Sunday, February 18, 2018

#नई कहानी 2

कॉलेज में पहला दिन साड़ी हाथों में चूड़ियाँ गले में मंगलसूत्र कानों में गूँजता  'आंटीजी' संबोधन और अब क्लास का रास्ता पूछने पर अजीब सी घूरती निगाहों ने उसके बचे खुचे आत्मविश्वास को बुरी तरह चकनाचूर कर दिया। बड़े शहर में आकर फाइनल करने के उसके फैसले के सही होने का विश्वास डगमगाने लगा। खुद को इतना अकेला उसने कभी महसूस नहीं किया था। जिसके साथ रहने  लिए उसने यह फैसला किया था वह साथ तो थे लेकिन इस समय उनका हाथ थाम हिम्मत पाने की जरूरत बेतरह महसूस होने लगी। वह भी तो अपनी मजबूरी में बंधे थे। उसे कॉलेज के गेट पर छोड़ कर अपनी नई नवेली पत्नी के लिए एक बेहतर आशियाना देने के लिए दो गाड़ियाँ बदल कर पच्चीस किलोमीटर दूर अपनी नौकरी पर जाना भी तो जरूरी था। क्या पता कुछ ना कह पाने और कुछ ना कर पाने की मजबूरी में उन्होंने भी अपनी आँखें धीरे से पोंछी हों। 
क्लास में प्रवेश करते ही सबकी निगाहें उसकी और घूम गईं जिसने उसे संकोच के मोटे आवरण में लपेट दिया। थोड़े ही समय बाद उसने फलाने की बहू के रूप में खुद का परिचय होते पाया। यह बेहद अप्रत्याशित था। उसका अपना एक नाम है लेकिन वहाँ मौजूद एक दो लड़कियों के सिवाय किसी ने उसका नाम जानने की इच्छा तक प्रकट नहीं की। वैसे भी बड़े शहर के प्राइवेट कॉलेज में साड़ी पहने एक लड़की जिसके जेठ भी उसी कॉलेज उसी क्लास में हों उसका नाम कुछ भी हो उसकी योग्यता कुछ भी हो क्या फर्क पड़ता है ?
उस दिन तीन क्लास लगीं हर प्रोफ़ेसर और लेक्चरर को उसका परिचय बहू के रूप में दिया गया उसके आगे एक स्टूडेंट के रूप में उसका कोई वजूद ही नहीं था। लगभग साढ़े ग्यारह बजे कॉलेज छूटा। सुबह जल्दी उठ कर तैयार होने टिफिन बनाने के बाद इतना समय ही कहाँ था कि खुद के खाने का ख्याल रहता। एक कप दूध जरूर उसने पी लिया था वह भी विदाई के समय मम्मी ने जिठानी से कह दिया था उसके दूध का ख्याल रखना इसलिए पहले दिन से उसे चाय के स्थान पर एक कप दूध मिल जाता था। पेट में चूहे कूद रहे थे मन मरा हुआ था। वापसी के लिए लगभग एक किलोमीटर पैदल चलकर टेम्पो लेना था फिर उतर कर लगभग एक किलोमीटर और चलना था। सिर बुरी तरह दुःख रहा था थोड़े पैसे पास में थे लेकिन रास्ते में रुक कर कुछ लेने और खाने की हिम्मत नहीं बची थी। 
हालाँकि सुबह वह रास्ता पहचानने  लिए बड़े ध्यान से दुकानों के साइन बोर्ड देखती आई थी जहाँ से उसे मुड़ना था लेकिन सुबह जो साइन बोर्ड सामने दिख रहे थे अब वे पीछे हो गए थे और वह मोड़ जहाँ से उसे मुड़ जाना था वह पीछे छूट गया। आगे बढ़ते हुए वह एक बड़े चौराहे पर आई तब अपनी गलती समझ आई। भूख से अंतड़ियाँ और सिर टनक रहा था। उसने किसी से रास्ता पूछा और लगभग पौना किलोमीटर और घूम  कर टेम्पो स्टैंड पर आई। थोड़े इंतज़ार के बाद ही टेम्पो मिल गया। अब उसकी अगली चिंता शुरू हो गई कि उसे उतरना कहाँ है ? वैसे उसने देखा था जहाँ से वह टेम्पो में चढ़ी थी वहाँ एक डॉक्टर का साइन बोर्ड लगा था। उसने अपना स्टॉप बताया लेकिन फिर भी आशंकित सी बैठी रही। 
काफी देर चलते रुकते सवारियाँ चढ़ाते उतारते टेम्पो एक स्टॉप पर रुका और उसे उसी डॉक्टर का साइन बोर्ड दिखा और वह तेज़ी से टेम्पो से उतर गई। टेम्पो वाले ने उसे घूर कर देखा लेकिन भूख थकान और मरे मन के साथ दिमाग ने काम करना ही बंद कर दिया था। टेम्पो आगे बढ़ गया उतर कर उसने चारों तरफ देखा तो लगा कि यह वह चौराहा नहीं है जहाँ से वह चढ़ी थी। आधे घंटे पहले एक मोड़ छोड़ देने की गलती की ग्लानि और गुस्से ने अब उसे एक चौराहे पहले ही टेम्पो से उतार दिया था। दोपहर के एक बज रहे थे क्वांर की चिलचिलाती धूप खाली पेट उसकी रुलाई छूट गई। 
पापा के यहाँ कभी भी कहीं जाना होता था तो भाई मोटरबाइक से छोड़ देते थे या पापा के ऑफिस की जीप से ड्राइवर। जीवन के इतने बेरहम यथार्थ से उसकी पहली मुठभेड़ थी यह बिना किसी तैयारी के। अब उसे लगभग दो किलोमीटर और चलना था दोपहर की धूप में उस सुनसान सड़क पर चलते हुए एक और विचार उसके मन में कौंधा अगर उसे घर नहीं मिला तो ? उसकी रुलाई छूट गई लेकिन दिमाग ने खुद के गुम होने पर घर ढूंढने के उपाय खोजने शुरू कर दिए। शुक्र है इसकी नौबत नहीं आई एक किलोमीटर चलने पर उसे पहचाना रास्ता मिल गया। दरवाजा खटखटाते समय लगभग डेढ़ बज रहा था दरवाजा तो खुला लेकिन उसका स्वागत अंदर पसरी बोझिलता ने किया। 
कविता वर्मा 

