Saturday, July 6, 2019

पोर्टब्लेयर डायरी 3

3) #पोर्टब्लेयर #portblair #andmannicobar
दूर तक फैले नीले समुद्र में अपना अक्स देखता नीला आसमान हरे भरे घने पेड़ों से भरे भरे टापू समुद्र की गहराई को नाप कर खड़े किये गये पिल्लर और उन पर बना ब्रिज जिस के पास जेट्टी रुकी और उस पर अस्थाई सीढ़ी लगा कर उतरते और अचंभित हो ठिठक जाते यात्री। जिसकी भी नजर उतरते ही नीले विस्तार पर गई वह एक पल को ठिठक गया और फिर जैसे अचानक चौंक गया और इसे कैद करने के साधन ढूंढने लगा। प्रकृति की सुंदरता को हम कहाँ कैद कर सकते हैं हम तो उसके एक अंश मात्र से खुद को भरमाते हैं। प्रकृति को कैद करने के लिये जो प्राकृतिक कैमरा बनाया है उसका अधिकतम उपयोग ही करना उचित है। पुल पर जवान तैनात थे किनारे पर नीले पानी के नीचे सफेद चट्टान दिखते दिखते अचानक गायब हो गई। मैंने जरा झांक कर देखा तो मुझे तुरंत टोका गया मैडम दूर रहिये।
कितना गहरा पानी है यहाँ?
काफी गहरा है कहते हुए वह खुद बिलकुल किनारे पर खड़ा हो गया।
सूरज को पता ही नहीं था कि जिस दर्पण में देख कर वह इठला रहा है उसी में अपनी तपिश उंडेल कर वह अपने और उसके बीच बादलों की चादर तान देगा। इससे क्या न भास्कर नारायण अपना धर्म छोड़ सकते हैं और न उनके प्यार से पिघलकर धुआं धुआं हुए समंदर महाराज। वे तो बादल रूप में ही आलिंगन करने को तत्पर हुए जाते हैं। इस प्रेम के बीच आ जाते हैं हम पर्यटक जो इसकी तपिश और उससे उपजी उमस के बीच पसीना पसीना होते हैं रुमाल से पोंछते हैं और नारियल पानी ढूंढते हैं। बाहर आने के पहले ही हमारा लोकल एजेंट हाथ में तख्ती लिए मिल गया और गाड़ी आने तक उसने हमें एक पेड़ की छांव में नारियल पानी वाले के पास छोड़ दिया।
हैवलाक आयरलैंड में हमें क्या देखना है यह पूछने पर उसने बताया कि यहाँ स्कूबा डाइविंग है राधा नगर बीच है और अगर स्कूबा डाइविंग के लिए जाना है तो आप घंटे भर में तैयार हो जाइये।
अंडमान आयें और कोरल न देखें तो क्या फायदा हालाँकि तैरना जाने बिना गहरे समुद्र में उतरने का विचार ही डरावना था।
खूबसूरत काॅटेज से घिरे स्वीमिंग पूल वाला हमारा होटल देखते ही बस दिल में समा गया। जल्दी से कमरे में सामान रखा एक बैग में कपड़े रखे और नाश्ता किया तब तक हमारी गाड़ी आ गई। स्कूबा डाइविंग के पहले आवश्यक फार्म भरा डाइविंग सूट पहना और हाई टाइड के पानी में सफेद चट्टानों पर चलते हुए पहुँच गये कमर तक पानी में जहाँ पंद्रह मिनट की ट्रेनिंग होना था। हाँ पानी में जाने के पहले कमर पर पत्थरों की एक बेल्ट पहनाई गई मतलब यही था कि तुम्हें गहरे डूबना है तैरने की कोशिश न करना। मुझे तो वैसे ही तैरना नहीं आता ऐसे ही छोडते तो डूब ही जाती। वैसे अब तक जिस दुनिया में हम विचर रहे थे उसमें पहले ही डूब चुके थे।
पीठ पर आक्सीजन टैंक बांधा मुँह पर मास्क लगा कर साँसों पर नियंत्रण मुँह से साँस लेने की प्रेक्टिस इशारों को समझना उसका इशारों में जवाब देना गहराई में कान पर बनने वाले प्रेशर को रिलीज करना मुँह में पानी भरने पर उसे निकालने के लिए बटन दबाना ऊफ। पंद्रह मिनट में कई बार ऐसा लगा कि क्या करें जायें या नहीं जायें? कहीं कुछ भूल गये तो? लेकिन दिल ने कहा अब जो होगा देखा जाएगा। डाइविंग फीस के साथ फोटो वीडियो शूट कांप्लीमेंट्री था। जाने के पहले वीडियो शूट हुआ तो बड़ा अच्छा लगा पीठ पर सिलेंडर मुंह पर मास्क डाइविंग सूट बस कमर तक पानी में खड़े होकर चाँद पर पहुँचने सा आभास हो रहा था। तभी जोरदार बारिश शुरू हो गई मन फिर डर से भर गया। बारिश में समुद्र कितने खतरनाक होते हैं लेकिन अंडमान सागर बहुत शांत है। हम चल पड़े डूबने नीली चादर के नीचे छुपी एक और दुनिया का दीदार करने। मन में डर उत्सुकता आशंका सभी लेकर। धूप न होने के कारण हल्का धुंधला पन था लेकिन अंदर बड़ी बड़ी चट्टान उनके आसपास तैरती छोटी छोटी मछली जीवित कोरल छोटे छोटे पौधे काली पीली हरी पीली कुछ एकदम छोटी मछलियों के झुंड तो कभी इक्का दुक्का बड़ी मछली। कहीं चट्टानों के बीच इतनी गहराई कि तल में कुछ दिखाई न दे तो कहीं इतनी ऊंची कोरल रीफ के डर कर पैर सिकोड़ लिए कि कहीं उनसे टकराकर उन्हें नुकसान न पहुँचा दें। तभी फोटोग्राफर कैमरा लेकर आ गया और धड़ाधड़ फोटो खींचना शुरू कर दिया। गहरे पानी की अनूठी दुनिया ने वैसे ही हतप्रभ कर रखा था ऐसे में पोज देना किसे सूझता है?
हर व्यक्ति के साथ एक गाइड था जो हर आधे मिनट में इशारे से ठीक होने के बारे में पूछता रहा। कई बार प्रेशर के कारण कान सुन्न हुए लेकिन ठान लिया था समय पूरा होने के पहले बाहर नहीं आना है। आधे घंटे का समय चुटकियों में बीत गया और हम बाहर आये तब तक बारिश बंद हो गई थी लेकिन बादल घने थे। बहुत देर तक तो विश्वास ही नहीं हुआ कि हम एक अनोखी दुनिया में विचरण करके आ गये हैं। जो दुनिया टीवी स्क्रीन पर देखते थे उसे इतने पास से देख कर आ रहे हैं। अद्भुत अनुभव था जिसे शब्दों में ढालना मुश्किल है। ध्यान या समाधि की स्थिति शायद ऐसी होती होगी जब सब कुछ विलीन हो जाये।
बाहर आकर हम कपड़े बदल रहे थे सामान समेट रहे थे लेकिन नजरों के सामने तैरती मछलियाँ सांस लेते कोरल पानी की गहराई ही थी।
यहाँ से अगला स्पाॅट था राधा नगर बीच। घने जंगल के बीच नारियल के बगीचे उनके किनारे पर बने छोटे छोटे मकान मकान के सामने करीने से लगाया गया गार्डन ऊंचे नीचे सर्पीले रास्ते। ड्राइवर ने हमें वहाँ छोड़ा और दो घंटे बाद वापस आने का कहकर चला गया।
कविता वर्मा

