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Showing posts from 2016

सूर्योदय सूर्यास्त और पीस पगोडा

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सुबह गाड़ियों के हॉर्न की आवाज़ों से नींद बहुत जल्दी खुल गई ये सब सुबह टाइगर पॉइंट पर जाने वाली गाड़ियाँ थीं जो कंचनजंघा पर सूर्योदय देखने जा रही थीं। हमने भी टैक्सी की बात की थी तो ड्राइवर ने कहा कोई फायदा नहीं है साब सुबह बादल हो जाते हैं कुछ दिखाई नहीं देता क्यों अपनी नींद ख़राब करते हैं। यह सुन कर हमने जाने  इरादा बदल दिया था पर अब नींद खुल ही गई थी और खिड़की से कंचनजंघा की चोटी दिख ही रही थी तो स्वेटर शॉल पहन कर खिड़की में खड़े हो गये। गहरे नीले जामुनी आसमान में धवल शिखर शान से सिर उठाये खड़ा था देखते ही देखते धुऐं की एक काली लकीर ने उसे ढँक लिया आसमान का रंग गहरे नीले से चमकीले नीले में बदलता जा रहा था और धवल शिखर कालिमा के आगोश में छुपता जा रहा था और देखते देखते पूरी तरह गायब हो गया। बहुत निराशा हुई सिर्फ इसलिए नहीं कि सूरज की पहली किरण से सुनहरी हुई चोटी को नहीं देख पाई बल्कि इसलिए भी कि जितना हम ज्ञान और जानकारी से लैस होते जा रहे हैं उतने ही कर्तव्यों से लापरवाह भी। लगातार चलती डीजल गाड़ियाँ उनके हॉर्न का शोर हमारा शोर धूल कचरा सुदूर प्राकृतिक स्थानों को भी इस कदर प्रदूषित कर चुका है…

कैसे प्रकृति प्रेमी थे वे लोग

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बहुत दिनों बाद अपने सफर पर फिर निकली हूँ। मैं जानती हूँ आप लोग मेरे ब्लॉग पर नियमित आते हैं अगली पोस्ट के इंतज़ार में और यही कारण अगली क़िस्त लिखने की प्रेरणा भी देता है।  आज हम चलेंगे दार्जिलिंग की सैर पर।  न्यू जलपाई गुड़ी से सड़क मार्ग द्वारा ही दार्जिलिंग पहुँचा जा सकता है शेयरिंग टैक्सी में आठ दस लोगों के साथ पहाड़ी रास्ते का पहला सफर करना बहुत तनाव दे रहा था। फिर पता चला जो टैक्सी दार्जिलिंग से सवारी छोड़ने आती हैं वो वापसी में कुछ कम में न्यूजलपाईगुड़ी से सवारी ले जाती हैं। उसके लिए रेलवे स्टेशन पर टैक्सी ड्राइवर से संपर्क करके उन्हें अपना नंबर दे दिया जाये तो वे खुद संपर्क कर लेते हैं। सुबह जल्दी स्टेशन पर पहुँच कर भी ऐसी गाड़ियाँ मिल जाती हैं। हमें भी एक इनोवा मिल गई जिसमे गाड़ी का मालिक और ड्राइवर वापस दार्जिलिंग जा रहे थे।  न्यूजलपाईगुड़ी से सिलीगुड़ी होते हुए रास्ता है। सिलीगुड़ी में छोटी रेल लाइन है इसलिए न्यूजलपाईगुड़ी ही अंतिम मुख्य स्टेशन है। सिलीगुड़ी  से दार्जिलिंग का रास्ता बेहद खूबसूरत है। सड़क के दोनों ओर ऊँचे ऊँचे कतार में लगे पेड़ जिनके नीचे फर्न और दूसरे छोटे पौधों का हरा गली…

