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Showing posts from 2011

नया साल.

नन्हे ,रफीक, मुन्नी आज सुबह जल्दी ही  कचरा बीनने घर से निकल गए. आज उनमे रोज़ जैसी मस्ती नहीं थी.उनकी निगाहें जल्दी जल्दी यहाँ वहां अपने काम की चीज़ें ढूंढ रही थीं.  रफीक आज नाले तरफ नहीं चलेंगे रे.दुपहर तक घर चले चलेंगे. क्यों आज क्या है?  नन्हे  ने कुछ सूखी लकड़ियाँ भी अपने बोरे में रख लीं तो रफीक को बड़ा अचम्भा हुआ. अरे तू ये लकड़ियाँ भी कबाड़ी को देगा क्या???ओर वह हो हो करके हंसने लगा. मुन्नी भी हंस दी.लगता है आज इसका दिमाग फिर गया है.  अरे दिमाग तो तुम दोनों का फिर गया है.तुम्हे पता नहीं आज नया साल है.आज जल्दी घर जा कर सो जायेंगे रात में सब जगह लोग नया साल मनाएंगे खायेंगे पियेंगे तब हम चोराहे पर जायेंगे रात के १२ बजे .वहां ढेर सारा कबाड़ा भी मिलेगा ओर खाने पीने की बची हुई चीज़ें भी. फिर लकड़ियाँ से आग तापेंगे ओर सो जायेंगे . नन्हे की आँखें नए साल के जश्न की ख़ुशी में चमक उठीं. 



कई दिनों से नए साल की पार्टी की तय्यारी चल रही थी .नयी ड्रेस खरीदी गए होटल में बुकिंग दोस्तों की फेहरिस्त उनको निमत्रण दे दिया गया. कौन किस के साथ आएगा ये भी तय था. पापा को बिजनेस में फायदा पहुँचाने  वाले लोगो के…

मातृत्व

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ब्लॉग जगत में आये मुझे लगभग ढाई साल हो गए है.इस समय में जो भी लिखा वो आप सभी लोगो ने सराहा.जिससे मुझे ओर लिखने की हिम्मत मिली .बीच बीच में कुछ रुकावटें भी आयी जिससे लिखना कम हुआ लेकिन लिखने का शौक ओर आपका प्रोत्साहन मुझे फिर यहाँ खींच लाया. आज में अपनी १०० वीं पोस्ट डाल रही हूँ.आशा है आप लोगो को पसंद आएगी . 
बरामदे से आती सिसकी की आवाज़ सुन कर स्नेहा का दिल बिंध सा गया .उसकी जेठानी की बेटी पिंकी को शायद आज फिर डांट पड़ी.
पता नहीं भाभी कैसे फूल सी बच्ची से ऐसा व्यव्हार कर पाती है. पिंकी उनकी दूसरी बेटी है.उसके जन्म के समय सभी को बेटे की आस थी इसलिए उसे वह प्यार कभी नहीं मिला जिसकी वह हकदार है.  भाभी जब भी पिंकी को बेवजह डांटती स्नेहा का दिल तड़प उठता .निस्संतान स्नेहा का मातृत्व एक किलकारी के लिए खून के आंसू बहता . उसने पिंकी को चुपके से अपने कमरे में बुलाकर सीने से लगा लिया. आज फिर भाभी का अवसाद पिंकी पर ज्वाला बन फूट पड़ा. उन्होंने पिंकी को चार -पांच तमाचे भी जड़ दिए. गुस्से में शब्द अंगारे बन कर बरस रहे थे. स्नेहा से रहा न गया .वह कमरे से बाहर निकली ओर भाभी के हाथ से पिंकी को छुड़ा कर अप…

बस यूँ ही ....

