठते है. 
  • आज़ादी के इतने साल बाद भी क्या इस तरह की जबरिया वसूली के खिलाफ कोई कानून नहीं बन पाया है? 
  • जनगणना में जाती के नाम पर इतना बवाल होता है तो निश्चित ही किन्नरों की जनसँख्या भी पता की जाती होगी ,क्या कभी किसी सरकार ने इस विकृति के साथ पैदा होने वाले बच्चों की संख्या और इनकी जनसँख्या के तालमेल को जानने की कोशिश की है? (ऐसी बातें अक्सर सुनाने में आती है की बच्चों को उठा कर ओपरेशन कर उन्हें विकृत बने जाता है.) 
  • आज जब सबके लिए पढ़ने और रोजगार के लिए सामान अवसर है फिर इनके रोजगार की जानकारी क्यों नहीं ली जाती? 
  • इनकी संपत्ति का कोई ब्यौरा लिया जाता है और उस कमाई का जरिया जानने की कोशिश की जाती है? 
  • जब कानून सबके लिए एक सामान है फिर किन्नरों के लिए क्यों नहीं ? इनके अपराध के लिए इन्हें जेल में क्यों नहीं रखा जा सकता? 
  • आज़ादी के इतने साल बाद भी अभी तक किसी ही पार्टी को इन्हें भी मुख्य धारा में जोड़ने की सुध क्यों नहीं आयी? 
  • इनके लिए रोजगार के अवसर जुटाने के लिए क्या काम हुए है? 
  • क्या सरकार ने इनके इस लूट के धंधे को मौन स्वीकृति दे रखी है? क्या ये एक तरह का भ्रष्टाचार नहीं है? 
  • कब तक आम आदमी इस तरह की लूट का शिकार होता रहेगा? 
प्रशन तो और भी कई होंगे लेकिन शायद इनका जवाब कम से कम आम आदमी के पास तो नहीं है.आज जब इन लोगों की जबरिया वसूली लाखों करोड़ों के धंधे में बदल गयी है जरूरत है इस पर रोक लगा कर इन्हें भी कानून के दायरे में लाने की ताकि लोग चैन से जी सके और अपनी खुशियाँ चैन से मना सकें. 

Thursday, June 16, 2011

.कान्हा

""कान्हा" मंडला जिले में जबलपुर से १६० किलो मीटर दूर टाइगर प्रोजेक्ट के तहत रिजर्व  फोरेस्ट है डिस्कवरी चेनल पर टाइगर देखते देखते असल में देखने की इच्छा हो आयी. बस नेट से वहां के कान्हा रेसोर्ट में बुकिंग करवाई और चल पड़े.इंदौर से कार से .इंदौर से सुबह साढ़े पांच बजे निकल गए ९ बजे भोपाल और १२ बजे पिपरिया पहुँच गए. भोपाल में ही भरपेट ब्रंच किया ताकि बार बार रुकना न पड़े. लेकिन पिपरिया से पचमढ़ी का रास्ता बिना रुके आगे बढ़ने ही नहीं दे रहा था.

रास्ते के दोनों और बड़े बड़े हरे भरे पेड़ ऐसा मनोरम दृश्य बना रहे थे की हम इंदौर वासी तो सच में अब ऐसे  दृश्य को तरस जाते है.इंदौर में विकास के नाम पर पर्यावरण का जो विनाश हुआ है की दिल रो देता है. इंदौर शहर के लगभग ९० % पुराने पेड़ विकास की भेंट चढ़ गए है.शहर अब तो हालत ये है की कही छाँव के लिए ढूंढें से एक पेड़ नहीं मिलता .ऐसा लगता है शहर अनाथ हो गया  सब बुजुर्गों का साया उठ गया. सारे रास्ते  पेड़ों से आच्छादित सड़क की फोटो लेते रहे.कार रोक कर फोटो खींची. तभी तेज़ आंधी के साथ बारिश शुरू हो गयी ,बस फिर क्या था तड़ा तड  कच्चे आम(केरियाँ)  पेड़ों से गिरने लगीं.बस गाँव की याद आ गयी जब पत्थर मार कर अमराई से केरियाँ तोड़ते थे.और नमक के साथ खाते थे. ढेर सी केरियाँ बटोर ली.