आपको पता है जंगल में भूत है।

सिक्किम यात्रा ( वो जो हमारी मदद करते रहे )
वैसे तो यात्रा के दौरान बहुत लोगों से साबका पड़ता है ये लोग ख़ामोशी से हमारे आस पास बने रहते हैं जिन्हें हम देख कर भी नज़र अंदाज कर देते हैं या एक व्यावसायिक सा भाव होता है कि उनकी सेवाओं के बदले पैसा तो दिया है। सभी पैसों के लिए काम करते है ये भी कर रहे हैं तो इसमें क्या खास है? अगर कभी जितना पैसा दिया उसके बदले कितनी मेह्नत कितनी ईमानदारी और मुस्तैदी दिखी इसका आकलन किया जाये काम करने की परिस्थियों पर ध्यान दिया जाये तो दिल उन सेवाओं का मोल समझ उनके सामने कृतज्ञ हो जाता है। कभी कभी ऐसा भी होता है कि हम सेवाओं से संतुष्ट नहीं होते या लगता है पैसे का पूरा मोल नहीं वसूल हुआ लेकिन उसके कारण अच्छे  ईमानदार और मेहनती लोगों का जिक्र ना किया जाये यह भी ठीक नहीं। 
उत्तरी सिक्किम जिला मंगन जाते हुए रास्ते में गाड़ी रुकी नामोक में। दो मंजिला पक्का मकान पहली मंजिल की बालकनी और मुख्य प्रवेश द्वार पर लगे फूलों के गमले। अंदर एक बड़ा सा हाल जिसमें टेबल कुर्सी लगी थीं। हाल के बीच से एक दरवाजा जिसके एक तरफ किचन और दूसरी तरफ एक कमरा जिसमे कई बोरे कनस्तर रखे थे। व…

जिंदगी भर कमाओ और मरने के लिये बचाओ

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सिक्किम यात्रा (नाथुला पास ) 
 नाथुला पास वाले ट्रिप में तीन ही पॉइंट्स होते हैं छंगू लेक नाथुला पास और बाबा मंदिर।  अब वापसी का समय था। मौसम बहुत ठंडा हो गया था। सेना के कैंटीन की चाय समोसे जम चुके थे। ठंडी हवा हड्डियों को भी जमा चुकी थी।  दरअसल गंगटोक दिन में पहुँचे थे तब मौसम गरम था शाम को थोड़ी ठण्ड हो गई थी और हम उसी हिसाब से साधारण ठण्ड  के कपडे पहने थे जो अब और गरम रखने में असमर्थ साबित हो रहे थे।  वापसी का सफर शुरू हो गया थोड़ी ही देर बाद गाड़ी फिर रुक गई चाय नाश्ते के लिये। हमारा पेट तो भरा ही था और ज्यादा चाय पीने की आदत नहीं है इसलिए हमने फिर कदमताल करने का विचार बना लिया। ड्राइवर को बताया और निकल पड़े। रास्ता उतार का था तो मेहनत भी नहीं करना पड़ रही थी और मज़ा भी आ रहा था। शहर में गाड़ियों की भीड़ से त्रस्त लोगों के लिए खाली साफ सुथरी सड़कें किसी वरदान से कम नहीं लगतीं।  तभी एक गाड़ी पास आकर रुकी ड्राइवर ने कहा आगे मिलिट्री एरिया है वहाँ की फोटो ना खींचें। सच अभिभूत हो गई स्थानीय लोगों की अपनी सामाजिक जिम्मेदारी के प्रति सजगता देखकर। अगर यही सजगता हर प्रदेश में हर नागरिक में हो तो द…

