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Tuesday, August 9, 2016

कौन कहता है आंदोलन सफल नहीं होते ?


बात तो बचपन की ही है पर बचपन की उस दीवानगी की भी जिस की याद आते ही मुस्कान आ जाती है। ये तो याद नहीं उस ज़माने में फिल्मों का शौक कैसे और कब लगा जबकि उस समय टीवी नहीं हुआ करते थे। उस पर भी अमिताभ बच्चन के लिए दीवानगी। मुझे लगता है इसके लिए वह टेप रिकॉर्डर जिम्मेदार है। थोड़ा अजीब है अमिताभ बच्चन और फिल्मो की दीवानगी के लिए टेप रिकॉर्डर जिम्मेदार पर है तो है। 
बात है सन 79 की है तलवार तीर कमान ले कर कोई  क्रांति नहीं हुई थी पर क्रांति तो हुई थी। झाबुआ जिले के उस छोटे गाँव में रेडियो भी नहीं चलता था तब पापाजी ने टू इन वन खरीदा था और अपने मनपसंद गानों की लिस्ट बना कर कुछ कैसेट रिकॉर्ड करवा ली थीं। उन्हीं में से एक कैसेट में मिस्टर नटवरलाल का गाना था शेर की कहानी वाला।  जिसे पापा रोज़ सुबह से लगा कर हम बच्चों को जगाया करते थे। तो ये पहला परिचय था हमारा अमिताभ बच्चन से उनकी आवाज़ के मार्फ़त। जब वे कहते थे 'लरजता था कोयल की भी कूक से बुरा हाल था उसपे भूख से ' और 'ये जीना भी कोई जीना है लल्लू ' और तभी से वे हमारे मनपसंद हीरो थे। फेवरेट उस ज़माने में ईजाद नहीं हुआ था। 

जब हम लोग इंदौर आये तब कभी कभार टाकीज में फिल्म देखने लगे। अमिताभ बच्चन की पहली फिल्म कौन सी देखी ये तो याद नहीं पर उससे उनके हमारे दिलो दिमाग पर छाये जादू पर कोई फर्क नहीं पड़ा। उसी समय उनकी एक फिल्म आई लावारिस। 

हमारा बड़ा मन था लावारिस देखने का जिस आवाज़ को कैसेट में सुनते आये थे उसे बड़े परदे पर अपने सामने सुनने का। सुना था उसमे भी एक गाना अमिताभ बच्चन की आवाज़ में है और वो गाना रोज़ रेडियो पर सुनते थे। स्कूल में कुछ दोस्त देख चुके थे जिसकी जानकारी दोनों भाई देते रहते थे। उससे उनकी दीवानगी में इजाफा ही हुआ था। हमने पापाजी से कहा हमें लावारिस फिल्म देखना है। सुनते ही उन्होंने कहा लावारिस ये कैसा नाम है ? बेकार होगी वो फिल्म कोई अच्छी फिल्म आएगी तब दिखाएंगे। अब क्या कहते थोड़ी बहुत पैरवी की इस दोस्त ने देखी है उसने बताया है पर पापाजी को तो नाम ही पसंद नहीं आया था इसलिए साफ़ इंकार हो गया। 
फिल्म लगे काफी दिन हो गये थे जल्दी ही वह उतरने वाली थी।  एक दिन दोनों भाइयों ने सलाह की हम भूख हड़ताल करते हैं। थोड़ा मुश्किल था लेकिन फिल्म तो मुझे भी देखना थी।  अब भूख हड़ताल कोई चुपचाप तो की नहीं जाती तो बाकायदा टोपी बनाई गई तख्तियाँ बनीं उन पर भूख हड़ताल लिखा गया और पापाजी के आने से पहले हम तीनों भाई बहन बाहर वाले कमरे में पलंग पर बैठ गए। 