Thursday, February 15, 2018

# नई कहानी

शादी के आठ दिन बाद वह मायके चली गई थी जिसके बाद करीब डेढ़ महीने बाद वापस लौटी। सगाई और शादी के बीच डेढ़ साल का फैसला था  ने इजाजत दी थी कि पोस्ट ग्रजुएट कर ले। प्रीवियस ईयर के बाद ही शादी हो गई। इन डेढ़ महीनों में यही जद्दोजहद चलती रही कि फाइनल कहाँ से करे ? इसके साथ ही एक अदृश्य दबाव सा बना रहा कि एक साल ड्राप ले ले लेकिन वह जानती थी ड्राप लेना मतलब ड्राप हो जाना। शादी में कॉलेज के प्रोफेसर भी आये थे और उनमे से एक ने स्टेज पर उसे आशीर्वाद देते हुए कहा था " फाइनल कर लेना ड्राप मत लेना। " जाने क्यों वे शब्द दिमाग में जम गए थे इसलिए उसने ड्राप लेने के आईडिया को दरकिनार कर उसी साल फ़ाइनल करने की जिद पकड़ ली थी। 
वह तो गई थी कॉलेज में अड्मिशन लेने लेकिन उसी दिन कॉलेज में दो गुटों के बीच झगडे हो गए और यहाँ माहौल ख़राब है के नाम से आखिर ससुराल से ही फ़ाइनल करने का तय हुआ। आसान तो वह भी नहीं था क्योंकि सिर्फ कॉलेज नहीं बदलना था बल्कि यूनिवर्सिटी भी बदलना था माइग्रेशन सर्टिफिकेट लेना था फिर बड़े शहर के ढेर सरे कॉलेजों में से सही कॉलेज चुनना था। 
इत्तफाक था कि उसी साल जेठ भी उसी विषय से पोस्ट ग्रेजुएट कर रहे थे और फाइनल में थे। उन्हीं ने सुझाव दिया कि उनके कॉलेज में एडमीशन ले ले। प्रायवेट कॉलेज है रोज़ जाने की दिक्कत नहीं रहेगी। "रोज़ जाने की दिक्कत " या "ना जाने की आसानी" समझ ही कहाँ पाई वह जैसा जिसने किया कर लिया। 
कहीं कुछ सुगबुगा रहा है यह भी तो नहीं समझ आया। 
मायके से आकर जब उसने अपनी अटैची खोली थी उसमे सलवार सूट देख कर बड़े तल्ख़ लहजे में पूछा गया था "क्या वह सूट पहनेगी ?" 
"कॉलेज जाना है तो सूट तो पहनना पड़ेगा " आश्चर्य में भर कर सहज ही जवाब दिया था उसने लेकिन बात फिर भी नहीं समझी थी।  
वह अंदर के कमरे में थी तभी बाहर किसी पड़ोसन को बात करते सुना " तो क्या वह जेठ के साथ कॉलेज जाएगी ?"
"हाँ जेठ के साथ सलवार सूट पहन कर कॉलेज जाएगी "एक तल्ख़ स्वर उभरा। 
शाम को जब पति वापस आये तो उन्हें फरमान सुनाया गया "उसे कॉलेज जाना हो तो जाये लेकिन सूट नहीं पहन सकती। " एक क्षीण प्रतिवाद भी हुआ लेकिन उनके घर में रहना है तो उनके अनुसार रहना होगा के फरमान के साथ ख़त्म हो गया। पति की नौकरी अभी पक्की नहीं हुई थी स्टायपेंड मिलता था एक दो महीने तो दिक्कत थी ही। हालाँकि पापा का मकान खाली था वह चाहती तो वहाँ रह सकती थी लेकिन घर में आते ही दो चूल्हे करने की उसकी सोच ही नहीं थी। एक भरे पूरे घर में शादी करना उसका सपना था इसलिए वह ऐसा कुछ नहीं चाहती थी।
दूसरे दिन सुबह आठ बजे नहा कर तैयार होकर पति के खाने का डब्बा बना कर वह साड़ी पहन कॉलेज जाने के लिए तैयार हो गई थी। रास्ता उसने देखा नहीं था वह तल्खी कानों के रस्ते थोड़ी तो दिल में भी उतरी थी इसलिए उसने कहा एक बार मुझे रास्ता दिखा दो फिर मैं चली जाऊँगी। रास्ते भर पति भुनभुनाते रहे। पापा से बात करने की बात करते रहे , मुझे कोई पायजामा कुरता पहन कर ऑफिस जाने को कहेगा तो कैसा लगेगा ? वह उन्हें शांत करने की कोशिश करती रही। बेकार में बुढ़ापे में उन्हें क्यों दुःख देना जैसी बातें उन्हें समझाती रही। 
"कॉलेज में घुसते ही उसकी साड़ी के कारण सबका ध्यान अनायास ही उसकी तरफ चला गया। पीछे से आंटी जी की आवाज़ें आती रहीं। अभी तक पति को देती समझाइश पर यथार्थ का पत्थर पड़ा था उसके आँसू निकल पड़े। मात्र बीस साल की उम्र में अपने से बड़े डीलडौल वाले लड़कों के मुँह से आंटीजी सुनना सिर्फ इसलिए कि अब उसकी शादी हो गई थी उसके सूट पहन लेने से किसी को तकलीफ थी कि वह बेवजह भाइयों बीच मनमुटाव का कारण नहीं बनना चाहती थी इसलिए कि वह बड़े घर की बेटी थी और उसपर लांछन लगा कर उसे बुरा साबित करना आसान था और इसलिए कि घर बना कर रखने के संस्कार उसे घुट्टी में मिले थे। 
कविता वर्मा 

