Wednesday, April 29, 2020

अपने आसपास की बातें करती कहानियाँ

अपने आसपास की बातें करती कहानियाँ
गिरजा कुलश्रेष्ठ जी को उनके ब्लॉग के माध्यम से कई साल पहले से जानती हूँ लेकिन उनसे पहली मुलाकात इसी महीने फरवरी में इंदौर महिला साहित्य समागम में हुई। आपने आपका कहानी संग्रह कर्जा वसूली बहुत प्यार से भेंट किया और उसे तुरंत पढ़ना भी शुरू कर दिया लेकिन बीच-बीच में व्यवधान आते गये और वह टलता गया। तेरह कहानियों का यह संग्रह सन 2018 में बोधि प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है। गिरिजा की लेखनी में एक तरह का ठांठीपन है। अपने कैरियर और मध्यम वर्गीय जीवन से रोजमर्रा की बहुत छोटी छोटी घटनाओं को तीक्ष्ण दृष्टि से देखते हुए आपने कहानियों में ढाला है और अपने पाठकों को हर कहानी से जोड़ लिया है। शिक्षण से जुड़ी गिरिजा जी सरकारी गलियारों की उठापटक से भी वाकिफ हैं और उसमें सामान्य आदमी को परेशान करने के तौर तरीकों से भी। ये ऐसी दुनिया है जहाँ आप गलत को देखते समझते भी गलत नहीं कह पाते और इसे कहानी में ढाल कर दुनिया को दिखाना सबसे बेहतर तरीका है जो गिरिजा जी ने अपनाया है।

कहानियों की बात करूँ तो संग्रह की पहली कहानी अपने अपने कारावास एक ऐसी लड़की की कहानी है जो म्यूजिक सीखना चाहती है। शादी के पहले उसके शौक को कोई तवज्जो नहीं दी जाती और शादी के बाद घर गृहस्थी के जंजाल में भी उसमें सीखने की ललक तो रहती है लेकिन क्या वह सीख पाती है यह उत्सुकता पाठकों के मन में अंत तक बनी रहती है। यह कहानी एक इच्छा के जीवित रहने की कहानी है।
साहब के यहाँ तो सरकारी कार्यालयों में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के इर्द-गिर्द घूमती यह कहानी उनके मौज मजे को दिखाते हुए एक मोड़ लेती है और अंत में जिसे मौज समझा जा रहा था उसकी हकीकत कुछ और ही निकलती है। कहानी में पात्रों के संवाद बुंदेलखंडी बोली में होने से कहानी का प्रभाव बढ जाता है।
शपथ-पत्र कहानी भी सरकारी कार्यालयों की कार्य प्रणाली को उजागर करती है।
कर्जा वसूली शीर्षक कथा गांव देहातों में साहूकारों के शोषण से इतर एक साहूकार की कहानी है। ऐसी कहानियाँ सिक्के का दूसरा पहलू उजागर करती हैं जो बरसों से अंधकार में गुम था।
उसके लायक कहानी एक सामान्य शक्ल सूरत की लड़की की कहानी है जो पढ़ना चाहती है लेकिन हमारे समाज में गुणों के बजाय रूप को किसी के सम्मान का मापक समझा जाता है। एक आम मानसिक धारणा पर प्रहार करती यह कहानी भी अच्छी बन पड़ी है हालांकि अंत के पहले कुछ कुछ अंदाजा हो जाता है कि कहानी किस ओर मुडेगी।
व्यर्थ ही एक छोटी कहानी है जो परिवारों में लेन देन की परंपराओं की मानसिक यंत्रणा को दर्शाती हैं।
पियक्कड ब्लण्डर मिस्टेक नामुराद पहली रचना कहानियाँ अपने आसपास से उठाई गई हैं। ये कहानियां समाज सरकारी विभागों के चलन की कहानियाँ हैं जो अपने प्रवाह से बांधे रखती हैं।
बोधि प्रकाशन से आये इस संग्रह की प्रिंटिंग और प्रूफ रीडिंग बेहतर है कवर पेज आकर्षक है। गिरिजा जी को इस संग्रह के लिए बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं ।

कर्जा वसूली
गिरिजा कुलश्रेष्ठ
बोधि प्रकाशन
मूल्य 175 /-

Monday, April 6, 2020

क्या है यह पंथ और वाद

बहुत दिनों से कई बातें दिमाग में उमड़ घुमड रही हैं आज कुछ कहना चाहती हूँ।

लाॅकडाउन शुरू होने के दूसरे ही दिन बेटी ने धीमे स्वर में बताया कि उसकी रूममेट बहुत पैनिक हो रही है कि कहीं उसे या परिवार में किसी को हो गया तो वे लोग आपस में मिल भी नहीं पाएंगे। सुनकर चिंता हुई जबकि जानती हूँ कि वह मानसिक रूप से बहुत स्ट्रांग है लेकिन जब चौबीस घंटे साथ रहने वाले का चित्त अस्थिर हो तो खुद को स्थिर रख पाना भी मुश्किल हो जाता है। उससे यही कहा कि काम के बीच भी उसे कंपनी देना म्यूजिक मूवी बातचीत करते रहना उसे सपोर्ट करना इस वक्त की जरूरत है।
बड़ी बेटी ने वियतनाम यात्रा की बुकिंग की तब कोरोना शुरू ही हुआ था और इसका कोई इलाज नहीं था। चीन से भयानक खबरें आ रही थीं। हम लोग उसे एक दो दिन में एकाध खबर की फोटो भेज रहे थे। मन ही मन मना रहे थे कि भारत सरकार ही सभी उड़ाने बंद कर दे या वीजा रद्द हो जाये लेकिन उससे नहीं कहा क्योंकि अगर वह जा रही है तो मन में आशंका लेकर न जाये। उसका मनोबल बनाए रखना जरूरी था ताकि वह ट्रिप एंजॉय करे और हर स्थिति का स्थिर मानसिकता के साथ सामना भी करे। जब वह वापस आई उसने स्टाफ बस लेना बंद कर खुद की कार से जाना शुरू किया ताकि कलीग के संपर्क में न आये और आफिस में भी सबसे दूरी बना कर रखी।