देर रात तक तारों संग , खिलखिलाने को जी चाहता है. चांदनी के आँचल को खुद पर से,  सरसराते गुजरते जाने को जी चाहता है.  पीपल की मध्धिम परछाई से छुपते छुपाते , खुद से बतियाने को जी चाहता है.  चलते देखना तारों को ओर खुद , ठहर जाने को जी चाहता है . रात के सन्नाटे में पायल की आहट दबाते,  नदी तक जाने को जी चाहता है . दिल में छुपा कर रखे अरमानों को , खुद को बताने को जी चाहता है.  तेरी मदहोश कर देने वाली बातों को सुन,  जी जाने को जी चाहता है  तू नहीं आस पास फिर भी , तेरे होने के एहसास को ओढ़  सो जाने को जी चाहता है . कविता वर्मा

इंतजार १२ ( समापन किश्त )

मधु से मंदिर में मिल कर मधुसुदन को कई पुरानी बातें याद आ गयीं .कैसे उसकी मधु से मुलाकात हुई कब वो प्यार में बदली और फिर समय ने कैसी करवट की .उस रिश्ते का क्या हुआ ?मधु से मिलकर उसे सारी बात बताने के बाद भी वह शांत थी ...उसके बाद वह फिर नहीं मिली मुझसे .आज मंदिर में मुलाकात हुई मुलाकातें बढ़ती गयीं और एक आशा ने फिर सर उठाया क्या हम फिर साथ नहीं हो सकते. इस बीच कुछ अप्रत्याशित घट गया मधु का क्या जवाब होगा पढ़िए समापन किश्त में )
रिटायरमेंट का दिन भी आ गया ,माला का फ़ोन आया आप कितने बजे फ्री होंगे?
ऑफिस के बाद एक छोटा सा कार्यक्रम है यही कोई सात बजे .
ठीक है कह कर उसने फ़ोन रख दिया.
विदाई चाहे कैसी भी हो भावपूर्ण ही होती है. मेरा भी गला रुंध गया जब मैंने विदाई भाषण दिया . करीब सात बजे जब बाहर आया देखा माला और आरती खड़ी है .उन्होंने मुझे बधाई दी और गाड़ी माला के घर की और घुमा दी.
मेरे लिए डिनर का इंतजाम किया था .मधु भी वहीँ थी .सब कुछ सामान्य था मधु शांत थी पर खामोश नहीं. उसने अपने को संभाल लिया था. मेरा प्रश्न मेरी आँखों में आ कर ठ…

.दुखवा कासे कहूँ ???

वह  उचकती  जा  रही  थी
  अपने  पंजों  पर .
लहंगा  चोली  पर  फटी चुनरी
बमुश्किल  सर  ढँक  पा  रही  थी
हाथ    भी  तो  जल  रहे  होंगे .
माँ  की  छाया  में
छोटे  छोटे  डग  भरती ,
सूख  गए  होंठों  पर  जीभ  फेरती ,
माँ  मुझे  गोद  में  उठा  लो
की  इच्छा  को
सूखे  थूक  के  साथ
 हलक  में  उतारती .
देखा  उसने  तरसती  आँखों  से  मेरी  और ,
अपनी   बेबसी  पर  चीत्कार  कर  उठा .
चाहता  था  देना  उसे
टुकड़ा  भर  छाँव
पर  अपने  ठूंठ  बदन  पर
जीवित  रहने  मात्र
दो  टहनियों  को  हिलते  देख
चाहा  वही  उतार  कर  दे  दूँ  उसे
 न  दे  पाया .
जाता  देखता  रहा  विकास  की  राह  पर
एक  मासूम  सी  कली  को  मुरझाते  हुए .

डर २

जैसे जैसे रास्ता सुनसान होता गया में ओर अधिक चौकन्नी हो कर बैठ गयी.मोबाइल हाथ में ले लिया ओर साइड मिरर से उस लड़की पर नज़र रखे हुए थी. हे भगवन बस ठीक से पहुँच जाएँ .अचानक गाड़ी के सामने एक कुत्ता आ गया गाड़ी में ब्रेक लगते ही में मेरे नकारात्मक विचारों को भी विराम मिला.मन ने खुद को धिक्कारा,छि ये क्या सोच रही हूँ  में, ११ साल पहले जब हम इस कोलोनी में रहने आये थे तब कितनी ही बार इसी सड़क  पर कितनी ही रात गए लोगो को लिफ्ट दी है.अगर कोई लिफ्ट न भी मांगे तो भी उसके पास गाड़ी रोक कर पूछ लेते थे कहाँ जाना है किसके घर जाना है आइये गाड़ी में बैठ जाइये हम भी उसी ओर जा रहे है. ओर आज एक लड़की से इतना डर.दुनिया इतनी भी बुरी नहीं है फिर कर भला हो भला का ये विश्वास आज डगमगा क्यों रहा है?लेकिन....मन यूं ही तो हार नहीं मानता ,जब उसके डर पर प्रहार होता है तो उसके अपने तर्क शुरू हो जाते है.संभल कर चलना ओर दूसरों की गलतियों से सीख लेना कोई बुरी बात तो नहीं है.फिर रोज़ इतनी ख़बरें पढ़ते है दूसरों को कोसते है आज जान बूझ कर खुद को मुसीबत में फंसा देना कहाँ की अकलमंदी है? फिर इस लड़की ने शराब पी रखी है भले …