ललचाता झरने का ठंडा ठंडा पानी

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(9th day )नाथुला पास।  
अगले दिन सुबह नाथुला पास जाना था भारत चाइना बॉर्डर जो पूर्व सिक्किम गंगटोक जिले में पड़ती है। गंगटोक से 80 किलो मीटर दूर लगभग 14140 फ़ीट की ऊंचाई पर है जहाँ जाने के लिये शेयर्ड टैक्सी भी मिलती हैं और प्राइवेट टैक्सी भी। लगभग हर होटल में टूरिस्ट एजेंसी के एजेंट मौजूद होते हैं जो बुकिंग करते हैं। बुकिंग के साथ ही दो फोटो और पहचान पत्र की एक कॉपी देना होती है। वहाँ जाने के लिए पहले परमिट बनवाना पड़ता है जो एजेंट करवा देते हैं।  गंगटोक का टैक्सी स्टैंड जो शहर के बीचों बीच है बहुत ही बढ़िया लगा। कम जगह में बेहतरीन व्यवस्था। यह एक तीन मंजिला टैक्सी स्टैंड है हर मंजिल पर जाने के मेन रोड से अलग अलग रास्ते जो अंदर भी सीढ़ियों से जुड़ा है। हर मंजिल पर एक रेस्टॉरेंट और टॉयलेट।  परमिट बनते बनते 10 /11 बज ही जाते हैं। साढ़े ग्यारह तक स्टैंड लगभग खाली हो जाता है और लोकल टैक्सी या प्राइवेट गाड़ियों की पार्किंग के काम आता है। शाम को जो टैक्सी जल्दी आती हैं यहीं सवारी उतारती हैं पर रात में यहाँ कोई गाड़ी खड़ी नहीं रहतीं सब अपने मालिक या ड्राइवर के घर के सामने सड़क किनारे लेकिन व्यवस्थित …

जब पाँच बजे आसमान तारों से भर गया

पंद्रह दिन के अपने टूर में गुवाहाटी दार्जिलिंग और सिक्किम गये थे। लिखना तो सभी के बारे में है पर कुछ यादें ज्यादा याद आती हैं और उन्हें लिखने की इच्छा हो जाती है। ये यात्रा वृतांत थोड़ा बेतरतीब लगेगा पर उम्मीद है आपको अच्छी सैर भी करा देगा।  19 अक्टूबर 2016 (8th day ) सिक्किम की राजधानी गंगटोक के बारे में काफी सुना था।  धुल धुंए रहित बिना शोर शराबे के एक शांत पहाड़ी शहर जो राजधानी भी है। हम गंगटोक पहुंचे दोपहर करीब दो बजे। होटल की लॉबी में पहुँच  तबियत जितनी खुश हुई कमरे में पहुँचते ही मूड ख़राब हो गया। सजा धजा साफ़ सुथरा रूम लेकिन बाहर की तरफ कोई खिड़की नहीं और बंद कमरे रहना मानो सज़ा। दार्जिलिंग में भी होटल का रूम पसंद नहीं आया था तब make my trip फ़ोन करके उसे अपग्रेड करवाया था जिसमे करीब आधा पौन घंटा लग गया। अब यहाँ फिर वह सब दोहराने की हिम्मत नहीं बची थी। एक तो पहाड़ी रास्ते का चार घंटे का सफर और साथ में चार घंटे लगातार बजते गानों ने सारी शक्ति छीन ली थी अब तो बस फ्रेश होकर खाना खाकर आराम करने का मन था। फिर सोचा सिर्फ रात में सोना ही तो है तो क्या फर्क पड़ता है ?
खाने का मेन्यू देखा कुछ खा…

अब हमारी बारी

देश की सरहदों पर तैनात हमारे जवान हमेशा अपनी जान हथेली पर लिये देश की रक्षा में लगे रहते हैं। जान देने की बारी आने पर एक पल के लिए भी नहीं सोचते ना खुद के बारे में ना अपने परिवार के बारे में। जिस तरह हम अपने घरों में इस विश्वास के साथ चैन से सोते हैं कि सरहद पर सैनिक हैं उसी तरह वे विश्वास करते हैं कि पीछे से देश की जनता और सरकार है जो उनके परिवार की देखभाल करेगी। किसी भी जवान की शहादत पर लोगों में भावनाओं का ज्वार उठता है उसकी अंतिम यात्रा में पूरा गाँव शहर उमड़ता है सरकार तुरंत मदद घोषित कर देती है। हर प्रदेश सरकार अपनी सोच की हैसियत के अनुसार मदद घोषित करती है। अब जिनकी सोच में ही दिवालियापन हो वह उसी के मुताबिक मदद घोषित करते हैं। हाँ लोगों के गुस्से मीडिया की लानत मलानत से कभी कभी सोच परिष्कृत हो जाती है और स्तर बढ़ जाता है सोच का भी और मदद का भी।  खैर मुद्दा प्रदेश सरकार या राजनैतिक पार्टी की सोच का नहीं है मुद्दा है इन सैनिक परिवारों की सच्ची मदद और उनके सही हाथों में पहुँचने का। कई बार होता यह है कि भावनाओ के अतिरेक में घोषणाएं तो हो जाती हैं पर उनपर अमल कब और कितना होता है इसे …

