Monday, June 3, 2019

पोर्टब्लेयर डायरी 1

इंदौर से शाम छह बजे घर से चले तब तक बिलकुल भी अंदाजा नहीं था कि कैसी जगह होगी। अब तक कई समुद्र के किनारे जा चुके हैं इसलिए वैसे ही किसी जगह की छवि मन में थी। इंदौर का हवाई अड्डा जैसा कि न्यूज में पढते थे उससे कहीं ज्यादा खूबसूरत और भव्य था। अभी कुछ दिन पहले ही एयर पोर्ट डायरेक्टर आर्यमा सान्याल जी से मुलाकात हुई थी और उनके व्यक्तित्व ने जितना प्रभावित किया था एयरपोर्ट ने उसमें इजाफा ही किया। शाम सात बजे पहली बार प्लेन में कदम रखा। इंडिगो की नीले सफेद रंग से सजी धजी फ्लाइट।
करीब डेढ़ घंटे में हम मुंबई पहुंचे और वहाँ इंतजार शुरू हुआ बिटिया का। लगभग आधे घंटे तक साफ सफाई बोर्डिंग चैक के बाद बिटिया फ्लाइट में आई और फिर तो यात्रा में जान आ गई।
रात लगभग साढ़े बारह बजे कोलकाता एयरपोर्ट पहुंचे और लगेज के इंतजार में खड़े हो गए। एक एक कर सभी का लगेज आ गया लेकिन हम खड़े ही रहे। तभी एक आदमी ने पूछा आपको आगे जाना है क्या तो आपका लगेज आगे के लिए बुक हो गया है वहीं मिलेगा। अब तक जोर से भूख लग आई थी। एयरपोर्ट से बाहर जाने पर फिर से सिक्यूरिटी चैक से गुजरना पड़ता इसलिए सोचा कि यहीं कुछ खा लेते हैं। कोलकाता एयरपोर्ट बहुत बड़ा और भव्य है। देखते देखते हम ऊपर फर्स्ट फ्लोर तक पहुंचे। कुछ फोटो लिये। फूड जोन बंद हो चुका था बस एक दो स्टाॅल टी जंक्शन और सीसीडी के खुले थे। वहाँ पेट भर खाने लायक विशेष कुछ नहीं था लेकिन भूख लगे तो जो मिले वही सही।
हालाँकि जिस तरह स्लीपर पहनने वाले के लिए हवाई यात्रा सुलभ बनाई गई है वैसे ही स्लीपर पहनने वाले के लिए खाने पीने के सामान के रेट भी सुगम होते तो ठीक था। अभी तो ये सूटबूट वालों के लिए भी विचारणीय लगे। कोलकाता एयरपोर्ट पर रात के समय भीड़ कम हो गई थी लेकिन एसी की ठंडक दिन की गर्मी और भीड़ भाड़ के अनुसार ही थी। अठ्ठारह डिग्री सेल्सियस से कम के तापमान पर चादर ओढ़ कर भी सारी रात ठिठुरते ही गुजरी। उस पर लगातार चलता म्यूजिक सोने कैसे देता। खैर हमारे यहाँ के अनुसार तो रात ही थी लेकिन सुदूर पूर्व में तो साढ़े चार बजे उजाला होने लगता है। सुबह साढ़े पाँच की फ्लाइट के लिए साढ़े चार बजे चेक इन की प्रक्रिया शुरू हो गई।
हल्के बदलाये उजाले में शुरू हुए सफर में ऊपर और नीचे दोनों तरफ बादल थे। बादलों के आर पार कुछ भी नहीं था फिर लगा कि बादलों की परछाई बन रही है नीचे पानी था। नहीं पानी नहीं समुद्र जो धुंधलाई रौशनी में बादलों सा ही दिख रहा था। अजीब सा सपनई नजारा था जिसमें बादल कहाँ शुरू हो कर कहाँ समुद्र से मिल रहे थे और समुद्र क्षितिज पर कहाँ बादलों पर सवार हो गया था पता ही नहीं चल रहा था। सात बजे बाद सूरज अपना उनींदा पन हटा कर आसमान के मैदान में डट कर खड़ा हुआ तब बादलों ने अपना साम्राज्य समेटा और धरती आसमान के बीच की सीमा रेखा स्पष्ट हुई लेकिन धरती पर तब तक समुद्र का साम्राज्य फैल चुका था। गहरा नीला समुद्र अपने गहन गंभीर स्वरूप में किनारे पर एक दो छोटी छोटी लहरें पहुँचा कर अपने होने का प्रमाण दे रहा था। दूर तक गहरे हरे पेड़ समुद्र की गंभीरता में सुर मिलाये खड़े थे और आसमान तक एक शांत सुंदर क्षेत्र के होने का संदेश पहुँचा रहे थे। आसमान से दिखने वाले इस नजारे ने आभास दे दिया था कि हमने जितना सोचा था उससे कहीं ज्यादा खूबसूरत जगह पर हम पहुँच चुके हैं और अब उसे भरपूर अपने दिलो दिमाग में समाने के लिए खुद को तैयार कर रहे थे।
पोर्टब्लेयर का वीर सावरकर हवाईअड्डा अपनी छोटी सी नीली इमारत के साथ हमारा इस्तकबाल करने को तैयार था। एयरपोर्ट के बाहर हमारे नाम की तख्ती लिये ड्राइवर हमारा इंतजार कर रहा था।
कविता वर्मा 