Monday, January 1, 2018

नया बनाम पुराने का अंत
साल 2017 चला गया समाप्त हुआ पूरी दुनिया में जश्न मना। जश्न मना उसके बाद आने वाले नये साल का। हालांकि नये साल के गर्भ में क्या है कोई नहीं जानता। बस एक आस होती है कि कुछ सुखद कुछ सुकून दायक होगा लेकिन हर जाने वाली चीजों के बाद आने वाली चीजें ऐसी ही सुखद नहीं होती।
रीगल चौराहे पर मुख्य सड़क से थोड़ा अंदर एक चाय की गुमटी है जहाँ अकसर साहित्यिक गोष्ठी के बाद चाय पीने जाते हैं। उसी गुमटी में एक छोटा सा कमरा है पता नहीं क्या है उस कमरे में कभी झांक कर नहीं देखा। उस दिन वहाँ एक बुजुर्ग व्यक्ति भी थे। मंझोला कद अनुभवों के रंग से रंगी दाढ़ी कुर्ता पायजामा पहने और चेहरे पर मुस्कान लिये वहां घूम रहे थे। किसी ने उन्हें पहचाना और सभी से परिचय कराया। वे अपने समय के सक्षम चित्रकार पचास वर्षीय श्री किशन राव जी थे।
एक जमाने में पोस्टर चित्रकार की विशिष्ट पूछ परख होती थी। किसी फिल्म की रिलीज के पहले किसी के जन्मदिन पर या किसी अवसर विशेष पर इन लोगों के पास सिर उठाने का समय नहीं होता था। उनके बनाए महान हस्तियों के पोट्रेट रेखाचित्र अभी भी वहाँ रखे थे।
फिर वक्त बदला नई तकनीक आई और उसने पुराने को अलविदा करने के साथ ही किसी का वक्त भी खत्म कर दिया।
कविता वर्मा