जीने दे मुझे तू जीने दे

सामाजिक बदलावों में फिल्मो की भूमिका पर अक्सर सवाल उठते रहते हैं। हमारे यहाँ फिल्मो को विशुद्ध मनोरंजन का साधन माना जाता है ऐसे में कोई फिल्म अगर सोचने को विवश करती है तो उस पर चर्चा की जाना चाहिए। हाल ही में शुजीत सरकार की फिल्म पिंक रिलीज हुई। महिलाओं के प्रति समाज के नज़रिये पर सवाल उठाती इस फिल्म ने हर आयु वर्ग के चैतन्य लोगों को झकझोरा है और इस पर चर्चा जोर शोर से जारी है। दिल्ली के निर्भया कांड के बाद पूरे देश में एक लहर उठी थी जिसमे बड़ी संख्या युवकों की थी। उस घटना ने युवकों की विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लगाया था और स्वयं को सदैव शक के दायरे में पाना उनके लिए असह्यनीय था। कभी लड़कियों के बारे में सोचा है जो हमेशा समाज की निगाहों की चौकसी में रहती हैं और उनके क्रिया कलाप हमेशा ही शक़ के दायरे में।  फिल्म की कहानी तीन मध्यम वर्गीय कामकाजी लड़कियों के आसपास घूमती है जो दिल्ली में एक फ्लैट किराये पर लेकर रहती हैं। उनके साथ हुए एक हादसे के बाद उनकी जिंदगी बदल जाती है तब एक बूढा वकील उनका केस लड़ता है और अदालती कार्यवाही के दौरान समाज की लड़कियों के प्रति मानसिकता पर उठाये सवालों के द्वा…

'आइना सच नहीं बोलता'

मातृभारती मातृभारती पर प्रकाशित हो रहे धारावाहिक उपन्यास 'आइना सच नहीं बोलता' की इस पहली और दूसरी कड़ी की लेखिका हैं नीलिमा शर्मा और कविता वर्मा... नंदिनी की इस कहानी को पढ़िए और सुझावों व् प्रतिक्रियाओं से अवगत कराइये..


http://matrubharti.com/book/6191/ 


http://matrubharti.com/book/6337/

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हँसते हँसते कट जायें रस्ते भाग 1

रोजमर्रा की जिंदगी में कितनी ही बातें ऐसी होती हैं जिन्हें जब याद करो हंसी फूट पड़ती है। ये छोटी छोटी बातें घटनायें हमें जीने की ऊर्जा देती हैं। कुछ घटनायें गहरी तसल्ली दे जाती हैं कुछ खुद की पीठ थपथपाने का मौका। ऐसी ही घटनाओं को कलमबद्ध करने का मन आज हो आया। आप भी पढिये और मुस्कुराइये। 

सिटी बस से सफर करना हमेशा ही रोमांचक होता है और अगर आसपास एक दो सहयात्री भी मजेदार या नोटंकीबाज मिल जाएँ तो फिर कहना ही क्या। बेटी रोज़ सिटी बस से कॉलेज जाती है कभी बैठने की जगह मिल जाती है कभी नहीं। कभी कभी बीच के स्टॉप पर कोई उतरने वाला होता है तो आसपास वालों में उस सीट को हथियाने की होड़ लग जाती है। अब सफर रोज़ का ही है इसलिए बिना वजह की सदाशयता भी कोई नहीं दिखाता सब अपने में मगन अपने लिए थोड़ी सी जगह और सुकून जुटाने भर की चिंता करते हैं। एक दिन एक लड़की दो सीट के बीच की जगह में खड़ी थी। सीट पर बैठी लड़की अगले स्टॉप पर उतरने वाली थी। एक स्टॉप पहले एक महिला चढ़ीं और उस सीट से थोड़ी दूर खड़ी थीं। जैसे ही स्टॉप आया वह लड़की उठी तो उन महिला ने अपना पर्स खाली हुई सीट पर फेंक दिया क्योंकि वहाँ तक तुरंत पहुँचना मुश्क…

कौन कहता है आंदोलन सफल नहीं होते ?

