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Showing posts from April, 2011

इंतजार ३

(मधु और मधुसुदन मंदिर में अचानक मिले देखते ही बरसों पुरानी बातें ताज़ा हो गयी. थोड़ी देर साथ बैठ कर एक दूसरे के बारे में जानकारी ली एक दूसरे का पता फोन नंबर लिया ) अब आगे...
.मधु के जाने के बाद में फिर बगीचे की बेंच पर बैठ गया पैतीस साल एक लम्बा अंतराल .मधु और में शाहपुर के कोलेज में थे .में एम् ए फ़ाइनल में था और वह सेकेण्ड इयर में जब हमारा परिचय हुआ था .
पहली ही नज़र में उसकी हंसी मेरे दिल में उतर गयी थी उसका आँखों से हंसना हर बात में चुटकियाँ लेना मेरे दिल दिमाग पर छा गया .हमारे शौक भी लगभग एक ही थे. दोनों ही पढ़ने के शौकीन . पर उसके दिल की बात में नहीं जानता था .करीब ६ महीने तक में अकेले में उसके ख्यालों से बातें करता रहा . और एक दिन हिम्मत कर के दिल के सारे ज़ज्बात मोती की तरह सजा कर एक पुस्तक में रख दिए और वह पुस्तक उसे पढ़ने के लिए दे दी. उस सारी रात में सो न सका
पता नहीं उसने पत्र देखा होगा या नहीं?पढ़ कर क्या सोचा होगा मेरे बारे में ? क्या उसे गुस्सा आया होगा? बार बार सोचने पर भी मेरा मन ये मानने को तैयार नहीं था की वह गुस्सा हुई होगी. में सोच ही नहीं पा रहा था वह …

इंतजार २

(बरसो बाद मंदिर में मधु और मधुसुदन ने एक दूसरे को देखा और उनकी कई पुरानी यादे जाग उठी.) अब आगे.....
तुम यहाँ कैसे मधु ने पूछा.
अभी चार पांच महीने पहले ही ट्रान्सफर हो कर यहाँ आया हूँ. पास ही की कॉलोनी में मकान लिया है . कभी कभार शाम को यहाँ आ जाता हूँ. इस मंदिर में बहुत शांति मिलती है. बहुत सारी बातें याद करते हुए शाम निकल जाती है.
में भी यहाँ इसीलिए आती हूँ. कहते हुए मधु ने जीभ काट ली वह दूर देखने लगी.
तुम यही कही पास ही रहती हो? उसकी झेंप कम करने के लिए मैंने बात बदली.
पास तो नहीं हाँ ५-७ किलोमीटर दूर एक कॉलोनी में .
तुम्हारा खुद का घर है या...
खुद का है .कई साल हो गए . मम्मी बहुत पीछे पड़ी थी-अपना घर नहीं बसाया तो क्या कम से कम एक मकान तो अपना कर लो.
में कुछ असहज हो गया. मधु आज भी अकेली है मेरे कारण.
मुझे माफ़ कर दो मधु मेरे कारण ...
नहीं तुम्हारे कारण नहीं मेरी बात को बीच से काटते हुए उसने कहा .शायद यही हमारी नियति थी .
क्या कर रही हो तुम?
एक कम्पनी में सलाहकार हूँ. मम्मी मेरे ही साथ रहती है दिन भर काम और शाम को सहेलियों के साथ घूमना फिरना. आज मेरी सहेलियां साथ नहीं आ पाई तो अकेले ही निकल …

इंतजार

मधु -मंदिर में अचानक एक महिला को देखते ही मेरे मुंह से बेसाख्ता निकला .वह भी मेरी ओर देखते हुए बोली मधुसुदन आप ?यहाँ कैसे कब आये ?
कुछ देर तक दोनों एक दूसरे को देखते ही रहे .तभी हमें हमारी स्थिति का आभास हुआ . अचकचा कर चारों ओर देखते हुए मैंने कहा हमें किनारे हो जाना चाहिए .
में दर्शन करके आती हूँ . तुमने दर्शन कर लिए ?
हाँ हाँ तुम जाओ में बाहर सीढ़ियों पर तुम्हारा इंतजार कर रहा हूँ .
ठीक है कहते हुए मधु मंदिर के गर्भ गृह की और चल दी
आज बसंतपंचमी पर शहर से दूर बसी इस कॉलोनी के सरस्वती मंदिर में बहुत गहमागहमी थी .दूर दूर से लोग दर्शन के लिए आ रहे थे. इतने बड़े शहर में बमुश्किल एक दो सरस्वती मंदिर थे . आम दिनों में यह मंदिर सामान्यतः सूना ही रहता है गाहे बगाहे बाहर की कॉलोनी या शहर से कोई यहाँ आता है.
में सीढ़ियों पर बैठ कर मंदिर की सजावट देखने लगा . पूरा मंदिर केसरिया पीले फूलों की माला से सजा था. माँ सरस्वती का शृंगार भी पीले सफ़ेद फूलों से किया गया था. हाथ में वीणा और पुस्तक लिए माँ अपनी सौम्य मुस्कान के साथ मानों मुझे ही देख रही थी. लाउडस्पीकर…

