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Thursday, November 10, 2016

आपको पता है जंगल में भूत है।


सिक्किम यात्रा ( वो जो हमारी मदद करते रहे )

वैसे तो यात्रा के दौरान बहुत लोगों से साबका पड़ता है ये लोग ख़ामोशी से हमारे आस पास बने रहते हैं जिन्हें हम देख कर भी नज़र अंदाज कर देते हैं या एक व्यावसायिक सा भाव होता है कि उनकी सेवाओं के बदले पैसा तो दिया है। सभी पैसों के लिए काम करते है ये भी कर रहे हैं तो इसमें क्या खास है? अगर कभी जितना पैसा दिया उसके बदले कितनी मेह्नत कितनी ईमानदारी और मुस्तैदी दिखी इसका आकलन किया जाये काम करने की परिस्थियों पर ध्यान दिया जाये तो दिल उन सेवाओं का मोल समझ उनके सामने कृतज्ञ हो जाता है। कभी कभी ऐसा भी होता है कि हम सेवाओं से संतुष्ट नहीं होते या लगता है पैसे का पूरा मोल नहीं वसूल हुआ लेकिन उसके कारण अच्छे  ईमानदार और मेहनती लोगों का जिक्र ना किया जाये यह भी ठीक नहीं। 

उत्तरी सिक्किम जिला मंगन जाते हुए रास्ते में गाड़ी रुकी नामोक में। दो मंजिला पक्का मकान पहली मंजिल की बालकनी और मुख्य प्रवेश द्वार पर लगे फूलों के गमले। अंदर एक बड़ा सा हाल जिसमें टेबल कुर्सी लगी थीं। हाल के बीच से एक दरवाजा जिसके एक तरफ किचन और दूसरी तरफ एक कमरा जिसमे कई बोरे कनस्तर रखे थे। वहाँ भी एक दो बेंच लगी थीं। भूख जोर से लगी थी मैं सीधे किचन में चली गई। अंदर मध्यम वय की एक महिला और 20 /22 साल की एक लड़की थी। एक तरफ चूल्हा जल रहा था जो थोड़ा ऊँचा था और एक दिवार से अलग किया गया था जिस पर एक देगची रखी थी। बगल में मोरी में जूठे बर्तनों का ढेर लगा था। शेष दो तरफ टेबल और प्लेटफार्म पर बरतन प्लेट्स रखे थे। एक पारंपरिक रसोई का नज़ारा जो कई सालों बाद देखा। 
"हैलो क्या बनाया है जोर से भूख लगी है ?"मैंने कहा। 
"चिकन राईस " जवाब आया और मेरा मुँह खुला रह गया। 
"ओ लेकिन हम तो वेज हैं " धड़कते दिल से मैंने कहा आसपास और कोई होटल दुकान नहीं थी यह आते हुए देख चुकी थी। 
"आपको वेज मिल जायेगा दाल चावल और आलू की सब्जी " अब तक वो लोग भी अचानक हुई इस घुसपैठ से सहज हो चुकी थीं। 
मैंने राहत की साँस ली शुक्र है अब भूखे नहीं रहना पड़ेगा। "फिर ठीक है पर हम बहुत सारा खाने वाले हैं। "
"आप पेट भर कर खाइये बहुत सारा बना है। " 
"मैं कुछ मदद करूँ ?" उन दोनों के सिवाय वहाँ और कोई नहीं था हम दस पर्यटक और ड्राइवर कुल ग्यारह लोग और वे दो। 
"बस सब हो गया खाना लगा ही रहे हैं। "
मैं बाहर आ गई हर टेबल पर एक एक पानी की बोतल और अचार रखा था। सबसे पहले उन्होंने हमें प्लेट्स दीं हम ही दो वेज वाले थे। नॉन वेज के साथ शायद चम्मच नहीं दी जाती हमारी प्लेट्स में भी चम्मच नहीं थीं। मैं फिर अंदर गई चम्मच लेने। दोनों माँ बेटी एकदम शांति से अपने काम में लगी थीं। दाल चावल आलू की सब्जी और एक लोकल फली की सब्जी। खाना सादा और स्वादिष्ट था और वो पूछ पूछ कर परोसती रहीं। खाना खा कर मैंने सभी प्लेट्स कटोरियाँ एक दूसरे में रख कर इकठ्ठे कर दीं। पानी के लिए बोतल थीं गिलास नहीं थे। अनावश्यक बरतन नहीं निकाले जाते। जब मैं थैंक्यू कहने वापस अंदर गई बेटी बरतन साफ कर रही थी और माँ सामान समेट रही थी। मैंने पूछा रोज़ कितनी गाड़ियाँ आती हैं आपके यहाँ। 
चालीस पचास जवाब मिला। 
मतलब चार पाँच सौ लोगों का खाना रोज़ और सारा काम हाथ से। तब तक एक छोटी लड़की स्कूल से वापस आ गई मैंने एक दो फोटो खींचे और बाहर आ गई। आसपास एक दो मकान और थे ऊपरी मंजिल पर रुकने के लिए कमरे थे। ड्राइवर से पूछा खाने की जगह फिक्स रहती हैं ? उसने कहा हाँ सुबह फोन पर बता देते हैं। 