Monday, December 10, 2018

उपन्यास समीक्षा


"आ कविता वर्माजी का उपन्यास "छूटी गलियाँ" मंगा तो बहुत पहले लिया था लेकिन समयाभाव के चलते पढ़ नहीं पाया था. और आज संयोग बैठ ही गया जब भोपाल से मुंबई की फ्लाइट मे इसे पढ़ने का समय मिल गया. एक बार शुरुआत करने के बाद खत्म करके ही दिल माना. कविता जी एक बेहतरीन लेखिका हैं और उनकी लघुकथा और कहानियों से काफी समय से रिश्ता रहा है लेकिन उपन्यास लिखना बहुत धैर्य और मेहनत का काम होता है और मुझे उत्सुकता इस बात की था कि क्या इनकी पकड़ इस विधा मे भी ऐसी ही होगी जैसी लघुकथा और कहानियों मे है. आज उपन्यास पढ़कर यह यकीन हो गया कि कविता जी की पकड़ इस विधा में भी बहुत बढ़िया है. यह उपन्यास मानवीय भावनाओं, रिश्तों और उससे गुजर रहे दो परिवारों के बारे मे है. उपन्यास का नायक पैसों को खुशियों का पैमाना मानकर उसे कमाने के चक्कर में अपने परिवार को खो देता है और जब वह एक और ऐसे ही परिवार के बारे में जानता है तो उसे बचाकर अपनी गलतियों को सुधारने के जद्दोजहद मे लग जाता है. कहानी दिलचस्प मोड़ लेती रहती है और पाठक उससे जुड़ा रहता है. एक अच्छे मोड़ पर उपन्यास खत्म होता है और पाठक राहत की सांस लेता है. पात्र काफी कम हैं इसलिए ज्यादा उलझन नहीं होती, बस अंत थोड़ी जल्दबाजी मे कर दिया गया लगता है. बहरहाल एक बढ़िया उपन्यास के लिए आ कविता वर्माजी बधाई की पात्र हैं और हम भविष्य मे उनकी और रचनाएँ पढ़ने की उम्मीद करेंगे."
विनय अंजू कुमार 