पीपल

Image
पीपल पर फिर नयी कोंपले आ गयी
फिर चहचहाने लगे पंछी उस पर
सड़क के किनारे लगा
बरसों पुराना पीपल
न जाने किसके हाथ से लगाया हुआ
छोड़ देता है अपने पुराने पत्ते
उसका विशाल भव्य आकर
हो जाता है रीता
और करता है इंतजार
नए पत्ते ,पंछियों और पथिकों का
है उसका विश्वास अटूट
ये सब फिर लौटेंगे

बरसों पहले बसी कालोनी
अपनी सामर्थ्य भर पैसा जुटाते
बच्चों की जरूरत मुताबिक
करते सुविधाओं का विस्तार
खूब रौनक भरी
लगभग एक उम्र के सब बच्चे
खेल के मैदान और छत पर
गूंजते कहकहे और किलकारियां
पीपल के नीचे बैठ कर
लिए गए मशविरे
देखते पीपल की कोपलें
दी गयी सलाहें
कुछ बन कर वापस लौटेंगे ये पंछी आज इन्हें जाने दो
पीपल की एक एक शाख सा
हर घर रहा इसी आस पर

तब से अब तक
न जाने कितनी बार
पीपल पर आ गयी नयी कोंपलें
कितने ही पंछियों के बने बसेरे
पीपल फैलता रहा अपनी शाखें
देने ज्यादा पथिकों को अपनी छाँव

पीपल के नीचे बैठ कर
आज भी होते है मशविरे
अपने विस्तार को समेटने के
इन बूढ़े पीपलों को
हो गया है विश्वास
इनकी शाख पर
कोंपलें अब नहीं लौटेंगी
पंछी दो घडी सुस्ता कर
फिर उड़ जायेंगे
कि अब उनका बसेरा है कही और

पीपल के नीचे
अब भी होती है बैठके
चहकते पंछियों को देखते
मन का सूनाप…

एतबार

अब जान कर भी कहाँ जान पाते हैं लोग?हर मोड़ पर नए रूप में नज़र आते हैं लोग.
थामा जो तूने हाथ तो दिल को संबल मिला.पर तूफ़ान में हाथ छोड़ दिया कैसा दिया सिला?
सोचा था कदम बहके तो थाम लोगे तुम.
पर हमसे पहले ही तुम बहकने क्यों लगे?

तुमसे था अपने होने का गुरुर हमको एतबार यूँ टूटा खुद पे भरोसा कैसे करें?

आईना

आईने में झांकते
देखते अपना अक्स
नज़र आये चहरे पर
कुछ दाग धब्बे
अपना ही चेहरा लगा
बदसूरत ,अनजाना
घबराकर नज़र हटाई
अपने अक्स से
और देखा आईने को
नज़र आये तमाम दाग
आईने के चहरे पर
आईने के सामने से हटते ही
मेरा चेहरा फिर था खूबसूरत, बेदाग कितना आसन था.

यूँ ही बैठे फुर्सत में
झाँका अपने अतीत में
कुछ पल ख़ुशी के
कुछ दोस्ती और प्रेम के
चमकते इन पलों से
था रोशन मेरा चेहरा
लेकिन इस पर भी
नज़र आये कुछ दाग
दिखा चेहरा धब्बेदार
कोशिश करते पहचानते
इन धब्बों को
ये थे जीवन के वो पल
जो सने थे ईर्ष्या, द्वेष ,धोखे से
स्वार्थ के दाग जो थे
बड़े भद्दे और डरावने
अनायास ही पहुंचा मेरा हाथ
हटाने उन धब्बों को
कितने गहरे जमे थे वो
छू भी न पाया उन्हें

चाहा न देखूं इस अक्स को
पर जीवन के साथ जुड़ा है ये
इस कदर
कि इससे दूर जाना नहीं है संभव
कि नहीं हो सकता अब मेरा चेहरा फिर खूबसूरत बेदाग
कि आईना है ये जिंदगी का
इससे दूर नहीं हो सकता मै