***
उत्तरी सिक्किम के लाचुंग में एक अति साधारण होटल था हम पहुंचे भी काफी रात में थे और ठण्ड भी बहुत थी। पैकेज टूर था और बुकिंग करने वाले गंगटोक में थे इसलिए कुछ कहने सुनने का कोई फायदा भी नहीं था। इतने सघन जंगल में सुदूर पहाड़ों के बीच इतने लोग रहते हैं यही अचरज वाली बात थी। चलने के पहले ही बोल दिया गया था सामान्य सुविधा होंगी इसलिए मानसिक रूप से भी सब तैयार थे। यहाँ भी खाने में चिकन राईस था। होटल के दूसरे कमरों में और लोग भी ठहरे थे। काम करने वाला सोलह सत्रह साल का  एक लड़का ही दिखा। वही दौड़ दौड़ कर खाना परोस रहा था किसी को पानी दे रहा था जूठे बर्तन उठा रहा था टेबल साफ कर रहा था। हमारे कमरे में पलंग की एक पाटी खिसक गई बड़ी समस्या कि सोयेंगे कैसे ? उससे कहा तो बोला सर और कोई रूम खाली नहीं है मैं सबको खाना खिला दूँ फिर आकर देखता हूँ। हमने थोड़ी देर इंतज़ार किया फिर गद्दे को हटा कर देखा और पाटी ठीक से बैठा दी। ठण्ड बहुत थी हम तो खाना खा कर सो गये वैसे भी दिन भर सफर में थक गए थे और सुबह जल्दी उठना था। वह रात में एक बार चक्कर लगा कर हर कमरे में पूछ कर गया सबने खाना खा लिया न ?
दूसरे दिन सुबह नलों में पानी नहीं आ रहा था फिर उसकी पुकार हुई। अब वह सबको चाय बना कर दे रहा था तो किसी को गर्म पानी की बाल्टी भर के दे रहा था चाय के कप धो रहा था तो लोगों की बातें सुन उनका समाधान भी कर रहा था। थोड़ी ही देर में सब चले जाने वाले थे उसके बाद उसे खाना बनाना था। जीरो पॉइंट से वापस आकर जब हम खाना खा रहे थे वह परसने आया तब मैंने कहा "कल रात में तुम आये नहीं पलंग देखने ?"
पता नहीं उसके भरे मन को किस भाव  ने छू लिया वह ऐसे बोल पड़ा जैसे सुनने वाला बड़ा संबल मिल गया हो। "मैडम मैं अकेला हूँ यहाँ काम करने वाला खाना बनाना परसना बरतन साफ करना सब अकेले करता हूँ। कल रात में भी बहुत देर हो गई और मैं भूल गया।"
"कोई बात नहीं पलंग की पाटी खिसक गई थी हमने ठीक कर ली थी। "मैंने सहानुभूति पूर्वक कहा तो वह अपनी बात कहने से खुद को रोक नहीं पाया। 
"मैडम अभी आप लोग जाओगे फिर मुझे सारे कमरे साफ करना है। अभी शाम को फिर तीन चार गाड़ियाँ आ रही हैं। फिर तीस चालीस लोगों का खाना बनाना है। मैडम मैं तो तीस तारीख का इंतज़ार कर रहा हूँ जिस दिन ये लोग मेरा हिसाब करेंगे। जिस दिन पैसे मिलेंगे यहाँ से भाग जाऊँगा। "
" मैंने उसे समझाने की कोशिश करते नरमी से कहा "काम में कभी कम ज्यादा होता रहता है क्या कर सकते हैं ?" 
"मैडम गाड़ी भेजते हैं तो काम करने वाले लोग भी तो भेजें मैं अकेले काम कर करके परेशान हो गया हूँ मेरा मन भी नहीं लगता शरीर भी आधा हो गया। अब यहाँ नहीं रुकूँगा पैसा मिलते ही भाग जाऊँगा। "
"कहाँ के रहने वाले हो ?"
"न्यू जलपाई गुड़ी का, मैडम अब घर की याद आती है।"
"चलो अब थोड़े ही दिन की बात है तीस तारीख आने ही वाली है तब तक मन मत ख़राब करो ये समय भी निकल जायेगा। " और क्या कहती उससे इतना बड़ा समझदार भी तो नहीं था बच्चा ही था पता नहीं क्या मजबूरी रही होगी जो इतनी दूर जंगल में पड़ा था काम के लिए। 
उसके बाद और कुछ नहीं खाया गया। जाते जाते उसके हाथ पर कुछ रुपये रखे लेकिन मन उसकी उदासी में अटक गया। 

लाचुंग से जीरो पॉइंट जाते हुए लगभग 26 किलोमीटर दूर युमथुंग में नाश्ते के लिए रुके। दो बहनें दुकान चला रही थीं। सबकी पसंद का नाश्ता पूछना नाश्ता बनाना सर्व करना साथ ही बूट्स हैण्ड ग्लव्स किराये पर देना किसी को कुछ खरीदना हो तो देना पैसों का हिसाब किताब रखना। लौटते हुए बूट्स वापस करने के लिए रुके तब छोटी बहन पीमा (palmu ) थोड़ी फुरसत में थी। उससे बात करने लगी उसने बताया दुकान का मालिक कोई और है वो वहाँ काम करती है छह हजार रुपये महीने की तनख्वा पर। मालिक तो ठीक है उसकी पत्नी थोड़ी टेड़ी है। सामान किराये पर नहीं जाता तो गुस्सा करती है तुम लोग ठीक से बताते नहीं हो। अब क्या हम जबरजस्ती किसी को सामान देगा। ये काम सिर्फ सीजन तक है उसके बाद हम नीचे चले जाते हैं। मालिक उसी समय हिसाब करके पैसे लेकर गया था जो लगभग पाँच हजार रुपये थे अब वह फुरसत में थी। बहुत देर तक उससे बात होती रही। वह बच्चो के बारे में हमारे प्रदेश के बारे में पूछती रही। 