जब पापाजी आये छोटे भाई ने नारे लगाये जिसमे हमने साथ दिया 'पापाजी की तानाशाही नहीं चलेगी नहीं चलेगी। ' पापाजी ने एक नज़र हम सब पर डाली और अंदर चले गये मम्मी से पूछा क्या माजरा है उन्होंने बता दिया लावारिस फिल्म देखना है। उन्होंने हमसे कुछ नहीं कहा मुँह हाथ धो कर खाना खाया तब तक हम बीच बीच में चुपके से अंदर झांकते रहे पर वहाँ कोई असर होता दिख नहीं रहा था। क्रांतिकारियों के हौसले पस्त होते जा रहे थे। पेट के चूहों ने उम्मीदों को कुतर दिया था। दो चार नारे और लगे फिर हम इशारों में बातें करके अगले कदम के बारे में विचार करने लगे थे। हमने तो इतनी तैयारीं की थी और हमें अपने आंदोलन की सफलता पर पूरा यकीन था पर हाय री किस्मत। ऐसा पता होता तो कोई अगला कदम सोच कर रखते। खैर थोड़ी देर में अंदर से पापाजी की आवाज़ आई कविता प्रवीण योगेश चलो खाना खा लो और थोड़े बुझे मन से ही सही हमें अपना अगला कदम मिल गया जो किचन की ओर बढ़ रहा था। 

भरे पेट और उम्मीद से खाली हम अपने बिस्तरों पर पड़ गये। 'बुदबुदाते हुए 'ये जीना भी कोई जीना है लल्लू '
फिल्म कल उतर जायेगी आज बुधवार है उस दिन हम ये सोच कर ही स्कूल गए थे। महीना जुलाई का था या अगस्त का ये तो याद नहीं पर उस दिन मूसलधार बारिश हो रही थी। हम स्कूल से वापस आये तो देखा पापाजी घर पर हैं। पापाजी आज आप जल्दी घर आ गये ? 
क्यों हम जल्दी घर नहीं आ सकते क्या ? जल्दी से कुछ खा पी लो और तैयार हो जाओ। 
कहाँ जाना है ? 
कहा न तैयार हो जाओ। 
इशारे से मम्मी से पूछा तो पता चला फिल्म देखने छह से नौ वाले शो में।  फिर क्या था जल्दी जल्दी सब तैयार हो गए पर बारिश इतनी तेज़ थी कि मोटर साइकिल से तो जा नहीं सकते थे। तय हुआ छाता ले कर चौराहे तक जायेंगे वहाँ से ऑटो ले लेंगे। आज तो सब में राजी थे। तेज़ हवा का पानी था कुछ पैदल जाते भीगे कुछ ऑटो में। जब पहुंचे पहला गाना बस ख़त्म ही हुआ था लेकिन अमिताभ बच्चन की एंट्री हमारी एंट्री के बाद ही हुई। टाकीज में पापाजी ने गरमा गर्म कचोरियाँ खिलाई कि ठण्ड ना लगे पर हम तो फिल्म में ऐसे डूबे थे कि काँपते हुए भी परदे से नज़र नहीं हट रही थी। अंदर अमिताभ बच्चन के घूंसे चल रहे थे बाहर जोर शोर से बारिश लौटते में रात नौ बजे सड़के सुनसान हो गई थीं।  दूंढने पर भी ऑटो नहीं मिला तो हमने मार्च पास्ट शुरू किया आखिर को आंदोलन की सफलता के बाद परेड सलामी तो बनती ही है ना। 

(कौन बनेगा करोड़पति के लिए कुछ फोन मैंने भी किये थे पर करोड़ों रुपये जीतने से ज्यादा चाव तो ये किस्सा खुद अमिताभ बच्चन को सुनाने का था। अब जब लग रहा है कोई मौका नहीं बचा तो सोचा लिख ही डालूँ इस किस्से को।)
कविता वर्मा 