पोर्टब्लेयर डायरी 2

2) #पोर्टब्लेयर #andmannikobar #portblair 
धरती की नमी सूरज की तपिश से ऊभचुभ होकर बादल बनने को बेताब थी और इस बेताबी की बैचेनी वह लोगों के चेहरों पर छोड़ जा रही थी। सबसे पहले तो हमने इस बैचेनी से बचने के लिए नारियल पानी पिया फिर गाड़ी में बैठकर होटल पहुँचे। रात्रि जागरण और ठिठुरन की थकान हावी थी। ड्राइवर ने बताया कि दोपहर तीन बजे सेल्यूलर जेल देखने जाना है तब तक का समय हमारा था। कमरे में सामान रख कर जल्दी से नहाया फिर नाश्ता किया और बिस्तर पर पीठ टिकाते ही आँख लग गई।
दोपहर पोर्टब्लेयर की ऊँची नीची पहाड़ी सड़कों से शहर की एक झलक देखते कुछ कुछ उसका मिजाज़ समझने की कोशिश करते हम काला पानी के नाम से कुख्यात उस जेल के गेट पर पहुँच गये जो पहली झलक में किसी पुरानी लेकिन बेहतर रख रखाव वाली सरकारी इमारत सी ही लगी। बाहर लोगों की लंबी कतार लगी थी। यहाँ हमें एक व्यक्ति हमारे टिकट के साथ मिला और कुछ ही देर में हम जेल के अंदर थे। एक बड़े से अहाते में जिसमें जेल की तीन तीन मंजिला दो भुजाएँ पूरी लंबाई में फैली थीं बीच में बना एक वाॅच टाॅवर जिससे सभी तरफ नजर रखी जा सकती थी और एक भुजा समुद्र की दिशा की तरफ थी। उस तरफ दूर तक फैला विशाल समुद्र इमारत को भयावह सन्नाटे से घेरे रखता था। एक जैसी आठ बाय दस फीट की कोठरियाँ जिसके रौशनदान और दरवाजे से कतरा भर आसमान दिखता था। ऐसी इमारत जहाँ से कहीं भागना संभव नहीं था उसमें दीवार के बीच आले बनाकर लोहे के दरवाजे में मोटी सांकल लगाई गई थी। इन्हीं दो भुजाओं के बीच रसोई घर फाँसी घर और दंड देने के लिए बनी कार्यशाला जिसमें तीस पौंड तेल निकालने जैसी सजा दी जाती थी। आज हमें मिली तमाम आजादी और सुरक्षा के बीच उसकी भयावहता समझना मुश्किल है लेकिन उस समय बरसों उस एकांत वास में हड्डी तोड़ मेहनत और मनोबल तोड़ने वाले व्यवहार और सजा के बीच रहने वाले उन 218 कैदियों की जीवटता को समझ पाना और भी ज्यादा मुश्किल है। अंग्रेज उनकी जीवटता और इरादों से किस कदर डरे हुए होंगे यह जानने के लिए लोहे के दरवाजे और सांकल की मोटाई ही काफी है।
शाम छह बजे से परिसर में लाइट और साउंड शो था जिसमें कालापानी का इतिहास और कैदियों को दी जाने वाली सजाओं को बताया गया। इस शो में लाइट का इफेक्ट झुटपुटे उजाले के कारण मध्यम ही रहा तो लाइट से भी बेहतरीन प्रयोग की काफी संभावना अपेक्षित थी। बाकी रही सही कसर फोटोग्राफी और रिकार्डिंग न करने के नियम तोड़ने वाले कर देते हैं। खैर कुल मिलाकर इतिहास से परिचित करवाने का अच्छा प्रयास है।
हम जब बाहर निकले अंधेरा घिर गया था दूसरा एक ड्राइवर लेने आया था जिसने हमें थोड़ी देर मार्केट में कुछ शापिंग करने का समय दिया और फिर वापस होटल छोड़ा।
अगले दिन सुबह साढ़े छह बजे की फेरी से हमें हैवलाक आयरलैंड जाना था जिसके लिए सुबह साढ़े पाँच बजे तैयार होना था ताकि चैक इन के लिये समय से पहुँच सकें। खाना खाकर जल्दी ही हम सो गये।