कोरोना वायरस के साथ ही व्हाट्स अप फेसबुक पर इससे निपटने के कई उपाय आये कपूर धूप-बत्ती काढ़ा दवाइयाँ वगैरह वगैरह। हमारे परिवार के ग्रुप पर भी बहुत सारे मैसेज आये मैंने शायद ही कोई पूरा पढा या देखा हो लेकिन कभी किसी को नहीं कहा कि ये सब बकवास है और इनका कोई फायदा नहीं है। कारण यह था कि धूप-दीप या काढ़ा पीने से  किसी का कोई नुकसान नहीं हो रहा था लेकिन अगर यह सब करने से उन्हें यह विश्वास होता है कि वे स्वस्थ रह सकते हैं तो यह विश्वास बनाये रखने में कोई अड़चन डालना ठीक नहीं है। फिर किसी भी काढे में कोई हानिकारक वस्तु का उपयोग नहीं है वही सब चीजें हैं जो सदियों से उपयोग की जा रही हैं।

इसके बाद देश में घटनाओं की बाढ़ आ गई इंदौर में जुलूस दिल्ली में लाखों लोगों का पलायन तबलीगी जमात हर घटना के साथ आक्रोश भी था बेबसी भी थी और यह उन लोगों की ज्यादा थी जो खुद को घरों में कैद किये हुए थे।
मुझे याद है जब हम कामाख्या देवी के दर्शन करने गये। किसी पंडित को दक्षिणा देकर पंद्रह बीस मिनट में दर्शन कर लेते लेकिन मेरी ही जिद थी कि लाइन में लगते हैं। वहाँ लाइन के लिये पच्चीस तीस फीट की बेंचो को जाली से घेर पिंजरा सा बनाया गया था। लगभग तीन घंटे बाद उसमें बैठे घुटन होने लगी और मैं दर्शन छोड़ कर बाहर आ गई। मुझे बचपन से ही अकेले रहने की आदत है और अभी भी मैं कई दिनों तक अकेले रहती हूँ लेकिन वह तीन घंटे बंद रहने का अहसास असहनीय था। ऐसे में वे लाखों लोग जो अकेले नहीं रह सकते या रहे हैं उनकी स्थिति समझ सकती हूँ। इस अवसाद को तोड़ने या जमीनी काम वालों को धन्यवाद करने के लिए जब थाली ताली बजाने की बात हुई तब भी इसके विरोध के नाम पर लोगों का मनोबल तोड़ने की कोशिश की गई। पता नहीं किसी के थाली बजाने से किसी व्यक्ति के पास धन्यवाद पहुंचा या नहीं लेकिन अडोसी पडोसियों ने एक-दूसरे की सूरत देखी और साथ के अहसास के साथ उनके अगले कुछ घंटे बेहतर गुजरे।
सेनेटाइजर कहीं नहीं मिला तभी एक ग्रुप पर मुफ्त सेनेटाइजर वितरित करने की बात हुई और मैंने कहा कि कितने का है कीमत लेकर मुझे भी दो दीजियेगा। तब किसी ने कहा कि मुफ्त मिल रहा है तो पैसे क्यों देना और मैंने कहा कि जो नहीं खरीद सकते उन्हें मुफ्त दें और जो खरीद सकत हैं खरीदें।
कल रश्मि ने स्टेटस डाला कि शहर में मेहनत कर कमाने वाले खाने का पैकेट लेते हुए नजरें नहीं मिला पा रहे हैं। समझ सकती हूँ हालांकि कुछ वर्षों से ऐसे लोग कम होते जा रहे हैं लेकिन फिर भी ऐसे लोग हैं जिनके लिए यह असहनीय स्थिति है।
हालांकि मेरा अनुभव इससे बिलकुल उलट रहा है और मैंने अच्छे खाते पीते लोगों को भी मुफ्त के लिए झूठ बोलते बेइमानी करते देखा है। बिजली बिल माफ करवाने के झूठे आवेदन लाने वाले तीस साल से देख रही हूँ लेकिन उस स्टेटस पर अपने अनुभव न लिखते हुए सिक्के के इस पहलू को देखा सराहा। कोई और समय होता तो मैं शायद अपने अनुभव वहाँ शेयर करती लेकिन फिर वही बात कि अभी यह वक्त नहीं है।

मुझसे एक वरिष्ठ लेखक ने कहा था कि हमेशा जनवादी रहना।

 न मुझे साहित्य का क ख ग आता है न ये वाद और पंथ ही कभी समझ आये। हाँ जमीनी काम करते हुए बहुत करीब से देखा है जब पापा दूर-दराज के आदिवासी इलाकों में लंगोटधारी तीर कमान वाले आदिवासियों को बैंक में पैसा जमा करवाने और बैंक से कर्ज लेकर साहूकारों के चुंगल से बचाने जाते थे या पति को बाइक पर जंगल जंगल लाइन की पेट्रोलिंग करते या ट्रांसफार्मर लगाने जाते देखा। और जन का मतलब हर उस व्यक्ति से रहा जो जमीनी काम कर रहा है। ऐसे समय में जब पुलिस के जवान निगम कर्मचारी प्रशासन के अधिकारी कर्मचारी जान हथेली पर लेकर काम कर रहे हैं तब इस जन के साथ भी मैं खुद को खड़े पाती हूँ।