Sunday, December 9, 2018

कमजोरी को शक्ति बना जीत लें दुनिया

विश्व दिव्यांग दिवस के अंतर्गत वामा साहित्य मंच के मासिक कार्यक्रम में संजीवनी संगम मूक बधिर केंद्र जाने का मौका मिला। शहर के व्यस्त इलाके में लेकिन मुख्य सड़क से अंदर यह एक बड़ा और शांत परिसर है। सन 81 में शुरू हुआ यह केंद्र प्रारम्भ में सिर्फ अनाथ बच्चों का संरक्षण गृह था। तब से अब तक लगभग ७५० अनाथ लावारिस छोड़ दिए गए नवजात बच्चे यहाँ लाये जा चुके हैं। ऐसे बच्चे जो सड़क किनारे झाड़ियों नालों में छोड़ दिए जाते हैं कई बेहद बुरी हालत में होते हैं। बीमार वक्त से पहले जन्में चीटियों द्वारा कटे गए पॉलीथिन में कम ऑक्सीजन में जीवन के लिए संघर्ष करते ये बच्चे जब इस केंद्र की ममतालु नर्सआया और डॉक्टर्स की देखरेख में आते हैं तो अधिकांश इस सम्बल को पा कर जी जाते हैं। ठीक होने के बाद शीघ्र ही बच्चों के लिए ममता रखने वाले माता पिता को गोद दे दिए जाते हैं। यहाँ अधिकतम आठ वर्ष तक के बच्चों को रखा जा सकता है। 
केंद्र की आया दीदी से बात करते हुए ऐसे कई बच्चों की लोमहर्षक कहानियाँ सुनीं। कुछ बच्चे विदेशों में भी गॉड दिए जाते हैं। 
पूछने पर कि गोद देने के बाद इन बच्चों की मॉनिटरिंग कैसे की जाती है ? आया दीदी ने बताया कि तीन साल तक हर तीन महीने में उनके घर जाकर देखा जाता  है। उसके बाद बच्चे बड़े हो जाते हैं उन्हें पता न चले कि गोद दिया गया है इसलिए संस्था के पदाधिकारी मेहमान बन कर मिलने जाते रहते हैं। उन्होंने बताया कि कई बच्चे तो बड़े होकर खुद पता लगते हैं कि वे कहाँ से गोद लिए गए हैं और फिर हमारे यहाँ मिलने आते हैं दान और अन्य सेवाएं देते हैं। 
पाँच छह कमरों में बिस्तर पालने किचन सहित सभी व्यवस्था बेहद साफसुथरी थीं। 
मूक बधिर केंद्र पहले सिर्फ ऐसे बच्चों को पढ़ाया जाता था लेकिन अब यहाँ स्पेशल बच्चों को पढ़ने के लिए टीचर्स ट्रेनिंग भी दी जाती है। जो बच्चे सुन नहीं पते उन्हें आवाज़ होते हुए भी बोलने में तकलीफ होती है क्योंकि उच्चारण क्या होते है वे नहीं जानते। इन बच्चों को साइन लेंग्वेज के द्वारा ही पढ़ाया और समझाया जाता है। यहाँ बच्चों के लिए कंप्यूटर लैब क्लास रूम एक्टिविटी रूम सभी हैं।  कुछ कक्षा स्मार्ट क्लास में भी तब्दील की गई हैं। 
बच्चों के कान की जाँच के लिए यहाँ रोज़ शाम शहर के वरिष्ठ नाक कान विशेषज्ञ आते हैं। यह ओ पी डी हैं जहाँ बाहर के अन्य मरीज भी बेहद कम फीस से अपने कान की जाँच करवा सकते हैं।संस्था को कुछ सालों पहले ही सरकारी मदद मिलाना शुरू हुई है इसके अल्वा शहर के दानदाता बड़ी मात्रा में आर्थिक और अन्य मदद देते हैं। मदद के लिए यहाँ संपर्क करके आवश्यक वस्तुओं की सूची प्राप्त की जा सकती है। फिलहाल यहाँ डे स्कूल है लेकिन शीघ्र ही भवन निर्माण करके हॉस्टल भी शुरू करने की योजना है ताकि आसपास के गाँवों कस्बों के मूक बधिर बच्चों को भी पढाई की सुविधा मिल सके। 
संस्था की फाउंडर सदस्य शारदा मंडलोई जी ने बताया कि उनकी टीम शहर में बस्तियों में सर्वे करके मूकबधिर बच्चों को तलाशती है और उनके माता पिता को बच्चों का इलाज करवाने और स्कूल भेजने को प्रेरित करती है। बहुत गरीब बच्चों की फीस माफ़ कर दी जाती है अन्य बच्चों की फीस भी काफी कम है। किसी बच्चे की साल भर की फीस की जिम्मेदारी लेकर भी मदद की जा सकती है। 
बच्चों के इलाज के बारे में बताते हुए कोर्डिनेटर यादव जी ने बताया कि एक कॉक्लियर इम्प्लांट करवाने में पाँच से सात लाख का खर्चा आता है फिर इसे रखने का बॉक्स ही ८०० रुपये का होता है जो हर महीने बदलना पड़ता है। बैटरी की कीमत लगभग पाँच लहज होती है और पोस्ट केयर खर्च भी लाखों का आता है। इस तरह जीवन भर का खर्च बीस से पच्चीस लाख तक होता है। 
वामा क्लब के लिए इन बच्चों ने सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ दीं। यह आश्चर्यजनक था कि जो बच्चे सुन नहीं सकते वे संगीत की हर टाक के साथ न सिर्फ थिरक रहे थे बल्कि उनका आपसी सामंजस्य भी कमाल का था। उनकी टीचर सामने से उन्हें स्टेप्स के एक्शन दे रही थीं और वे एक दूसरे को देखे बिना बस अपने में मगन नृत्य का आनंद ले रहे थे। उनके टीचर्स ने बताया कि जब एक गुण कम होता है तो डी अन्य गुण अधिक सशक्त होता है। बच्चों के साथ क्लब की सदस्यों ने पिक्चर चेयर रेस और क्विज खेले और विजेताओं को पुरुस्कार बाँटे। 
संस्था की एक वरिष्ठ सदस्य इन बच्चों की सिलाई कढ़ाई बुनाई भी सिखाती हैं। छोटे बच्चों के स्वेटर नैपकिन कम्बल आदि का स्टॉल यहाँ लगाया गया था और सदस्यों ने जैम कर इन सामानों की खरीदी की। 
रोजमर्रा की जिंदगी से अलग हट कर एक दिन इन स्पेशल बच्चों के साथ बिता कर यह एहसास होता है कि अपनी कमजोरियों को अपनी शक्ति बना कर कितने आसानी से खुश रहा जा सकता है। 
कविता वर्मा 