डर

पता नहीं कैसे कैसे बेवकूफ लोग है??अख़बार नहीं पढ़ते या पढ़ कर भी समझते नहीं है,या समझ कर भी भूल जाते है ओर हर बार एक ही तरह से बेवकूफ बनते जाते है.टेबल पर अख़बार पटकते हुए पतिदेव झल्लाए .
ऐसा क्या हुआ ?चाय के कप समेटते हुए मैंने पूछा . होना क्या है फिर किसी बुजुर्ग महिला को कुछ लोगो ने लूट लिया ये कह कर की आगे खून हो गया है मांजी अपने गहने उतार दीजिये .अरे खून  होने से गहने उतारने  का क्या सम्बन्ध है.ओर खून तो हो चुका उसके बाद ख़ूनी वहां खड़े थोड़ी होंगे. लेकिन पता नहीं क्यों लोग लोजिकली सोचते ही नहीं है. बस आ गए बातों में ओर गहने उतार कर दे दिए.  अरे तो वो बूढी महिलाओं को निशाना बनाते है .घबरा जाती है बेचारी.नहीं समझ पाती, आ जाती है झांसे में. अरे बूढी नहीं अब ५० -५५ साल की कामकाजी महिलाएं ओर उनमे भी कई तो अच्छी पोस्ट पर भी है. कैसे नहीं समझ पाती. समझ नहीं आता. ओर खैर मान लिया महिलाएं है लेकिन  कितने ही आदमी भी तो ठगे जाते है,लड़कियाँ लिफ्ट लेती है ओर सुनसान रास्ते पर गाड़ी रुकवा कर लूट लेती है.जब पता है की आपके रास्ते सुनसान है तो क्यों देते है लोग लिफ्ट ?  अब बेचारे नहीं मना कर पाते लड़…

जीवन के रंग

जिंदगी के हर कदम हर पड़ाव हर मोड़ पर ,घटनाओं को अलग अलग कोण से देखते हुए बहुत कुछ सीखा जा सकता है.सच तो यही है की हर घटना कुछ सिखाने के लिए ही होती है ओर अगर थोडा रुक कर चीज़ों  को देखा जाये उन्हें महसूस किया जाये तो जिंदगी  जीने का एक नया नजरिया मिलता है या आपके नज़रिए में  बेहतरी के लिए कुछ न कुछ तबदीली जरूर आती है .पिछले १० दिन पर नज़र डालती हूँ तो यही महसूस होता है.एक छोटा सा निर्णय कहीं बहुत आत्मविश्वासी बना देता है तो उस डगर पर जब आत्मविश्वास डिगता है जो डर लगता है वह मजबूत ही बनाता है. वैसे भी मेरा यह मानना है की जीवन की हर घटना को सकारात्मक ढंग से लेने से हर काम सरल हो जाता है वहीँ अगर उनमे कमियां ढूँढने बैठ जाएँ तो चीज़ें कठिन हो जाती है. 
करीब १० दिन पहले फ़ोन आया की मम्मी (सासु माँ )की तबियत ठीक नहीं है उन्हें अस्पताल  ले गए है उम्र का तकाजा है कमजोरी भी रहती है सोचते हुए में अस्पताल  पहुंची. इसके पहले पतिदेव का फ़ोन आया की क्या हुआ वो शहर से बाहर थे मैंने कहा की अभी बताती हूँ अस्पताल  पहुँच कर .पता चला की उन्हें हार्ट अटक आया है.आई सी यु में है .उन्हें बहुत तेज़ दर्द हो रहा…