सुबह जब हम पोर्ट पर पहुँचे पहली बार नीले शांत समुद्र के दीदार हुए। आसमान साफ था और उसकी परछाई से सराबोर समुद्र भी उसी रंग में रंगा था। समुद्र में खड़ा छोटा सा जहाज जिसमें हमें जाना था और दूर तक गहरा नीला समुद्र जिसकी रक्षा करने के लिए बीच बीच में हरेभरे द्वीप सिर उठाये खड़े थे। तुरंत कैमरे मोबाइल निकाले न जाने कितने फोटो लेकिन मन नहीं भरा और जहाज (जट्टी) पर चढने का समय आ गया। जहाज के चलते ही थोड़ी ही देर में हम ऊपर डेक पर आ गए। वहाँ तेज म्यूजिक के साथ डांस चल रहा था साइड गैलरी में खड़े होकर तेजी से पीछे छूटते और आगे और गहरे समुद्र में घुसते जाना एक रोमांच पैदा कर रहा था। दूर गहनता को प्रमाणित करती लहरें और जट्टी के तल से पीछे छूटती दूधिया लहरें। ओह ये दृश्य कभी पूरी संतुष्टि क्यों नहीं देते बस देखते रहो देखते रहो लेकिन मन हटने को तैयार ही नहीं होता। अब तक सूरज बादलों के बीच से निकल कर पानी के वितान पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा था। अपने साम्राज्य में सूर्य चाहे पृथ्वी से कितना ही बड़ा हो लेकिन पृथ्वी सुत समुद्र के एक छोटे से हिस्से पर ही चकाचौंध फैला पा रहा था। अजीब है न जब मन समंदर की तरफ हो तो वह सूरज को भी छोटा बना देता है और क्यों न बनाए आखिर अभी समंदर ही तो मन के करीब था अचंभित करता हुआ। बाँयी ओर एक बेहद विशाल पहाड़ी द्वीप साथ साथ चल रहा था। कभी करीब हो जाता कभी दूर। दरअसल समंदर और द्वीप ऐसे हाथों में हाथ डाले रहते हैं यहाँ कि न द्वीप इसके विस्तार को रोकते हैं और न समुद्र इसके किनारों पर सिर पटक कर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करता है। सभी कुछ बड़ा शांत सौहार्द्र पूर्ण और आप इस में खोये सोचते रह जाते हैं कि हम इंसान इनके सीने चीर कर भी इस सौहार्द्र का अंश मात्र भी खुद में समाहित क्यों न कर पाये?
लगातार पानी को देखते चक्कर आने लगते हैं लेकिन दृष्टि हटती नहीं। तभी पानी में बहती एक लाल भूरी पत्ती दिखती है जो न जाने किस किनारे से किस मंजिल पर पहुंचने के लिए निकली थी। उसकी मंजिल का अंदाजा लगा ही नहीं था कि एक छोटी सी चिड़िया ने पानी में डुबकी लगाई। वह पानी से निकलती तब तक जहाज आगे बढ़ गया और मैं बस कल्पना ही कर रही हूँ कि वह अपना भोजन तलाश कर बाहर आ गई होगी।
तभी ऊपर डेक से पानी में कुछ गिरा देखते समझते तब तक लहरों में समा गया। तभी फिर कुछ गिरा इस बार आंखें एलर्ट थीं और तुरंत पकड़ लिया यह डिस्पोजेबल कप था फिर थोड़ी थोड़ी देर में कप प्लेट पैकेट फिंकाते रहे। मैंने हर बार आगे को झुक कर ऊपर देखा। एक्जीक्यूटिव क्लास में सफर करने वाले दिल दिमाग से भी एक्जिक्यूटिव हों जरूरी तो नहीं हैं। कभी-कभी सोचती हूँ काश कोई ऐसी मशीन हो जो इंसान के सिविक सेंस का आकलन कर सके और उसके आधार पर ही उन्हें ऐसे खूबसूरत प्राकृतिक स्थानों पर जाने की अनुमति दी जाये तो शायद अगली पीढ़ी के लिए हम रहने लायक पृथ्वी बचा सकेंगे। 
डेक पर म्यूजिक जोर शोर से चल रहा था और मैं सोच रही थी कि काश यह थोड़ी देर के लिए बंद हो जाये सब थोड़ी देर बिलकुल चुप हो जायें और कुछ देर नीले समंदर और हरे टापुओं पर इठलाती हवा की खामोश सदाएं सुनी जा सकें।
वैसे मुझे कभी समझ नहीं आया कि शोर तो शहरों में भी काफी है और जब उसी में रहना है तो लोग इतनी दूर प्रकृति को अपने शोर से भरने क्यों चले आते हैं?
आपको समझ आये तो बताइयेगा जरूर।