बात तो बचपन की ही है पर बचपन की उस दीवानगी की भी जिस की याद आते ही मुस्कान आ जाती है। ये तो याद नहीं उस ज़माने में फिल्मों का शौक कैसे और कब लगा जबकि उस समय टीवी नहीं हुआ करते थे। उस पर भी अमिताभ बच्चन के लिए दीवानगी। मुझे लगता है इसके लिए वह टेप रिकॉर्डर जिम्मेदार है। थोड़ा अजीब है अमिताभ बच्चन और फिल्मो की दीवानगी के लिए टेप रिकॉर्डर जिम्मेदार पर है तो है। 
बात है सन 79 की है तलवार तीर कमान ले कर कोई  क्रांति नहीं हुई थी पर क्रांति तो हुई थी। झाबुआ जिले के उस छोटे गाँव में रेडियो भी नहीं चलता था तब पापाजी ने टू इन वन खरीदा था और अपने मनपसंद गानों की लिस्ट बना कर कुछ कैसेट रिकॉर्ड करवा ली थीं। उन्हीं में से एक कैसेट में मिस्टर नटवरलाल का गाना था शेर की कहानी वाला।  जिसे पापा रोज़ सुबह से लगा कर हम बच्चों को जगाया करते थे। तो ये पहला परिचय था हमारा अमिताभ बच्चन से उनकी आवाज़ के मार्फ़त। जब वे कहते थे 'लरजता था कोयल की भी कूक से बुरा हाल था उसपे भूख से ' और 'ये जीना भी कोई जीना है लल्लू ' और तभी से वे हमारे मनपसंद हीरो थे। फेवरेट उस ज़माने में ईजाद नहीं हुआ था। 
जब हम लोग इंद…

विवेक पूर्ण उपयोग जरूरी है

विवेक पूर्ण उपयोग जरूरी है सोशल नेटवर्क ने जिस तरह लोगों को जोड़ा है उन्हें मनोरंजन और जरूरी सूचनाओ से अवगत कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है वह न अनदेखी की जा सकती है न ही उसके महत्व को अस्वीकार किया जा सकता है।  फोन और फिर मोबाइल ने भी लोगों को जोड़ा लेकिन उसके साथ बड़े भारी बिल की चिंता भी जुडी रहती थी। लेकिन व्हाट्स एप ने इस चिंता को काफी हद तक कम किया है। लोग अपने परिवार के सदस्यों सहेलियों दोस्तों के ग्रुप बना कर आपसी बातें शेयर करते हैं जो सभी के बीच होती हैं। एकदम ड्राइंग रूम में बैठ कर होने वाली चर्चाओ जैसी बातें हंसी मजाक चुटकुले सभी कुछ तो होता है यहाँ। दोस्तों के ग्रुप में सूचनाओ का आदान प्रदान आसानी से होने लगा है तो स्टूडेंट्स अपने जरूरी डिस्कशन भी यहाँ कर लेते है आने जाने में टाइम बर्बाद किये बिना तो प्रोफेशनल्स अपनी कामकाजी उलझनें उपलब्धियाँ। साहित्य जगत में ब्लॉग के बाद व्हाट्स एप साहित्यिक गतिविधियों के लिए एक नया साइट बन गया है जिसमे साहित्यिक सामग्री पर लाइव चर्चा संभव हुई है। 
तकनीकि जब कुछ सुविधा देती है तो उस सुविधा के साथ कुछ सावधानियाँ रखने की जरूरत भी होती है…