Friday, October 19, 2012

समझा जो होता


समझा जो होता 
मेरी विवशता और 
उलझनों को 
जाना जो होता 
मेरी सीमा और 
बंधनों को 
थमा जो होता 
मेरी ख्वाहिशों और
अरमानों को 
पाया जो होता 
मेरे मन की
गहराइयों को
सोचा जो होता
मेरी धडकनों और
सांसों को
महसूस जो होता
मेरे प्यार और
भावनाओं को
यूं चले न जाते
इक पुकार के इंतजार में
पलटकर देखते तो पाते
ठिठके पड़े शब्द
विवशताओं के उलझे धागे में फंसे।

12 comments:

  1. पलटकर देखते तो पाते
    ठिठके पड़े शब्द
    विवशताओं के उलझे धागे में फंसे
    ......bilkul sahi kaha hai ji

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  2. बस समझने भर की देरी थी..
    और सब कुछ छुट गया.....
    बेहद भावपूर्ण रचना....

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  3. हज़ार राहें मुड के देखीं...
    कहीं से कोई सदा न आई...

    उलझन में उलझे शब्दों का बयान स्पष्ट है...खुबसूरत रचना।।।

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  4. आपकी ये कविता फेसबुक पर एक बार पढ़ चुका हूं, लेकिन कुछ रचनाएं ऐसी होती हैं, जिन्हें जब भी पढिए लगता है पहली बार पढ़ रहा हूं। ये रचना उनमें से एक है।
    बहुत बढिया

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  5. यूं चले न जाते
    इक पुकार के इंतजार में
    पलटकर देखते तो पाते
    ठिठके पड़े शब्द
    विवशताओं के उलझे धागे में फंसे।

    निःशब्द करते भाव

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  6. बहुत ही शानदार और सराहनीय प्रस्तुति....
    बधाई

    जयपुर न्यूज
    पर भी पधारेँ।

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  7. उत्कृष्ट भावपूर्ण रचना,,,,,RECENT POST : ऐ माता तेरे बेटे हम

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  8. ऐसी समझ हर बंधन में ज़रूरी है.. बढ़िया!

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  9. आपकी यह बेहतरीन रचना बुधवार 31/10/2012 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

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