Monday, June 3, 2019

पोर्टब्लेयर डायरी 1

इंदौर से शाम छह बजे घर से चले तब तक बिलकुल भी अंदाजा नहीं था कि कैसी जगह होगी। अब तक कई समुद्र के किनारे जा चुके हैं इसलिए वैसे ही किसी जगह की छवि मन में थी। इंदौर का हवाई अड्डा जैसा कि न्यूज में पढते थे उससे कहीं ज्यादा खूबसूरत और भव्य था। अभी कुछ दिन पहले ही एयर पोर्ट डायरेक्टर आर्यमा सान्याल जी से मुलाकात हुई थी और उनके व्यक्तित्व ने जितना प्रभावित किया था एयरपोर्ट ने उसमें इजाफा ही किया। शाम सात बजे पहली बार प्लेन में कदम रखा। इंडिगो की नीले सफेद रंग से सजी धजी फ्लाइट।
करीब डेढ़ घंटे में हम मुंबई पहुंचे और वहाँ इंतजार शुरू हुआ बिटिया का। लगभग आधे घंटे तक साफ सफाई बोर्डिंग चैक के बाद बिटिया फ्लाइट में आई और फिर तो यात्रा में जान आ गई।
रात लगभग साढ़े बारह बजे कोलकाता एयरपोर्ट पहुंचे और लगेज के इंतजार में खड़े हो गए। एक एक कर सभी का लगेज आ गया लेकिन हम खड़े ही रहे। तभी एक आदमी ने पूछा आपको आगे जाना है क्या तो आपका लगेज आगे के लिए बुक हो गया है वहीं मिलेगा। अब तक जोर से भूख लग आई थी। एयरपोर्ट से बाहर जाने पर फिर से सिक्यूरिटी चैक से गुजरना पड़ता इसलिए सोचा कि यहीं कुछ खा लेते हैं। कोलकाता एयरपोर्ट बहुत बड़ा और भव्य है। देखते देखते हम ऊपर फर्स्ट फ्लोर तक पहुंचे। कुछ फोटो लिये। फूड जोन बंद हो चुका था बस एक दो स्टाॅल टी जंक्शन और सीसीडी के खुले थे। वहाँ पेट भर खाने लायक विशेष कुछ नहीं था लेकिन भूख लगे तो जो मिले वही सही।
हालाँकि जिस तरह स्लीपर पहनने वाले के लिए हवाई यात्रा सुलभ बनाई गई है वैसे ही स्लीपर पहनने वाले के लिए खाने पीने के सामान के रेट भी सुगम होते तो ठीक था। अभी तो ये सूटबूट वालों के लिए भी विचारणीय लगे। कोलकाता एयरपोर्ट पर रात के समय भीड़ कम हो गई थी लेकिन एसी की ठंडक दिन की गर्मी और भीड़ भाड़ के अनुसार ही थी। अठ्ठारह डिग्री सेल्सियस से कम के तापमान पर चादर ओढ़ कर भी सारी रात ठिठुरते ही गुजरी। उस पर लगातार चलता म्यूजिक सोने कैसे देता। खैर हमारे यहाँ के अनुसार तो रात ही थी लेकिन सुदूर पूर्व में तो साढ़े चार बजे उजाला होने लगता है। सुबह साढ़े पाँच की फ्लाइट के लिए साढ़े चार बजे चेक इन की प्रक्रिया शुरू हो गई।
हल्के बदलाये उजाले में शुरू हुए सफर में ऊपर और नीचे दोनों तरफ बादल थे। बादलों के आर पार कुछ भी नहीं था फिर लगा कि बादलों की परछाई बन रही है नीचे पानी था। नहीं पानी नहीं समुद्र जो धुंधलाई रौशनी में बादलों सा ही दिख रहा था। अजीब सा सपनई नजारा था जिसमें बादल कहाँ शुरू हो कर कहाँ समुद्र से मिल रहे थे और समुद्र क्षितिज पर कहाँ बादलों पर सवार हो गया था पता ही नहीं चल रहा था। सात बजे बाद सूरज अपना उनींदा पन हटा कर आसमान के मैदान में डट कर खड़ा हुआ तब बादलों ने अपना साम्राज्य समेटा और धरती आसमान के बीच की सीमा रेखा स्पष्ट हुई लेकिन धरती पर तब तक समुद्र का साम्राज्य फैल चुका था। गहरा नीला समुद्र अपने गहन गंभीर स्वरूप में किनारे पर एक दो छोटी छोटी लहरें पहुँचा कर अपने होने का प्रमाण दे रहा था। दूर तक गहरे हरे पेड़ समुद्र की गंभीरता में सुर मिलाये खड़े थे और आसमान तक एक शांत सुंदर क्षेत्र के होने का संदेश पहुँचा रहे थे। आसमान से दिखने वाले इस नजारे ने आभास दे दिया था कि हमने जितना सोचा था उससे कहीं ज्यादा खूबसूरत जगह पर हम पहुँच चुके हैं और अब उसे भरपूर अपने दिलो दिमाग में समाने के लिए खुद को तैयार कर रहे थे।
पोर्टब्लेयर का वीर सावरकर हवाईअड्डा अपनी छोटी सी नीली इमारत के साथ हमारा इस्तकबाल करने को तैयार था। एयरपोर्ट के बाहर हमारे नाम की तख्ती लिये ड्राइवर हमारा इंतजार कर रहा था।
कविता वर्मा 

