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महेश्वर यात्रा

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छुट्टियों में कही जाने का कार्यक्रम नहीं बन पाया तो सोचा चलो एक दो दिन के लिए महेश्वर ही हो आया जाये.वैसे मालवा की गर्मी छोड़ कर निमाड़ की गर्मी में जाना कोई बुध्धिमात्तापूर्ण फैसला तो नहीं कहा जायेगा,पर और कही जाने के लिए सफ़र के लिए ही कम-से-कम २४ घंटे चाहिए,फिर रुकने के लिए समय ही कहा बचा? हमारे पास कुल दो दिन का समय था जिसमे आना-जाना और घर ऑफिस की दिनचर्या से थोडा आराम हमारा लक्ष्य था.इसलिए महेश्वर को चुना.वैसे भी वहा ज्यादा घूमना नहीं था ले दे कर एक घाट ही तो है जहा जाया जा सकता है।
तो हम पहुँच गए महेश्वर। महेश्वर होलकर वंश की महारानी "अहिल्याबाई 'की कर्मस्थली रही है.उन्होंने इंदौर रियासत की बागडोर यही से संचालित की.नर्मदा नहीं के किनारे उनका बहुत साधारण सुविधायों वाला किला बना है.पर उन्होंने यहाँ नदी के किनारे भव्य घाट बनवाये।( हमारे जाने के दो दिन पहले ही किसी फिल्म की शूटिंग के लिए पूरा देओल परिवार यहाँ था)।
दिन तो होटल मे ऐ सी में गुजरा पर शाम को घूमने घाट पर चले गए।वहा शाम की आरती हो रही थी । पंडितजी के साथ कुछ श्रद्धालु आरती और भजन गा रहे थे.कुछ लोग नहा भी रहे थे.प…

न्याय........

२ दिसम्बर १९८४ शाम को ५ बजे मम्मी और पास में रहने वाली वैध आंटी के साथ घूमने निकली। सूरज पश्चिम में डूबने को था.आसमान में सुर्ख लाल रंग बिखेर कर आगाह कर रहा था की,पंछियों घर जाओ मुझे जाना है। पंछी भी जैसे सूरज की चेतावनी को समझ कर अपने साथिओं को आवाज़े दे कर तेज़ी से चले जा रहे थे।
मम्मी ने कहा ,कितनी सुंदर शाम है पूरा आसमान लाल हो गया ,"देखो कैसा दिन फूला है"।
आंटी बोली ,हमारी दादी कहती थी ऐसा दिन डूबना अशुभ होता है।
अरे, हम तो समझ रहे थे कितना सुन्दर लग रहा है, मम्मी ने कहा ।
बात आयी गयी हो गई,हम लोग घूम कर कुछ गप्प्पे मार कर वापस अपने -अपने घरो को चले गए।
दूसरे दिन सुबह सामान्य हुई.अपने काम निबटा कर मम्मी आराम कर रही थी, तभी पास वाली आंटी ने आवाज़ दे कर कहा ,:भाभी जल्दी आओ ,वैध भाभी के यहाँ कुछ हो गया।
देखा उनके घर के सामने भीड़ जमा थी.कुछ लोग अंदर थे ,बाहर लोगो से बात करने पर पता चला की कल भोपाल में कुछ हादसा हो गया ,वैध सर वही थे ,उनकी तबियत ख़राब हो गयी है। अभी भोपाल से फ़ोन आया है ,सर के कोलाज में ,वहा से उनके साथियों ने घर आ कर खबर दी । आंटी के कुछ करीबी रिश्तेदार आये ह…