Saturday, September 25, 2010

दौटेर्स डे के बहाने ..........

कल दौटेर्स डे है ,वैसे तो हमारे यहाँ ये दिन साल में दो बार ९-९ दिन के लिए मनाया जाता है ,पर वैश्वीकरण ने हमें अपने रीति- रिवाजों के अलावा भी कई दिन त्यौहार मानाने का मौका दिया है। अब में इस फेर में नहीं पड़ना चाहती की ये सही है या गलत। बस एक ही बात है दिमाग में की ये मेरी उन नन्ही परियों के लिए है जिनसे मेरे घर और जीवन में रौनक है।
२० साल पहले जब मेरे जीवन में किसी नन्हे सदस्य के आगमन की आहट हुई तो मन झूम उठा। उस समय तो सिर्फ ममता थी, फिर जब मन ने ये सोचना शुरू किया की क्या होना चाहिए जो निश्चित रूप से किसी के हाथ में न था पर मुझे ही क्या सबको अपनी उमीदों और दुआओं पर बहुत भरोसा रहता है सो मैंने भी सोचना शुरू किया ,कभी लड़का कभी लड़की। इसी बीच दिवाली आ गयी .दीपक लगाते हुए अनायास ही मन ने कहा इस घर में बिटिया आयी तो अगले साल सारे घी के दीपक लगाउंगी ,और सच में होंठो पर सुंदर सी हंसी गालों में गढ्ढे बड़ी बड़ी आँखों से निहारती बेटी जब गोद में आयी तो लगा पूरा घर दीपों से रोशन हो गया।
हॉस्पिटल में जब नर्स बेटी को नहलाने के लिए लेने आयी तो मन काँप गया कही इन्होने बदल दी तो ?ये तो इतनी छोटी है इसे पहचानूंगी कैसे?? बहुत ध्यान से देखा,उसके नन्हे हाथों को थामे फिर उसकी पतली पतली लम्बी लम्बी उंगलिया देखी,लगा यही सही पहचान है कितनी सुंदर उंगलियाँ है इससे सुंदर तो किसी की हो ही नहीं सकती और बिटिया नर्स को पकड़ा दी। जब वो नर्सरी से वापस आयी तो सबसे पहले उसकी उँगलियाँ देखी और इत्मिनान किया हाँ ये मेरी ही बिटिया है क्योंकि इससे सुंदर उँगलियाँ तो किसी की हो ही नहीं सकती।

सारा दिन उसके साथ कहाँ बीत जाता था पता ही नहीं चलता। हमारे जीवन की धुरी हो गयी वो। उसके हिसाब से उठाना बैठना ,खाना पीना ,कही आना जाना... थोड़ी बड़ी हुई जब मोटरसाइकल पर आगे बैठती थी ,उसके लिए कैप लाना ,छोटे चश्मे लेना.बीच-बीच में चप्पल -जूते चेक करना पता नहीं कितनी ही एक-एक चप्पल गिर जाती थी । मेरा तो सारा दिन "मेरे घर आयी एक नन्ही परी " गाते हुए निकल जाता था । उसके बोलना सीखते ही घर की रौनक को चार चाँद लग गए ,सारा दिन बातें और गाने ,मुझे याद है हाथ में कलम ले कर घर के फर्श पर चित्रकारी करते हुए जब उसने कहा मम्मी देखो "अ" तो मन विभोर हो गया मेरी बेटी पढना लिखना सीख रही है ।उसकी तोतली बोली में बोले गयी शब्द आज भी हमारे घर की डिक्शनरी के स्थाई शब्द है । दाल छालूम (दाल चावल ),किचड़ी (कीचड )और एक गीत "ओ हसीना गुण-गुण गाणी "ये आज भी हमारे यहाँ इसी तरह गया जाता है । ४ साल की थी जब सिंठेसैजर बजाना सीखने लगी ,म्यूजिक टीचर अपने घर पर एक कार्यक्रम करवाते थे वहां उसे बजाते हुए सुना तो में अपने आंसू न रोक पाई। दिवाली पर रंगोली बनाना,होली पर पापा को रंग लगा कर किलकारी भरना यादें यादें कितनी यादें सब तो लिख ही नहीं पाउंगी ...

फिर जब दूसरे नन्हे मेहमान के आगमन की आहट हुई तो मन आशंकित हुआ अगर इसके मन को कभी ठेस पहुंची तो ?उसे प्यार से बताया की कोई छोटी बहन या भाई आने वाला है तो उसने झट से कहा मुझे तो बहन चाहिए.और भगवन ने उसकी सुन ली। एक दिन बहुत दुखी थी और गुस्से में बोली मम्मी अब अपने घर किसी को मत बुलाना और न अपन किसी के घर जायेंगे । मैंने पूछा क्यों ? तो बोली सब मेरी छोटी बहिन को मुझसे मांगते है हम ले जाये - हम ले जाएँ मुझे अच्छा नहीं लगता में इसे किसी को नहीं दूँगी। आंसू छलक आये मेरे ,मन के किसी कोने में एक दुश्चिंता थी ,दो बेटियां हमारे बाद इनका कौन ?वो एक पल में दूर हो गयी और हजारों हज़ार धन्यवाद दिया भगवन को की दूसरी भी बेटी दी जब ये दोनों है एक दूसरे के साथ तो किसी और की क्या जरूरत??

यादे यादे यादें न जाने कितनी ,बस जिसने भी इन यादों को याद करने के लिए ये दिन इजाद किया उसको धन्यवाद,aur dhanyavad arun royji ko jinhone is din ke liye kuchh likhane ka agrah kiya.

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