Wednesday, July 26, 2017

दो लघुकथाएँ

जिम्मेदारी 
"मम्मी जी यह लीजिये आपका दूध निधि ने अपने सास के कमरे में आते हुए कहा तो सुमित्रा का दिल जोर जोर से धकधक करने लगा। आज वे पूरी तरह अक्षम हैं कल रात ही खाना खाने के बाद चक्कर आया और वे गश खाकर गिर पड़ीं तो खुद से उठ ही नहीं पाईं। डॉक्टर ने बताया आधे शरीर में लकवा का अटैक हुआ है और वह बिस्तर पर लग गईं। 
पाँच साल पहले बड़े अरमानों से अपने बेटे की शादी की थी और बहू को घर गृहस्थी सौंप कर निश्चिन्त हुई भी नहीं थीं कि निधि ने घर में हंगामा कर दिया था। उसने साफ़ साफ़ कह दिया कि वह अकेले सुबह से शाम तक घर के कामों में नहीं खटेगी। मम्मी को भी बराबरी से काम में हाथ बंटाना होगा। सास बनकर राज करने आराम करने के उनके अरमान धरे ही रह गए। सब्जी काटना बघारना कोई स्पेशल डिश बनाना अचार डालना सब उनके जिम्मे था। निधि हाथ बंटाती थी लेकिन सुमित्रा देवी अपनी किस्मत को कोसती ही रहतीं। और अब तो वे असहाय बिस्तर पर पड़ी हैं पता नहीं क्या क्या दुःख देखने पड़ेंगे ? आज तो पहला दिन है इसलिए बहू दूध लेकर आई है जब वो घर के काम में कोई मदद नहीं कर पाएँगी तब जाने क्या होगा ? कहीं उन्हें घर से बाहर ही तो  ... इसके आगे वे सोच ही नहीं पाईं। 
तब तक निधि ने सहारा दे कर उन्हें बैठा दिया था और उन्हें दवाईयाँ देकर उन्हें अपने हाथों से दूध पिलाने लगी। 
"अब मैं घर के कामों में तुम्हारी मदद नहीं कर आऊँगी आँखों से छलक आये आँसुओं को रोकने की कोशिश करते सुमित्रा ने टूटे फूटे शब्दों में कहा। हाथ जोड़ने की कोशिश की लेकिन दूसरा हाथ उठा ही नहीं। 
"ये क्या कह रही हैं मम्मी ?" आपकी देखभाल करना मेरा फ़र्ज़ है। अगर आप घर के कामों में मदद की बात सोच कर चिंता कर रही हैं तो निश्चिंत रहिये। यह उस समय की बात है जब आप स्वस्थ थीं एकदम सारे काम छोड़ कर निष्क्रिय हो जाना आपके स्वास्थ्य के लिए भी अच्छा नहीं था और बिना अनुभव के गृहस्थी संभालना मेरे लिये भी मुश्किल । लेकिन अब आपके सिखाये तौर तरीके से मैं सब ठीक से संभाल सकती हूँ। आप बस आराम कीजिये अब वर्तमान के आखेट की जिम्मेदारी मेरी। 
कविता वर्मा   

मेरे नाम 
"भैया इस पेपर पर यहाँ दस्तखत कर दीजिए।" छोटे ने कहा तो सुरेश ने डबडबाई आंखों से धुँधलाती ऊँगली को देखा और अपना नाम लिख दिया। इसके बाद वह खुद पर नियंत्रण नहीं कर सके और फूट फूट कर रो पड़े।
दो दिन पहले की ही तो बात है जब फोन की घंटी बजी सुरेश ने स्क्रीन पर चमकता नाम पड़ा छोटे। नाम पढते ही उसके चेहरे का रंग उड गया। वह तो फोन उठाना भी नहीं चाहते थे लेकिन लगातार बजती घंटी ने मजबूर कर दिया।
"पांय लागी बडके भैया।"
"हाँ हाँ खुश रहो छोटे कैसे हो?"
"हम अच्छे हैं भैया कल दोपहर की गाड़ी से पहुँच रहे हैं। आपकी बहू और बच्चे भी आ रहे हैं। बस यही खबर देने के लिये फोन किया था। कल मिलते हैं। पाय लागी।"
दिल के किसी कोने में छोटे भाई के आने की खुशी ने उछाह भरा लेकिन मकान जमीन के बँटवारे के संदेह ने उसे कुचल दिया। कुर्सी पर निढाल होते सुरेश ने आवाज लगाई "अरे सुनती हो कल छोटे आ रहा है बहू बच्चे भी आ रहे हैं जरा रुकने का इंतजाम कर लेना।"
"अब क्या होगा क्या मकान जमीन का हिस्सा दे दोगे? आधी जमीन तो बाबूजी पहले ही बेच चुके हैं। फिर अपना गुजारा कैसे होगा? निर्मला ने चिंता जताते हुए कहा।
"अब आने तो दो फिर देखते हैं क्या होता है? "
" और कब तक देखते रहोगे तुम्हें उन्हें आने से ही मना कर देना था। रामदीन काका का बेटा शहर गया था तब छोटे भैया ने साफ साफ तो कहा था कि अगली बार आएंगे तो मकान जमीन का फैसला करेंगे। अगर छोटे भैया ने अपनी जमीन बेचने का कहा या तुमसे पैसे मांगे तो कहां से लायेंगे अपना ही गुजारा मुश्किल है।" कहते कहते निर्मला रुंआसी हो गई।
छोटे के आने से घर में रौनक तो आ गई लेकिन संशय का बादल घुमडता रहा। और आज जब छोटे वकील के साथ घर आया और कागज पर दस्तखत करवाये तब भी सुरेश कुछ कह नहीं पाये। छोटे ने कहा "भैया मैं तो नौकरी के कारण कभी गाँव में नहीं रहूँगा इसलिए यह जमीन मकान सब आपके नाम कर दिया है बस आपके दिल में मेरी जगह को मेरे ही नाम रहने देना।"
कविता वर्मा  