नाथुला पास ले जाने वाला ड्राइवर था रुस्तम खवासी और लाचेन लाचुंग (उत्तर सिक्किम ) के टूर पर ले जाने वाला Tsong Rinsing .दोनों ही बौद्ध थे बड़े शांत काम से काम रखने वाले पर हर जिज्ञासा का बड़े चाव से जवाब देने वाले। सोंग रिन्ज़िंग तो लाचेन का ही रहने वाला था उसके घर के सामने से निकले तो उसकी पत्नी और बेटा बाहर खड़े उसका इंतज़ार कर रहे थे। उसने बताया तीन दिन के टूर में एक दिन घर आने को मिलता है। बर्फ गिरने के बाद टूरिस्ट नहीं आते रास्ते बंद हो जाते हैं तब तीन महीने सिर्फ खाना टीवी देखना और मोटे होना होता है। 

***
लाचेन में होटल का रूम बहुत अच्छा था। गुरदुम्बर लेक के लिए रात तीन बजे निकलना था जिसका हमारा मन नहीं हुआ। होटल के मालिक तोशी को बताया तो कहने लगा अगर आप नहीं जा रहे हैं तो मुझे रात में ही बता दें मैं सुबह जल्दी आ जाऊँगा आपके चाय नाश्ते का इंतज़ाम करने। नहीं तो हम दिन में बारह एक बजे तक होटल आते हैं। सुबह तो यहाँ कोई नहीं होता है। जब उसे पता चला कि हम लोग ज्यादा चावल नहीं खाते हमारा मुख्य भोजन रोटी है तो कहने लगा मैं आपके लिए रोटी बनवा लाऊंगा। और सच में सुबह आठ बजे वह सब्जी रोटी के नाश्ते और चाय के साथ हाजिर था। हमें भी करीब एक हफ्ते बाद रोटी मिली थी इसलिए हमने भी टाइम देखे बिना गर्मा गर्म खा ली। 

गंगटोक के होटल में हम चार दिन रुके लेकिन बीच में उत्तर सिक्किम घूमने भी गए तो सामान कमरे तक लाना ले जाना होता रहा। वहाँ एक लड़का था प्रवेश थापा दार्जिलिंग का। बड़ा क्यूट सा हर काम को तत्पर हर वक्त चेहरे पर मुस्कराहट। आखरी दिन हम थके हुए होटल पहुंचे तो उसने पूछा मैडम खाना ? मैंने कहा क्या खिलाओगे ?
आप जो खाना चाहें। 
सब्जी रोटी बना दूँ ? उसे भी पता था हम रोटी खाने वाले लोग हैं। 
मैंने पहले दिन की रोटी याद करते हुए कहा तुम इतनी छोटी छोटी रोटी बनाते हो कि पेट ही नहीं भरता। तो मुस्कुरा के कहने लगा बड़ी रोटी बना देंगे मैडम। 
ठीक है तो बस दाल रोटी खिला दो। ( हरी सब्जी वहाँ बहुत कम मिलती है ) वह बढ़िया गरमा गरम दाल रोटी रूम के साथ लगी बालकनी में टेबल पर लगा गया। 
मैंने उससे पूछा कल सुबह होटल का दरवाजा कौन खोलेगा हमें सुबह जल्दी जाना है?
मैं उठ जाऊँगा मैडम आप मेरा नंबर भी ले लीजिये सुबह एक मिस काल कर दीजियेगा मैं आपके लिए चाय बना दूँगा आपका सामान ले चलूँगा। 
मैंने पूछा प्रवेश कहाँ तक पढ़े हो तो कहने लगा मैडम 12th में बेक आ गई थी तब पढाई छोड़ दी। 
अब आगे नहीं पढ़ना है ?
पढ़ना है मैडम अब यहाँ आने के बाद लगता है पढ़ना चाहिये। 
हम्म पढ़ना तो चाहिए तुम बहुत अच्छे लड़के हो पढ़ो आगे बढ़ो तुम्हे ज्यादा अच्छा काम मिलेगा। 
जाते हुए ऐसा लगा काश कुछ और समय प्रवेश से बात की होती। 

***
लाचेन से लौटते समय रास्ते में रुके सूर्यास्त हो चुका था अँधेरा होने ही वाला था। तीन दिन के इस सफर में कहीं अकेले पैदल चलने का मौका नहीं मिला था अब ये आखरी मौका था सो तुरंत लपक लिया। पति देव को बताया उनकी इच्छा नहीं थी सो अकेले निकल पड़ी। कोई सौ मीटर चली होऊँगी कि सामने से आती सात आठ बरस की एक बच्ची ने रोका ,कोठार जाइबे ? 