याद है अट्ठाइस साल पहले जब बिजली चोरी का प्रकरण बनाने पर एक कंज्यूमर जिस पर हत्या के केस दर्ज थे पति को जंगी जीप में बैठा कर बिजली की मोटर वापस लाने के लिए रात में हेड आफिस लेकर गया था। वे तीन घंटे भगवान के आगे दीपक लगा कर टकटकी बांधे उनकी सलामती की प्रार्थना करती रही थी। उस दिन उनका जन्मदिन था और उन्होंने सुबह से कुछ नहीं खाया था। ऐसे में उन पुलिस वालों अधिकारियों कर्मचारियों और उनके परिवार वालों की दुश्चिंता को समझ पाती हूँ और ऐसे में अगर कोई वीडियो पुलिस जवान किसी को डंडे से पीटता है तब भी मेरा मन उस जन के साथ होता है जो घर परिवार को छोड़कर रात दिन ड्यूटी बजा रहा है।
बच्चे को किसी काम के लिए चार बार मना करने के बाद माता-पिता भी झुंझला जाते हैं फिर ये उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वे हर समय संयम बनाए रखें।

दो दिन से सोशल मीडिया पर बताया जा रहा है कि अचानक बिजली बंद होने से क्या कुछ नहीं हो सकता है। आशंकाओं को हवा दी जा रही है। आम जन जो इस विषय में कुछ नहीं जानता समझता बल्कि सच कहें तो ये अफवाह फैलाने वाले भी कुछ नहीं जानते समझते। वे बता रहे हैं कि सब कुछ कितना खतरनाक हो सकता है। दरअसल हमारे यहाँ लोग अपने आप को सभी आधुनिक तकनीक से तुरंत लैस कर लेते हैं लेकिन सरकारी तंत्र को लेकर उनकी सोच चालीस साल पुरानी ही है।
इस बात से भी कोई आपत्ति नहीं है कि लोग जो सोच रहे हैं वह बोलें लेकिन जब इसका असर विशाल जन समुदाय के मनोबल को तोड़ने और अफवाहों को जन्म देने के लिए होता है तब जवाब देना पड़ता है।
आम लोगों को तो पता ही नहीं है कि आजकल सारा सिस्टम कंप्यूटरीकृत हो चुका है और किस ग्रिड पर किस समय कितनी बिजली जा रही है कितनी खपत हो रही है उसका पल पल का ब्यौरा मौजूद है और हर सिस्टम के पिछले आठ दिन के डाटा की स्टडी करके पूरी योजना तैयार है। अब आप वह करिये जो आप करना चाहते हैं जिसमें आपको खुशी मिलती है।
आज एक सखी ने कहा यार मैं यह दीया जलाने की बात से कंविंस नहीं हूँ मैंने कहा कोई बात नहीं तुम वह करो जिससे तुम कंविंस हो। लेकिन किसी और को उस बात के लिए कंविंस करने की कोशिश मत करो जिससे वह अभी कंविंस नहीं है।

लब्बोलुआब यह है दोस्तों कि इस समय सभी को अपनी अपनी आस्था के साथ अपना मनोबल बनाए रखने की और दूसरे के मनोबल को संभाले रखने की जरूरत है।

आज ऐसी सास बनिये जो बहू से कहे दूध में जामन लगा दे, और बहू आकर बताए मने तो जामन में दूध डाल दियो, न सास कहे वा जाने दे दही तो जमीज जायेगो।
कविता वर्मा 