Monday, December 10, 2018

उपन्यास समीक्षा


"आ कविता वर्माजी का उपन्यास "छूटी गलियाँ" मंगा तो बहुत पहले लिया था लेकिन समयाभाव के चलते पढ़ नहीं पाया था. और आज संयोग बैठ ही गया जब भोपाल से मुंबई की फ्लाइट मे इसे पढ़ने का समय मिल गया. एक बार शुरुआत करने के बाद खत्म करके ही दिल माना. कविता जी एक बेहतरीन लेखिका हैं और उनकी लघुकथा और कहानियों से काफी समय से रिश्ता रहा है लेकिन उपन्यास लिखना बहुत धैर्य और मेहनत का काम होता है और मुझे उत्सुकता इस बात की था कि क्या इनकी पकड़ इस विधा मे भी ऐसी ही होगी जैसी लघुकथा और कहानियों मे है. आज उपन्यास पढ़कर यह यकीन हो गया कि कविता जी की पकड़ इस विधा में भी बहुत बढ़िया है. यह उपन्यास मानवीय भावनाओं, रिश्तों और उससे गुजर रहे दो परिवारों के बारे मे है. उपन्यास का नायक पैसों को खुशियों का पैमाना मानकर उसे कमाने के चक्कर में अपने परिवार को खो देता है और जब वह एक और ऐसे ही परिवार के बारे में जानता है तो उसे बचाकर अपनी गलतियों को सुधारने के जद्दोजहद मे लग जाता है. कहानी दिलचस्प मोड़ लेती रहती है और पाठक उससे जुड़ा रहता है. एक अच्छे मोड़ पर उपन्यास खत्म होता है और पाठक राहत की सांस लेता है. पात्र काफी कम हैं इसलिए ज्यादा उलझन नहीं होती, बस अंत थोड़ी जल्दबाजी मे कर दिया गया लगता है. बहरहाल एक बढ़िया उपन्यास के लिए आ कविता वर्माजी बधाई की पात्र हैं और हम भविष्य मे उनकी और रचनाएँ पढ़ने की उम्मीद करेंगे."
विनय अंजू कुमार 