मैं अचकचा गई मुझे झिझकता देख उसे तुरंत समझ आया कि मुझे बांगला नहीं आती। तुम कहाँ जाते हो ?उसने मेरी मुश्किल आसान की। 
"घर "
" तुम्हारा घर तो बहुत दूर है इतनी दूर पैदल कैसे जाओगे ?"
"तुम भी तो अपने घर पैदल जा रही हो ना वैसे मैं भी चली जाऊँगी। "
"मेरा घर तो यहीं है वो सामने " उसने इशारे से बताया। 
"हाँ तो ठीक है न जैसे तुम पैदल जा रही हो वैसे मैं भी धीरे धीरे चली जाऊँगी। "
उसे समझ आ गया ये ढीठ प्राणी है आसानी से नहीं समझेंगी अब उसने तुरुप का पत्ता चलाया 'तुमको पता है जंगल में भूत है आत्मा है। "उसके साथ  आँखें और हाथ भूत की भयावहता बखान कर रहे थे। 
बात तो बड़ी डरावनी थी मैंने दो मिनिट सोचा उसकी चिंता का ध्यान भी तो रखना था " ठीक है हम उस को भी साथ ले लेंगे वो हमारा कुछ काम करवा देगा। "
"उलटा वो आपसे अपना काम करवाएगा। " वह भी हार मानने वाली नहीं थी। 
"ओह्ह ऐसा चलो ठीक है हम सबका काम करते है उसका भी कर देंगे। "
सच में ये मेरी दुष्टता थी वह छोटी सी अनजान बच्ची मेरी शुभचिंतक और मैं , मुझे तो पैदल चलने की पड़ी थी। अँधेरा घिरता जा रहा था रुक जाती फिर पतिदेव ही न जाने देते और हसरत दिल में रह जाती। 
"अच्छा देखो वो अंकल खड़े हैं न वो पीछे से गाड़ी लेकर आयेंगे और मुझे लेकर जायेंगे ठीक है अब हम जाएँ ? बाय " 
इतनी बड़ी लंबी बात तो उसे समझ नहीं आई पर ये समझ आ गया कि इन अंकल से बात करना चाहिए उन्हें बताना चाहिए कि ये उन्होंने क्या किया। वह पतिदेव के पास पहुंची और बोली "ये जो बेबी हैं वो पैदल क्यों जा रही हैं ?"
"क्योंकि उन्हें पैदल चलना अच्छा लगता है। "
"पर उनका घर तो बहुत दूर है आपने उन्हें क्यों जाने दिया ?"
"वो नहीं मानती कहती हैं पैदल जाएँगी। "
"आपको पता है जंगल में भूत है आत्मा है आपको उन्हें पैदल नहीं जाने देना चाहिए था। "
"क्या करें वो मानती ही नहीं हैं अब हम जायेंगे तो उन्हें गाड़ी में बैठा लेंगे। "
थोड़ी संतुष्ट थोड़ी असंतुष्ट वह चली गई। 
मैं थोड़े आगे बड़ी थी एक गाड़ी मेरे पास आकर रुकी ड्राइवर ने पूछा "मैडम आपका गाड़ी पीछे आ रहा है ना ?" 
"हाँ हाँ मेरा गाड़ी आ रहा है। "
ऐसे चिंता करने वाले ऐसी मदद करने वाले लोग जहाँ हों वहाँ घूमना कितना भला लगा होगा आप सोचिये। उस समय तो मैं यह सोच रही थी कि अभी एक हफ्ता तो भाषा सुधरने में लगेगा। 
क्रमशः 
कविता वर्मा 

Monday, November 7, 2016

जिंदगी भर कमाओ और मरने के लिये बचाओ

सिक्किम यात्रा (नाथुला पास ) 