Thursday, March 12, 2020

यह सिर्फ एक थप्पड़ और तलाक नहीं है


थप्पड़ की गूंज इन दिनों पूरे देश में है। चर्चा पक्ष में भी है विपक्ष में भी। एक थप्पड़ मारे जाने पर क्या कोई तलाक ले लेता है? ये बुद्धिजीवी सोच है जो भारत की संस्कृति को बर्बाद करना चाहती है। इसीलिए शादियाँ टूट रही हैं तलाक हो रहे हैं। आजकल की पढी लिखी लडकियाँ निभाना नहीं जानती। परिवार को जोड़े रखने के लिए कुछ समझौते करना पडते हैं जैसी सतही प्रतिक्रिया भी हैं और कुछ एक्सट्रीम प्रतिक्रिया भी कि शादी जैसी संस्था सड गल चुकी है इसे खत्म किये जाने की जरूरत है।
थप्पड़ फिल्म देखी और चार अलग-अलग कपल के परिचय के साथ शुरू हुई फिल्म में इंतजार शुरू हुआ थप्पड़ का। एक खूबसूरत शादीशुदा जोड़ा पति से बेहद जुड़ी उसके सपने को अपना सपना बना चुकी अमृता यानी कि अमू। सुबह सबके उठने के पहले उठ कर रात सबके सोने के बाद तक घर की जिम्मेदारियों को निभाती हँसती मुस्कुराती मार्डन कपड़े पहनती खाना बनाना नहीं आता इसलिए हाउस हेल्प के साथ सब करवाती और खुद खाना बनाने की कोशिश करती। एक खूबसूरत घर में हैंडसम हसबैंड के साथ रहती पार्टी डिनर करती अमू। सास साथ रहती हैं लेकिन सास जैसी कोई किटकिट नहीं है और वह भी उनका अच्छे से ध्यान रखती है। उसके जीवन में क्या कमी है? यही तो चाहती है हर लड़की अपने जीवन में। 
लड़की अपने जीवन में क्या चाहती है यह उससे पूछ कर निश्चित नहीं किया गया है। यह तो समाज ने निर्धारित कर दिया है कि लड़की के जीवन में यह सब कुछ है तो उसका जीवन सफल है वह सुखी है संतुष्ट है।
इस हँसती खेलती जिंदगी में एक झटका तब लगता है जब अपनी नौकरी में इच्छित प्रमोशन न मिलने से बौखलाया पति उसे पार्टी में थप्पड़ मार देता है। यह थप्पड़ अमू को अपनी अब तक की जिंदगी के हर उस लम्हे की याद दिलाता है जो उसने पति और परिवार के लिए जिया है खुद की उपेक्षा करके खुद के सपनों को मारकर। यह थप्पड़ उसे बताता है कि वह पति की सुविधाओं का साधन मात्र है उसे सब कुछ देने की आड़ में खुद की महत्वाकांक्षाओं को जीता पति वास्तव में अपने किये से नाममात्र शर्मिंदा नहीं है और न उसके लिए कोई अफसोस है। पत्नी से माफी माँगने जैसा कोई विचार तो उसे आता ही नहीं है।
अमू बेहद संवेदनशील है और इस असंवेदनशीलता को बर्दाश्त नहीं कर पाती। बहुत सोच विचार के बाद वह तलाक लेने का निर्णय लेती है और इस बात पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आने लगती हैं। यहाँ फिल्म बताती है कि एक थप्पड़ मारे जाने के लिए हमारे यहाँ कानून में कोई प्रावधान ही नहीं है। इस ग्राउंड पर जो वास्तव में एक स्त्री के आत्मसम्मान की बात है न कोई केस बनता है और न ही इसकी कोई अहमियत है। दुनिया के सबसे बड़े संविधान में एक पत्नी को उसका पति एक थप्पड़ मार देता है तो उसे कहीं असामान्य नहीं माना जाता और न ही माना जाता है कि इसकी वजह से स्त्री को कोई चोट पहुंचती है और उसके मन में ऐसे पति के लिए प्यार खत्म हो सकता है जो शादी को खत्म करने का आधार बनता है।
प्रसिद्ध वकील उसे कानूनी विसंगतियों के बारे में बताती है और उसमें घरेलू हिंसा जोड़ने की सलाह देती है जिसे अमू मना कर देती है क्योंकि यह नियमित मारपीट नहीं है जिसे घरेलू हिंसा कहा जाये।
यहाँ फिल्म एक बड़ा प्रश्न खड़ा करती है कि क्यों पति-पत्नी के संबंधों में एक थप्पड़ या एक गाली जैसी बात के लिए कोई प्रावधान नहीं है। इस तरह दहेज विरोधी कानून और घरेलू हिंसा के कानून के दुरुपयोग के बड़े कारण को इंगित किया जाता है। अमू झूठा केस दायर नहीं करना चाहती लेकिन ईमानदारी से केस दर्ज करना लड़ना और जीतना असंभव है और इस ईमानदारी को उसकी कमजोरी समझ कर उस पर अनर्गल आरोप लगाए जाते हैं। अब तक की उसकी सेवा समर्पण पर गंभीर आक्षेप लगाये जाते हैं। एक साधारण मध्यम वर्ग की लड़की की उच्च मध्यम वर्ग में शादी करने को भी उसकी धन पैसा स्टेटस हड़पने की योजना बता दिया जाता है। दरअसल जब कानून का एक प्रावधान कमजोर होता है तब उसे लागू करवाने के लिये अन्य प्रावधानों का किस तरह दुरुपयोग होता है यह वकीलों के कागजी खेल में खुल कर सामने आता है। तब मजबूरन अमू को घरेलू हिंसा की रिपोर्ट दर्ज करना पड़ती है।
फिल्म में तलाक की बात से तिलमिलाए पति द्वारा पत्नी पर लगाए झूठे आरोपों पर कोई आश्चर्य नहीं होता क्योंकि पितृसत्तात्मक सोच सिर्फ जीतना चाहती है अपने अहं की तुष्टि चाहती है पत्नी को नीचा और गलत साबित करना इसका आसान तरीका है और वही तरीका अपनाया जाता है। 