धनतेरस

कल यानि २४ अक्तूबर यानि धन तेरस ....ठीक ग्यारह साल पहले भी धनतेरस २४ तारिख को ही थी ठीक ग्यारह साल पहले अपने नए बने आशियाने में हम रहने आये थे. जी हाँ कल हमारे मकान जो अब हमारा घर है उसकी ग्यारहवी सालगिरह है. समय कब कैसे निकल जाता है पता ही नहीं चलता. बीच में कई साल बिना इस सालगिरह को याद किये भी निकल गए. लेकिन इस बार ये सालगिरह बहुत याद आ रही है.शायद इसलिए भी क्योंकि अब फिर से मकान का काम चल रहा है ओर हम पल पल उसके पूरे होने का इंतजार कर रहे है. 
आज भी याद है हमारे नए बने मकान की वास्तु शांति के पहले वाला दिन सारा दिन हम अपनी छोटी गाड़ी से सामान ढोते रहे. उस समय यहाँ का रास्ता भी बहुत उबड़ खाबड़ था गाड़ी दायें चलाओ तो पत्थरों पर लुदकती  हुई बाएं पहुँच जाती थी. दूर दूर तक कोई पंचर वाले की दुकान नहीं थी हमारे घर से लगभग ३ -४ किलोमीटर दूर तक कुछ भी नहीं था. वास्तु शांति के बाद रात में नए घर में ही सोना था. उस समय तक मकान में दरवाजे भी नहीं लगे थे. आज भी याद है रात में बिस्तर के साथ मच्छरदानी लाना नहीं भूले थे ओर बच्चों को बड़े ध्यान से सुलाया था क्योंकि उस समय यहाँ बिच्छू ओर सांप बहुत थे…

.पचमढ़ी यात्रा ४

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शरद पूर्णिमा आने वाली थी आसमान में चाँद बादलों के साथ अठखेलियाँ कर रहा था.ठंडी हवा के झोंके कह रहे थे की थोड़ी देर हमारे साथ भी बतकही कर लो. पचमढ़ी एक छोटा सा शहर है. यहाँ के मूल निवासी भोले भाले हैं .पचमदी  की आबादी लगभग ३००० है ,यहाँ सेना,पोलिसे ओर स्काउट के ट्रेनिंग सेण्टर है जिसमे सरकारी अधिकारी ओर कर्मचारी की स्थापना मिला कर यहाँ की आबादी लगभग ५००० है. इस लिहाज से यह एक सुरक्षित शहर है.रात लगभग १२ बजे में ओर मेरी एक कलीग बाहर घूमने गए . यहाँ की मेन रोड पर लगभग आधे घंटे चहलकदमी करते रहे. एक बार ख्याल भी आया की ये बहादुरी कहीं महँगी न पड़ जाये लेकिन एक तरह से ये ठीक ही हुआ. लगातार उबड्खाबाद रास्ते पर चलते ओर बस ओर जिप्सी में बेठे  घुटने चलते हुए लोंक  हो रहे थे. इससे ये समझ आ गया की कल रजत प्राप्त की कठिन चढाई उतरना ओर चदना संभव नहीं है.इसका कोई इंतजाम करना ही होगा. जब वापस लौटे तो पता चला की होटल का मेन डोर बंद हो चुका है ओर सब लोग सो चुके है. बाहर खड़े हो कर आवाज़ लगाई लेकिन दिन भर के थके हारे वर्कर ,मेरी कलीग के पास मोबाइल था लेकिन यहाँ  सिग्नल आसानी से नहीं मिलते. एक ओर तरीका थ…

पचमढ़ी यात्रा ३

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पता नहीं बच्चों में इतनी ताकत कहाँ से आती है?? सारे समय बच्चे कोरिडोर में चक्कर लगाते रहे कुछ ने तो दरवाजा खटखटा कर बता भी दिया मम हम तैयार है कब निकलना है?? खैर आधे घंटे में क्या तो नींद आनी थी? तैयार हो कर नीचे आ गए. हमारा अगला पड़ाव था जटा शंकर. जटा शंकर  गहरी घाटी में  शिव मंदिर है. जहाँ जाने के लिए सीढियां बनी है. कहीं कहीं घाटी इतनी संकरी है की दोनों तरफ के पहाड़ सर मिलाते से लगते है. यह लगभग ३ किलो मीटर  लम्बी घाटी है.यहाँ एक बड़ी गुफा है जिसमे एक पानी का कुण्ड है .जब आसपास की पहाड़ियों से बहता हुआ पानी यहाँ आता है तो वह आगे घाटी में नहीं बहता बल्कि  इस कुण्ड के नीचे से ही जमीन में समां जाता है ओर लगभग १४ किलो मीटर दूर एक अन्य घाटी में निकालता है. रास्ते में जड़ी बूटियों की दुकाने है लेकिन ये जड़ी बूटियाँ कितनी असली है ये तो पहचानने वाले ही बता सकते है. सालों से बहने वाले पानी के साथ  कचरा प्लास्टिक ओर रेत कुण्ड में जमा होते गए .तब एक साधू ने इस कुण्ड की सफाई करवाई ओर टनों कचरा ओर रेत यहाँ से निकली गयी. प्लास्टिक तो खैर आजकल सर्वत्र है.जहाँ भगवन नहीं पहुँच सकते शायद वहां भी प्ल…