Tuesday, July 5, 2016

विवेक पूर्ण उपयोग जरूरी है

विवेक पूर्ण उपयोग जरूरी है
सोशल नेटवर्क ने जिस तरह लोगों को जोड़ा है उन्हें मनोरंजन और जरूरी सूचनाओ से अवगत कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है वह न अनदेखी की जा सकती है न ही उसके महत्व को अस्वीकार किया जा सकता है।  फोन और फिर मोबाइल ने भी लोगों को जोड़ा लेकिन उसके साथ बड़े भारी बिल की चिंता भी जुडी रहती थी। लेकिन व्हाट्स एप ने इस चिंता को काफी हद तक कम किया है। लोग अपने परिवार के सदस्यों सहेलियों दोस्तों के ग्रुप बना कर आपसी बातें शेयर करते हैं जो सभी के बीच होती हैं। एकदम ड्राइंग रूम में बैठ कर होने वाली चर्चाओ जैसी बातें हंसी मजाक चुटकुले सभी कुछ तो होता है यहाँ। दोस्तों के ग्रुप में सूचनाओ का आदान प्रदान आसानी से होने लगा है तो स्टूडेंट्स अपने जरूरी डिस्कशन भी यहाँ कर लेते है आने जाने में टाइम बर्बाद किये बिना तो प्रोफेशनल्स अपनी कामकाजी उलझनें उपलब्धियाँ। साहित्य जगत में ब्लॉग के बाद व्हाट्स एप साहित्यिक गतिविधियों के लिए एक नया साइट बन गया है जिसमे साहित्यिक सामग्री पर लाइव चर्चा संभव हुई है। 
तकनीकि जब कुछ सुविधा देती है तो उस सुविधा के साथ कुछ सावधानियाँ रखने की जरूरत भी होती है। ये विडम्बना ही है कि हमारे यहाँ का प्रबुद्ध वर्ग भी ऐसी सावधानियों की ओर से बिलकुल लापरवाह होता है। 
मीना ने सहेलियों के ग्रुप पर आया सांप्रदायिक भड़काऊ मैसेज अपने फैमिली ग्रुप पर डाल दिया बिना ये सोचे की परिवार की बातों में ऐसे सांप्रदायिक मैसेज का क्या काम है? उस ग्रुप में बच्चे भी जुड़े थे उन्होंने भी उस मैसेज को बिना ठीक से पढ़े समझे अपने दोस्तों के ग्रुप पर फॉरवर्ड कर दिया। इसका क्या अौचित्य है ये जानने की या बताने की किसी ने जरूरत ही नहीं समझी। बस सब एक गलत सन्देश के वाहक बनते चले गए। किसी ने अपनी सामाजिक जिम्मेदारी के बारे में नहीं सोचा। 
राधा के पास किसी लड़की के किडनैप होने का मैसेज आया उसने बिना सोचे समझे उसे अपनी सहेलियों के ग्रुप पर भेज दिया।  उसमे एक फोन नंबर भी दिया गया था। अब नंबर सच था या गलत लड़की को सही में किडनैप किया गया था या उसे बदनाम करने की कोई साजिश थी ये जानने की किसी ने जहमत नहीं उठाई। अगर वह सन्देश गलत था तो उस सन्देश और फोन नंबर की वजह से उस परिवार को कितनी मानसिक तकलीफ उठानी पड़ी होगी। अगर किसी का अपहरण हुआ है तो वह यूं खुले आम सड़कों पर तो नहीं घूम रहा होगा की किसी की नज़रों में आ जाये और पुलिस को खबर हो जाये। 
विनीता के पास एक मैसेज आया दूर किसी शहर में किसी को किसी खास ग्रुप के ब्लड की जरूरत है उसने उस मैसेज को अपने शहर की सहेलियों के ग्रुप पर डाल दिया बिना ये सोचे की यहाँ बैठ कर कोई कैसे इतनी दूर अस्पताल में पड़े व्यक्ति की मदद कर पायेगा? बस वह मैसेज ऐसे ही एक ग्रुप से दूसरे ग्रुप तक घूमता रहा बिना किसी विचार या ठोस कार्यवाही के।  