इस फिल्म में तीन और जोड़े हैं जिनमें स्त्री घुट रही है। दरअसल इस बहाने जब फिल्म के सभी कैरेक्टर को देखा जाता है तो पता चलता है कि पति-पत्नी के इस रिश्ते में कहीं भी बराबरी या बराबर का स्पेस है ही नहीं। कहीं स्त्री अनावश्यक मार खा रही है क्योंकि मारना मर्दानगी है तो कहीं एक सफल वकील अपनी उपलब्धियों के लिए पति और ससुर के नाम के अहसान को सहने के लिए मजबूर है। वहीं एक अकेली महिला एक खूबसूरत शादीशुदा जिंदगी के बाद अपनी बेटी के साथ अकेली है और बेटी की खुशी के लिए एक साथी ढूंढती है लेकिन खुद को अकेले बेहतर पाती है। उसकी टीनएज बेटी जिसने माता-पिता को विवाह बंधन में नहीं देखा वह भी शादी के एक वीभत्स स्वरूप से रूबरू होती है।  अमू की सास उसकी माँ सभी जीवन को समझौते के रूप में जीती हैं जिसमें उनका स्थान दोयम है जिसे समाज ने बना दिया है स्त्रियों ने स्वीकार लिया है और पीढ़ी दर पीढ़ी इसी को खुद की खुशी समझने के लिए विवश हैं। अमू इस विवशता को तोड़ना चाहती है और उसकी जद्दोजहद दर्शकों को भी बैचेन करती है। पारंपरिक विचार बार बार सिर उठाता है कि आखिर क्यों लेकिन इस क्यों का सामना करना ही पड़ेगा और इसके समाधान के लिए कदम उठाना ही पड़ेगा। 
फिल्म आजकल लड़के के माता-पिता की बड़ी चिंता कि आजकल की लडकियाँ शादी नहीं करना चाहतीं या निभाना नहीं जानतीं को प्रमुखता से उठाती है। हालाँकि फिल्म बहुत स्पष्ट यह संदेश नहीं देती कि शादी नहीं करना ही ठीक है बल्कि दर्शकों को लड़कियों के शादी नहीं करने के कारणों में से एक को मुखरता से उठाती है। 
क्या वाकई शादी में पति-पत्नी दोनों एक गाड़ी के दो पहिये हैं या एक बड़ा फोरव्हील है जिसके साथ दूसरा पहिया सिर्फ घिसटता चला जा रहा है यह प्रश्न विचारणीय है। इस प्रश्न का उत्तर शादी संस्था को समाप्त कर देना तो हरगिज नहीं है लेकिन इस पर विचार कर दोनों पहियों को एक बराबर एक गति से चलने की सोच विकसित करने की आवश्यकता जरूर है।
एक और जोड़ा है अमू की हाउस हेल्पर जिसका पति उसे रोज पीटता है वह रोज पिटती है और कह सुनकर अपना दुख भुलाने की कोशिश करती है। निम्न तबके में ये आम है लाखों औरतें हर रोज यह झेलती हैं और अगले दिन फिर सामान्य होकर घर बाहर के काम करती रहती हैं लेकिन क्या इसका अर्थ यह निकाला जाये कि इनका अपना कोई स्वाभिमान नहीं है उन्हें कोई दुख नहीं होता चोट नहीं पहुंचती? दरअसल उन्हें इंसान ही नहीं समझा जाता वे सिर्फ बहू हैं पत्नी हैं और सब कुछ सहकर शादी बनाए रखना उनकी मजबूरी है क्योंकि न उनके परिवार में कोई उन्हें सपोर्ट करता है और न ही कानून।
दरअसल फिल्म के एक थप्पड़ पर तलाक को इतना प्रचारित किया गया है कि फिल्म के असली प्रश्न नजरअंदाज कर दिये गये हैं। फिल्म उस पुरुष वादी सोच को दर्शाती है कि शादी को बनाए रखने के लिए स्त्री को बहुत सारी कोशिशें करना पड़ती हैं परिवार को जोड़कर रखना स्त्री का काम है। फिल्म में अमू पूछती है कि जिसे जोड़े रखने की कोशिश करना पडे वह तो टूटा हुआ है न?
हमारे देश में महिलाओं की मानसिकता भी पुरुष सत्ता से इस कदर प्रभावित है कि एक पढी लिखी अपने पैरों पर खड़ी महिला भी बहुत सारे कड़वे घूंट पीते हुए शादी को निभाये जाती है क्यों वह खुद नहीं जानती। हाथ उठा कर उसे थप्पड़ नहीं मारा जाता लेकिन उसके आत्मसम्मान को आहत करने के लिए शब्दों के थप्पड़ वह हर दिन चुपचाप बर्दाश्त करती है और समझ नहीं पाती कि उसके लिए कैसे रिएक्ट करे उसे कैसे रोके?
फिल्म में छोटी छोटी डिटेलिंग बहुत खूबसूरत हैं और गहरे अर्थ लिये हुए हैं। कामवाली का बढा कर दिये हुए पैसे वापस करना वकील का अपने दोस्त के साथ घूमने जाना या सुबह जल्दी मिलने के लिए बुलाना अमू की पडोसी दोस्त का उसे हग करना उसकी सास की खामोशी एक समर्थन सी गूंजती है तो भाई का उसकी गर्लफ्रेंड से रिश्ता बिगड़ना। फिल्म का हर फ्रेम कुछ कहता है और दर्शक खामोशी से इसे सुनते हैं। 
भारतीय शादी सदियों से दुनिया का ध्यान खींचती आईं हैं खासतौर पर इनकी लंबाई बड़ी वाहवाही पाती है जबकि अधिकांश शादियों में एक पक्ष घुट रहा है उसकी आकांक्षाएं उसके सपने माता-पिता की दहलीज पार करते ही किसी संदूक में बंद कर दिए जाते हैं और किसी को कभी उसकी याद भी नहीं आती। कोई कभी नहीं पूछता कि तुम्हारे सपने क्या थे तुम क्या चाहती थीं? पूरी जिंदगी एक दूसरे के साथ बिताने वाले भी उम्र के आखिरी पड़ाव तक नहीं जान पाते कि सबके अपने अपने सपने चाहतें होती हैं।
फिल्म एक बार फिर भारतीय समाज में लड़कों की परवरिश को नये नजरिए के साथ करने की ओर ध्यान आकर्षित करती है। शादी में पति-पत्नी की बराबरी को अमली जामा पहनाने से हम कितने दूर हैं यह बात शिद्दत से उठाती है और अगर थप्पड़ और तलाक को परे रखकर देखें तो और भी बहुत कुछ देखने और सोचने पर मजबूर करती है। 
कविता वर्मा 