Sunday, December 9, 2018

कमजोरी को शक्ति बना जीत लें दुनिया

विश्व दिव्यांग दिवस के अंतर्गत वामा साहित्य मंच के मासिक कार्यक्रम में संजीवनी संगम मूक बधिर केंद्र जाने का मौका मिला। शहर के व्यस्त इलाके में लेकिन मुख्य सड़क से अंदर यह एक बड़ा और शांत परिसर है। सन 81 में शुरू हुआ यह केंद्र प्रारम्भ में सिर्फ अनाथ बच्चों का संरक्षण गृह था। तब से अब तक लगभग ७५० अनाथ लावारिस छोड़ दिए गए नवजात बच्चे यहाँ लाये जा चुके हैं। ऐसे बच्चे जो सड़क किनारे झाड़ियों नालों में छोड़ दिए जाते हैं कई बेहद बुरी हालत में होते हैं। बीमार वक्त से पहले जन्में चीटियों द्वारा कटे गए पॉलीथिन में कम ऑक्सीजन में जीवन के लिए संघर्ष करते ये बच्चे जब इस केंद्र की ममतालु नर्सआया और डॉक्टर्स की देखरेख में आते हैं तो अधिकांश इस सम्बल को पा कर जी जाते हैं। ठीक होने के बाद शीघ्र ही बच्चों के लिए ममता रखने वाले माता पिता को गोद दे दिए जाते हैं। यहाँ अधिकतम आठ वर्ष तक के बच्चों को रखा जा सकता है। 
केंद्र की आया दीदी से बात करते हुए ऐसे कई बच्चों की लोमहर्षक कहानियाँ सुनीं। कुछ बच्चे विदेशों में भी गॉड दिए जाते हैं। 
पूछने पर कि गोद देने के बाद इन बच्चों की मॉनिटरिंग कैसे की जाती है ? आया दीदी ने बताया कि तीन साल तक हर तीन महीने में उनके घर जाकर देखा जाता  है। उसके बाद बच्चे बड़े हो जाते हैं उन्हें पता न चले कि गोद दिया गया है इसलिए संस्था के पदाधिकारी मेहमान बन कर मिलने जाते रहते हैं। उन्होंने बताया कि कई बच्चे तो बड़े होकर खुद पता लगते हैं कि वे कहाँ से गोद लिए गए हैं और फिर हमारे यहाँ मिलने आते हैं दान और अन्य सेवाएं देते हैं। 
पाँच छह कमरों में बिस्तर पालने किचन सहित सभी व्यवस्था बेहद साफसुथरी थीं। 
मूक बधिर केंद्र पहले सिर्फ ऐसे बच्चों को पढ़ाया जाता था लेकिन अब यहाँ स्पेशल बच्चों को पढ़ने के लिए टीचर्स ट्रेनिंग भी दी जाती है। जो बच्चे सुन नहीं पते उन्हें आवाज़ होते हुए भी बोलने में तकलीफ होती है क्योंकि उच्चारण क्या होते है वे नहीं जानते। इन बच्चों को साइन लेंग्वेज के द्वारा ही पढ़ाया और समझाया जाता है। यहाँ बच्चों के लिए कंप्यूटर लैब क्लास रूम एक्टिविटी रूम सभी हैं।  कुछ कक्षा स्मार्ट क्लास में भी तब्दील की गई हैं। 
बच्चों के कान की जाँच के लिए यहाँ रोज़ शाम शहर के वरिष्ठ नाक कान विशेषज्ञ आते हैं। यह ओ पी डी हैं जहाँ बाहर के अन्य मरीज भी बेहद कम फीस से अपने कान की जाँच करवा सकते हैं।संस्था को कुछ सालों पहले ही सरकारी मदद मिलाना शुरू हुई है इसके अल्वा शहर के दानदाता बड़ी मात्रा में आर्थिक और अन्य मदद देते हैं। मदद के लिए यहाँ संपर्क करके आवश्यक वस्तुओं की सूची प्राप्त की जा सकती है। फिलहाल यहाँ डे स्कूल है लेकिन शीघ्र ही भवन निर्माण करके हॉस्टल भी शुरू करने की योजना है ताकि आसपास के गाँवों कस्बों के मूक बधिर बच्चों को भी पढाई की सुविधा मिल सके। 
संस्था की फाउंडर सदस्य शारदा मंडलोई जी ने बताया कि उनकी टीम शहर में बस्तियों में सर्वे करके मूकबधिर बच्चों को तलाशती है और उनके माता पिता को बच्चों का इलाज करवाने और स्कूल भेजने को प्रेरित करती है। बहुत गरीब बच्चों की फीस माफ़ कर दी जाती है अन्य बच्चों की फीस भी काफी कम है। किसी बच्चे की साल भर की फीस की जिम्मेदारी लेकर भी मदद की जा सकती है। 
बच्चों के इलाज के बारे में बताते हुए कोर्डिनेटर यादव जी ने बताया कि एक कॉक्लियर इम्प्लांट करवाने में पाँच से सात लाख का खर्चा आता है फिर इसे रखने का बॉक्स ही ८०० रुपये का होता है जो हर महीने बदलना पड़ता है। बैटरी की कीमत लगभग पाँच लहज होती है और पोस्ट केयर खर्च भी लाखों का आता है। इस तरह जीवन भर का खर्च बीस से पच्चीस लाख तक होता है। 
वामा क्लब के लिए इन बच्चों ने सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ दीं। यह आश्चर्यजनक था कि जो बच्चे सुन नहीं सकते वे संगीत की हर टाक के साथ न सिर्फ थिरक रहे थे बल्कि उनका आपसी सामंजस्य भी कमाल का था। उनकी टीचर सामने से उन्हें स्टेप्स के एक्शन दे रही थीं और वे एक दूसरे को देखे बिना बस अपने में मगन नृत्य का आनंद ले रहे थे। उनके टीचर्स ने बताया कि जब एक गुण कम होता है तो डी अन्य गुण अधिक सशक्त होता है। बच्चों के साथ क्लब की सदस्यों ने पिक्चर चेयर रेस और क्विज खेले और विजेताओं को पुरुस्कार बाँटे। 
संस्था की एक वरिष्ठ सदस्य इन बच्चों की सिलाई कढ़ाई बुनाई भी सिखाती हैं। छोटे बच्चों के स्वेटर नैपकिन कम्बल आदि का स्टॉल यहाँ लगाया गया था और सदस्यों ने जैम कर इन सामानों की खरीदी की। 
रोजमर्रा की जिंदगी से अलग हट कर एक दिन इन स्पेशल बच्चों के साथ बिता कर यह एहसास होता है कि अपनी कमजोरियों को अपनी शक्ति बना कर कितने आसानी से खुश रहा जा सकता है। 
कविता वर्मा 

