Wednesday, September 5, 2012

मन का क्लेश

 ये कविता मेरे भाई योगेश वर्मा ने अपने कौलेज के दिनों में लिखी थी


मन का क्लेश 
समाप्त हुआ अब वह अध्याय
नित-सौरभ-संचन औ' काव्य व्यवसाय 
नूतन से विषयों ने आज किया है मन व्यथित
और प्रिय यायावरी से भी हुआ अब तन थकित 

तब लेखनी में भी हुआ करती थी एक पावन रसधार 
और हम स्वप्नों को बुनते थे लेकर मन के तार| 
क्या कविता महज तुकबंदी थी और गीतों में शेष तान ही था?
 शब्दों का वह खेल भावुक मन का गान नहीं था?

अब भुला चला वो प्रेम स्मृतियाँ -घुटनों पर है सिर रखा 
पर्वत हिलाने में सक्षम मनुष्य हिय बोझ से है थका
अनुभूति गयी,आल्हाद गया,अब अश्रु रह गए शेष!
स्नेह क्षणिक तड़ित था मन में,स्थाई है क्लेश!
 

5 comments:

  1. बहुत बढ़िया बेहतरीन प्रस्तुति,,,,

    RECENT POST,तुम जो मुस्करा दो,

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  2. गहरी अनुभूति लिए ... भावमय रचना ...

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  3. सही लिखा हैं कविता जी आपने ...आज वो पहले वाला वक्त है भी नहीं ...
    बदलाव ही जीवन को गति देता हैं ....सादर

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