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Showing posts from March, 2011

ये क्या किया लता?

दीदी ,लता के जितने पैसे बाकि हो दे दो अब वह काम पर नहीं आएगी. गेट बजाते हुए उसने कहा .
लता मेरी काम वाली बाई ,टखने तक चढ़ती मैली फटी साड़ी,बिखरे रूखे बाल ,पांच महीने का बढ़ा पेट,चहरे पर सिर्फ दांत और सूनी आँखें ,ये तस्वीर थी लता की जब पहली बार वह काम मांगने आयी थी .
काम तो है लेकिन तुम कितने दिन कर पाओगी ?उसके पेट को देखते हुए मैंने पूछा ?
कर लूंगी दीदी ,मुझे काम की जरूरत है,छोटे छोटे बच्चे है मेरे .जब छुट्टी जाउंगी तब दूसरी बाई लगा दूँगी आपको तकलीफ नहीं होगी. काम वाली बाई की मुझे सख्त जरूरत थी और शहर से दूर इस इलाके में बाइयों का वैसे भी टोटा है ,सो हाथ आई बाई को इस तरह जाने देना कोई समझदारी न थी .जितने दिन कर पायेगी और जितना भी काम कर पायेगी उतना ही सही .
क्या नाम है तुम्हारा ?कहाँ कहाँ काम करती हो ?कोई जान पहचान वाला है जो जमानत दे सके जैसी बातें पूछने के बाद मैंने उसे काम पर रख लिया . सुबह का काम करने वह १२- १ बजे की चिलचिलाती धूप में आती घडी दो घडी सुस्ताती पानी मांग कर पीती और फिर काम में लग जाती.
उसकी सूनी खाली पीली आँखें बता देती की उसे खून की बहुत कमी थी उस पर छटा…

तन्हाई

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जब तन्हा होता हूँ में निकल पड़ता हूँ यूँ ही कहीं अपनी तन्हाई के साथ किसी भीड़ भरे बाजार में फेरी वालों की आवाज़ों के बीच चीखती गाड़ियों के शोर में किसी धुआं उड़ाते हुए झुण्ड के पास से गुजरते हुए उस उड़ते धुंए के साथ दूर तक चला जाता हूँ में


किसी भीड़ भरे रेस्तरां में कोने की ख़ाली मेज़ पर यूं ही बैठे शीशे के उस पार
भागती दौड़ती दुनिया को देखते ख़ाली प्लेटों चम्मचों संगीत की आवाज़ के साथ कहीं ठहर जाता हूँ में


पर नहीं जाता किसी निर्जन समुद्र तट पर ,पहाड़ी पर बने किसी सूने किले में की मेरी तन्हाई होती है मेरे साथ की डरता हूँ की इस एकांत में मेरी तन्हाई न पूछ बैठे वो सवाल जिससे बचने के लिए भीड़ भरी जगहों पर जाता हूँ में .

शोर

शोर -शोर- शोर आज की जीवन शैली में ये हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन गया है...बहुत पहले मनोज कुमार की एक फिल्म आयी थी शोर जिसमे नायक को शोर से बहुत नफरत होती है इतनी की वह हमेशा शोर से परेशान रहता है ,उसके कान तरसते है तो अपने बेटे की आवाज़ सुनने को जो बोल नहीं सकता ,उसका ऑपरेशन होता है पर उसी दिन नायक का एक्सीडेंट होता है और वह सुनने की क्षमता खो देता है... आज हम में से कितने ही इस शोर से परेशान रहते है और न जाने कितने ही इस शोर को सुनकर भी नज़र अंदाज कर देते है. अब तो लगता है शायद हम में से कितनो ने शांति या कहे निशब्दता की आवाज़ ही नहीं सुनी होगी ,उसे महसूस ही नहीं किया होगा . आज से करीब १० साल पहले जब हमने शहर से दूर मकान बनवाना शुरू किया तब यहाँ आ कर शोर से दूर इस निशब्द स्थान को महसूस करने का मौका मिला . लेकिन इसे निशब्द भी कहना उचित नहीं होगा इसे सन्नाटा भी नहीं कहा जा सकता ,क्योंकि आवाज़ तो यहाँ भी थी .हवा के चलने की आवाज़, पक्षियों के चहचहाने की आवाज़ ......जब भी मोबाइल फ़ोन पर बात करते सामने वाला जरूर पूछता कहाँ से बोल रहे हो बहुत तेज़ हवा चलने की आवाज़ आ रही…