Friday, July 21, 2017

बिना मेकअप की सेल्फियाँ


फेसबुक पर दो दिनों से महिलाओं की बिना मेकअप की सेल्फियों का दौर चल रहा है। यह तो पता नहीं यह ट्रेंड कब और किसने शुरू किया लेकिन दो दिनों में कई महिलाओं ने बिना काजल बिंदी लिपिस्टिक के अपनी फोटो खूब शेयर की। इनमे से कुछ ने इसमें कुछ लॉजिक सोचा होगा या शायद कुछ विचार किया होगा लेकिन अधिकतर ने सिर्फ खुद को टैग किये जाने के कारण ही ऐसा किया। सोशल मीडिया में लोगों ने आभासी दुनिया के परे भी बेहतरीन संबंध बनाये हैं जहाँ कुछ बातों और अभियानों में बहुत सोच विचार विरोध तर्क वितर्क की आवश्यकता नहीं होती। चूँकि टैग किया गया है इसलिए कर दो क्या हर्ज है? आखिर हर बाल की खाल निकलना जरूरी भी तो नहीं। 

वहीँ कुछ लोगों ने इसे स्त्री स्वतंत्रता से जोड़ा इसे स्त्री सशक्ति करण की ओर एक कदम बताया। मानों मेकअप न करना बिंदी काजल लिपिस्टिक ना लगाने भर से कोई महिला सशक्त हो जाएगी। तो कुछ ने सौंदर्य प्रसाधन के करोड़ों रुपयों के बाजार पर ही खतरा महसूस कर लिया। कुछ ने खुद पर जीत बताया कि बिना मेकअप खुद की फोटो डालने की हिम्मत की और मेकअप को खुद की पहचान बनाने से बाहर निकल आये। हम जो हैं वो दिखें। शब्द कम और बात गहरी है। कितने लोग हैं जो है वो ही दिखते हैं। असली मुखौटा तो हम कभी उतार ही नहीं पाते थोड़ी देर के लिए बिंदी काजल भले उतार दें। किसी के कहने पर किसी को दिखाने के लिए उसके बाद फिर वापस। 

सुन्दर दिखने की चाह आदिम है फिर स्त्री हो या पुरुष सभी खुद को सदा से सुन्दर दिखने की चाह रखते हैं। ये बात अलग है कि स्त्री के श्रृंगार समय के साथ परिष्कृत होते गए जबकि पुरुषों के कुछ समय के लिए मिट गए थे। पहले पुरुष भी रोली टीका लगा कर घडी अंगूठी गले में चेन कान में इत्र का फाया रख कर ही घर से निकलते थे लेकिन तब भी उनके लिए यह आवश्यक नहीं था जैसा कि स्त्री के लिए। लड़कियों के लिए सूने माथे या सूनी कलाई रहना अच्छा नहीं माना जाता था और विवाहित महिलाओं के लिए तो सौभाग्य के और भी ढेरों प्रतीक थे जिन्हें पहनना अनिवार्य था। धीरे धीरे यह श्रृंगार बंधन बनने लगा। मौसम दिनचर्या रहनसहन के बदलाव तो कारण थे ही स्त्री स्वतंत्रता के पैराकारों ने भी इन्हें बंधन करार दिया। और फिर यह शारीरिक से ज्यादा मानसिक बंधन हो गया। यहाँ रेखांकित करने वाली बात यह है कि सुन्दर दिखने की खुद को सजाने की चाह ख़त्म नहीं हुई। वह तो बल्कि और ज्यादा बढ़ी हाँ उसके तरीके बदल गए। टेटू पियर्सिंग बालों को हाई लाइट करना ट्रेडिशनल या फंकी ज्वेलरी लम्बी सी मांग भरना या छोटा सा सिन्दूर कभी बिंदी के साथ कभी बिंदी के बिना। मतलब चाह तो वहीँ रही बस अब वह बाजार के रुख के अनुसार अपना रुख बदलने लगी। 

श्रृंगार उसमे भी सुहाग चिन्हों की अनिवार्यता जरूर ख़त्म हो गई लेकिन उनके प्रति ललक स्वाभाविक रूप से बनी रही। मार्किट में बिंदी कुमकुम के नए नए प्रकार आज भी आ रहे हैं चूड़ियों का मार्केट लाखों करोड़ों का हो गया है। चाँदी के पायल बिछुए का स्थान अन्य मेटल ने ले लिया है। त्यौहार और शादियों के सीजन में इनका करोड़ों का कारोबार होता है। यह बेहद स्वाभाविक है और खुद की मर्जी से ही तो है। असली हासिल तो यही है कि जो किया जाये वह अपनी मर्जी से हो किसी दबाव या जोर जबरजस्ती से नहीं।  

