Thursday, April 12, 2012

आफरीन



में आई इस जहाँ में 
बिना तुम्हारी इच्छा या मर्जी के 
अपनी जिजीविषा के दम पर 

सहा तुम्हारा हर जुल्म निशब्द 
पर तोड़ नहीं पाए तुम मुझे 
ये तुम्हारी हार थी.

अपनी हार पर संवेदनाओं का मलहम लगाते तुम 
हंसती रही में तुम्हारी बचकानी मानसिकता पर 
दर्द दे कर कन्धा देने से शायद मिलता हो 
बल तुम्हारे पौरुष को 

माँ के आंसुओं ने विवश किया मुझे 
ओर में कर बैठी विद्रोह 
की क्यों दूं में अपनी मुस्कान तुम्हे 
क्यों रोशन करूँ तुम्हारी जिंदगी 
जो ना कम हो सकी सदियों में 
क्या इससे कम होगी तुम्हारी दरिंदगी 

में अस्वीकार करती हूँ तुम्हे 
धिक्कारती हूँ तुम्हारी हर कोशिश को 
मेरे जाने के बाद 
शायद तुम महसूस कर सको 
कितने आदिम हो तुम 

ओर रखो हमेशा याद 
आई थी में अपने दम पर ओर 
जा रही हूँ अपनी इच्छा से 
तुम जीवित रहोगे जब तक 
मुझे याद रखना तुम्हारी मजबूरी होगी 
पर में तुम्हारी नहीं 
अपनी माँ की स्मृतियों को ले जा रही हूँ 
ओर मेरे साथ हैं माँ के आंसू 
बेहतरीन तोहफे की तरह .


19 comments:

  1. अस्वीकार कर तुम्हारी हर कोशिशे
    शायद तुम महसूस कर सको
    कितने आदिम हो तुम

    जी, बहुत ही सुंदर रचना़
    आपके सोचने का नजरिया सच में बिल्कुल अलग है।

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  2. sunder rachna.........bhavpurn....

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  3. बहुत ही गहरे को रचना में सजाया है आपने.....

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  4. पर में तुम्हारी नहीं
    अपनी माँ की स्मृतियों को ले जा रही हूँ
    ओर मेरे साथ हैं माँ के आंसू
    बेहतरीन तोहफे की तरह .

    अनुपम भाव लिए सुंदर रचना...बेहतरीन पोस्ट .

    MY RECENT POST...काव्यान्जलि ...: आँसुओं की कीमत,....

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  5. आफरीन और फलक सभी की याद दिला दी इस मार्मिक रचना ने .

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  6. में अस्वीकार करती हूँ तुम्हे
    धिक्कारती हूँ तुम्हारी हर कोशिश को
    मेरे जाने के बाद
    शायद तुम महसूस कर सको
    कितने आदिम हो तुम

    ....अंतस को झकझोरती बहुत मार्मिक प्रस्तुति...कब बदलेगी हमारी मानसिकता बेटी के प्रति जो कभी वहसीपन की सीमाएं लांघ जाती है?...कब हम बेटी को बेटी के हिस्से का प्यार दे पायेंगे?...बहुत उत्कृष्ट रचना...

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  7. मैं नहीं हारी हूं .. आप हार गए ..
    आपने इस कविता में बढिया सोंच दर्शाया है..
    अभिव्‍यक्ति भी अच्‍छी है .. सुंदर रचना !!

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  8. में आई इस जहाँ में
    बिना तुम्हारी इच्छा या मर्जी के
    अपनी जिजीविषा के दम पर

    gambhir bhav hai yaha

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  9. आई थी में अपने दम पर और जा रही हूँ अपनी इच्छा से
    तुम जीवित रहोगे जब तक मुझे याद रखना तुम्हारी मजबूरी होगी

    अनुपम भाव, "मैं तो तुम्हें सहारा देने आई थी, तुम्हारे जीवन को कुछ अर्थ देने, पर तुम पुरुष प्रधान मानसिकता से बाहर आही नहीं सके, जाओ तुम मेरे साथ के क़ाबिल ही नहीं थे", कुछ ऐसे ही भाव हैं। सुंदर रचना, बधाई।

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  10. आई थी में अपने दम पर ओर
    जा रही हूँ अपनी इच्छा से
    तुम जीवित रहोगे जब तक
    मुझे याद रखना तुम्हारी मजबूरी होगी

    अनुपम भाव;
    "मैं तो तुम्हें सहारा देकर तुम्हारे जीवन को कुछ अर्थ देने के लिए आई थी, पर तुम्ही सदियों पुरानी पुरुष प्रधान मानसिकता से बाहर नहीं असके, इसे तुम्हारा दुर्भाग्य ही कहूँगी, अफसोस और ग्लानि तुम्हारे हिस्से मे है, मेरे नहीं, जाओ तुम मेरे स्नेह त्याग और प्रेम के क़ाबिल ही नहीं बन सके।" शायद यही भाव है। बहुत सुंदर रचना, बधाई।

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  11. आई थी में अपने दम पर ओर
    जा रही हूँ अपनी इच्छा से
    तुम जीवित रहोगे जब तक
    मुझे याद रखना तुम्हारी मजबूरी होगी

    अनुपम भाव;
    "मैं तो तुम्हें सहारा देकर तुम्हारे जीवन को कुछ अर्थ देने के लिए आई थी, पर तुम्ही सदियों पुरानी पुरुष प्रधान मानसिकता से बाहर नहीं असके, इसे तुम्हारा दुर्भाग्य ही कहूँगी, अफसोस और ग्लानि तुम्हारे हिस्से मे है, मेरे नहीं, जाओ तुम मेरे स्नेह त्याग और प्रेम के क़ाबिल ही नहीं बन सके।" शायद यही भाव है। बहुत सुंदर रचना, बधाई।

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  12. दमदार प्रस्तुति...

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  13. तुम जीवित रहोगे जब तक
    मुझे याद रखना तुम्हारी मजबूरी होगी
    पर में तुम्हारी नहीं
    अपनी माँ की स्मृतियों को ले जा रही हूँ
    SUNDAR BAHUT KHUBSURAT BHAWON BHARI ABHIWYAKTI

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  14. भाव बहुत सुन्दर हैं .

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  15. bahot sunder! dil ko chhoo jati hai

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  16. अपनी हार पर संवेदनाओं का मलहम लगाते तुम
    हंसती रही में तुम्हारी बचकानी मानसिकता पर
    दर्द दे कर कन्धा देने से शायद मिलता हो
    बल तुम्हारे पौरुष को

    बहुत खूब..............
    सलाम आपकी लेखनी को...

    अनु

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