Wednesday, October 16, 2013

व्यथा

 
प्रारब्ध ने चुना मुझे 
चाहर दीवारी से घिरा बचपन 
बिना दुःख क्या मोल सुख का 
बिना संग क्या ज्ञान अकेलेपन का।  

तुम रहीं नाराज़ चला गया 
बिना कहे 
न सोचा एक बार 
क्या कह कर जाना था आसन? 
मुझे जाना था 
क्योंकि प्रारब्ध ने था चुना मुझे।  

ज्ञान प्राप्ति की राह में 
किसी कमज़ोर क्षण 
हो जाना चाहा होगा 
एक बेटा, पिता ,पति 
क्यों नहीं समझा कोई ?

मैंने कब चाही थी यह राह आसान 
होना चाहा था एक आम इंसान 
संघर्ष ,सुख दुःख जिजीविषा जी कर 
वंचित किया गया मुझे 
क्योंकि प्रारब्ध ने चुना मुझे।  

देवों की श्रेष्ठ कृति इंसान 
तभी तो लोभ संवरण नहीं कर पाए 
अवतरित होते रहे धरती पर 
बन कर मानव अवतार 

फिर क्यों चुना मुझे 
बनने को भगवान 
मैंने भी कभी चाह होगा 
बनना एक आम इंसान।  

कविता वर्मा  

Tuesday, October 15, 2013

मेला दिलों का …

कल फेस बुक पर दशहरा मेले का एक फोटो  डाला बहुत सारे लोगों ने इसे पसंद  किया।  अपने बचपन  को  याद करते हुए  बचपन के मेलों को याद किया। कुछ लोगों ने तुलना  कर डाली  उस समय के मेले , उनकी बात ही कुछ और थी , इसी बात ने सोचने को मजबूर कर दिया। 

उस समय के मेले मतलब बीस पच्चीस साल पहले के मेले जिनमे  हिंडोले थे ,चकरी वाले झूले थे। गुब्बारे चकरी वाले ,प्लास्टिक के मिट्टी के खिलोने वाले ,मिट्टी  के बर्तन , नकली फूल ,छोटे मोटे बर्तनों वाले, सस्ते कपड़ों वाले ,खाने पीने की दुकानों में जलेबी इमरती मालपुए वाले ,गुड़िया के बाल ,सीटी, कार्ड बोर्ड पर रंगीन पन्नी लगा कर बनाये गयीं तलवार ,गदा, धनुष बाण वाले। यही सब तो था। 
आज भी कमोबेश वही सब है दूरदराज़ के गावों में तो बहुत कुछ नहीं बदला , बड़े शहरों के पास वाले गाँवों में आधुनिकता का असर पड़ा है लोगों की रुचियाँ बदली हैं इसीलिए मेलों का स्वरुप भी बदला है। यही बात शहरों के मेलों के साथ है।  
माल संस्कृति के चलते शहरी बच्चों में मेलों का बहुत ज्यादा आकर्षण नहीं रह गया है। मॉल में गाहे बगाहे कई इवेंट्स होते रहते हैं जिनमें बच्चे मेलों की तरह ही शामिल होते हैं झूले लगाने की जगह वहाँ नहीं है उनकी जगह हवा भरी जंपिंग माउस ,छोटे से टब में चलती नाव, रेसिंग कार आदि ने ले ली  हैं जो सारे साल उपलब्ध हैं।  
कपडे सिर्फ त्योहारों पर खरीदे जायेंगे वाली बात अब नहीं रही।  वैसे भी ब्रांडेड कपडे जूते पहनने वाली पीढ़ी मेलों की दुकानों से कपडे खरीदने से रही और तो और उनके माता पिता जिन्होंने पूरा बचपन मेलों से खरीदे कपडे पहन कर बिताया होगा वे भी ऐसे कपडे मेलों में देख कर नाक भोंह सिकोड़ लेंगे , इसलिए इन दुकानों का तो मेलों से बाहर होना निश्चित ही था। मिठाई के बारे में पसंद अब बदलती जा रही है इसलिए जलेबी, इमरती बाहर ,वैसे भी लोग खुद की साफ़ सफाई के बारे में सजग हुए हैं इसलिए धूल  भरे माहौल में बिकने वाली मिठाइयाँ खाना पसंद नहीं करेंगे हाँ इसकी जगह चाट ,भेल जैसी चीज़ें पसंद की जाती हैं ये पूरी तरह साफ़ सुथरी तो नहीं कही जा सकती लेकिन फिर भी कुछ हद तक , फिर जबान के चटकारे के सामने सब ताक पर। 
कुल मिला कर देखा जाये तो मेले आधुनिक हो गए हैं वृहद हो गए हैं , उनमे वही परिवर्तन आ रहे हैं जो लोगों को पसंद हैं फिर क्या है ऐसा जिसके लिए लोग नॉस्टेलजिक हो जाते हैं ?
वह है मेलों में मौजूद अजनबीपन। जी यही वह बात है जो आधुनिक हो रहे मेलों में है जो उस जमाने के मेलों में नहीं थी और जो लोगों के सर चढ़ जाती है। आपके बगल में खड़ा परिवार शायद शहर के दूसरे कोने से आया हो और आप उसे नहीं जानते , दो घंटे मेले में घूमने के बाद भी आपको शायद ही कोई रिश्तेदार या परिचित दिखाई देता है। इस बड़े से मेले में आपका छोटा सा परिवार कुल जमा तीन चार लोग आपमें अकेलापन भर देते हैं। ऐसे में अगर आपके बगल में कोई संयुक्त परिवार खड़ा हो या कुछ लोग जो अपने ढेर सारे रिश्तेदारों या मित्रों के साथ आये हों हंसी ठिठोली चल रही हो तो आप एक सौ एक फुट के रावन के बजाय उनकी और ही देखते रह जाते हैं।  
मेलों से आकर लोग अपने ज़माने के मेलों को याद नहीं करते बल्कि अकेलेपन से घिर कर उस अपनेपन को याद करते हैं और इसीलिए उस ज़माने के मेले बहुत याद आते हैं।  