 नाथुला पास वाले ट्रिप में तीन ही पॉइंट्स होते हैं छंगू लेक नाथुला पास और बाबा मंदिर।  अब वापसी का समय था। मौसम बहुत ठंडा हो गया था। सेना के कैंटीन की चाय समोसे जम चुके थे। ठंडी हवा हड्डियों को भी जमा चुकी थी।  दरअसल गंगटोक दिन में पहुँचे थे तब मौसम गरम था शाम को थोड़ी ठण्ड हो गई थी और हम उसी हिसाब से साधारण ठण्ड  के कपडे पहने थे जो अब और गरम रखने में असमर्थ साबित हो रहे थे। 
वापसी का सफर शुरू हो गया थोड़ी ही देर बाद गाड़ी फिर रुक गई चाय नाश्ते के लिये। हमारा पेट तो भरा ही था और ज्यादा चाय पीने की आदत नहीं है इसलिए हमने फिर कदमताल करने का विचार बना लिया। ड्राइवर को बताया और निकल पड़े। रास्ता उतार का था तो मेहनत भी नहीं करना पड़ रही थी और मज़ा भी आ रहा था। शहर में गाड़ियों की भीड़ से त्रस्त लोगों के लिए खाली साफ सुथरी सड़कें किसी वरदान से कम नहीं लगतीं। 
तभी एक गाड़ी पास आकर रुकी ड्राइवर ने कहा आगे मिलिट्री एरिया है वहाँ की फोटो ना खींचें। सच अभिभूत हो गई स्थानीय लोगों की अपनी सामाजिक जिम्मेदारी के प्रति सजगता देखकर। अगर यही सजगता हर प्रदेश में हर नागरिक में हो तो देश की आधी से ज्यादा समस्याएं खुद बखुद ख़त्म हो जाएँ। हमने भी अच्छे नागरिक होने की जिम्मेदारी समझी और कैमरा अंदर रख दिया। चलते चलते गर्मी आ गई थी और रुकने का मन ही नहीं हो रहा था कब डेढ़ दो किलोमीटर तय कर लिए पता ही नहीं चला जब हमारी गाड़ी आकर रुकी तो ड्राइवर ने पूछा बैठोगे या पैदल ही आ जाओगे ? मन तो वाकई नहीं था गाड़ी में बैठने का पर पचास किलोमीटर चलने की हिम्मत भी नहीं थी। 
रास्ते में फिर छंगू झील के पास से निकले पानी को बादलों ने ढँक लिया था। अब चढ़ाई शुरू हो गई और थोड़ी ही देर में हम बादलों के बीच से गुजर रहे थे। ट्रेकिंग की भाषा में इसे व्हाइट आउट होना कहते हैं जिसमे आप बादलों से इस तरह घिरे हों कि आगे पाँच दस किलोमीटर भी न दिखे। उस समय यही हाल था सड़क किस ओर मुड़ रही है यह भी नहीं दिख रहा था घाटी बादलों से भर गई थी लेकिन गाड़ी उसी रफ़्तार से चल रही थी। ये तो मानना पड़ेगा वहाँ ड्राइवर्स बेहद एक्सपर्ट हैं। बिना हॉर्न टेड़े मेढे संकरे रास्ते पर गाड़ी चलाना ओवरटेक करने साइड देने में नियमों का पालन करना। ये तो बाद में पता चला कि तय समय में मिलिट्री एरिया से बाहर नहीं आने पर ड्राइवर पर पाँच हजार का जुर्माना होता है। 
थोड़ा और नीचे उतर आये थे व्हाइट आउट ख़त्म हो गया अब आपस में बातें शुरू हुई। चार अलग अलग प्रदेशों से आये दस लोग अब एक मित्र मंडली से हो गए थे। 
मैंने ड्राइवर रुस्तम खवासी से पूछा इस रास्ते पर कभी कोई हादसा हुआ है जैसे गाड़ियों की टक्कर या कोई गाड़ी खाई में गिरी हो ? 
ऐसा तो कुछ नहीं हुआ लेकिन 2011 की बात है मैं टूरिस्ट लेकर नाथुला पास आया था आठ टूरिस्ट को लेकर आया था वो साउथ के थे उन्हें मेरी भाषा समझ नहीं आती थी। कुछ कुछ समझते थे तो मानते नहीं थे। घूमने आये हैं तो पूरा पैसा वसूल कर लें। 
उस दिन मौसम अजीब हो चला था बाबा मंदिर पर मैंने कहा जल्दी करो वो नहीं माने। रास्ते में गाड़ी के सामने चट्टान गिरी पीछे देखा तो पीछे भी चट्टान गिरी थी गाड़ी बीच में फंस गई। थोड़ी देर में अंधेरा हो गया गंगटोक शहर की लाइट बंद थी। न कोई आर्मी का ट्रक न जवान कुछ समझ नहीं आया क्या हुआ। सारी रात गाड़ी में बैठे रहे टूरिस्ट रोते रहे। सुबह सात बजे सबको गाड़ी से निकाला चारों तरफ पहाड़ गिरे हुए थे रास्ते बंद थे। पैदल चलना शुरू किया और शाम को सात बजे सभी के साथ गंगटोक पहुंचे तब पता चला भूकंप आया है और बहुत लोग मारे गये हैं। 2011 के उस भूकंप के निशान बाद में भी सिक्किम में कई जगह देखने को मिले। 
पहाड़ों पर कई जगह रंगबिरंगी झंडियाँ लगी थीं जो बौद्ध मतावलंबी लगाते हैं। इन झंडियों पर मंत्र लिखे होते हैं और मान्यता है कि जब ये हवा से लहराते है मंत्र भी हवा की लहरों पर सवार हो दूर दूर तक पहुँचते हैं। एक पहाड़ पर एक कतार में सफ़ेद झंडे लगे थे। पता चला जब किसी की मृत्यु हो जाती है उसके नाम पर उसके परिवार वाले 108 सफ़ेद झड़े लगाते हैं इन पर भी मंत्र लिखे होते हैं और ये मृत आत्मा की शांति के लिये हैं। रंगीन झंडियां घर की शांति के लिए लगाई जाती हैं। मैंने पूछा बौद्ध धर्म में मृतक का अंतिम संस्कार कैसे होता है ? दाह संस्कार ही होता है पर बौद्ध धर्म में मरना बहुत मंहगा होता है। मरने के समय के अनुसार साइत देखी जाती है उसके अनुसार निर्णय होता है कि संस्कार कितने दिन बाद होगा। तीन पांच सात ग्यारह दिन बाद या कभी कभी कभी तो महीने भर बाद। तब तक शव घर में रहता है और बौद्ध भिक्षु को रोज़ बुलाकर मंत्र पाठ करवाया जाता है। दो से पाँच सात भिक्षु रोज़ आते हैं एक भिक्षु का एक दिन का खर्च दो से पांच हजार तक होता है। बौद्ध धर्म में मरने का खर्च बहुत होता है। मैंने कहा इसका मतलब है जिंदगी भर कमाओ और अपने मरने के लिये जमा करो। 
हाँ शादी का खर्च ज्यादा नहीं होता। शादी घर में या मोनेस्ट्री में हो जाती है। कोई जब तक साथ रहना चाहे ठीक है नहीं तो अपना साथी बदल ले या अलग हो जाये। 
दिसंबर में सिक्किम में बौद्ध उत्सव होता है जिसमे याक का गोश्त और वहाँ के अन्य व्यंजन बनते हैं। स्थानीय रहवासी हिंदी इंग्लिश बंगाली भूटिया भाषा बोलते और समझते हैं। 
एक बड़ी दिलचस्प चीज़ हर गाड़ी में देखी। गाड़ी के डेश बोर्ड पर बौद्ध हनुमान शंकर या किसी अन्य देवी देवता की मूर्ती हो उसमे एक या दो नोट (रुपये ) फंसा कर रखते हैं शायद मान्यता हो रूपया रूपये को खींचता है। खैर मैंने पूछा नहीं कभी कभी आस्थाओं की व्याख्या ना करना ना पूछना ही ठीक होता है। 
शाम साढ़े पाँच तक हम लोग गंगटोक वापस पहुँच गये थे। इतने जल्दी होटल जा कर भी क्या करते तो टहलते हुए एम जी रोड चले गये। नाथुला पास एक यादगार सफर की यादों को संजोते हुए देर तक माल रोड की रौनक देखते रहे। 
कविता वर्मा 
क्रमशः 

