Friday, March 15, 2013

छोटी कहानियाँ


कुछ छोटी छोटी कहानियाँ जो अपने आप में बहुत गहरे अर्थ समेटे हुए हैं ....

छुपम छई खेलते  वह उसे ढूँढने के लिए आवाज़ देती और वह उसका जवाब, और पकड़ा जाता। उसके दोस्त उसकी बेवकूफी पर बहुत हँसते। 
एक बार उसने उसकी पुकार का कोई जवाब नहीं दिया और वह उसे ढूँढते ढूँढते खुद खो गयी।  
                                         * * * 
बिना प्यार के इस दुनिया में कुछ नहीं । तुमने मुझे प्यार करना सिखा दिया। पत्नी की आँखों में डूबते हुए उसने कहा। 
बाहर आँगन में बूढी माँ अकेली पड़ी खाँस रही थी। 
                                        * * * 
तुम रोज़ पेन पेंसिल,पुस्तक माँगते हो खुद की क्यों नहीं लाते?उसने झुंझलाते हुए कहा। 
हौले से मुस्कुरा कर उसने पेंसिल ले ली और अपना पेंसिल बॉक्स चुपके से दोस्त को दे दिया। 
                                       * * *
कक्षा से सबके जाने के बाद उसने उसका नाम ब्लेक बोर्ड पर लिख कर दिखाया।
यह उसके पहले प्यार का पहला इज़हार था। 
                                       * * * 
ये दिखाने के लिए कि उसकी कोई परवाह नहीं ,उसने उसे देखते ही मुंह फेर लिया। 
और उसने ये सोच कर लम्बी सांस भरी कम से कम वह अब तक पहचानता तो है। 
                                       * * * 
वह बहुत बदल गया है उसके हाव भाव, बात करने का तरीका, उसका  अंदाज़ उसके दोस्त उसकी पहचान सब कुछ,
लेकिन फिर भी उसकी आँखे वैसी की वैसी क्यों हैं ????
                                      * * * 
बेहतर है तुम मुझे भूल जाओ मैंने तुम्हे अपनी जिंदगी से निकाल दिया है। 
ओह ये अचानक बादल क्यों बरस पड़े? 
                                      * * * 

प्यार जब हद से ज्यादा बढ़ जाये तो क्या बोझ हो जाता है? उसने कोई जवाब नहीं दिया। 
आज जाने से पहले उसने कहा में बहुत हल्का महसूस कर रहा हूँ।उसे जवाब मिल गया। 
                                             * * *
अच्छा बताओ दुःख का रंग गहरा होता है या उदासी का? 

जब अपनों का साथ न हो उस समय आयी ख़ुशी का रंग सबसे स्याह होता है .

उसने कहीं दूर देखते हुए जवाब दिया
                                                                  * * * 

Thursday, March 7, 2013

नंबर का चक्कर



बहुत दिनों से बिना काम की व्यस्तता ने पुरानी यादों को कही गहरे दफ़न कर दिया था। आज यूँ ही सी मिली फुर्सत में एक पुरानी घटना याद आ गयी जिससे जुडी थी एक मीठी सी याद तो एक कड़वी सी बात। वैसे तो कडवाहट देर तक अपना असर रखती है लेकिन मिठास कुछ ज्यादा है शायद इसलिए कड़वी याद को भी एक मुस्कान के साथ याद कर लेती हूँ . 
बात होगी यही कोई १३- १४ पुरानी हमने अपना घर शिफ्ट किया इससे हमारा लैंड लाइन फोन का नंबर भी बदल गया .नया नंबर पहले किसी मुथु साहब (परिवर्तित नाम ) का था जो शायद किसी बड़े सरकारी महकमे में रहे होंगे तो हमारा फोन शुरू होते ही उनके लिए फोन आने लगे जब तक लोकल फोन आते रहे तब तक कोई बात नहीं थी लेकिन कई बार बंगलोर, चेन्नई,कोयम्बतूर से फोन आते तो बड़ा अफ़सोस होता की लोगों का पैसा बेकार बर्बाद हो रहा है. ऐसे ही एक दिन इंदौर से ही किसी महिला का फोन आया वे किसी स्कूल की रिटायर्ड प्रिंसिपल थीं .जब मैंने उन्हें बताया की मुथु साहब का ये नंबर मुझे मिला है और उनके लिए बहुत सारे फोन आते हैं अगर आपको उनका नंबर कहीं से मिले तो प्लीज़ मुझे भी बता दीजियेगा ताकि में लोगों को उनका नंबर बता दूँ .