Saturday, September 29, 2018

समीक्षा किसी और देश में

विनय कुमार जी से पहचान फेसबुक के माध्यम से ही हुई। उनके बनाये लघुकथा समूह नया लेखन नए दस्तख़त ने लघुकथा की बारीकियां सिखाई तो नियमित लिखना भी सिखाया। आपके बारे में जानने पर अचम्भा हुआ कि दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए भी भारत उनमें धड़कता है। उनकी पोस्ट से भारतीय जीवन संस्कृति आचार विचार के साथ साथ खेती किसानी तीज त्यौहार नदी प्रकृति के प्रति प्रेम और चिंता सभी प्रकट होते हैं। चीज़ों को देखने की उनकी दृष्टी सहज सरल होते हुए बेहद सुलझी हुई है और कई बार हैरान करती है। हिन्दी भाषा के प्रति उनके प्रेम ने दक्षिण अफ्रीका में भी इसके प्रचार प्रसार की राह खोज ली। हाल ही में उनका एक लघुकथा कहानी संग्रह 'किसी और देश में ' दक्षिण अफ्रीका से प्रकाशित हुआ है। 

किसी और देश में 
किसी और देश में विनय कुमार जी का लघुकथा कहानी संग्रह है जिसमे छोटी बड़ी कई कहानियाँ शामिल हैं। संग्रह की पहली कहानी शीर्षक कहानी 'किसी और देश में ' विदेशों की मंहगी पढाई  कर्ज को उतारने के बाद बच्चों का पैसों की चकाचौंध के लिए विदेशों में बस जाने की मार्मिक कथा है। यह कथा पीछे असहाय माता पिता की पीड़ा छोड़ जाती है। 
लड़कियाँ सबके लिए सहज ही एक ममत्व भाव सहेजे होती हैं और इसी भाव को व्यक्त करती कथा है बेटियाँ जो अनायास आँखें नम कर देती है। 
दूसरों के कृत्य पर नाक भौं सिकोड़ने वाले जब खुद वही करते हैं तो कोई सरलता से उन्हें अपनी गलती का एहसास करवा देता है। तमाचा बेहद अच्छी पंच लाइन के साथ चुस्त लघुकथा है। 
महिलाओं और पुरुषों के लिए समाज ने दोहरे मापदंड तय कर लिए हैं। इन्हीं पर करारा प्रहार करती लघुकथा इज्जत दो तीखे मोड़ लेकर चकित करती है।वहीँ फर्क लघुकथा इस मापदंड को स्वर देती है।  
श्राद्ध और प्रायश्चित जीते जी इंसान को तरसाने के बाद उसके मरने पर धूमधाम से श्राद्ध करने की कुसंस्कृति पर प्रहार करती है। 
'उदासी' यूँ तो अपने दुःख को छुपा कर दूसरों के सामने हँसने की कथा है लेकिन इसमें एक सच्चे दोस्त के द्वारा छुपे दुःख को पहचान लेने की दिल छूती भावना है। 
ईमान लघुकथा वंचितों की ईमानदारी बचाने की सामाजिक जिम्मेदारी को  अच्छी कथा है। हालाँकि इसे एक और ड्राफ्ट की जरूरत भी महसूस हुई। 
लेखन में लगातार आगे बढ़ते कई बार असंभव आदर्श सिर उठाने लगते हैं लेकिन संकल्प लघुकथा एक टीस छोड़ते हुए व्यावहारिक रास्ता अख्तियार करती है। 
कुछ लघुकथाएं बेहद चौंकाती हैं। ये सरल लेकिन मनोवैज्ञानिक सजगता से लिखी गई कथाएं हैं। बदलाव , बदलते रिश्ते , स्टोरी, यकीन ,परिपक्वता, गुलाल के रंग   ऐसी ही लघुकथाएं हैं जिनके बारे में कुछ भी कहने से बेहतर है पढ़ना होगा। 
राजनीति और धर्म एक मेहनत मजदूरी करने वाले व्यक्ति के लिए शतरंज की ऐसी बिसात होते हैं जिसमे शह और मात का उसके लिए कोई अर्थ नहीं रहता। उसे तो हर हालत में हारना ही है।  
स्वच्छता अभियान का जो मनोवैज्ञानिक प्रभाव लोगों पर पड़ा है उसके चलते सफाई कर्मियों के काम को सम्मान मिलने लगा है जो कि एक अच्छी बात है कुछ ऐसे भी भाव है लघुकथा सम्मान में। कह सकते है कि विनय जी की लेखनी समसामयिक मुद्दों पर तो बड़ी सजगता से चली है साथ ही समाज के सकारात्मक बदलाव को उन्होंने अपने लेखन में शामिल करते हुए देश की छवि को 'किसी और देश में 'निखारा है।
कामयाबी का सेहरा अपने और अपनों के सिर पर तो आसानी से बाँधा जाता है लेकिन इससे अलग कुछ लोग बहुत ख़ामोशी से सफलता के पायदानों पर चढ़ने के लिए सहारा देते हैं। ऐसे ही लोगों को पहचानने और सम्मान देने की कथा है नींव। 
बालश्रम ,लड़कियों के प्रति संकुचित नजरिया जैसे ज्वलंत मुद्दों पर भी आपकी लेखनी खूब चली है। 
विकास की दौड़ में उपजाऊ जमीन के अधिग्रहण से उपजी निराशा का चित्र करती है लघुकथा वचन। 