Saturday, November 5, 2016

ललचाता झरने का ठंडा ठंडा पानी

(9th day )नाथुला पास।  

अगले दिन सुबह नाथुला पास जाना था भारत चाइना बॉर्डर जो पूर्व सिक्किम गंगटोक जिले में पड़ती है। गंगटोक से 80 किलो मीटर दूर लगभग 14140 फ़ीट की ऊंचाई पर है जहाँ जाने के लिये शेयर्ड टैक्सी भी मिलती हैं और प्राइवेट टैक्सी भी। लगभग हर होटल में टूरिस्ट एजेंसी के एजेंट मौजूद होते हैं जो बुकिंग करते हैं। बुकिंग के साथ ही दो फोटो और पहचान पत्र की एक कॉपी देना होती है। वहाँ जाने के लिए पहले परमिट बनवाना पड़ता है जो एजेंट करवा देते हैं। 
गंगटोक का टैक्सी स्टैंड जो शहर के बीचों बीच है बहुत ही बढ़िया लगा। कम जगह में बेहतरीन व्यवस्था। यह एक तीन मंजिला टैक्सी स्टैंड है हर मंजिल पर जाने के मेन रोड से अलग अलग रास्ते जो अंदर भी सीढ़ियों से जुड़ा है। हर मंजिल पर एक रेस्टॉरेंट और टॉयलेट। 
परमिट बनते बनते 10 /11 बज ही जाते हैं। साढ़े ग्यारह तक स्टैंड लगभग खाली हो जाता है और लोकल टैक्सी या प्राइवेट गाड़ियों की पार्किंग के काम आता है। शाम को जो टैक्सी जल्दी आती हैं यहीं सवारी उतारती हैं पर रात में यहाँ कोई गाड़ी खड़ी नहीं रहतीं सब अपने मालिक या ड्राइवर के घर के सामने सड़क किनारे लेकिन व्यवस्थित तरीके से खड़ी होती हैं। रात आठ बजे तक हर सड़क के एक किनारे गाड़ियों की कतार मिलती है जो सुबह साढ़े सात बजे तक हटा कर फिर स्टैंड पर पहुँचा दी जाती हैं। गंगटोक में टैक्सी ड्राइवर का पार्किंग सेंस इतना अनुशासित है कि आप प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाते। खास कर विशाल मैदानी इलाकों में रहने वाले जो जगह और पार्किंग की कमी की शिकायत करते हैं पर ना नियमो का पालन करते हैं ना ही अपनी आदतें सुधारते हैं। 