धार्मिक राजनैतिक अन्धविश्वास युक्त मैसेज यहाँ तेज़ी से फैलते हैं जिसमे खुद की कोई खास विचारधारा नहीं होती बस हमारे पास आये हैं इसलिए हमें इन्हे आगे भेजना है यही सोच होती है। कई सन्देश तो इस धमकी के साथ आते हैं कि अगर इसे आगे नहीं भेजा तो आपका कोई अहित होगा। क्या हम मन से इतने कमजोर हैं कि कोई सन्देश हमारा हिट अहित कर सके ? लेकिन बस एक सोच रहती है भेज दो भेजने में क्या जाता है ? ऐसी चीज़े धीरे धीरे हमें धर्म भीरु दब्बू बनाती हैं। 
दुःख और अचरज तो तब होता है जब महिलाओ पर बने जोक्स सबसे ज्यादा महिलाये ही एक दूसरे को भेजती हैं। चलिए हँसने के लिए इन्हे भेजा जाता है और कोई इन्हे गंभीरता से नहीं लेता वहाँ तक तो ठीक है लेकिन कई सन्देश तो इतने अपमान जनक होते हैं कि उन्हें पढ़ कर भेजने वाले की अक्ल पर तरस आता है। 
कभी सोचा है कि क्या आपके ग्रुप के सभी मेंबर्स इन्हे पढ़ते भी हैं ? कभी ध्यान दीजिये एक ही ग्रुप पर एक ही मैसेज कई कई बार भेजा जाता है। किसी ने भेजा आपने नहीं पढ़ा आपने भेजा किसी और ने नहीं पढ़ा लेकिन फिर भी मोबाइल हमेशा हाथ में होता है हर दो मिनिट में चेक किया जाता है कोई नया मैसेज आया क्या ? 
एक और ट्रेंड है सुबह होते ही गुड मॉर्निंग करते फोटो भेजने का  अगर आप दो चार ग्रुप के मेंबर हैं तो समझ लीजिये सुबह सुबह आपके मोबाइल में ४० / ५० फोटो आ जायेंगे अब जब भी फुर्सत मिले उन्हें डाउन लोड करिये फिर डिलीट करिये बिना हिसाब लगाये की इसमे आपका कितना समय और नेट वाउचर का पैसा जाया होता चला जाता है। घर के लोगों के साथ सुबह बिना गुड मॉर्निंग बोले हो सकती है लेकिन समूह पर आप नज़र अंदाज हो जाएगी अगर आपने फूलों के गुलदस्ते या राधा कृष्ण साईं बाबा के फोटो नहीं भेजे। 
धार्मिक फोटो से साथ ही कर्मकांड फ़ैलाने का काम भी इन दिनों खूब हो रहा है। साईं बाबा का दुग्ध स्नान करता फोटो लाखों चूड़ियों से सुसज्जित देवी का चित्र और ऐसे ही कई। समझ नहीं आता जिन साईं बाबा ने फकीरी में जीवन जिया वे इस तरह दूध स्नान से कैसे प्रसन्न होंगे। लेकिन उनके भक्तों के पास इतना सोचने का समय ही कहाँ है वे तो बस अंध श्रद्धा वश फोट मैसेज आगे बढ़ाते जा रहे हैं। 
किसी सोशल या पर्सनल इवेंट के समय तो पढ़े लिखे प्रबुद्ध कहे जाने वाले लोग भी ऐसे मैसेज भेजते हैं कि उनके पढ़े लिखे होने पर शक होने लगता है। फिर चाहे विराट कोहली के आउट होने पर अनुष्का को पनौती कहने वाले मैसेज हों या शाहिद की शादी कम उम्र मीरा से होने और इसे करीना से बदला करार देने वाले मैसेज हों लोगों के दिमागी दिवालियेपन पर अफ़सोस होता है और ऐसे सन्देश ऐसी पढ़ी लिखी महिलाये भी आगे बढाती हैं जो स्वयं को सामाजिक सरोकारों की पुरोधा समझती हैं। 
नेपाल में भूकंप के दौरान वहाँ के कई फोटो तेज़ी से फैले जिनमे कई वहाँ बिखरी लाशों के बिलखते औरतों और बच्चों के थे तो कई संदेश अगले भूकंप के झटकों के बारे में। जबकि भूकंप की पूर्व चेतावनी नहीं की जा सकती है।  ऐसे संदेशों से वहाँ फंसे लोगों में बेवजह घबराहट फैली खाने पीने की  वस्तुओं के दाम अचानक कई गुना बढ़ गए और संदेश करने वाले अपने इस असामाजिक कृत्य से बेपरवाह ही रहे। 