शाम पांच बजे जबलपुर पहुंचे. जबलपुर में भेडा घाट  और धुंआधार    देखने का प्लान था. भेडा घाट में नर्मदा  दोनों और से संगमरमर की चट्टानों  की पहरेदारी में चलती है  .कही कहीं ये चट्टानें इतने पास पास है की किसी ज़माने में बंदर भी आर पार कूद जाया करते थे. यहाँ शाम की सुनहरी धुप संगमरमर की चट्टानों को अपने रंग में रंग कर अनोखा ही दृश्य उत्पन्न कर रही थी. यहाँ से हम पहुंचे धुअधार जहाँ नर्मदा नहीं नीचे खाई में गिरती है पानी का वेग इतना है की  पानी की बौछारे पलट कर ऊपर उठती है और धुए सा दृश्य उत्पन्न   करती है. यहाँ अब  रोप वे बन गया है जिसमे बैठ कर प्रपात को ऊपर से निहारा जा सकता है. रात हम जबलपुर में ही दीदी के यहाँ रुके.

सुबह जल्दी निकले तो दीदी ने घर का बना सत्तू हमारे साथ रख दिया .मंडला यहाँ से १६० किलोमीटर है  रास्ते में  में एक पेड़ के नीचे रुक कर हमने सत्तू घोला और नाश्ता किया..करीब १२ बजे हम कान्हा पहुँच गए.उस दिन हमने सिर्फ आराम किया और सफारी के बारे में जानकारी ली.कान्हा गाँव जंगले के लगभग किनारे बसा है यहाँ चरों और बिलकुल शांति है गाड़ियाँ चलती है लेकिन होर्न की आवाज़ नहीं सुनाई देती.रेसोर्ट है लेकिन तेज़ लाइट कहीं नहीं है   सब कुछ बिलकुल शांत . कान्हा की भोगोलिक जानकारी तो नेट पार उपलब्ध है.में आपको वह बताना चाहती हु जो मैंने वहां  महसूस किया .

अगले दिन सुबह साढ़े ४ बजे हम सफारी के लिए निकले .जंगल में प्रवेश के लिए एक गेट है वहा सभी वाहनों की एंट्री होती है और वहीँ से एक एक  फोरेस्ट गार्ड अनिवार्य  रूप से सभी गाड़ियों में सवार होता है.ये गार्ड एक गाइड का भी कम करता है साथ ही जंगल में अनुशाशन भी देखता है.रास्ते में स्पीड ३० किलोमीटर  ,पहले जंगली जानवरों को रास्ता दे के बोर्ड लगे है.  रोज़ यहाँ से लगभग १५० गाड़ियाँ जंगल में प्रवेश करती है .हर गाड़ी में ६ टूरिस्ट एक ड्राइवर और एक गाइड होता है. जंगल में भी गाड़ियों की गति पर नियंत्रण होता है .

 साल के ऊँचे पेड़ लम्बे घास के मैदान कच्ची सड़क और चारों और शांति. शहर की आपाधापी के बाद ये पल बहुत सुकूनदायी  लगते है . सूर्योदय का मनोहारी दृश्य. साल के पेड़ों के बीच से आती रवि रश्मियाँ सड़क के दोनों और दीमक के डूह.बेखोफ सड़क पर करते संभार चीतल ..और कहीं कहीं बारहसिंघा बीसों जिसे इंडियन गौर भी कहा जाता है और जंगली सूअर . इस जंगल में सभी कुछ रिज़र्व  है यहाँ किसी पेड़ के टूटने या सूखने पर उसे हटाया नहीं जाता वही सड़ने के लिए पड़ा रहने दिया जाता है  .साल के पेड़ का रोपा नहीं लगता वह अपने आप ही जमीन पर गिरे बीज से उगता है और बहुत धीरे धीरे  बढ़ता है .घने जंगल में जाना बहुत रोमांचकारी था .यहाँ आ कर सिर्फ टाइगर के पीछे भागने का मन नहीं हुआ मैंने ड्राइवर   से कहा आप तो आज हमें जंगल घुमाओ.फिर तो हमने खूब फोटोग्राफी की .