कविता वर्मा 

Saturday, October 12, 2013

अभ्यस्त

 

घनघोर अँधेरे पथ पर 
कुछ बिखरे काँटे , कुछ 
फूलों जैसे पल 
अटपटी राह 
पर बढ़ते अकेले कदम।  

कठिन राह, घनघोर अन्धकार 
संवेदनाओं से रीता संसार 
मन ढूँढ रहा एक किरण 
एक आस , कोई एहसास 
टटोलते हाथ 
टकराते सघन निरास 
ठोकर खाते गिरते 
भीगते जज़्बात। 

नहीं समय करने का 
भोर का इंतज़ार 
न ही कोई साथ 
उठ खड़ा हो मिचमिचा कर आँख 
हो अभ्यस्त साध अन्धकार 
बढ़ा कदम न कर इंतज़ार।  

कविता वर्मा 

Friday, October 4, 2013

शक्ति पूजा


नवरात्री शुरू होने वाली हैं सीमा घर की साफ़ सफाई में लगी है। कल शक्ति स्वरूपा  देवी जी की स्थापना का दिन है उनके स्वागत में वह कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती। 
बचपन से सुनती आयी है नारी ही शक्ति है जो सृष्टि के निर्माण की सामर्थ्य रखती है। शक्ति की उपासना के द्वारा नारी शक्ति को शशक्त किया जाता है जिससे विश्व निर्माण और सञ्चालन सुचारू रूप से चल सके।  
फोन की घंटी ने उसके हाथों और दिमाग की गति को रोक दिया।  बाहर उसके ससुर जी फोन सुन रहे थे घर में अचानक जैसे सन्नाटा पसर गया।  उसके ससुर जी बहुत धीमी आवाज़ में कह रहे थे " बेटी तू ही बता मैं और पैसा कहाँ से लाऊँ ? पहले ही दस लाख रुपये दामाद जी को दे चूका हूँ ,रिटायर आदमी हूँ ,तेरे भाई की तनख्वाह से उसके खर्चे ही जैसे तैसे पूरे हो पाते हैं। तू दामाद जी को समझा न अगर दे सकता तो जरूर दे देता बेटी। " 
फोन रख कर ससुरजी निढाल से पलंग पर बैठ गए और दोनों हाथों से माथा थाम लिया।  "क्या करूँ कहाँ फेंक दिया मैंने अपनी बेटी को ,जानती हो सुनील की माँ आज तो वो रो रो कर कह रही थी ,पापा मुझे यहाँ से ले जाओ आप इनका पेट कभी नहीं भर सकोगे ,मुझे जिन्दा देखना चाहते हो तो यहाँ से ले जाओ। "
उसे ले भी आऊं लेकिन इतनी बड़ी जिंदगी अकेले कैसे और किसके भरोसे काटेगी ? हम कब तक बैठे रहेंगे ? " 
सीमा चुपचाप अपने काम में लग गयी। देवी स्थापना का दूसरे दिन दोपहर का मुहूर्त था । सीमा सुबह ही बाज़ार जाने का कह कर घर से निकल गयी।  
मुहूर्त का समय निकला जा रहा था सीमा का कहीं अता पता नहीं था। घर की बहू के बिना शक्ति पूजा कैसे हो ? तभी घर के सामने ऑटो आ कर रुका और उसमे से सीमा के साथ उतरी उसकी ननद।  सब अवाक उसे देखने लगे , ननद दौड़ कर अपनी माँ के गले लग कर फूट फूट कर रो पड़ी। सबकी प्रश्न वाचक दृष्टी सीमा की ओर उठ गयीं।  
माँ जी नारी ही शक्ति स्वरूप है और शक्ति सबके साथ से मिलती है हम शक्ति पूजा के इस मौके पर घर की बेटी को कैसे अकेला छोड़ सकते हैं ? आज से हम सब उसके साथ रहेंगे और अन्याय के खिलाफ लड़ेंगे। यही देवी की सच्ची उपासना होगी।  
माँ जी ने सीमा को गले लगा लिया।  


संवेदना तो ठीक है पर जिम्मेदारी भी तो तय हो

इतिहास गवाह है कि जब भी कोई संघर्ष होता है हमारी संवेदना हमेशा उस पक्ष के लिए होती हैं जो कमजोर है ऐसा हमारे संस्कारों संस्कृति के कारण ...