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Wednesday, October 16, 2013

व्यथा

 
प्रारब्ध ने चुना मुझे 
चाहर दीवारी से घिरा बचपन 
बिना दुःख क्या मोल सुख का 
बिना संग क्या ज्ञान अकेलेपन का।  

तुम रहीं नाराज़ चला गया 
बिना कहे 
न सोचा एक बार 
क्या कह कर जाना था आसन? 
मुझे जाना था 
क्योंकि प्रारब्ध ने था चुना मुझे।  

ज्ञान प्राप्ति की राह में 
किसी कमज़ोर क्षण 
हो जाना चाहा होगा 
एक बेटा, पिता ,पति 
क्यों नहीं समझा कोई ?

मैंने कब चाही थी यह राह आसान 
होना चाहा था एक आम इंसान 
संघर्ष ,सुख दुःख जिजीविषा जी कर 
वंचित किया गया मुझे 
क्योंकि प्रारब्ध ने चुना मुझे।  

देवों की श्रेष्ठ कृति इंसान 
तभी तो लोभ संवरण नहीं कर पाए 
अवतरित होते रहे धरती पर 
बन कर मानव अवतार 

फिर क्यों चुना मुझे 
बनने को भगवान 
मैंने भी कभी चाह होगा 
बनना एक आम इंसान।  

कविता वर्मा  

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