इस संग्रह में लघुकथाओं के साथ कुछ कहानियाँ भी हैं। 'कसूर' इकलौती बेटी के प्रति पिता के प्रेम की अनूठी कहानी है जो विपरीत हालात में बेटी के अधूरे काम को पूरा करने का बीड़ा उठाता है। 
'घर वापसी' धर्म और राजनीति के खेल में पिसती तो आम जनता है इसी भाव को उकेरती है यह कहानी। विनय जी की कहानियों में भाषा सरल सहज और प्रवाहमय है। शब्दों का चयन खूबसूरती से किया गया है। किसी और देश में अपने देश की समस्या संस्कृति राजनीति भावनाओं को इस खूबी से उभारने के लिए आपको बहुत बहुत बधाई। 
कविता वर्मा 

 

Monday, July 23, 2018

आँखों की गुस्ताखियाँ

बात सन 87 की है। पंजाब के बाद इंदिरा जी की हत्या और उसके बाद दिल्ली पंजाब और आसपास का इलाका बेहद अस्थिर दौर से गुजर रहा था। उसी समय हमारा वैष्णोदेवी श्रीनगर बद्रीनाथ केदारनाथ गंगोत्री और यमुनोत्री जाने का कार्यक्रम बना। लगभग एक महीने का टूर था मम्मी पापा दोनों भाई मैं हमारी फिएट कार से एक ड्राइवर को लेकर बैतूल से निकल पड़े।
ग्वालियर आनंद होते हुए दिल्ली पहुंचना था और एक परिचित ने बहुत जोर देकर कहा था कि आप वहाँ हमारी बहन के घर ही ठहरें। वह मोबाइल गूगल का जमाना नहीं था और एक कागज पर लिखा पता लेकर जब हम दिल्ली शहर में प्रविष्ट हुए तो माहौल भयावह था। सड़क के दोनों ओर दो पांच सौ मीटर की दूरी पर रेत की बोरियों के पीछे सैनिक मशीनगन लिये मोर्चा संभाले खड़े थे। सड़क पर पुलिस थी किसी भी गाड़ी को रुकने नहीं दिया जा रहा था और हमें तो जगह जगह रास्ता पूछना था।
कहीं पुलिस वालों से तो कहीं रास्ते चलते लोगों से रास्ता पूछते हम दिशा भ्रमित से चले जा रहे थे। सांझ घिर आई थी पीली रौशनी फेंकते हैलोजन माहौल को और भयावह सा बना रहे थे। हर कोई और आगे और आगे ही बताता जा रहा था। कहीं कोई पीसीओ भी नहीं दिख रहा था।
एक जगह अंदर जाती सड़क के किनारे खड़े चार पाँच लडकों से पापाजी ने रास्ता पूछा तो उन्होंने मेन रोड से अंदर जाती सड़क की ओर इशारा करते हुए वहाँ जाने को कहा। मैं पीछे खिड़की के पास बैठी थी और तभी मैंने उन लडकों को एक दूसरे को आंखों में इशारा करते और आंख मारते देखा।
ड्राइवर गाड़ी मोडता इससे पहले ही मैंने जोर देकर कहा "नहीं पापाजी मुझे कुछ ठीक नहीं लग रहा है आप मेन रोड मत छोडो और सीधे चलो किसी पुलिस वाले से रास्ता पूछेंगे।
पापाजी ने मेरी बात मान कर मेन रोड पर ही चलने का फैसला किया और आगे जाकर चौराहे पर खड़े पुलिस वालों से पता पूछा। वो लोग भी सही पता नहीं जानते थे तब उनसे पूछा कि पीछे कुछ लड़के अंदर की रोड पर बता रहे थे। तब वह बोला अंदर कहाँ साहब वहाँ तो कर्फ्यू लगा है देखते ही गोली मारने का आदेश दिया गया है।
दिल्ली के उन लडकों की आंखों की उस हरकत ने हमें बहुत बड़ी मुसीबत से बचा लिया था।

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आंखें वाकई मासूम होती हैं और अपनी हरकतों से गाहे-बगाहे मासूमों को फंसने से बचा लेती हैं।
कविता वर्मा 

Wednesday, June 20, 2018

उपन्यास समीक्षा 'छूटी गलियाँ '