उस सुबह टाइगर नहीं दिखा तो थोडा उदास तो हुए लेकिन शाम को फिर आना था .गर्मियों में शाम को पानी पीने जरूर बाहर निकलता है इसलिए उम्मीद ज्यादा थी. शाम की सफारी ४ बजे से ७ बजे तक होती है.आपस की बात से टाइगर किस इलाके में है इसकी जानकारी गाइड लेता रहा और फिर वह दृश्य दिखा जिसके लिए कम से कम ७०-८० किलोमीटर घूम चुके थे .एक बाघिन पानी पी कर वापस लौट रही थी .करीब ३०-३५ जीप वहा खडी थी लेकिन उसे किसी की परवाह नहीं थी वह तो अपने रास्ते गाड़ियों के सामने से अपनी मस्ती भरी चाल से निकल गयी....तब लगा वाकई ये जंगल के राजा है  इतने लोग इनके पीछे मारे -मारे फिर रहे है और ये मस्त है अपनी दुनिया में.अगले दिन फिर जंगल घूमे उस दिन कोई टाइगर नहीं दिखा लेकिन आज आखरी दिन है ये सोच कर मन उदास हो गया. मेरा तो मन था की एक दिन एक जीप कर के कही दूर जंगल में कोई पुस्तक लेकर  जा बैठू .कितनी शांति है यहाँ .बातें तो निकलने से और भी निकलेंगी पर आज आप फोटो देखिये ...फिर कभी और कुछ बातें शेयर करूंगी. 

Saturday, June 11, 2011

यादें

कभी सोचती हूँ
दिमाग जो होता एक डिबिया
निकाल कर देखती उसमे पड़े
विचार,भाव रिश्ते-नाते ,
यादें ,एहसास,घटनाएँ
हौले से छूकर सहलाती
संचेतना भरती उनमे
हंसती, रोती, खिलखिलाती
फिर महसूसती उन्हें

करीने से फिर रखती
छांट बाहर करती
अगड़म -बगड़म विचार
टूटे बेजान रिश्तों के तार
टीसते एहसास

खाली पड़े कोनों को भर देती
किसी सुंदर विचार से
सुनहरी यादों की गोटी किनारी से
सजा लेती डिबिया

लेकिन,
उस एक अनाम से रिश्ते
जाने अनजाने से नाम
कुछ अनबूझे से भाव ,
कुछ कसकती बातें, यादें
झाड़ पोंछ कर फिर सहेज देती
छुपा देती फिर किसी कोने में
चाह कर भी न निकाल पाती
निकाल कर भी न भुला पाती
वो बसी है दिल में कहीं गहरे
बहुत गहरे .

Thursday, June 2, 2011

"बचपन और हमारा पर्यावरण"