Saturday, September 29, 2018

समीक्षा किसी और देश में

विनय कुमार जी से पहचान फेसबुक के माध्यम से ही हुई। उनके बनाये लघुकथा समूह नया लेखन नए दस्तख़त ने लघुकथा की बारीकियां सिखाई तो नियमित लिखना भी सिखाया। आपके बारे में जानने पर अचम्भा हुआ कि दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए भी भारत उनमें धड़कता है। उनकी पोस्ट से भारतीय जीवन संस्कृति आचार विचार के साथ साथ खेती किसानी तीज त्यौहार नदी प्रकृति के प्रति प्रेम और चिंता सभी प्रकट होते हैं। चीज़ों को देखने की उनकी दृष्टी सहज सरल होते हुए बेहद सुलझी हुई है और कई बार हैरान करती है। हिन्दी भाषा के प्रति उनके प्रेम ने दक्षिण अफ्रीका में भी इसके प्रचार प्रसार की राह खोज ली। हाल ही में उनका एक लघुकथा कहानी संग्रह 'किसी और देश में ' दक्षिण अफ्रीका से प्रकाशित हुआ है। 

किसी और देश में 
किसी और देश में विनय कुमार जी का लघुकथा कहानी संग्रह है जिसमे छोटी बड़ी कई कहानियाँ शामिल हैं। संग्रह की पहली कहानी शीर्षक कहानी 'किसी और देश में ' विदेशों की मंहगी पढाई  कर्ज को उतारने के बाद बच्चों का पैसों की चकाचौंध के लिए विदेशों में बस जाने की मार्मिक कथा है। यह कथा पीछे असहाय माता पिता की पीड़ा छोड़ जाती है। 
लड़कियाँ सबके लिए सहज ही एक ममत्व भाव सहेजे होती हैं और इसी भाव को व्यक्त करती कथा है बेटियाँ जो अनायास आँखें नम कर देती है। 
दूसरों के कृत्य पर नाक भौं सिकोड़ने वाले जब खुद वही करते हैं तो कोई सरलता से उन्हें अपनी गलती का एहसास करवा देता है। तमाचा बेहद अच्छी पंच लाइन के साथ चुस्त लघुकथा है। 
महिलाओं और पुरुषों के लिए समाज ने दोहरे मापदंड तय कर लिए हैं। इन्हीं पर करारा प्रहार करती लघुकथा इज्जत दो तीखे मोड़ लेकर चकित करती है।वहीँ फर्क लघुकथा इस मापदंड को स्वर देती है।  
श्राद्ध और प्रायश्चित जीते जी इंसान को तरसाने के बाद उसके मरने पर धूमधाम से श्राद्ध करने की कुसंस्कृति पर प्रहार करती है। 
'उदासी' यूँ तो अपने दुःख को छुपा कर दूसरों के सामने हँसने की कथा है लेकिन इसमें एक सच्चे दोस्त के द्वारा छुपे दुःख को पहचान लेने की दिल छूती भावना है। 
ईमान लघुकथा वंचितों की ईमानदारी बचाने की सामाजिक जिम्मेदारी को  अच्छी कथा है। हालाँकि इसे एक और ड्राफ्ट की जरूरत भी महसूस हुई। 
लेखन में लगातार आगे बढ़ते कई बार असंभव आदर्श सिर उठाने लगते हैं लेकिन संकल्प लघुकथा एक टीस छोड़ते हुए व्यावहारिक रास्ता अख्तियार करती है। 
कुछ लघुकथाएं बेहद चौंकाती हैं। ये सरल लेकिन मनोवैज्ञानिक सजगता से लिखी गई कथाएं हैं। बदलाव , बदलते रिश्ते , स्टोरी, यकीन ,परिपक्वता, गुलाल के रंग   ऐसी ही लघुकथाएं हैं जिनके बारे में कुछ भी कहने से बेहतर है पढ़ना होगा। 
राजनीति और धर्म एक मेहनत मजदूरी करने वाले व्यक्ति के लिए शतरंज की ऐसी बिसात होते हैं जिसमे शह और मात का उसके लिए कोई अर्थ नहीं रहता। उसे तो हर हालत में हारना ही है।  
स्वच्छता अभियान का जो मनोवैज्ञानिक प्रभाव लोगों पर पड़ा है उसके चलते सफाई कर्मियों के काम को सम्मान मिलने लगा है जो कि एक अच्छी बात है कुछ ऐसे भी भाव है लघुकथा सम्मान में। कह सकते है कि विनय जी की लेखनी समसामयिक मुद्दों पर तो बड़ी सजगता से चली है साथ ही समाज के सकारात्मक बदलाव को उन्होंने अपने लेखन में शामिल करते हुए देश की छवि को 'किसी और देश में 'निखारा है।
कामयाबी का सेहरा अपने और अपनों के सिर पर तो आसानी से बाँधा जाता है लेकिन इससे अलग कुछ लोग बहुत ख़ामोशी से सफलता के पायदानों पर चढ़ने के लिए सहारा देते हैं। ऐसे ही लोगों को पहचानने और सम्मान देने की कथा है नींव। 
बालश्रम ,लड़कियों के प्रति संकुचित नजरिया जैसे ज्वलंत मुद्दों पर भी आपकी लेखनी खूब चली है। 
विकास की दौड़ में उपजाऊ जमीन के अधिग्रहण से उपजी निराशा का चित्र करती है लघुकथा वचन। 

