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'बन रही है नई दुनिया ' ( पुस्तक समीक्षा )

अमरजीत कौंके का कविता संग्रह 'बन रही है नई दुनिया ' कुछ दिनों पहले ही मिला जिसे व्यस्तता के चलते पढ़ नहीं पाई पर जब एक बार पढ़ने बैठी तो छोड़ते ही नहीं बना।  संग्रह की पहली आकर्षित करने वाली पंक्ति  ' मुहब्बत के उस एहसास के लिए जो जीवन की स्याह अँधेरी रातों में किसी जुगनू की तरह टिमटिमाता है ' इतनी रोचक और भावपूर्ण है कि आप उसके भीने एहसास में डूबते चले जाते हैं। 

शुरूआती कविताओं में ही अमरजीत जी की विराट सोच विराट ह्रदय की झलक मिल जाती है।  उनकी कवितायेँ अपने प्रेम को धरती पहाड़ नदी जंगल से परे सूरज चाँद से लेकर अंतरिक्ष ब्रम्हांड तक ले जाती है और प्रेम को उसकी विशालता में महसूस करती हैं।  
अपने आसपास के परिवेश को कवि ने शिद्दत से महसूस किया और जिया है फिर चाहे वह बस का सफर हो वैक्यूम क्लीनर से घर की सफाई , चादर की धुलाई पत्थर पक्षी या तितली।  कवि की कलम हर विषय पर पूरे अधिकार से चली है और उन्हें सार्थक अर्थ प्रदान करती है। 
बानगी देखिये , कहता हूँ खींच लो / वैक्यूम क्लीनर के साथ / मेरे दिमाग में फंसी/ यादों की मकड़ियाँ / बुनती रहती हैं जाले हमेशा / उलझा रहता है मन। 
गरीब …