शहरी सीमा पार करते ही गाड़ी खुले पहाड़ी रास्ते पर बढ़ चली। एक ओर आसमान में फख्र से सिर उठाये ऊँचे पहाड़ तो दूसरी ओर अपनी विनम्रता की मिसाल देती गहरी खाईयाँ। पहाड़ों से झरते झरने अपनी ओर ललचा रहे थे। एक चेकपोस्ट पर गाड़ी रुकी तो पानी की बोतल लेने का विचार किया। कीमत तीस रुपये सुन कर रुक गई। मेरा मन तो झरने का शुद्ध शीतल जल पीने का हो रहा था लेकिन उन तक पहुँचना मुश्किल था। फिर सोचा अभी तो आधी बॉटल पानी है जब ज्यादा पैसे देना ही है तो ऊपर ही देंगे इतनी दूर संभालना नहीं पड़ेगा। 
चाय नाश्ते के लिये गाड़ी रुकी तो सामने ही बहुत बड़ा एक झरना था लेकिन बहाव तेज़ और पहुँचने का रास्ता उबड़ खाबड़ इसलिए मन मसोस कर रह जाना पड़ा। अच्छी बात ये है कि पूरे सिक्किम में पेड टॉयलेट हर जगह हैं और उसके अलावा कहीं गाड़ी रोकने से ड्राइवर मना कर देते हैं। अपने टूरिस्ट की बात के ऊपर अपने प्रदेश की साफ सफाई को तरजीह देना बहुत बड़ी बात हैं। वैसे अपवाद सभी जगह देखने को मिलते हैं वही आदत से लाचार लोग।
साफ़ सुथरी सड़कें नीला आसमान मिलिट्री एरिया की सुरक्षा मन मचल ही गया पैदल चलने को। हमने ड्राइवर से कहा हम पैदल चलते हैं आप चलोगे तो रास्ते से हमें ले लेना। ड्राइवर हंसमुख था बोला आप छूट गये तो मेरी जिम्मेदारी नहीं। 
मैंने हँसते हुए कहा "आपने परमिट चेक करवाया था ना आठ लोगों को लेकर आये थे छह को वापस लेकर जाओगे तो सेना आपको पकड़ लेगी कि आपने दो लोगों को बॉर्डर पार करवा दी। " 
थोड़ी दूर ही चले होंगे कि एक और झरना मिल गया यह कम प्रवाह वाला और कुछ आसान पहुँच वाला था। मैंने झट से बॉटल निकली उसमे बचा पानी ख़त्म किया और थोड़ी मशक्कत के बाद पतिदेव बॉटल भर लाये। ठंडा मीठा पानी जो किसी भी कंपनी के पैक पानी को मात करता है। हवा ठंडी थी पर धूप की गुनगुनाहट उसे भला बना रही थी क्यों न हो आखिर प्रकृति के अवयव एक दूसरे के हाथ में हाथ डाले ही चलते हैं। हम लगभग आधे पौन किलोमीटर आ गए थे कई गाड़ियाँ निकलती जा रही थीं और अब हमें डर लगा कहीं सच में हम छूट तो नहीं गये ? वहाँ से कोई खाली गाड़ी कोई टैक्सी भी नहीं मिलने वाली थी सब गिनती के पैसेंजर लेकर आती हैं और किसी के पास खाली सीट नहीं होती। ओवर लोडिंग वहाँ होती नहीं। आगे खड़ी चढ़ाई थी इसलिये अब हम रुक कर अपनी गाड़ी का इंतज़ार करने लगे। 

रास्ते में कई जगह सेना के कैंप हैं जहाँ फोटोग्राफी निषिद्ध है। परमिट चेक करने के लिए गाड़ियों को थोड़ी ज्यादा देर रुकना पड़ता है। पहाड़ों के बीच जहाँ भी थोड़ी जगह थी वहाँ टीन के शेड और बैरक बने थे। गाड़ियाँ हथियार से लैस। कई जगह रास्ते में बोर्ड लगे थे चीनी निगरानी क्षेत्र। गलबंद गरम कपड़ों से लैस जवान मुस्तैदी से अपने काम में जुटे थे। लगातार ठंडी हवाओं ने चेहरे की त्वचा को झुलसा कर काला कर दिया था लेकिन ड्यूटी के आगे इसकी चिंता किसे है ? मैं सोचने लगी जब ये जवान छुट्टी में घर जाते होंगे तब ही शायद ध्यान जाता होगा इस ओर। 

