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Showing posts from November, 2016

आपको पता है जंगल में भूत है।

सिक्किम यात्रा ( वो जो हमारी मदद करते रहे )
वैसे तो यात्रा के दौरान बहुत लोगों से साबका पड़ता है ये लोग ख़ामोशी से हमारे आस पास बने रहते हैं जिन्हें हम देख कर भी नज़र अंदाज कर देते हैं या एक व्यावसायिक सा भाव होता है कि उनकी सेवाओं के बदले पैसा तो दिया है। सभी पैसों के लिए काम करते है ये भी कर रहे हैं तो इसमें क्या खास है? अगर कभी जितना पैसा दिया उसके बदले कितनी मेह्नत कितनी ईमानदारी और मुस्तैदी दिखी इसका आकलन किया जाये काम करने की परिस्थियों पर ध्यान दिया जाये तो दिल उन सेवाओं का मोल समझ उनके सामने कृतज्ञ हो जाता है। कभी कभी ऐसा भी होता है कि हम सेवाओं से संतुष्ट नहीं होते या लगता है पैसे का पूरा मोल नहीं वसूल हुआ लेकिन उसके कारण अच्छे  ईमानदार और मेहनती लोगों का जिक्र ना किया जाये यह भी ठीक नहीं। 
उत्तरी सिक्किम जिला मंगन जाते हुए रास्ते में गाड़ी रुकी नामोक में। दो मंजिला पक्का मकान पहली मंजिल की बालकनी और मुख्य प्रवेश द्वार पर लगे फूलों के गमले। अंदर एक बड़ा सा हाल जिसमें टेबल कुर्सी लगी थीं। हाल के बीच से एक दरवाजा जिसके एक तरफ किचन और दूसरी तरफ एक कमरा जिसमे कई बोरे कनस्तर रखे थे। व…

जिंदगी भर कमाओ और मरने के लिये बचाओ

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सिक्किम यात्रा (नाथुला पास ) 
 नाथुला पास वाले ट्रिप में तीन ही पॉइंट्स होते हैं छंगू लेक नाथुला पास और बाबा मंदिर।  अब वापसी का समय था। मौसम बहुत ठंडा हो गया था। सेना के कैंटीन की चाय समोसे जम चुके थे। ठंडी हवा हड्डियों को भी जमा चुकी थी।  दरअसल गंगटोक दिन में पहुँचे थे तब मौसम गरम था शाम को थोड़ी ठण्ड हो गई थी और हम उसी हिसाब से साधारण ठण्ड  के कपडे पहने थे जो अब और गरम रखने में असमर्थ साबित हो रहे थे।  वापसी का सफर शुरू हो गया थोड़ी ही देर बाद गाड़ी फिर रुक गई चाय नाश्ते के लिये। हमारा पेट तो भरा ही था और ज्यादा चाय पीने की आदत नहीं है इसलिए हमने फिर कदमताल करने का विचार बना लिया। ड्राइवर को बताया और निकल पड़े। रास्ता उतार का था तो मेहनत भी नहीं करना पड़ रही थी और मज़ा भी आ रहा था। शहर में गाड़ियों की भीड़ से त्रस्त लोगों के लिए खाली साफ सुथरी सड़कें किसी वरदान से कम नहीं लगतीं।  तभी एक गाड़ी पास आकर रुकी ड्राइवर ने कहा आगे मिलिट्री एरिया है वहाँ की फोटो ना खींचें। सच अभिभूत हो गई स्थानीय लोगों की अपनी सामाजिक जिम्मेदारी के प्रति सजगता देखकर। अगर यही सजगता हर प्रदेश में हर नागरिक में हो तो द…

ललचाता झरने का ठंडा ठंडा पानी

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(9th day )नाथुला पास।  
अगले दिन सुबह नाथुला पास जाना था भारत चाइना बॉर्डर जो पूर्व सिक्किम गंगटोक जिले में पड़ती है। गंगटोक से 80 किलो मीटर दूर लगभग 14140 फ़ीट की ऊंचाई पर है जहाँ जाने के लिये शेयर्ड टैक्सी भी मिलती हैं और प्राइवेट टैक्सी भी। लगभग हर होटल में टूरिस्ट एजेंसी के एजेंट मौजूद होते हैं जो बुकिंग करते हैं। बुकिंग के साथ ही दो फोटो और पहचान पत्र की एक कॉपी देना होती है। वहाँ जाने के लिए पहले परमिट बनवाना पड़ता है जो एजेंट करवा देते हैं।  गंगटोक का टैक्सी स्टैंड जो शहर के बीचों बीच है बहुत ही बढ़िया लगा। कम जगह में बेहतरीन व्यवस्था। यह एक तीन मंजिला टैक्सी स्टैंड है हर मंजिल पर जाने के मेन रोड से अलग अलग रास्ते जो अंदर भी सीढ़ियों से जुड़ा है। हर मंजिल पर एक रेस्टॉरेंट और टॉयलेट।  परमिट बनते बनते 10 /11 बज ही जाते हैं। साढ़े ग्यारह तक स्टैंड लगभग खाली हो जाता है और लोकल टैक्सी या प्राइवेट गाड़ियों की पार्किंग के काम आता है। शाम को जो टैक्सी जल्दी आती हैं यहीं सवारी उतारती हैं पर रात में यहाँ कोई गाड़ी खड़ी नहीं रहतीं सब अपने मालिक या ड्राइवर के घर के सामने सड़क किनारे लेकिन व्यवस्थित …

जब पाँच बजे आसमान तारों से भर गया

पंद्रह दिन के अपने टूर में गुवाहाटी दार्जिलिंग और सिक्किम गये थे। लिखना तो सभी के बारे में है पर कुछ यादें ज्यादा याद आती हैं और उन्हें लिखने की इच्छा हो जाती है। ये यात्रा वृतांत थोड़ा बेतरतीब लगेगा पर उम्मीद है आपको अच्छी सैर भी करा देगा।  19 अक्टूबर 2016 (8th day ) सिक्किम की राजधानी गंगटोक के बारे में काफी सुना था।  धुल धुंए रहित बिना शोर शराबे के एक शांत पहाड़ी शहर जो राजधानी भी है। हम गंगटोक पहुंचे दोपहर करीब दो बजे। होटल की लॉबी में पहुँच  तबियत जितनी खुश हुई कमरे में पहुँचते ही मूड ख़राब हो गया। सजा धजा साफ़ सुथरा रूम लेकिन बाहर की तरफ कोई खिड़की नहीं और बंद कमरे रहना मानो सज़ा। दार्जिलिंग में भी होटल का रूम पसंद नहीं आया था तब make my trip फ़ोन करके उसे अपग्रेड करवाया था जिसमे करीब आधा पौन घंटा लग गया। अब यहाँ फिर वह सब दोहराने की हिम्मत नहीं बची थी। एक तो पहाड़ी रास्ते का चार घंटे का सफर और साथ में चार घंटे लगातार बजते गानों ने सारी शक्ति छीन ली थी अब तो बस फ्रेश होकर खाना खाकर आराम करने का मन था। फिर सोचा सिर्फ रात में सोना ही तो है तो क्या फर्क पड़ता है ?
खाने का मेन्यू देखा कुछ खा…