(फेसबुक और साहित्य जगत में सीमा भाटिया गंभीर और औचित्य पूर्ण लेखन में जाना पहचाना नाम है। मेरा उपन्यास 'छूटी गलियाँ ' उनकी नजरों से।

आजकल लेखन के साथ साथ पुस्तकें पढ़ने का क्रम भी जारी है। पिछले दिनों "क्षितिज अखिल भारतीय लघुकथा समारोह" में Kavita Verma  जी से मिलने का सुअवसर मिला और उनके द्वारा लिखित पहला उपन्यास "छूटी गलियाँ" भी। पढ़ने से पहले तक इसी संशय में थी कि कोई रूमानी उपन्यास होगा। पर कल जो हाथ में लिया, तो पहले अध्याय से ही एकदम नए और अछूते कथानक के साथ ऐसा तारतम्य बना कि समाप्त कर के ही उठी इसे। विदेश में धन कमाने की लालसा एक इंसान को अपने परिवार से कैसे दूर कर देती है, और वहां की चकाचौंध और बच्चों की महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति में वह सब पीछे छूट जाता है जिसे पारिवारिक खुशी कहते हैं। ऐसे हालात में पत्नी और बच्चों की मनोव्यथा और बाद में सब कुछ छूट जाने की पीड़ा एक अनचाहे पश्चाताप से भर देती है नायक के मन को और वह उसी परिस्थिति में जी रहे एक मासूम को वह खुशी देने की कोशिश करता है जिसके अभाव में उसका अपना बेटा मानसिक तनाव में जूझता हुआ संघर्ष कर रहा  बाहर आने के लिए। खून के रिश्तों के अतिरिक्त भी स्नेह के रिश्ते होते और कई बार उनसे भी ज्यादा मजबूत सिद्ध होते हैं। बहुत ही मनोवैज्ञानिक विश्लेषण के बाद लेखिका ने पूरा तानाबाना बुना है उपन्यास का और इस क्षेत्र में वह पूरी तरह सक्षम प्रतीत होती हैं।

हर पात्र के चरित्र को उसके अंतर्द्वंद्व के माध्यम से और भी सशक्त रूप से उकेरने में सफल रही हैं कविता जी। अंत के एकाध अध्याय में कुछ जगह नेहा और मिस्टर सहाय के अंतरद्वंद्व में confusion महसूस होती पाठक के तौर पर, पर यह कमी ज्यादा नहीं खलती पूरे उपन्यास को देखते हुए। सारा उपन्यास एक अनूठी शैली में लिखा गया है और शुरुआत से अंत तक रोचकता बनाए रखता है। पारिवारिक रिश्तों में जरूरी संवाद की कमी और आपाधापी के इस युग में सिर्फ धनार्जन के लिए परिवार की उपेक्षा करने के दुष्परिणाम की ओर सचेत करता यह उपन्यास लेखिका का पहला प्रयास होने के बावजूद एक बहुत बड़ी सफलता है। आशा है कि आगे भी ऐसी और भी कृतियों को पढ़ने का सौभाग्य मिलता रहेगा।
सीमा भाटिया 

Friday, June 15, 2018

लघुकथा सम्मेलन 2

अखिल भारतीय लघुकथा सम्मेलन के दूसरे दिन का शुभारंभ महेंद्र पंडित द्वारा स्वस्ति वाचन के साथ माँ सरस्वती को माल्यार्पण से हुआ। आज के मुख्य अतिथि श्री बलराम वरिष्ठ कथाकार प्रधान संपादक लोकायत पाक्षिक पत्रिका दिल्ली , विशेष अतिथि श्री श्रीराम दवे कार्यकारी संपादक समावर्तन उज्जैन और श्री राकेश शर्मा संपादक वीणा इंदौर थे। कार्यक्रम सम्मान समारोह और पुस्तक विमोचन के रूप में शुरू हुआ। 

अनघा जोगलेकर के उपन्यास अश्वत्थामा का लोकार्पण श्याम सुंदर दीप्ति की लघुकथा पत्रिका प्रतिमान लघुकथाओं के मराठी अनुवाद की पत्रिका 'भाषा सखी ' आदि का विमोचन हुआ। 
लघुकथा शिखर सम्मान श्री बलराम अग्रवाल दिल्ली का क्षितिज संस्था के सदस्य डॉ अखिलेश शर्मा द्वारा शॉल श्रीफल अंग वस्त्र मोमेंटो और प्रशस्ति पत्र द्वारा किया गया। आपको सम्मान राशि भी प्रदान की गई। 
लघुकथा समालोचना सम्मान 2018 श्री बी एल आच्छा जी चेन्नई को मिला। 
लघुकथा नवलेखन सम्मान कपिल शास्त्री भोपाल 
क्षितिज लघुकथा कला सम्मान संदीप राशिनकर को  रेखांकन और चित्रांकन के लिए और नंदकिशोर बर्बे  को नाट्य कर्म के लिए प्रदान किया गया। 
क्षितिज लघुकथा विशिष्ट सम्मान श्री बलराम को प्रदान किया गया। 
इसके अलावा श्री योगराज प्रभाकर सतीशराज पुष्करणा भगीरथ परिहार सुभाष नीरव अशोक भाटिया कांता रॉय को लघुकथा विशिष्ठ सम्मान से सम्मानित किया गया। अनघा जोगलेकर और किशोर बागरे जी को उनके बनाये पोस्टर और चित्रकारी के लिए सम्मानित किया गया। 
लघुकथा साहित्य पत्रकारिता सम्मान इंदौर के पत्रकार श्री रविंद्र व्यास को दिया गया। 