कामकाजी महिलाएं जरूर वक्त की कमी से सुविधा के चलते श्रृंगार से दूर हुई हैं लेकिन यह उनकी मर्जी है ना की किसी के कहने से या दबाव से वे ऐसा करती हैं। फिर भी खुद को व्यवस्थित सुरुचि पूर्ण तो वे भी रखती हैं। कभी कभी काम की आवश्यकता या खुद के शौक के लिए भी महिलाएँ श्रृंगार के लिए समय निकल लेती हैं। वहीँ पुरुष भी अब अपने रखरखाव सजने संवारने को पर्याप्त समय देने लगे हैं। पुरुष प्रसाधन की बड़ी रेंज मार्केट में है साथ ही एक्सेसरीज की भी कई वैरायटी हैं। क्रीम जेल परफ्यूम डीयो सभी श्रृंगार के साधन ही तो हैं। 

एक बात और भी है रोज़मर्रा के जीवन में हम कितना मेकअप करते हैं ? काजल बिंदी क्रीम बहुत ज्यादा तो लिपस्टिक वह भी बाहर आनेजाने पर। दो चार दिन के ऐसे अभियान के लिए फोटो खिंचाते दो पाँच मिनिट बिना मेकअप के कितना बाजार डाउन हो जायेगा ? जो इसे स्त्री सशक्तिकरण का बड़ा पड़ाव साबित किया जा रहा है। 

लब्बोलुआब यह है कि ऐसे अभियान क्या वाकई कुछ हासिल करते हैं या यह सोशल मीडिया के शिगूफे हैं जो लोगों को इस पर सक्रिय बने रहने के लिए उकसाते रहते हैं। याद करिये सोशल मीडिया पर थोड़े थोड़े समय अंतराल पर ऐसे अभियान चलते रहते हैं और हम उकताए लोग कुछ करने के लिए कर जाते हैं और दो दिन बाद वही हो जाते है जो वास्तव में हैं। 

खैर बगैर मेकअप की सेल्फियाँ भी दो तीन दिन धूम मचा कर समय के अंधकार में खो जाएँगी। कुछ लोग दिमागी कसरत करेंगे कुछ अपने तर्कों से जीत हार दर्ज करेंगे। लेकिन यह तथ्य तो रहेगा ही कि महिलाओं ने फोटो खिंचाने के लिए मेकअप किसी के कहने से छोड़ा अपनी मर्जी से नहीं। तो फिर कहाँ आ गए हम ?
कविता वर्मा 

Saturday, July 8, 2017

सहेजें इन पारंपरिक पद्धतियों को

अच्छी वर्षा की मौसम विभाग की भविष्यवाणी के बाद भी मध्यप्रदेश के पश्चिमी हिस्से में बारिश नदारद है। किसानों ने इसी भविष्वाणी के चलते और मानसून पूर्व की अच्छी बारिश को देखते हुए खेत में बीज बो दिए थे , नगर निगम ने तालाब खाली कर दिए थे और अब आसमान से बादल पूरी तरह नदारद हैं। 
पहले किसानों की हड़ताल फिर प्याज़ की खरीदी ना हो पाने से सड़ता हुआ प्याज़ और अब बीज का ख़राब हो जाना किसानों पर चौतरफा मार है। जिनके पास पानी है वे तो फिर भी किसी तरह अपनी फसलों को जीवित रखने की कोशिश में लगे हैं लेकिन जिनके पास पानी नहीं है वे दुबारा बीज खरीदने को विवश हैं। 
बीते कुछ वर्षों में बारिश तो ठीक ठाक हुई है लेकिन जब मौसम विभाग ने बताया उस समय नहीं। 
आज जबकि आधुनिक तकनीक सेटेलाइट के द्वारा अंतरिक्ष से मौसम पर नज़र रखी जा रही है ऐसे समय में ज्यादा सटीकता की उम्मीद करना चाहिए लेकिन लगातार नाउम्मीदी ही मिल रही है। ऐसे में क्या समझा जाये तकनीक गलत है या इन तकनीकों से मिलने वाले डाटा को सटीक तरह से पढ़ने उसका विश्लेषण करने वाले वैज्ञानिक अधिकारी नहीं हैं ?