यात्रा का पहला पड़ाव था छंगू लेक (झील ) Tsomgo lake जो 14310 फ़ीट ऊँचाई पर है। पहाड़ों से घिरी इस प्राकृतिक झील तक पहुँचते बादल छाने लगे थे ठण्ड बढ़ गई थी। इतनी ऊंचाई पर पहाड़ों पर वनस्पति कम होने लगी थी। झील को जगह देने के लिए यहाँ पहाड़ पीछे खिसक गए हैं और बीच में झील और पर्यटकों के लिए बड़ी सी जगह छोड़ दी गई है। झील में मछलियाँ हैं और 51 फ़ीट गहरी यह झील ठंडों में पूरी तरह जम जाती है। यहाँ सजे धजे याक लिये स्थानीय रहवासी याक पर फोटो खिंचवाने का आग्रह करते हैं। 
आगे बढते ऊपर हुए बार बार झील दिखती है और हम देखते जाते हैं साफ सुथरे स्थिर पानी पर पहाड़ों का प्रतिबिम्ब मन मोह लेता है। पचास साठ फ़ीट ऊपर से भी उथली सतह के पत्थर दिखते हैं तब अनछुई प्रकृति की सुंदरता गहराई से महसूस होती हैं। 
नाथुला पास करीब आ रहा था ठण्ड बढ़ने लगी थी गाड़ी में भी हाथ में मोबाइल और कैमरे की अनुमति नहीं थी। पास के करीब हर मोड़ पर चार बाय चार के केबिन के बाहर मुस्तैदी से मशीनगन थामे जवान खड़ा था। संभवतः लोगों को फोटो खींचने से रोकने के लिए यह तैनाती थी। यह इलाका चीनी निगरानी क्षेत्र में आता है इसलिए यह सावधानी जरूरी है। 
गाड़ी से उतरते ही ड्राइवर ने कहा अपने मोबाइल कैमरे गाड़ी में छोड़ जाइये जवानों ने देख लिए तो जब्त हो जायेंगे फिर वापस नहीं मिलेंगे। मैंने बैग से सिर्फ पानी की बॉटल निकाली और बैग भी गाड़ी में छोड़ दिया। पार्किंग से लगभग ढाई तीन सौ फ़ीट चल कर बार्डर थी। ठण्ड बहुत बढ़ गई थी बादल आसपास उतर आये थे हवा में ऑक्सीजन की कमी थी। ड्राइवर ने कह दिया था ज्यादा देर मत रुकना नहीं तो तबियत ख़राब हो जाएगी अधिकतम एक घंटे। कई महिलाएं और बच्चे हांफ रहे थे कई अपर्याप्त गरम कपड़ों में थे तो कइयों ने पर्याप्त कपड़ों के बावजूद उन्हें ठीक से नहीं पहना था। जैकेट की जिप खुली थी सिर नहीं ढँका था साँस लेने में तकलीफ के बावजूद लोग बच्चों को चढ़ा रहे थे या उनके मुँह पर स्कार्फ नहीं लपेटा था। 
जहाँ दोनो  देशों के दरवाजे हैं उनके बीच महज पंद्रह बीस फ़ीट की दूरी है इसे देखने के लिए खुली टैरेस जैसी जगह है। टैरेस पर दीवार ऐसी है जैसे दो छतों के बीच दीवार होती है। दो जवान दुश्मन देश पर नज़र रखे तैनात थे तो पाँच छह जवान भारतीय पर्यटकों पर नज़र रखे थे जो किसी न किसी तरह नज़र बचा कर फोटो लेने की फ़िराक में थे। जब वे पकडे जाते अजीब अजीब तर्क देने लगते हम इतनी दूर से इतना खर्च करके आये हैं ,अपने दोस्तों को दिखाने के लिए फोटो चाहिये और कई तो अपने पद पैसे और पहुँच की धौस देने से भी नहीं चूके। जिस ठण्ड में हम बमुश्किल घूम पा रहे थे और एक घंटे बाद वापस चले जाने वाले थे वहाँ उन जवानों की लोगों से बहस मशक्कत देख सिर शर्म से झुक गया। सिविलियन को सिविक सेन्स सीखने की बहुत जरूरत है सिर्फ मंहंगे कपडे जूते गाड़ियाँ इस्तेमाल करने से ही सभ्य नहीं कहलाया जा सकता। पिंक फिल्म की तर्ज पर No को विस्तार से परिभाषित करने की आवश्यकता है। मैंने हंसते हुए एक जवान से कहा जितनी चौकसी आपको दुश्मन देश चीन की नहीं करनी पड़ती उससे ज्यादा तो अपने देश के लोगों की करना पड़ती है। वहाँ दो जवान काफी हैं यहाँ पांच जवान लगे हैं। 
चाइना बॉर्डर में ख़ामोशी छाई थी मैंने वहाँ मौजूद जवान से पूछा चाइनीज़ लोग नहीं आते बॉर्डर देखने ? 
कभी कभी आते है पर सिर्फ 40 /50 लोग ही आते हैं। अब पता नहीं ऐसा कम आकर्षण के कारण है या नीतियों के कारण। 
लगभग चालीस मिनिट में ही ठण्ड से हमारी हालत ख़राब थी। वहीँ दो टेंट में सेना ने मेडिकल हेल्प और कैंटीन बनाया हुआ था। कैंटीन में गरमा गरम कॉफ़ी समोसे और मोमो मिल रहे थे। तीन चार टेबल कुर्सी लगी थीं लोग ठंड से राहत पाते खाते चाय-कॉफी पीते और चल देते। 
सेना का एक जवान बार बार लोगों से आग्रह कर रहा था कि डस्टबिन का उपयोग करें। 
लोग खुद से यह भी नहीं सोच सकते कि इतनी ऊंचाई पर बार्डर पर उनके कप प्लेट उठाने के लिए कौन नौकर लगे होंगे?
गरम कॉफ़ी पी कर थोड़ी राहत मिली हम लोग वापस गाड़ी पर आ गये। अगला पड़ाव था बाबा मंदिर यानि बाबा हरभजन श्रीन का मंदिर। बाबा हरभजन सेना में थे जो रसद ले जाते हुए पहाड़ी झरने में बह गए थे और घटना स्थल से दो किलोमीटर दूर उनका शव मिला। कहते हैं उन्होंने अपने साथियों को सपने में दर्शन दे कर अपने शव की स्थिति बताई थी। सेना ही मंदिर की व्यवस्था देखती है। यहाँ पास की एक पहाड़ी पर एक बड़ी सी शिव प्रतिमा स्थापित है जिसके पीछे बड़ा सा झरना बहता है। पहाड़ों में जो जगह बड़े पास दिखती हैं वो पहुँचने में बड़ी दूर होती हैं। हमने वहाँ जाना कैंसिल किया और ठंडी हवा उतरते बादल के बीच फोटोग्राफी का मज़ा लिया। 
कविता वर्मा 
क्रमशः



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