Friday, November 15, 2019

अंतस की नदी

हर स्त्री और पुरुष के भीतर बहती है अंतस की नदी
https://storymirror.com/read/story/hindi/25sskg1s/ants-kii-ndii/detail

Saturday, November 2, 2019

कछु अकथ कहानी समीक्षा शिवानी जयपुर

कलमकार मंच द्वारा प्रकाशित मेरे कहानी संग्रह कछु अकथ कहानी के बारे में यहाँ पढिये और अच्छा लगे तो आर्डर भी यहीं कर दीजिए ।
#booksfortrade
#books
#BookReview

https://kalamkarmanch.in/archives/1250

Saturday, July 6, 2019

पोर्टब्लेयर डायरी 3

3) #पोर्टब्लेयर #portblair #andmannicobar
दूर तक फैले नीले समुद्र में अपना अक्स देखता नीला आसमान हरे भरे घने पेड़ों से भरे भरे टापू समुद्र की गहराई को नाप कर खड़े किये गये पिल्लर और उन पर बना ब्रिज जिस के पास जेट्टी रुकी और उस पर अस्थाई सीढ़ी लगा कर उतरते और अचंभित हो ठिठक जाते यात्री। जिसकी भी नजर उतरते ही नीले विस्तार पर गई वह एक पल को ठिठक गया और फिर जैसे अचानक चौंक गया और इसे कैद करने के साधन ढूंढने लगा। प्रकृति की सुंदरता को हम कहाँ कैद कर सकते हैं हम तो उसके एक अंश मात्र से खुद को भरमाते हैं। प्रकृति को कैद करने के लिये जो प्राकृतिक कैमरा बनाया है उसका अधिकतम उपयोग ही करना उचित है। पुल पर जवान तैनात थे किनारे पर नीले पानी के नीचे सफेद चट्टान दिखते दिखते अचानक गायब हो गई। मैंने जरा झांक कर देखा तो मुझे तुरंत टोका गया मैडम दूर रहिये।
कितना गहरा पानी है यहाँ?
काफी गहरा है कहते हुए वह खुद बिलकुल किनारे पर खड़ा हो गया।
सूरज को पता ही नहीं था कि जिस दर्पण में देख कर वह इठला रहा है उसी में अपनी तपिश उंडेल कर वह अपने और उसके बीच बादलों की चादर तान देगा। इससे क्या न भास्कर नारायण अपना धर्म छोड़ सकते हैं और न उनके प्यार से पिघलकर धुआं धुआं हुए समंदर महाराज। वे तो बादल रूप में ही आलिंगन करने को तत्पर हुए जाते हैं। इस प्रेम के बीच आ जाते हैं हम पर्यटक जो इसकी तपिश और उससे उपजी उमस के बीच पसीना पसीना होते हैं रुमाल से पोंछते हैं और नारियल पानी ढूंढते हैं। बाहर आने के पहले ही हमारा लोकल एजेंट हाथ में तख्ती लिए मिल गया और गाड़ी आने तक उसने हमें एक पेड़ की छांव में नारियल पानी वाले के पास छोड़ दिया।
हैवलाक आयरलैंड में हमें क्या देखना है यह पूछने पर उसने बताया कि यहाँ स्कूबा डाइविंग है राधा नगर बीच है और अगर स्कूबा डाइविंग के लिए जाना है तो आप घंटे भर में तैयार हो जाइये।
अंडमान आयें और कोरल न देखें तो क्या फायदा हालाँकि तैरना जाने बिना गहरे समुद्र में उतरने का विचार ही डरावना था।
खूबसूरत काॅटेज से घिरे स्वीमिंग पूल वाला हमारा होटल देखते ही बस दिल में समा गया। जल्दी से कमरे में सामान रखा एक बैग में कपड़े रखे और नाश्ता किया तब तक हमारी गाड़ी आ गई। स्कूबा डाइविंग के पहले आवश्यक फार्म भरा डाइविंग सूट पहना और हाई टाइड के पानी में सफेद चट्टानों पर चलते हुए पहुँच गये कमर तक पानी में जहाँ पंद्रह मिनट की ट्रेनिंग होना था। हाँ पानी में जाने के पहले कमर पर पत्थरों की एक बेल्ट पहनाई गई मतलब यही था कि तुम्हें गहरे डूबना है तैरने की कोशिश न करना। मुझे तो वैसे ही तैरना नहीं आता ऐसे ही छोडते तो डूब ही जाती। वैसे अब तक जिस दुनिया में हम विचर रहे थे उसमें पहले ही डूब चुके थे।
पीठ पर आक्सीजन टैंक बांधा मुँह पर मास्क लगा कर साँसों पर नियंत्रण मुँह से साँस लेने की प्रेक्टिस इशारों को समझना उसका इशारों में जवाब देना गहराई में कान पर बनने वाले प्रेशर को रिलीज करना मुँह में पानी भरने पर उसे निकालने के लिए बटन दबाना ऊफ। पंद्रह मिनट में कई बार ऐसा लगा कि क्या करें जायें या नहीं जायें? कहीं कुछ भूल गये तो? लेकिन दिल ने कहा अब जो होगा देखा जाएगा। डाइविंग फीस के साथ फोटो वीडियो शूट कांप्लीमेंट्री था। जाने के पहले वीडियो शूट हुआ तो बड़ा अच्छा लगा पीठ पर सिलेंडर मुंह पर मास्क डाइविंग सूट बस कमर तक पानी में खड़े होकर चाँद पर पहुँचने सा आभास हो रहा था। तभी जोरदार बारिश शुरू हो गई मन फिर डर से भर गया। बारिश में समुद्र कितने खतरनाक होते हैं लेकिन अंडमान सागर बहुत शांत है। हम चल पड़े डूबने नीली चादर के नीचे छुपी एक और दुनिया का दीदार करने। मन में डर उत्सुकता आशंका सभी लेकर। धूप न होने के कारण हल्का धुंधला पन था लेकिन अंदर बड़ी बड़ी चट्टान उनके आसपास तैरती छोटी छोटी मछली जीवित कोरल छोटे छोटे पौधे काली पीली हरी पीली कुछ एकदम छोटी मछलियों के झुंड तो कभी इक्का दुक्का बड़ी मछली। कहीं चट्टानों के बीच इतनी गहराई कि तल में कुछ दिखाई न दे तो कहीं इतनी ऊंची कोरल रीफ के डर कर पैर सिकोड़ लिए कि कहीं उनसे टकराकर उन्हें नुकसान न पहुँचा दें। तभी फोटोग्राफर कैमरा लेकर आ गया और धड़ाधड़ फोटो खींचना शुरू कर दिया। गहरे पानी की अनूठी दुनिया ने वैसे ही हतप्रभ कर रखा था ऐसे में पोज देना किसे सूझता है?
हर व्यक्ति के साथ एक गाइड था जो हर आधे मिनट में इशारे से ठीक होने के बारे में पूछता रहा। कई बार प्रेशर के कारण कान सुन्न हुए लेकिन ठान लिया था समय पूरा होने के पहले बाहर नहीं आना है। आधे घंटे का समय चुटकियों में बीत गया और हम बाहर आये तब तक बारिश बंद हो गई थी लेकिन बादल घने थे। बहुत देर तक तो विश्वास ही नहीं हुआ कि हम एक अनोखी दुनिया में विचरण करके आ गये हैं। जो दुनिया टीवी स्क्रीन पर देखते थे उसे इतने पास से देख कर आ रहे हैं। अद्भुत अनुभव था जिसे शब्दों में ढालना मुश्किल है। ध्यान या समाधि की स्थिति शायद ऐसी होती होगी जब सब कुछ विलीन हो जाये।
बाहर आकर हम कपड़े बदल रहे थे सामान समेट रहे थे लेकिन नजरों के सामने तैरती मछलियाँ सांस लेते कोरल पानी की गहराई ही थी।
यहाँ से अगला स्पाॅट था राधा नगर बीच। घने जंगल के बीच नारियल के बगीचे उनके किनारे पर बने छोटे छोटे मकान मकान के सामने करीने से लगाया गया गार्डन ऊंचे नीचे सर्पीले रास्ते। ड्राइवर ने हमें वहाँ छोड़ा और दो घंटे बाद वापस आने का कहकर चला गया।
कविता वर्मा