कुछ सालों पहले तक किसान मानसून के लिए गाँव के बड़े बुजुर्गों के द्वारा प्रकृति के सूक्ष्म निरिक्षण आधारित भविष्यवाणियों पर निर्भर रहते थे। टिटहरी का जमीन पर अंडे देना आसमान में भूरे बादलों का होना , पक्षियों का व्यवहार पढ़ना और समझना आदि। कालांतर में वह ज्ञान धीरे धीरे विलुप्त होता जा रहा है .नयी पीढ़ी में इसे ग्रहण करने की इच्छा नहीं है और पुरानी पीढ़ी का अपनी उपेक्षा के चलते उसे अपने तक सीमित रखना मुख्य कारण है। लेकिन इस सब में नुकसान तो सभी का है। 
कृषि अधिकारी जो आसानी से इन बुजुर्गों तक पहुँच सकते हैं उन्हें इन प्राकृतिक संकेतों को उनसे सीखने की जरूरत है। सेटेलाइट से मिले डाटा और इन प्राकृतिक संकेतों को सम्मिलित करके सटीक भविष्यवाणी कर देश और किसान हित में काम किया जाना चाहिए साथ ही भारत की प्राचीन तकनीक और ज्ञान को सहेजने की आवश्यकता है। 

अभी कुछ समय पहले एक आयुर्वेदिक डॉक्टर के पास जाने की जरूरत पड़ी। डॉक्टर ने मौखिक रूप से लक्षण पूछे और दवाइयाँ लिख दीं। याद करिये पहले एलोपैथी डॉक्टर भी आपकी नब्ज देखते थे स्टेथोस्कोप से धड़कन सुनते थे आँखों की जीभ की जाँच करते थे। आयुर्वेद तो पूरी तरह नाड़ी परीक्षण पर निर्भर था और सुबह जल्दी खाली पेट वैद्य नाड़ी देखते थे और मरीज के बताने के पहले ही उसके शरीर की अनियमितता और उनकी जड़ को पकड़ लेते थे। अब यह कला और ज्ञान भी लुप्त होता जा रहा है। एक प्रसिद्द आयुर्वेदिक दवा की दुकान पर किसी अच्छे नाड़ी वैद्य के बारे में पूछा तो जवाब मिला आजकल नाड़ी परीक्षण करने वाले वैद्य तो नहीं के बराबर रह गए हैं हम तो लक्षण के अनुसार दवा दे देते हैं। तो क्या अब नाड़ी परीक्षण की यह प्राचीन भारतीय विद्या लुप्त होती जा रही है ? क्या इसे सहेजने की आवश्यकता नहीं है ? आयुर्वेदिक कॉलेज में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को क्या यह विधा नहीं सिखाई जा रही है या वे बाज़ारवाद का शिकार होकर इसे दरकिनार कर पैथोलॉजी टेस्ट करवाकर बीमारी को पकड़ कर खुद का कमीशन बनाने के लिए इसे छोड़ रहे हैं? 

आधुनिक तकनीक के साथ ही अपने समृद्ध ज्ञान और तकनीक को संरक्षित किये बिना कोई भी देश आगे नहीं बढ़ सकता। अपने आसपास देखेंगे तो पाएंगे कि भारत की समृद्ध परंपरा की कई ऐसी प्राचीन पद्धति विलुप्ति के कगार पर हैं। जरूरत है समय रहते इन्हें संरक्षित और प्रोत्साहित करने की। 
कविता वर्मा 