इस अवसर पर बोलते हुए बलराम अग्रवाल ने कहा साहित्य का मूल कर्म जिज्ञासा पैदा करना है। परकाया प्रवेश कर लेखक वह कर सकता है जो वह करना चाहता है। लघुकथा की छोटी काया है उसमे अन्य संकोचन नहीं हो सकता। लेखन व्यवसाय नहीं व्यसन है।
 
सम्मान समारोह की अगली कड़ी में श्री योगराज प्रभाकर अशोक भाटिया कांता राय सतीश राज पुष्करणा भगीरथ परिहार सुभाष नीरव जी को क्षितिज लघुकथा सम्मान से सम्मानित किया गया। 
इस अवसर पर डॉ शैलेन्द्र शर्मा ने अतिथियों को बधाई और आयोजन के लिए शुभकामनायें प्रेषित कीं। आपने इस आयोजन को लघुकथा का महाकुंभ कहा। आपने कहा लघु पर जब चिंतन होता है तो बहुत सारी चिंताएं हमारे समक्ष आती हैं। आपने कहा कि जिस तरह मंदिर की घंटी की गूंज देर तक गूंजती रहती है वैसी ही गूँज लघुकथा की होना चाहिए। लघुकथाकारों को सहानुभूति के साथ समाज के सरोकारों से जुड़ना चाहिए। लघुकथाकार भी शिल्पी हैं और इन्हें अपने अंदर के लोक कथाकार को जगाने की जरूरत है और ऐसे आयोजन यह काम बखूबी करते हैं। 


आज के पहले सत्र और आयोजन के चतुर्थ सत्र में लघुकथा लोकप्रियता और गुणवत्ता के बीच अंतर्संबंध एवं पाठकों के मध्य सेतु निर्माण पर बोलते हुए श्री बलराम ने कहा चालीस साल से लघुकथा लघुकथा सुन रहा हूँ अब लघुकथाकार को कारीगर बनना होगा तभी वह शिखर तक पहुँचेगा। कथाकार मूर्तिकार चित्रकार कोई यूँ ही नहीं हो जाता उसके लिए साधना करनी पड़ती है। जब तक रचना कलात्मक नहीं होगी तब तक वह ऊंचाइयों पर नहीं पहुँचेगी। विधाएँ हमारे अंतर से निकलती हैं इसलिए विरोध से घबराना नहीं चाहिए क्योंकि आलोचना के बिना विकास संभव नहीं है। जो लेखक पाठकों और आलोचकों का सामना करने में माहिर होते हैं एक वर्ग उन्हें महान मानता है तो दूसरा वर्ग जो लोकजन की अनुभूतियों को लिखते हैं उन्हें महान मानते हैं। अच्छे लेखक मध्य मार्ग से आते हैं। 

आपने शहर के साहित्यकार चैतन्य त्रिवेदी की दो लघुकथाओं खुलता बंद घर और जूते और कालीन का जिक्र करते हुए उनकी समीक्षा की और एक कथा में आदमी और दूसरे में समाज की महत्ता को प्रतिपादित करने को इंगित किया। 

चर्चाकार श्रीमती संध्या तिवारी ने अपनी बात रखते हुए कहा कि हमारे समकालीन लघुकथाकार बहुत अच्छा लिख रहे हैं और विविध विषयों पर लिख रहे हैं और संवेदनाओं के द्वारा पाठकों से जुड़े भी हैं। 
दूसरे चर्चाकार श्री सतीश राठी ने कहा कि यदि लघुकथा के संप्रेषण में भोथरापन है तो वह पाठकों से सेतु नहीं बना सकती। तुलसी की चौपाइयां अनपढ़ व्यक्ति भी पढता है और यही उसकी लोकप्रियता है गुणवत्ता है और पाठकों से उसका संबंध स्थापित करता है। 
इस सत्र में भी लघुकथाकारों ने लघुकथा पाठ किया और उनकी विभिन्न आयामों से समीक्षा की गई। 