पोर्टब्लेयर डायरी 2

2) #पोर्टब्लेयर #andmannikobar #portblair 
धरती की नमी सूरज की तपिश से ऊभचुभ होकर बादल बनने को बेताब थी और इस बेताबी की बैचेनी वह लोगों के चेहरों पर छोड़ जा रही थी। सबसे पहले तो हमने इस बैचेनी से बचने के लिए नारियल पानी पिया फिर गाड़ी में बैठकर होटल पहुँचे। रात्रि जागरण और ठिठुरन की थकान हावी थी। ड्राइवर ने बताया कि दोपहर तीन बजे सेल्यूलर जेल देखने जाना है तब तक का समय हमारा था। कमरे में सामान रख कर जल्दी से नहाया फिर नाश्ता किया और बिस्तर पर पीठ टिकाते ही आँख लग गई।
दोपहर पोर्टब्लेयर की ऊँची नीची पहाड़ी सड़कों से शहर की एक झलक देखते कुछ कुछ उसका मिजाज़ समझने की कोशिश करते हम काला पानी के नाम से कुख्यात उस जेल के गेट पर पहुँच गये जो पहली झलक में किसी पुरानी लेकिन बेहतर रख रखाव वाली सरकारी इमारत सी ही लगी। बाहर लोगों की लंबी कतार लगी थी। यहाँ हमें एक व्यक्ति हमारे टिकट के साथ मिला और कुछ ही देर में हम जेल के अंदर थे। एक बड़े से अहाते में जिसमें जेल की तीन तीन मंजिला दो भुजाएँ पूरी लंबाई में फैली थीं बीच में बना एक वाॅच टाॅवर जिससे सभी तरफ नजर रखी जा सकती थी और एक भुजा समुद्र की दिशा की तरफ थी। उस तरफ दूर तक फैला विशाल समुद्र इमारत को भयावह सन्नाटे से घेरे रखता था। एक जैसी आठ बाय दस फीट की कोठरियाँ जिसके रौशनदान और दरवाजे से कतरा भर आसमान दिखता था। ऐसी इमारत जहाँ से कहीं भागना संभव नहीं था उसमें दीवार के बीच आले बनाकर लोहे के दरवाजे में मोटी सांकल लगाई गई थी। इन्हीं दो भुजाओं के बीच रसोई घर फाँसी घर और दंड देने के लिए बनी कार्यशाला जिसमें तीस पौंड तेल निकालने जैसी सजा दी जाती थी। आज हमें मिली तमाम आजादी और सुरक्षा के बीच उसकी भयावहता समझना मुश्किल है लेकिन उस समय बरसों उस एकांत वास में हड्डी तोड़ मेहनत और मनोबल तोड़ने वाले व्यवहार और सजा के बीच रहने वाले उन 218 कैदियों की जीवटता को समझ पाना और भी ज्यादा मुश्किल है। अंग्रेज उनकी जीवटता और इरादों से किस कदर डरे हुए होंगे यह जानने के लिए लोहे के दरवाजे और सांकल की मोटाई ही काफी है।
शाम छह बजे से परिसर में लाइट और साउंड शो था जिसमें कालापानी का इतिहास और कैदियों को दी जाने वाली सजाओं को बताया गया। इस शो में लाइट का इफेक्ट झुटपुटे उजाले के कारण मध्यम ही रहा तो लाइट से भी बेहतरीन प्रयोग की काफी संभावना अपेक्षित थी। बाकी रही सही कसर फोटोग्राफी और रिकार्डिंग न करने के नियम तोड़ने वाले कर देते हैं। खैर कुल मिलाकर इतिहास से परिचित करवाने का अच्छा प्रयास है।
हम जब बाहर निकले अंधेरा घिर गया था दूसरा एक ड्राइवर लेने आया था जिसने हमें थोड़ी देर मार्केट में कुछ शापिंग करने का समय दिया और फिर वापस होटल छोड़ा।
अगले दिन सुबह साढ़े छह बजे की फेरी से हमें हैवलाक आयरलैंड जाना था जिसके लिए सुबह साढ़े पाँच बजे तैयार होना था ताकि चैक इन के लिये समय से पहुँच सकें। खाना खाकर जल्दी ही हम सो गये।