पचमढ़ी यात्रा २

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हम टीचर्स भी गप्पें मारने बैठ गए. अभी सो पाना तो संभव नहीं था. बच्चों के सो जाने के बाद उनके कमरों का चक्कर लगाना था .रात करीब १२ बजे हमने चक्कर लगाया ,तो पता चला २-३ कमरों में टी वी चल रहा है  ओर बच्चे सो चुके है २ कमरों में अंदर से सांकल नहीं लगी है ओर बच्चे बेसुध पड़े है . धीरे से एक बच्चे को जगाकर उससे कहा की अंदर से बंद कर ले.जब सारे कमरे चेक हो गए तब करीब १ बजे हम अपने कमरों में पहुंचे. सुबह ६ :३० पर बच्चों को जगाना था. 
सुबह  चाय  आने से १५ मिनिट पहले ही नींद खुल गयी. चाय आयी तब तक फ्रेश हो कर हम फिर अपने राउंड के लिए तैयार थे. कई बच्चों को तो खूब देर तक उठाना पड़ा तो एक दो उत्साही लाल तो उठ चुके थे. जिसको भी जो पीना था चाय दूध कॉफ़ी ओर ८  बजे  तैयार हो कर नाश्ते के लिए ऊपर पहुँचने के लिए कहा. नीचे  पहुंचे  तो  जिप्सी  आ  गयी  थी . अब  दो  दिन  हमें  जिप्सी  से  घूमना  था . करीब ९ बजे हम जिप्सी से रवाना हुए .  हमारा  पहला स्पोट था हांड़ी खोह.हांड़ी खोह पचमढ़ी की सबसे गहरी घाटी है. ये इतनी गहरी है की आप इसका तल नहीं देख सकते. इस घाटी में घना जंगल है जिसमे कई ओषधिय  वनस्पतियाँ  पाई…

पचमढ़ी यात्रा.१

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स्कूल की ओर से शैक्षणिक भ्रमण पर पचमढ़ी जाना था..मन तो बिलकुल नहीं था चार दिन की छुट्टी शहीद करना. कब से इंतजार में थी इन चार दिनों में ये काम करना है वो करना है ओर सबसे बड़ी बात की थकान उतरना है.कुछ कहानियां अधूरी है उन्हें पूरा करना है लेकिन ...खैर ५ तारिख को रात में बस से रवाना होना था करीब ९ बजे बस चल पड़ी .सच कहूँ तो आँखों में आंसू भरे थे जिन्हें अँधेरे में आसानी से छुपाया जा सका बार बार छोटी बिटिया की बात ही मन में गूंजती रही आप पिछले ३ सालों से हर बार दशहरे  पर घर से बाहर रहती हो दिवाली पर पापा नहीं रहते घर पर. हमारे सारे त्यौहार तो ऐसे ही चले जाते है .सोचती हूँ इन छोटी छोटी खुशियों को पाने के लिए इस नौकरी से छुटकारा पा लूं.लेकिन अब तो ये हाल है की एक दिन की छुट्टी भी  लो तो दिन ख़त्म नहीं होता..दिन भर यही सोचते निकल जाता है की कोर्स  पूरा करना है आज के कितने पीरियड चले गए .टीचिंग  जैसे दिनचर्या में समां गयी है. खैर अब तो बस रवाना हो गयी थी अब बेकार की बातें सोचने से क्या होना था तो यही सोचा की बस अब काम पर ध्यान दिया जाये. रास्ता लम्बा था ओर बहुत ख़राब.. नवमी का दिन था इंदौर स…

