Tuesday, March 30, 2010

नियमो में कैद बचपन

मार्च आ गया इसी के साथ शुरू हो गया नया सत्र। नए सत्र के साथ ही नयी युनिफर्म्स,नए बैग ,नए शैक्षणिक कार्यक्रम के साथ ,कुछ नए और कुछ पुराने नियम । ये नियम बच्चों को कितना अनुशाषित करते है ये तो नहीं पता,पर कई नियम तो बच्चों पर लादे गए से लगते है । इनमे से कुछ नियम जो मुझे परेशान करते है उनका जिक्र यहाँ करती हूँ । (यहाँ बता दूं की जिक्र पब्लिक स्कूलों का हो रहा है )।
* मोटी-मोटी युनिफर्म्स जिनका कोलर बैटन बंद होना जरूरी है।
*कमर पर बेल्ट होना चाहिए जो ढीला या लटका ना हो.( चाहे बच्चे की कमर पसीने से गीली हो जाये।
* गर्मी में भी पूरे दिन जूते -मोज़े पहनना जरूरी है।
*गले में ताई होना जो उन्हें पब्लिक स्कूल का होने की पहचान देती है।
* क्लास में संन्मैका का फर्नीचर जिस पर उन्हें सारा दिन बैठना है,दो पेरिओद के बीच में उठ कर घूम नहीं सकते,
चाहे उनके बम्स पसीने से भीग जाये या दर्द करने लगे।
*दो पेरिओद के बीच-बीच में पानी पीने या बाथरूम जाने की की मनाही,आखिर उन्हें अपने पर नियंत्रण रखना जो सीखना है।
*एक नियम है हाथों को पीछे बांध कर चलाना,मुझे इसका ओउचित्य आज तक समझ नहीं आया .(मुझे तो लगता था की हाथों का मूवमेंट चल को आसान बनता है) ।
*इसी तरह के और भी कई नियम होंगे जो आपके नौनिहालों को परेशां करते होंगे ,उनका जिक्र करके इन्हें बदने की दिशा में कदम बढ़ाये।

दो लघुकथाएँ

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