ये सुन कर वे बहुत खुश हुईं और कहने लगीं में पता करती हूँ .आप उन लोगों की मदद करना चाहते हैं जिन्हें जानते भी नहीं और उनकी परेशानी दूर करना चाहते हैं ये बहुत अच्छी बात है. उन्होंने अपना नंबर भी मुझे दिया .
मैं उनके फोन का इंतजार करती रही और कुछ दिनों बाद उनका फोन आया भी और मुझे मुथु साहब का नंबर मिल गया . मैंने उस नंबर पर फोन किया तो मुथु साहब ने ही फोन उठाया . मैंने उन्हें बताया की उनके पुराने नंबर पर बहुत लोगों के फोन आते हैं और वह भी एस टी डी .ये आपका ही नंबर है न ये जानने के लिए फोन किया था मैंने आपका ये नया नंबर में उन लोगों को दे दूं?? 
वे साहब जाने किस अकड़ फूँ  में थे कहने लगे कोई जरूरत  नहीं है जिसे जरूरत होगी वो खुद पता कर लेगा ,और फोन काट दिया . 
मैं सिर्फ फोन को देखती रह गयी .
शाम को जब ये बात अपने पतिदेव को बताई और बताया की उन्होंने किस लहज़े में मुझसे बात की तो उन्हें बड़ा गुस्सा आया .  कहने लगे अब जिसका भी फोन आये उसे ये नंबर जरूर देना और वह नंबर लिख कर फोन के पास ही रख दिया . 
खैर कुछ दिनों में ही लगभग सभी लोगों तक वह नंबर पहुँच गया और फिर उनके लिए फोन आने बंद हो गए .

एक दिन एक फोन आया किसी राजपुरवाला साहब के लिये. स्वाभाविक था मैंने कहा रॉंग नंबर तो कहने लगे नंबर तो यही है. लेकिन यहाँ तो कोई राजपुरवाला  साहब नहीं रहते .खैर फोन बंद हो गया .  अब ये सबके लिए कौतुहल हो गया की मुथु साहब के बाद किसी और के फोन .बच्चे तो कहने लगे मम्मी बड़ा मज़ा आयेगा . 

अब तो ये सिलसिला भी चल निकला हफ्ते में कम से कम ३- ४ फोन आ ही जाते थे राजपुरवाला साहब के लिये. हर बार लोग मायूस होते थे कहते नंबर तो यही है .एक दिन ऐसे ही बात करते अचानक मैंने पूछ लिया की ये राजपुरवाला साहब रहते कहाँ हैं ? 
पता चला उज्जैन मे. 
अब सारा माज़रा समझ में आया की उनका और हमारा नंबर तो सामान था लेकिन लोग उज्जैन के कोड की जगह इंदौर का कोड लगा देते थे और फोन हमारे यहाँ लग जाता था . 
एक दिन मैंने उज्जैन का कोड लगा कर अपना ही नंबर डायल किया और राजपुरवाला साहब से बात की और उनसे कहा की वे अपने रिश्तेदारों और मित्रों को सही कोड लगाने को कहें ताकि उनका समय और पैसे बर्बाद ना हों .उन्होंने मुझे अनेकों धन्यवाद दिए और एक मीठी सी मुस्कान के साथ फोन बंद किया गया .
हालांकि बाद में भी राजपुरवाला साहब के लिए फोन आते रहे लेकिन सिर्फ एक बात की उज्जैन का कोड लगाइए के साथ हम हंसते हुए फोन बंद करते रहे. 

दो लघुकथाएँ

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