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Showing posts from April, 2012

खुशियों का खज़ाना.

आज एक शादी में अपनी एक कलीग की बेटी से मिली. नाम सुनते ही वह पहचान गयी अरे आप वही है ना जो ब्लॉग लिखती है.में आपको पढ़ती हूँ .सच कहूँ अभी कुछ समय से लेखन से खास कर ब्लॉग लेखन से एक दूरी सी बन गयी थी.वैसे लेखन जारी है .आजकल कुछ कहानियों पर काम कर रही हूँ.सोचती हु उन्हें ही धारावाहिक के रूप में ब्लॉग पर डालूँ लेकिन खैर ये सब समय की बात है .आज सच में मन हुआ की कुछ लिखू.पता नहीं ऐसा सबके साथ होता है या सिर्फ मेरे साथ .जब भी लेखन की एक विधा छोड़ दूसरे पर जाती हूँ पहली विधा कहीं पीछे छूट जाती है. बहुत दिनों से कोई संस्मरण लिखने की सोच रही थी लेकिन क्या ??
कल अलमारी जमाते हुए एक पुरानी डिब्बी खोल के देखी तो उसमे एक छल्ला निकला.उसे उंगली में डालते मन २५ साल पीछे पहुँच गया .ये छल्ला मेरी बुआ की बेटी का था.बस यूं ही बात करते करते उसकी उंगली से निकाल लिया ओर कह दिया मुझे बहुत पसंद है उसने भी कह दिया तो आप रख लो. जिस प्यार ओर अपनेपन से उसने दे दिया था उसे उतने ही प्यार ओर सम्हाल के साथ मैंने बरसों उंगली में डाले रखा. यहाँ तक की जब उतार कर रखा तब भी उसे अपने प्यार में लपेट कर रख दिया. कल उसे उंगली…

आफरीन

में आई इस जहाँ में  बिना तुम्हारी इच्छा या मर्जी के  अपनी जिजीविषा के दम पर 
सहा तुम्हारा हर जुल्म निशब्द  पर तोड़ नहीं पाए तुम मुझे  ये तुम्हारी हार थी.
अपनी हार पर संवेदनाओं का मलहम लगाते तुम  हंसती रही में तुम्हारी बचकानी मानसिकता पर  दर्द दे कर कन्धा देने से शायद मिलता हो  बल तुम्हारे पौरुष को 
माँ के आंसुओं ने विवश किया मुझे  ओर में कर बैठी विद्रोह  की क्यों दूं में अपनी मुस्कान तुम्हे  क्यों रोशन करूँ तुम्हारी जिंदगी  जो ना कम हो सकी सदियों में  क्या इससे कम होगी तुम्हारी दरिंदगी 
में अस्वीकार करती हूँ तुम्हे  धिक्कारती हूँ तुम्हारी हर कोशिश को  मेरे जाने के बाद  शायद तुम महसूस कर सको  कितने आदिम हो तुम 
ओर रखो हमेशा याद  आई थी में अपने दम पर ओर  जा रही हूँ अपनी इच्छा से  तुम जीवित रहोगे जब तक  मुझे याद रखना तुम्हारी मजबूरी होगी  पर में तुम्हारी नहीं  अपनी माँ की स्मृतियों को ले जा रही हूँ  ओर मेरे साथ हैं माँ के आंसू  बेहतरीन तोहफे की तरह .

दोस्ती

आजकल इंडियन आइडल का एक विज्ञापन आ रहा है जिसमे एक कालेज का लड़का खुद शर्त लगा कर हारता है किसी ओर लडके की आर्थिक मदद के लिए. वैसे तो टी वी पर कई विज्ञापन रोज़ ही आते है लेकिन कुछ विज्ञापन दिल को छू जाते है.खास कर दोस्ती वाले विज्ञापन.अभी कुछ दिनों पहले एक मोबाईल कम्पनी का जिंगल हर एक फ्रेंड जरूरी होता है सबकी जुबान पर था.  दोस्ती दुनिया का सबसे खूबसूरत रिश्ता है एक ऐसा रिश्ता जिसमे एक दोस्त दूसरे दोस्त की भावनाओ को, मन की बातों को बिना कहे जान लेता है. जब दोस्त कहे मुझे अकेला छोड़ दो तब उसके कंधे से कन्धा मिला कर खड़ा हो जाता है.ओर जब दोस्त कहे सब ठीक है तब बता ना क्या बात है पूछ पूछ कर सब उगलवा लेता है.  जब भी इस विज्ञापन को देखती हूँ मन २३ साल पीछे अपने कोलेज की लैब में पहुँच जाता है जब फ्री पीरियड में हम समोसे खाने का प्रोग्राम बनाते थे अब उस समय कोई भी इतना धन्ना सेठ तो था नहीं की सिर्फ अपनी अकेले की जेब से सबको खिला सके .इसलिए पैसे इकठ्ठे होते थे.हमारा एक साथी हमेशा दो लोगो के पैसे मिलता था एक खुद के ओर दुसरे उसके दोस्त जग्गू के .मजे की बात ये थी की हम में से कोई भी जग्गू से पैसे…

मुस्कान से मुस्कान तक

गुलाब की पंखुरियों से होंठों पर
नन्ही किरण सी वह मुस्कान 
आई थी जन्म के साथ  जन्म भर साथ रहने को.

अपनी मासूमियत के साथ  बढ़ती रही वह मुस्कान  पल पल खिलखिलाते इठलाती रही  होंठों से आँखों तक  ओर पहुंचती रही दिल तक.
समय के उतार चढ़ावों में  सिमटती रही करती रही संघर्ष  किसी तरह बचाने अपना अस्तित्व 
उम्र के तमाम पड़ावों पर  यूं तो कभी ना छोड़ा साथ  लेकिन भूली बिसरी किसी सखी ने  याद किया कुछ इस तरह  'वह 'जो बहुत हंसती थी  अब वही चहरे ओर नाम के साथ  पहचान नहीं आती. 
 पोपले मुंह ओर बिसरती याददाश्त के साथ  फिर आ बैठी है अपने पुराने ठिकाने पर  अपने उसी मासूमियत को पाने में  तमाम उम्र गंवाकर.