Friday, June 30, 2017

अवतरण 
नर्मदा पर बने बाँध के किनारे जल महोत्सव की खबर सुन कर रामधन ने वहाँ जाने का मन बना लिया। नर्मदा मैया के किनारे तो पीढ़ियाँ गुजर गईं यह मैया का नया अवतार है उनके दर्शन से कैसे चूके। लगे हाथ दो डुबकी भी लगा लेंगे पुण्य मिलेगा। जब से गाँव छोड़ कर शहर आये हैं तीज त्यौहार अमावस पूनो स्नान के पुण्य से वंचित हो गए। शहर के पाप संचित होते जा रहे हैं। इतवार को जाने का तय किया पत्नी ने कहा सब्जी पूरी बना कर रख लेते हैं तो रामधन ने झिड़क दिया। नरमदा जी के किनारे महोत्सव में खाने के भंडारे चल रहे होंगे उस प्रसादी को छोड़ कर तू घर की सब्जी पूरी खायेगी। बच्चे सुनकर खुश हो गए लेकिन पत्नी का मन नहीं माना उसने रात में ही पाँच सात रोटी बना कर रख ली कि सुबह चाय के साथ खा लेंगे। 
बच्चे सुबह बिना आवाज़ लगाए ही उठ गए फिर नहा कर जायें या नरमदा में ही डुबकी लगायें पर बहस छिड़ गई। जाने में देर हो रही थी तय हुआ आधे घंटे में जो नहा लें ठीक बाकी पुण्य कमा लेंगे। पत्नी और बेटी अच्छे दिखने की चाह में नहा लीं दोनों लड़के नदी में मस्ती करने और रामधन पुण्य के लालच में नहीं नहाये। 
सभी मोटर सायकल पर सवार हो गए कपड़ों के झोले में पत्नी में बासी रोटी कागज में लपेट कर छुपा दीं। बूंदी भजिये के नाश्ते के लालच में किसी का मन नहीं था खाने का। पक्की सड़क पर तो मन उमंग से चलता रहा पर टूटी फूटी सिंगल रोड ने पेट के चूहों को जगा दिया। बच्चों ने भूख राग शुरू कर दिया। रास्ते में धूल उड़ाती बड़ी बड़ी गाड़ियों को जाते देख रामधन आशंकित हो गया। गाँव में नर्मदा किनारे ऐसी बड़ी बड़ी गाड़ियाँ तो कभी नहीं आती थीं। शहर के लोगों के आने का मतलब बहुत ही बड़ा मेला या शहरों में पाप या पापियों का बढ़ जाना। इसका एक मतलब यह भी था कि जलमहोत्सव खूब महंगा होगा। 
रामधन ने सड़क किनारे ठेले पर गाड़ी रोक कर सबको पोहे जलेबी का नाश्ता करवा दिया रोटियाँ झोले में कसमसाती रहीं। गाड़ी बहुत दूर रोक कर धूल भरे रास्ते पर तेज़ धूप में पैदल चलते रामधन को कई  बार अंदेशा हुआ कि कहीं वे गलत जगह तो नहीं आ गए। नर्मदा किनारे की हरियाली बड़े बड़े पत्थर खेत कुछ भी तो नहीं था वहाँ। बैलगाड़ी वाले दस दस रुपये में ले जा रहे थे उसने दो छोटे बच्चों को बैठा दिया। बैलगाड़ी की सवारी के पचास रुपये देने को उसका गंवई मन तैयार नहीं हुआ। 
रास्ते में लगे छोटे छोटे तंबू ने फिर उसे ढाढस बंधाया कि यहाँ भी गाँव खेड़े के लोग आये हैं बेचारे तंबू में रात काट रहे हैं। सबकी टिकिट लेकर बड़े से दरवाजे से अंदर जाते हुए उसे अपने जैसा आदमी गेट पर दिखा तो उसने पूछ लिया ये एक जैसे तंबू गाँव वालों के लिए सरकार ने लगवाये हैं इनमे रुक सकते हैं ?
एक रात का किराया सुन उसकी साँस रुक गई और वह अपने जैसे दिखने वाले गार्ड की विद्रूप हंसी से खुद को बचाता अंदर घुस गया। मैया के विशाल अवतार को देख श्रद्धा से उसने सिर झुका लिया लेकिन हैरान था वहाँ कोई स्नान नहीं कर रहा था। नदी में बड़े बड़े जहाज खड़े थे जिनकी भव्यता उसे पानी का स्पर्श करने से रोक रही थी। 
छोटी बड़ी नावें जहाज की सवारी का टिकिट देख कर उसका महीने का बजट लहरों पर हिलोरे लेने लगा। उसने मायूसी से पत्नी की तरफ देखा। पत्नी ने इतने गहरे पानी और इतनी तेज़ नाव में बच्चों को बैठाने से मना करते हुए वहाँ से तुरंत चलने को कहा। बच्चे भुनभुनाये और रामधन उन्हें समझाता रहा कि पानी कितना गहरा है। 
ऊँची दिवार पर चढ़ना या मोटे मोटे पहियों वाली गाड़ी के तीन चक्कर चार सौ रुपये में लगाना उसके बस के बाहर था। वह लोगों को सब करते देखता रहा और मन ही मन उनकी कमाई का हिसाब लगाने की कोशिश करता रहा जो भूखे पेट असंभव लग रहा था। 
नाश्ते में कुछ चीज़े उसकी चादर पर रखा सकती थीं कुछ बच्चों की मायूसी देख पत्नी ने आँखों ही आँखों में पैरवी की। रामधन ने भी सोचा यह खर्चा तन से लगेगा। चार अलग अलग चीज़ों का आर्डर देकर वह रेस्टॉरेंट से बाहर निकल आया। एक बार चक्कर लगा कर वह भंडारे वाली जगह खोजना चाहता था। उसने और पत्नी ने आधा आधा डोसा खाया और देर होने का हवाला देकर बच्चों को लेकर बाहर आ गया। 
नर्मदा मैया के नए अवतरण से वह हैरान था उसने फिर भी तसल्ली की एक सांस ली मानों किसी आधुनिका को बहुत पास से देख लिया हो और गाड़ी सड़क किनारे गुमटी पर रोक चाय का आर्डर देते पत्नी से कहा झोले से रोटियाँ निकाल ले वापस ले जाकर क्या करेगी। 
कविता वर्मा 

#नई कहानी 2

कॉलेज में पहला दिन साड़ी हाथों में चूड़ियाँ गले में मंगलसूत्र कानों में गूँजता  'आंटीजी' संबोधन और अब क्लास का रास्ता पूछने पर अजीब ...