 इस माध्यम से जानकारी युक्त सन्देश भी भेजे जाते हैं लेकिन उन संदेशों की प्रमाणिकता की जाँच कोई नहीं करता।  आयुर्वेदिक नुस्खों की तो भरमार है यहाँ। आप किसी तकलीफ का जिक्र भर करिये और देखिये फटा फट दो चार उपाय बता दिए जायेंगे। इन पर विश्वास उतना ही होता है जितना ये उपाय बताने वाले पर आपका विश्वास है। उपाय काम कर गया तो ठीक नहीं किया तो कौन सा आपने फीस दी है बल्कि कुछ समय बाद तो ये भी भूल जायेंगे कि ये उपाय बताया किसने था आखिर तो ग्रुप में बहुत सारे लोग हैं। 

हाँ जो लोग नए नए इस माध्यम से जुड़ते हैं उन्हें तो आने वाले हर सन्देश नए लगते हैं उनकी सक्रियता से तो डर ही लगता है। मजे की बात ये है कि कई सन्देश इस टैग लाइन के साथ होते हैं कि मार्केट में नया है जल्दी आगे भेजो। ये एक तरह का मानसिक प्रभाव पैदा करता है खुद की पीठ थपथपाने को प्रोत्साहित करता है कि हमने इतना बढ़िया मैसेज सबसे पहले भेजा और फिर बार बार चेक करते हैं कि कितने लोगों ने इसे पढ़ा या इस पर वाह वाह की कितनी तालियाँ बजीं और कितने लाइक्स आये। देखा जाये तो ये बाजार वाद में आपको पूरी तरह जकड़ने का तरीका होता है जिसमे आप फंसते जाते हैं। अपना बहुमूल्य समय इस पर जाया करते हैं और अपने जरूरी काम या शौक का समय इस पर बर्बाद कर बैठते हैं और इन सबका अफ़सोस हावी होता जाता है। 
ऐसा नहीं है कि इसे बिलकुल बंद ही कर दिया जाना चाहिये। आपा धापी की इस जिंदगी में दोस्तों घर परिवार वालों के संपर्क में रहने का ये बहुत अच्छा साधन है बस जरूरत है इसके सदुपयोग की। 
* अपने व्हाट्स ऍप के समय को समूह के सभी साथियों की सहमति से सीमित करिये।  तय करिये ऐसा समय जब अधिकतर लोग फुर्सत में हो कर इस पर बात कर सकें। बाकि समय या तो इसे बंद करिये या अपने मन को कड़ा करिये कि आप बार बार मैसेज चेक नहीं करेंगी। 
* समूह में सबकी रूचि किस मे है ये तय करिये फोटो विडिओ चुटकुले या आपसी बातचीत उसके अनुसार समय सारिणी बनाइये। हफ्ते में एक दिन निश्चित समय पर सब चैट करेंगे ऐसा कुछ तय करिये ताकि आप अपनों से जुड़े रह सकें उनके हालचाल पता हों। 
* अपने समूह के नियम बनाइये जिसमे अश्लील सांप्रदायिक सामग्री महिलाओं के बारे में फूहड़ जोक्स जैसी सामग्री शेयर ना की जाये।  परिवार और दोस्तों के मन में महिलाओं के प्रति सम्मान भाव पैदा करना हम महिलाओं की ही जिम्मेदारी है। 
* व्यक्ति विशेष को निशाना बना कर होने वाली टिप्पणियों से बचिये।  
* सुनिश्चित करिये हफ्ते में कम से कम एक दिन कुछ रोचक ज्ञानवर्धक सामग्री साझा की जाएगी जिससे सभी लाभान्वित होंगे। उस पर चर्चा की जा सकती है। 

तकनीकि एक सुविधा हमें प्रदान करती है लेकिन उस सुविधा का विवेक पूर्ण उपयोग हमें ही सुनिश्चित करना है। 
व्हाट्स एप पर किसी भी तरह के धार्मिक राजनैतिक सामाजिक व्यवस्था को आहत करने वाले संदेश गंदे चित्र या वीडियो नहीं पोस्ट करें। 
किसी वर्ग संप्रदाय भौगोलिक क्षेत्र विशेष से संबंधित किसी भी प्रकार के भड़काऊ बहकाने वाले संदेश पोस्ट ना करें।  

क्या आप जानते हैं व्हाट्स एप विश्व की कुछ सबसे बड़ी कंपनियों में से एक है। 
व्हाट्स एप की कीमत जमैका , आइसलैंड उत्तरी कोरिया की जी डी पी से ज्यादा है। 
लगभग पचास करोड़ लोग व्हाट्स एप का उपयोग करते हैं। 
व्हाट्स एप में लगभग 55 कर्मचारी हैं जो सभी अरबपति हैं। 
हर रोज़ लगभग दस लाख लोग इससे जुड़ते हैं। 
लगभग पाँच करोड़ फोटो इस पर शेयर किये जाते हैं। 
इस कंपनी की कीमत नासा के साल भर के बजट जो लगभग १७ अरब डॉलर है उससे ज्यादा है। 

इस सबमे हम आप बिना सोचे समझे अपना समय और पैसा लगा रहे हैं जो हमारे किसी काम नहीं आ रहा है।  ये पैसा बाहर जा रहा है टेलीकॉम कम्पियों की जेब में जा रहा है और हम खुश हैं कि हम कितने सक्रिय हैं।  जरा रुकिए और सोचिये ये कितना जायज है।  

