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Showing posts from July, 2015

सच्ची श्रद्धा

मंदिर में भगवान के आगे तरह तरह की मिठाइयों का भोग सज गया।  घर के छोटे बेटे, अंशु के चाचू की नौकरी लगी है उसी के धन्यवाद ज्ञापन के लिये पूरा परिवार सुबह से मंदिर में था। नन्हा अंशु सुबह से मिठाई खाने को मचल रहा था ,'दादी ने समझाया पहले पूजा होगी फिर भगवान खाएँगे फिर अंशु को मिलेगी। '  अंशु बेसब्री से पूजा पूरी होने का इंतज़ार कर रहा था। पूजा के बाद भोग के लिये आव्हान करने के लिये सभी आँखें बंद किये बैठे थे। सभी के मन में अलग अलग भाव और विचार चल रहे थे।  दादी हिसाब लगा रही थीं रिश्तेदारों पड़ोसियों में बाँटने में कितनी मिठाई लग जाएगी तो मम्मी को चिंता थी बाहर नये चप्पल जूते रखे हैं कोई उठा ना ले जाये।  अंशु के पापा सोच रहे थे आधे घंटे में फ्री होकर टाइम से ऑफिस पहुँच जाऊँगा तो दादाजी पंडित जी को कितनी दक्षिणा देना है उसके हिसाब में लगे थे। चाचा नई नौकरी के ख्यालों में खोये थे।  सभी की आँखें बंद थीं सिर्फ अंशु पूरी ताकत से मींची आँखों को बार बार खोल कर देख रहा था कि भगवान ने मिठाई खाई या नहीं ?  कविता वर्मा

कहाँ से चले कहाँ पहुँचे ?

साथ साथ रहने का फैसला उन दोनों का था बालिग थे आत्मनिर्भर थे। अपनी समझ से दुनिया के सबसे समझदार इंसान। अपनी जिंदगी अपनी शर्तों पर जीने का युवा जूनून भी था और रीति रिवाजों को बेकार रवायत कह ठोकर मारने की आधुनिकता भी।  माता पिता क्या कहते , कह भी क्या सकते थे ?  साथ रहते जिंदगी रंगीन हो गई नित नए रंग भरते गए प्रेमी से सह जीवन साथी एक दूसरे की जरूरतों का ख्याल रखते एक दूसरों का काम करते करते कब बिन ब्याहे पति पत्नी हो गए पता ही नहीं चला। प्यार भी कब तक एक रंगी रहता विविध रंग भरने को दो बच्चे भी हो गए उनकी खिलखिलाहट से घर गूँजता लेकिन जल्दी ही एक के लिये वह शोर में तब्दील होने लगा। सारी आधुनिकता और सहजीवन के बावजूद भी राहें उसी परंपरागत मंजिल तक ही पहुँची जहाँ घर का मालिक तो था मालकिन नहीं।  जीवन में रंग भरते उसने अपने जीवन को बेरंग कर लिया था अब उसके पास ना अपना करियर था ना ही आत्मविश्वास पूर्ण व्यक्तित्व।  आखिर एक दिन मेरा घर मेरी शांति मेरी निजता के नाम से राहें अलग अलग हो गईं। बच्चों से गर्भनाल से लगा ममता का नाता था इसलिए बच्चे उसके हिस्से में आये और मकान पुरुष के हिस्से में।  कविता …

व्यापमं घोटाला

कल एक पुरानी स्टूडेंट से बात हुई वह एक साधारण परिवार की ब्रिलियंट स्टूडेंट थी।  उसका सपना था डॉक्टर बनना और हम सभी टीचर्स को पूरा विश्वास था कि उसका सेलेक्शन हो जायेगा। दो बार कोशिश करने पर भी जब उसका सेलेक्शन नहीं हुआ हम सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने भी इसे अपनी किस्मत मान कर बी एस सी करते हुए ट्यूशन लेना शुरू कर दिया।  उसके पढ़ाये बच्चे जब एग्जाम में बेहतरीन करते वह दिल से खुश होती थी लेकिन जब से व्यापम घोटाला उजागर हुआ है वह बहुत निराश है।  कल मिलते ही पूछने लगी "मैडम मेहनत और ईमानदारी का जो पाठ हमें स्कूल में पढ़ाया गया था क्या वो गलत था ?मुझे तो इसका कोई सुफल नहीं मिला।  जो सीट मैं डिज़र्व करती थी वह किसी और ने पैसों के दम पर खरीद ली। समय के साथ मेरा सपना तो टूट ही गया। अब सपने मेहनत से नहीं बेईमानी और पैसे के बल पर पूरे किये जाते हैं।" मैं अनुत्तरित थी लेकिन उसकी निराशा ने बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया। 
आरक्षक भर्ती सेवा में चयनित होने के लिये अजय से जब पाँच लाख रुपये की माँग की गई तो वह इस कदर हतोत्साहित हो गया कि उसने सारी कोशिशें छोड़ चाय का ठेला लगा लिया।  छात्र अभिष…

बरसात

बरसात  मड़िया में बैठा रामभरोसे झमाझम बारिश होते देख रहा था। बरसती हर बूँद के साथ उसका मन प्रफुल्लित होता जा रहा था। मन ही मन प्रार्थना करते उसने कहा। बरखा मैया ऐसे ही दो चार दिन बरसियो फसल को अमृत पिला दियो जा बेर  तुम्हरी मेहर रही तो बिटिया के हाथ पीले कर दूंगो।  बरखा रानी भी उसकी प्रार्थना को अनसुना कहाँ कर पाई ऐसे झूम कर बरसी की खेत खलिहान नदी बन गए। 
रामभरोसे मड़िया में बैठा बरखा रानी को कोस रहा है जा दारी बरसात ने सब कुछ बहा डालो सबरी फसल गल गई खेत में नदी की कीचड़ भर गई हे आग लगे ऐसी बरसात के। भगवान इस साल तो खाबे को अन्ना मिल जाये बहुत है। बिटिया की किस्मत पर पानी फेर डारो।  गरीब की सुनवाई किस रूप में होती है ये तो जग जाहिर है।  अगले बरस रामभरोसे मड़िया में बैठे आसमान ताक रहा है बादल का नमो निशान नहीं है एक बरसात के बाद खेतों में बीज डाल दिया था फसल पानी की आस में मुरझा गई है और रामभरोसे बिटिया की किस्मत को कोस रहा है।   कविता वर्मा