इस संग्रह में लघुकथाओं के साथ कुछ कहानियाँ भी हैं। 'कसूर' इकलौती बेटी के प्रति पिता के प्रेम की अनूठी कहानी है जो विपरीत हालात में बेटी के अधूरे काम को पूरा करने का बीड़ा उठाता है। 
'घर वापसी' धर्म और राजनीति के खेल में पिसती तो आम जनता है इसी भाव को उकेरती है यह कहानी। विनय जी की कहानियों में भाषा सरल सहज और प्रवाहमय है। शब्दों का चयन खूबसूरती से किया गया है। किसी और देश में अपने देश की समस्या संस्कृति राजनीति भावनाओं को इस खूबी से उभारने के लिए आपको बहुत बहुत बधाई। 
कविता वर्मा 

 

Monday, July 23, 2018

आँखों की गुस्ताखियाँ

बात सन 87 की है। पंजाब के बाद इंदिरा जी की हत्या और उसके बाद दिल्ली पंजाब और आसपास का इलाका बेहद अस्थिर दौर से गुजर रहा था। उसी समय हमारा वैष्णोदेवी श्रीनगर बद्रीनाथ केदारनाथ गंगोत्री और यमुनोत्री जाने का कार्यक्रम बना। लगभग एक महीने का टूर था मम्मी पापा दोनों भाई मैं हमारी फिएट कार से एक ड्राइवर को लेकर बैतूल से निकल पड़े।
ग्वालियर आनंद होते हुए दिल्ली पहुंचना था और एक परिचित ने बहुत जोर देकर कहा था कि आप वहाँ हमारी बहन के घर ही ठहरें। वह मोबाइल गूगल का जमाना नहीं था और एक कागज पर लिखा पता लेकर जब हम दिल्ली शहर में प्रविष्ट हुए तो माहौल भयावह था। सड़क के दोनों ओर दो पांच सौ मीटर की दूरी पर रेत की बोरियों के पीछे सैनिक मशीनगन लिये मोर्चा संभाले खड़े थे। सड़क पर पुलिस थी किसी भी गाड़ी को रुकने नहीं दिया जा रहा था और हमें तो जगह जगह रास्ता पूछना था।
कहीं पुलिस वालों से तो कहीं रास्ते चलते लोगों से रास्ता पूछते हम दिशा भ्रमित से चले जा रहे थे। सांझ घिर आई थी पीली रौशनी फेंकते हैलोजन माहौल को और भयावह सा बना रहे थे। हर कोई और आगे और आगे ही बताता जा रहा था। कहीं कोई पीसीओ भी नहीं दिख रहा था।
एक जगह अंदर जाती सड़क के किनारे खड़े चार पाँच लडकों से पापाजी ने रास्ता पूछा तो उन्होंने मेन रोड से अंदर जाती सड़क की ओर इशारा करते हुए वहाँ जाने को कहा। मैं पीछे खिड़की के पास बैठी थी और तभी मैंने उन लडकों को एक दूसरे को आंखों में इशारा करते और आंख मारते देखा।
ड्राइवर गाड़ी मोडता इससे पहले ही मैंने जोर देकर कहा "नहीं पापाजी मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा है आप मेन रोड मत छोडो और सीधे चलो किसी पुलिस वाले से रास्ता पूछेंगे।
पापाजी ने मेरी बात मान कर मेन रोड पर ही चलने का फैसला किया और आगे जाकर चौराहे पर खड़े पुलिस वालों से पता पूछा। वो लोग भी सही पता नहीं जानते थे तब उनसे पूछा कि पीछे कुछ लड़के अंदर की रोड पर बता रहे थे। तब वह बोला अंदर कहाँ साहब वहाँ तो कर्फ्यू लगा है देखते ही गोली मारने का आदेश दिया गया है।
दिल्ली के उन लडकों की आंखों की उस हरकत ने हमें बहुत बड़ी मुसीबत से बचा लिया था।

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आंखें वाकई मासूम होती हैं और अपनी हरकतों से गाहे-बगाहे मासूमों को फंसने से बचा लेती हैं।
कविता वर्मा 

पोर्टब्लेयर डायरी 3

3)  # पोर्टब्लेयर   # portblair   # andmannicobar दूर तक फैले नीले समुद्र में अपना अक्स देखता नीला आसमान हरे भरे घने पेड़ों से भरे भरे टा...