कविता वर्मा 

Tuesday, June 7, 2016

एक सार्थक दिन


समाज सेवा प्रकोष्ठ का तीन दिवसीय बाल व्यक्तित्व विकास शिविर देवास जिले के गंधर्व पुरी में लगा। आज दूसरा दिन था और मुझे बच्चों को कहानियों के माध्यम से साहित्य और शिक्षा से जोड़ना था। सुबह लगभग आठ बजे हम इंदौर से चले। गाँव की ही एक अधबनी धर्मशाला में शिविर लग रहा था। साफ सुथरी बिसात बिछी थी पंखे चल रहे थे जो गर्मी से राहत देने की भरसक कोशिश में लगे थे। 
इसके पहले एक शिविर में मैंने कहानियाँ सुनाई थीं पर वहाँ छोटे बच्चे थे यहाँ सभी उम्र के बच्चे थे आठ नौ साल से लेकर सत्रह अठारह साल तक के।  स्वाभाविक है अब कंटेंट में बदलाव करना जरूरी था।  कुछ देर बच्चों की गतिविधियों को देखते मैंने एक दिशा निर्धारित की। 





सामान्य बात चीत से शुरू हुई गोष्ठी बच्चों के ज्ञान पढ़ने की आदत और इंटरनेट के उपयोग तक पहुंची। इंटरनेट पर उपलब्ध ज्ञान और कथा कहानियों में उपलब्ध ज्ञान के अंतर को बताते हुए कहानियों के माध्यम से व्यक्तित्व निर्माण सोच और नज़रिए का विकास भाषा बोली का विकास जैसी बातें बच्चों को बताई। 
एक बात उभर कर आई कि ग्रामीण बच्चों में पढ़ने की आदत बिलकुल नहीं है ना ही उनके पास किताबें हैं और ना ही कोई प्रेरणा।  स्कूल में लाइब्रेरी है यह बात भी कई बच्चों को नहीं पता। जिन्हे पता है उन्होंने भी कभी वहाँ से पढ़ने के लिए पुस्तकें नहीं ली। अखबार पढ़ने की आदत भी बिलकुल नहीं है। हाँ कुछ बड़े बच्चे जो इंटरनेट का उपयोग करते हैं वे भी वहाँ से सिर्फ गाने डाउन लोड करते हैं या शायद कुछ ऐसी साइट्स देखते हैं जो वे बता नहीं सकते थे या व्हाट्स ऐप या फेस बुक चलाते हैं। यहाँ तक की बच्चों को नए फ़िल्मी गानों के अलावा पुराने फ़िल्मी या जनगीत भी नहीं पता। 

गाँव में हर घर पक्का है सड़के पक्की है बच्चों का रहन सहन पहरावा भी साफ सुथरा और व्यवस्थित दिखा।  ऊपरी तौर पर देखा जाए तो बहुत तरक्की दिखी लेकिन वैचारिक बौद्धिक तरक्की में कहीं बहुत पीछे छूट गए। ऐसा लगा कि इन बच्चों के साथ बैठ कर बेतकल्लुफी से बात करने की बहुत जरूरत है। कई ऐसी बाते हैं जिन्हे बताया जाना चाहिए कई ऐसे प्रश्न हैं जिन्हे सुलझाया जाना चाहिए। उनको दिशा देने की बहुत जरूरत है। 
एक और बात जो उभर कर आई बच्चे चाहे जिस भी उम्र के हों कहानियाँ बड़े ध्यान से सुनते हैं और उनमे निहित संदेशों को भी बखूबी समझ लेते हैं जो हम उन्हें देना चाहते हैं। गंधर्व पुरी एक ऐतिहासिक स्थल है यहाँ एक प्राचीन शिव मंदिर है। मंदिर से कई पुरानी मूर्तियाँ निकली हैं जिनमे से कई तो वहीं रखी हैं तो करीब ढाई तीन सौ मूर्तियाँ पुरातत्व विभाग के संग्रहालय में रखी हैं।  यहाँ घर बनाने के लिए नींव की खुदाई करने पर भी मूर्तियाँ निकलती हैं।  
चिलचिलाती धूप में 44 डिग्री टेम्प्रेचर में मंदिर संग्रहालय घूमकर रास्ते में भोजन करते हुए लगभग चार बजे घर पहुंचे। एक सार्थक दिन रहा जिसने बहुत कुछ सिखाया और बहुत कुछ सिखाने को प्रेरित किया।  
कविता वर्मा 

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