खबर का असर

न्यूज चेनल और न्यूज  पेपर में आये दिन पढ़ते सुनते है खबर का असर.तब इसे एक मुस्कान के साथ पलट दिया जाता है ..व्यावसायिक कसरत,हर और हर कोई ये बताने की कोशिश में है की उसके द्वारा दिखाई या  छापी गयी खबर का ही नौकरशाही या राजनितिक गलियारों में असर होता है .हालाँकि इन ख़बरों को जो आम आदमी पढता है उस पर इन ख़बरों का क्या और कैसा असर होता है इसकी परवाह जो की जानी चाहिए वो शायद ही कोई करता है.  हम आये दिन पेपर में अच्छी और बुरी ख़बरें पढ़ते है.कुछ ख़बरों से मन व्यथित होता है तो कुछ को पढ़ कर चिंतित .कुछ ही ख़बरें होती है जो ख़ुशी से चहकने पर मजबूर कर देती है और कुछ सच में सोचने पर .ज्यादातर ख़बरों को हम ख़बरों की तरह पढ़ते है और भूल जाते है .कुछ ख़बरें दिमाग के  किसी कोने में अटक जाती है और उनका असर कितना गहरा और कितनी देर तक होता है ये तब पता चलता है जब ऐसी ही किसी परिस्थिति से रूबरू होना पड़ता है.  कुछ दिनों पहले समाचार पत्र में एक खबर पढ़ी.किसी पोलिसे इंस्पेक्टर ने रात में अकेले घर लौटती एक लड़की को किसी सुनसान स्थान पर ले जा कर उसके  फोटो खींच लिए और फिर उसे ब्लेकमेल  करने लगा .वो तो लड़की …

काली साडी

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बहुत दिन हो गए कोई पोस्ट नहीं लिखी.सोचते सोचते एक महिना बीत गया ,ऐसा नहीं इस बीच कोई विचार मन में न आया हो लेकिन बस लिखा ही नहीं गया.हम महिलाएं छोटी छोटी कितनी बातें सोचती रहती है और उनको किन किन बातों से जोड़ लेती है और बस बातों ही बातों में वाकये बन जाते है.एक छोटी सी घटना  है कम से कम हमारे इंदौर में तो काफी प्रचलित है की वार के अनुरूप कपडे पहने जाये.खास कर वृहस्पतिवार को पीले और शनिवार को काले या नीले .तो कल शनिवार को जब स्कूल जाने के लिए साडी निकालने लगी तो हाथ काली साड़ी पर ठहर गया .शनिवार के दिन काली साड़ी.शनि महाराज का रंग.बस वही निकाल ली.स्कूल पहुँच कर रजिस्टर  में साइन  किये ही थे की पीछे से आवाज़ आयी. अरे आज में भी बिलकुल ऐसी ही काली साडी पहनने वाली थी . फिर पहनी क्यों नहीं ?अच्छा लगता हम दोनों एक जैसी साड़ी में होते . सोच कर ही अच्छा लगा की अरे एक सा  विचार दो लोगो के मन में आया . अरे यार पहनने वाली थी लेकिन आज मेरे बेटे का पेपर है इसलिए आज काला पहने का मन नहीं हुआ.  ओह्ह ..हम्म ये भी ठीक है अब शनि महाराज बेटे से बढ़ कर थोड़े ही है. बस अपनी क्लास की तरफ बढ़ रही थी सामने से एक दू…

जरा देखिये

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अन्ना हजारे जी का आन्दोलन देश के हर घर का आन्दोलन बन गया है जिससे पता चलता हैकी सच में लोग भ्रष्टाचार से किस कदर त्रस्त है. इस देश की आबो हवा में बेईमानी इस तरह रच बस गयी है और बेईमानी करने के लिए लोग दिमाग का किस तरह उपयोग करते है इसका एक उदहारण आपके सामने लाना चाहती हूँ . 
ये है बाज़ार में बिकने वाले फेस वाश जो अधिकतर दुकानों में उलटे रखे होते है याने की ढक्कन नीचे .ये पूरे भरे दिखाई देते है कीमत यही कोई ५५-६० रुपये के आसपास. निश्चित तौरपर इस कीमत पर भी कम्पनी इसपर मुनाफा कमाती होगी . इतनी बड़ी ट्यूब  और कीमत ५५- ६० ठीक है चहरे की सुन्दरता के लिए खर्च की जाती है.( वैसे  ट्यूब में उत्पाद  वजन  में भरा जाता है).
ऐसी ही एक ट्यूब जब ख़त्म होने लगी तो खालिस भारतीय आदत ने आखिर के बचे फेस वाश को निकलकर उपयोग करने के लिए उसे उल्टा कर के रख दिया .लेकिन जब दो दिन ,चार दिन बाद भी दीवारों में चिपका फेस वाश नीचे नहीं आया तो ध्यान से देखा ,तब पता चला की वास्तव में तो ट्यूब आधी ही भरी थी और बाकि ट्यूब में तो अंदर से प्रोडक्ट के रंग का पैंट किया हुआ है.इसमें  नीला ट्यूब बिलकुल खाली है जबकि नारंगी ट्यू…