सुबह जब हम पोर्ट पर पहुँचे पहली बार नीले शांत समुद्र के दीदार हुए। आसमान साफ था और उसकी परछाई से सराबोर समुद्र भी उसी रंग में रंगा था। समुद्र में खड़ा छोटा सा जहाज जिसमें हमें जाना था और दूर तक गहरा नीला समुद्र जिसकी रक्षा करने के लिए बीच बीच में हरेभरे द्वीप सिर उठाये खड़े थे। तुरंत कैमरे मोबाइल निकाले न जाने कितने फोटो लेकिन मन नहीं भरा और जहाज (जट्टी) पर चढने का समय आ गया। जहाज के चलते ही थोड़ी ही देर में हम ऊपर डेक पर आ गए। वहाँ तेज म्यूजिक के साथ डांस चल रहा था साइड गैलरी में खड़े होकर तेजी से पीछे छूटते और आगे और गहरे समुद्र में घुसते जाना एक रोमांच पैदा कर रहा था। दूर गहनता को प्रमाणित करती लहरें और जट्टी के तल से पीछे छूटती दूधिया लहरें। ओह ये दृश्य कभी पूरी संतुष्टि क्यों नहीं देते बस देखते रहो देखते रहो लेकिन मन हटने को तैयार ही नहीं होता। अब तक सूरज बादलों के बीच से निकल कर पानी के वितान पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा था। अपने साम्राज्य में सूर्य चाहे पृथ्वी से कितना ही बड़ा हो लेकिन पृथ्वी सुत समुद्र के एक छोटे से हिस्से पर ही चकाचौंध फैला पा रहा था। अजीब है न जब मन समंदर की तरफ हो तो वह सूरज को भी छोटा बना देता है और क्यों न बनाए आखिर अभी समंदर ही तो मन के करीब था अचंभित करता हुआ। बाँयी ओर एक बेहद विशाल पहाड़ी द्वीप साथ साथ चल रहा था। कभी करीब हो जाता कभी दूर। दरअसल समंदर और द्वीप ऐसे हाथों में हाथ डाले रहते हैं यहाँ कि न द्वीप इसके विस्तार को रोकते हैं और न समुद्र इसके किनारों पर सिर पटक कर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करता है। सभी कुछ बड़ा शांत सौहार्द्र पूर्ण और आप इस में खोये सोचते रह जाते हैं कि हम इंसान इनके सीने चीर कर भी इस सौहार्द्र का अंश मात्र भी खुद में समाहित क्यों न कर पाये?
लगातार पानी को देखते चक्कर आने लगते हैं लेकिन दृष्टि हटती नहीं। तभी पानी में बहती एक लाल भूरी पत्ती दिखती है जो न जाने किस किनारे से किस मंजिल पर पहुंचने के लिए निकली थी। उसकी मंजिल का अंदाजा लगा ही नहीं था कि एक छोटी सी चिड़िया ने पानी में डुबकी लगाई। वह पानी से निकलती तब तक जहाज आगे बढ़ गया और मैं बस कल्पना ही कर रही हूँ कि वह अपना भोजन तलाश कर बाहर आ गई होगी।
तभी ऊपर डेक से पानी में कुछ गिरा देखते समझते तब तक लहरों में समा गया। तभी फिर कुछ गिरा इस बार आंखें एलर्ट थीं और तुरंत पकड़ लिया यह डिस्पोजेबल कप था फिर थोड़ी थोड़ी देर में कप प्लेट पैकेट फिंकाते रहे। मैंने हर बार आगे को झुक कर ऊपर देखा। एक्जीक्यूटिव क्लास में सफर करने वाले दिल दिमाग से भी एक्जिक्यूटिव हों जरूरी तो नहीं हैं। कभी-कभी सोचती हूँ काश कोई ऐसी मशीन हो जो इंसान के सिविक सेंस का आकलन कर सके और उसके आधार पर ही उन्हें ऐसे खूबसूरत प्राकृतिक स्थानों पर जाने की अनुमति दी जाये तो शायद अगली पीढ़ी के लिए हम रहने लायक पृथ्वी बचा सकेंगे। 
डेक पर म्यूजिक जोर शोर से चल रहा था और मैं सोच रही थी कि काश यह थोड़ी देर के लिए बंद हो जाये सब थोड़ी देर बिलकुल चुप हो जायें और कुछ देर नीले समंदर और हरे टापुओं पर इठलाती हवा की खामोश सदाएं सुनी जा सकें।
वैसे मुझे कभी समझ नहीं आया कि शोर तो शहरों में भी काफी है और जब उसी में रहना है तो लोग इतनी दूर प्रकृति को अपने शोर से भरने क्यों चले आते हैं?
आपको समझ आये तो बताइयेगा जरूर।



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