क्या खेले ?क्या खेले?सोचते सोचते आखिर ये तय हुआ नदी पहाड़ ही खेलते है
तेरी नदी में कपडे धोउं,
तेरी नदी में  रोटी पकाऊ,
चिल्लाते हुए बच्चे निचली जगह  को नदी और  ऊँचे ओटलो को पहाड़ समझ कर  खेल  रहे है , 
नदी का  मालिकअपनी नदी  के लिए  इतना सजग है की उसमे कपडे धोने ,बर्तन  धोने से  उसे  
तकलीफ होती  हैगर्मियों की  चांदनी रात ,लाइट नहीं है अब अँधेरे  में क्या करे? एक जगह बैठे
तो मच्छर काटते है ,नानी कहती है ,अरे ! जाओ धुप छाँव खेलो ,कितनी अच्छी चांदनी रात है, 
और बच्चे मेरी धूप और मेरी छाँव के मालिक बन जातेहैत्ता इत्ता पानी गोल गोल रानी हो या  
अमराई में पत्थर पर गिरी केरीयों की चटनी पीसना ,खेलते हुए किसी कुए,की जगत पर बैठना,
प्यास लगे और पानी  हो तो किस पेड़ की पत्तियां चबा लेना ,या रंभाती गाय भैस से बातेकरना,
इस साल किस आम पर मोर आएगा किस पर नहीं ,गर्मी में नदी सूखेगी या नहीं, टिटहरी जमीन
पर अंडे देगी या नहीं ?हमारा बचपन तो ऐसी ही जाने कितनी बातों से भरा पड़ा था। खेल खेल में
बच्चे अपने परिवेश से कितने जुड़ जाते थे?कितनी ही बाते खुद - -खुद सीख जाते थे ,पता ही  
नहीं चलता था। हमारे खेल हमारे जीवनसे परिवेश से पर्यावरण से इस तरह जुड़े थे की उन्हें कही
अलग देखा ही नहीं जा सकता था
समय बदला नदियाँ सूख गयी, पहाड़ कट कर सड़के या खदाने बन गयी,सड़क की लाइट ने चाँद  
तारों की रोशनी छीन ली,अब  पेड़ों से मोह रहा  उनकी चिंता, पानी के लिए ट्यूब वेल  गए या 
मीलों दूर से पाइप  लाइन ।      
हमारा प्लेनेट खतरे में है ,अन्तरिक्ष से आयी आफत हम पर टूट पड़ी ,पोपकोर्न खाते हाथ मुह तक 
आने से पहले ही रुक गए ,अब आयेंगे हमारे सुपर हीरो .........ये लो  गए पृथ्वी,अग्नि, वायु, जल,
आकाश और ये बनी सुपर पॉवर मिस्टर प्लेनेट ,और दुश्मन का हो गया खात्मा ,हमारी पृथ्वी बच गयी ।
एक गहरी सांस लेकर पोपकोर्न खाना फिर शुरू हो गया ,बिस्तेर पर पैर और फ़ैल गए । लीजिये अब 
चाहे अन्तरिक्ष से कोई आफत आये या ओजोन लयेर में छेद हो ,चाहे कही आग लगे या बाढ़  जाये 
हमारा सुपर हीरो सब ठीक कर देगा ,हम खाते रहेंगे आराम से अपने घर में बिस्तर पर । न्यूज़ पेपर वाले 
शोर मचाएंगे,टीचेर कोई प्रोजेक्ट देगी ग्लोबल वार्मिंग पर हम नेट से जानकारी जुटा कर ढेर सारे कागजों  
को इस्तेमाल करके बढ़िया सा प्रोजेक्ट बनायेंगे और १० में से १० नंबर पायेंगे । अब जिस पर्यावरण को 
कभी महसूस ही नहीं किया जिस की गोद में खेले ही नहीं उसके लिए संवेदनाये लाये कहाँ से ?
बच्चे पर्यावरण से बस इसी तरह से जुड़े है अब इसमें उनका क्या दोष है ?जो पर्यावरण हमारे बुजुर्गों ने हमारे 
लिए सदियों से सहेज कर रखा था ,उसे हमने अपने स्वार्थ के लिए किस तरह तहस नहस कर दिया है,
और इसी के साथ छेन लिया है पर्यावरण सा मासूम बचपन .....पर्यावरण सहेजे ,ताकि बचपन का भोलापन कायम रह पाए...

संवेदना तो ठीक है पर जिम्मेदारी भी तो तय हो

इतिहास गवाह है कि जब भी कोई संघर्ष होता है हमारी संवेदना हमेशा उस पक्ष के लिए होती हैं जो कमजोर है ऐसा हमारे संस्कारों संस्कृति के कारण ...