रेशम की डोर

मम्मी मम्मी कल स्कूल में रेशम की राखी बनाना सिखायेंगे ,मुझे रेशम का धागा दिलवा दो ना. बिटिया की बात सुनकर सीमा अपने बचपन के ख्यालों में खो गयी .दादी ने उसे रेशम के धागे से राखी बनाना सिखाया था .चमकीले रेशम की सुंदर राखी जब उसने सितारों से सजा कर अपने भाई की कलाई पर बाँधी थी तो उसके भाई ने भावावेश में उसे गले लगा लिया था. लेकिन रेशम की डोर में गाँठ टिकती ही नहीं थी .राखी  बार बार खुल जाती और भाई बार बार उसके पास आकर राखी बंधवाता रहा .तब एक बार झुंझलाकर उसने दादी से कहा था -दादी इसकी डोरी बदल दो ना इसमें गाँठ टिकती ही नहीं.  दादी ने मुस्कुरा कर कहा था -बेटा रेशम की डोर इसीलिए बाँधी जाती है ताकि भाई बहनों के रिश्ते में कभी कोई गाँठ ना टिके .छोटी सी बच्ची सीमा ऐसी बात कहाँ समझ पाती?  समय बदला हाथ से बनी राखी की जगह बाज़ार में बिकने वाली सुंदर सजीली महँगी  राखियों ने ले ली .अब राखी के दाम के अनुसार उन्हें कलाई पर टिकाये रखने के लिए सूती डोरियाँ और रिबन लगाने लगे .जिसमे मजबूत गाँठ लगती है और राखियाँ लम्बे समय तक कलाई पर टिकी रहती है . ऐसी ही एक गाँठ सीमा ने अपने मन में भी बाँध ली थी जो समय के स…

जीजी तूने चिठ्ठी नहीं लिखी

Monday, August 23, 2010जीजी तूने चिठ्ठी नहीं लिखी रक्षाबंधन,ये शब्द ही मन में हलचल मचा देता है हर दिल में चाहे वो भाई हो या बहन अपनो की यादे उनके साथ बिताये बचपन के अनगिनत खट्टे -मीठे पल आँखों के आगे कौंध जाते हैं। बात बात पर वो भाइयों से लड़ना,दादी का उलाहना देना,भाई से लड़ेगी तो वो ससुराल लेने नहीं आएगा,पापा के पास भाइयों की शिकायत करना,और पापा से उन्हें डांट पड़वा कर युध्ध जीतने जैसी अनुभूति होना, साईकिल सिखाने के लिए भाई के नखरे,और बाज़ार जाने का कहने पर तू रहने दे मैं ला दूंगा कह कर लाड जताना ....और भी न जाने क्या क्या.....और बचपन में राखी के दिन सुबह से भाइयों का आस पास घूमना जीजी राखी कब बांधेगी?हर बीतते सावन के साथ राखी की एक अनोखी याद । और ये यांदे हर भाई बहन के मन में अपना स्थान बिना धूमिल किये बनाये रखती हैं सालों साल यहाँ तक की मरते दम तक। दादी को अपने भाइयों के यहाँ जाने की उत्सुकता और मम्मी को लेने आये मामा के लिए भोजन बनाते देखना ,मामा के यहाँ जाने की तय्यरियाँ करना न जाने क्या क्या.....
पर यादे हमेशा एक अनोखा सा अहसास ही कराती है। कभी कभी इन एहसासों में एक अजीब सी उदासी…