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Showing posts from December, 2009

"परेंटिंग स्किल"

घर के पास ही एक आदिवासी परिवार रहता है.पति-पत्नी और उनके ५ बच्चे.सारा दिन गाय-बकरियां चराते हुए यहाँ-वहां घूमते रहते है। मां-बाप सुबह से ही काम पर निकल जातेऔर बच्चे अपने काम पर,घर का दरवाजा ऐसे ही अटका दिया जाता.जब भी कोई बच्चा वहां से निकालता एक नज़र घर पर डाल , पानी पी कर कुछ देर सुस्ता कर फिर गाय-बकरियों को इकठ्ठा करने लगता. बच्चों की आत्मनिर्भरता देख कर आश्चर्य होता.कभी-कभी सोचती ये अनपढ़ आदिवासी कैसे इन बच्चों को सिखाता होगा,फिर सोचती शायद इतना मजबूत बनना इनके खून में ही है। 
एक दिन सुबह-सुबह किसी छोटे बच्चे के चीखने की आवाज़ सुन कर घर से बाहर निकली,तो देखा उसकी सबसे छोटी  मुश्किल से ३-४ साल की लड़की मैदान में खड़ी है और ३-४ कुत्ते उसके आस-पास खड़े जोर-जोर से भौक रहे है.वह लड़की डर कर चीख रही है,उसके बड़े भाई-बहन और पिताजी पास ही खड़े देख रहे है,पर कोई भी न तो कुत्तों को भगा रहा है न ही उस लड़की को उठा कर घर ला रहा है। 
कुछ देर चिल्लाने के बाद जब उस लड़की को ये समझ आया की उसे ही इस स्थिति से निबटना है ,उसने पास पड़े पत्थर उठाये और उन कुत्तों को मारने लगी। उसे सामना करता देख उसका पि…

पोल सर ; एक विनम्र श्रधांजलि,

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कल पुराने पपेर्स इकठ्ठा करते हुए कोने में छपी एक छोटी सी खबर पर नज़र गयी."गणित को सरल बनाने वाले"सर"। पड़ते ही जेहन में पोल सर का नाम कौंधा.गणित को सरल बनाने वाले उसे दिलचस्प बनाने वाले,हमारे अपने श्री विश्वनाथ मार्तंड पोल सर। उनका निधन १६ दिसंबर को चेन्नई में हो गया.इंदौर के इंदिरा विद्या मंदिर में क्लास ८ में हमें गणित पढ़ने वाले सर सदा सा पहनावा,चहरे पर स्निग्ध मुस्कान,और गणित के कठिन से कठिन सवालों को सरल से सरल नम्बरों के उदाहरनो से आसन बनाने वाली उनकी शैली। मैं सिर्फ एक वर्ष ही उनकी विद्यार्थी रही पर उनके पढ़ाने की जो अमित छाप मेरे ऊपर पढ़ी उसने मुझे भी गणित का शिक्षक बना दिया.आज भी कोई भी कठिन सवाल समझाते हुए एक बार सर को याद कर सोचती हूँ ,की वो इसे कैसे समझाते?
इस ब्लॉग का उद्देश्य उनके सभी विद्यार्थियों को उनके निधन की दुखद सूचना देना है.साथ ही बिछड़े साथियों से मिलने की एक उम्मीद भी .धन्यवाद श्री प्रभाकर नारायण उंडे का जिन्होंने इस खबर को दे कर सर के पुराने विद्यार्थियों को उन्हें श्रद्धांजलि  देने का मौका दिया.

क्यूँ छीना मेरा चीर

मेरे पिता ने बड़े नाजों से पला मुझे ,सदा सजा संवार कर रखा ,मुझे हरी नीली ओढ़नी पहराई
उस पर अनगिनत रंगबिरंगे फूल सजाये ।मेरी चोटी में बर्फ से सफ़ेद फूलोंकी माला गुथी । में बहुत खुश थी इठलाती फिरती थी लहरों के साथ उछलती रहती थी दिन रत अपनी नीली ओधनी को हवा में उड़ाते हुए ।वैसे तो कई दोस्त थे मेरे पर वो बड़े शांत थे मैं चाहती थी एक ऐसा दोस्त जो मुझसे बात करे ।मेरे पिता भला मेरी इच्छा कैसे टालते ।मुझे एक दोस्त मिला भी मैंने उसे अपना समझा खूब खुश थी मैं . उसे मेरी हरी ओढ़नी में लगे फूल अच्छे लगे मैंने उसे दिए ,मेरी ओढनी से भी कई टुकडे उसे दिए ,पर उसके लालच का तो जैसे कोई अंत ही न ही था ,वो और -और मांगता रहा मैं देती रही ।आज मेरा असीमित चीर टुकडे -टुकडे हो कर बमुश्किल मेरा तन ढक पा रहा है ।उसका नीला रंग मटमैला हो गया है , और तो और मेरे बालों में गुथी सफ़ेद फूलों की वेणी भी मसल कुचल दी गयी है ।हाँ अब मेरा तन ढकने के लिए उसने मुझ पर लाल , हरेपीले कुछ टुकडे जरूर फ़ेंक दिए हैं जिन्होंने मेरी बची -खुची सुन्दरता को भी हर लिया है ।अब मेरा ये दुखवा मैं कासे कहूँ ?  
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ममता

रोज़ की तरह सुबह घर से स्कूल जाते हुए रस्ते में बनने वाले एक घर को देखती। वहां देखभाल कराने वाले चौकीदार के परिवार में दो छोटे -छोटे बच्चे भी हैं जो सड़क पर खेलते रहते हैं .जब भी कोई गाड़ी निकलती उनकी माँ उन बच्चों को किनारे कर लेती .वहां से गुजरते हुए चाहे कितनी भी देर क्यूँ न हो रही हो गाड़ी की गति धीमी कर लेती.पता है बच्चे सड़क पर ही खेल रहे होंगे.हमेशा उनकी माँ को ही उनके साथ देखा.आज सुबह दोनों बच्चे सड़क पर बैठे थे उनकी माँ वहां नही थी पर उनके पिता पास ही खड़े थे। जैसे ही गाड़ी का हार्न बजा पिता ने गाड़ी की और देखा और तुंरत ही उनकी नज़र बच्चों की तरफ़ घूम गई ।बच्चों को किनारेबैठा देख कर वह फ़िर बीडी पिने में मशगूल हो गया। लापरवाह से खड़े पिता की ये फिक्र मन को छू गई।