अगले सत्र में चित्र आधारित लघुकथाऐं बनाम स्वयं स्फूर्त लघुकथाएं पर बीज वक्तव्य देते कांता राय ने कहा लघुकथा लेखन के लिए कोई प्रेरणा आवश्यक है फिर वह चित्र या शीर्षक ही क्यों न हो। लेखन के लिए रोजमर्रा की परेशानियां भी सृजन की संभावना पैदा करती हैं। अवचेतन में दबी संवेदनाएं चित्र या शीर्षक देख जीवित हो जाती हैं जो लेखन में सहायक होता है इस चिंतन को सृजन में उपयोग कर कथ्य को उभारा जाता है। स्वयं स्फूर्त लेखन के नाम पर सृजन से दूर होने से कोई प्रेरणा होना बेहतर है। 
चर्चाकार अंतरा करवडे ने दोनों का तुलनात्मक विवरण प्रस्तुत किया और स्वयं स्फूर्त रचना मस्तिष्क को उर्वर करती है इससे सृजन का सुख महसूस होता है जबकि विषय आधारित में अनुभव और जानकारी को विषय के आसपास लाया जाता है। 
सुभाष नीरव जी ने कहा 21 वीं सदी में लघुकथा में लोग जुड़ रहे हैं। लेखन का दबाव स्वस्फूर्त होता है खुले आकाश में स्वतंत्र रचनाएँ पैदा होती हैं जबकि विषय पर लेखन ऐसा है मानों एक खिड़की खोल दी हो कि इसमें से जितना आसमान दिख रहा है उस पर लिखो। 
इस सत्र में लघुकथाओं पर बात करते हुए कविता वर्मा ने कहा की साहित्य का काम समाज में संवेदना जगाना होता है इस संवेदना को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचना चाहिए और इसलिए लगातार लिखना जरूरी है। 

अंतिम सत्र में वैश्विक क्षितिज के साथ नई जमीन की तलाश विषय पर बात करते हुए श्याम सुंदर दीप्ति ने कहा यह बाजार वाद वैश्वीकरण का दौर है। पहले व्यक्ति साल में जीता था और अब क्षण क्षण में जी रहा है। पूर्व में जो विषय लिखे गए वह कैसे लिखे और वर्तमान में कैसे लिखे जा रहे हैं इसका अध्ययन करने की आवश्यकता है।  मनोवैज्ञानिक दृष्टी से तो देखना होगा साथ ही अर्थशास्त्रीय दृष्टी से भी तर्क करना होगा। जिज्ञासा व्यक्ति को आगे बढाती है। 
वक्तव्य पर चर्चा करते हुए सतीश राज पुष्करणा ने आज की वैश्विक समस्याओं का जिक्र करते हुए नए विषयों पर प्रकाश डाला। आपने पर्यावरण जनसँख्या नारी शोषण जैसी विसंगतियों की चर्चा करने के साथ ही खेती की कम होती जमीन, युवाओं का पलायन, शस्त्र बाजार, आतंकवाद, स्त्री का सही स्पेस, जैसे विषयों पर लिखने पर जोर दिया। 
अशोक भाटिया ने कहा कि एक विषय पर अनेक आयामों से लघुकथाएं लिखी जा सकती हैं और इसके लिए अध्ययन का दायरा बढ़ाने की जरूरत है। आपने घटना की गुलामी करना छोडने और घटना का पुनर्निर्माण करने की जरूरत पर बल दिया। कई वैश्विक लघुकथाकारों के उद्धरण देते हुए आपने अपनी बात स्पष्ट की जिसमें खलील जिब्रान की लघुकथा आदमी की पर्तें प्रमुख है। 
समारोह के समापन अवसर पर क्षितिज के लिए काम करने वाले वालेंटियर्स और परिवारों का सम्मान किया गया। माहेश्वरी भवन के ट्रस्टी लाइट साउंड केटरिंग वालों आभार व्यक्त करते हुए कार्यक्रम के समापन की औपचारिक घोषणा की गई। 

दो दिवसीय इस कार्यक्रम में अतिथियों को लाने छोड़ने रहने खाने नाश्ते की स्तरीय व्यवस्था सम्मलेन स्थल पर की गई थी। आयोजक क्षितिज संस्था के सदस्यों के साथ ही सतीश राठी जी का पूरा परिवार भी इस व्यवस्था में लगा रहा। कहीं कोई अव्यवस्था या हड़बड़ाहट देखने को नहीं मिली। लघुकथा के विभिन्न आयामों पर सारगर्भित सत्रों ने लघुकथाकरों को समृद्ध किया तो सोशल मीडिया पर जुड़े लघुकथाकारों को आपस में मिलने जुलने का मौका भी उन्हें मिला जिससे उनके बीच आत्मीयता बढ़ी। खूबसूरत फोटो के माध्यम से सभी खूबसूरत यादें अपने साथ ले गए।

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कविता वर्मा 

पोर्टब्लेयर डायरी 1

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