Saturday, December 26, 2009

"परेंटिंग स्किल"

घर के पास ही एक आदिवासी परिवार रहता है.पति-पत्नी और उनके ५ बच्चे.सारा दिन गाय-बकरियां चराते हुए यहाँ-वहां घूमते रहते है। मां-बाप सुबह से ही काम पर निकल जातेऔर बच्चे अपने काम पर,घर का दरवाजा ऐसे ही अटका दिया जाता.जब भी कोई बच्चा वहां से निकालता एक नज़र घर पर डाल , पानी पी कर कुछ देर सुस्ता कर फिर गाय-बकरियों को इकठ्ठा करने लगता. बच्चों की आत्मनिर्भरता देख कर आश्चर्य होता.कभी-कभी सोचती ये अनपढ़ आदिवासी कैसे इन बच्चों को सिखाता होगा,फिर सोचती शायद इतना मजबूत बनना इनके खून में ही है। 
एक दिन सुबह-सुबह किसी छोटे बच्चे के चीखने की आवाज़ सुन कर घर से बाहर निकली,तो देखा उसकी सबसे छोटी  मुश्किल से ३-४ साल की लड़की मैदान में खड़ी है और ३-४ कुत्ते उसके आस-पास खड़े जोर-जोर से भौक रहे है.वह लड़की डर कर चीख रही है,उसके बड़े भाई-बहन और पिताजी पास ही खड़े देख रहे है,पर कोई भी न तो कुत्तों को भगा रहा है न ही उस लड़की को उठा कर घर ला रहा है। 
कुछ देर चिल्लाने के बाद जब उस लड़की को ये समझ आया की उसे ही इस स्थिति से निबटना है ,उसने पास पड़े पत्थर उठाये और उन कुत्तों को मारने लगी। उसे सामना करता देख उसका पिता अब इत्मिनान से पास ही पड़ी खाट पर बैठ गया,भाई-बहन अपने-अपने काम में लग गए,और वो लड़की उन कुत्तों को भगा कर घर चली गयी। 
मैं ये सारा वाकया देख कर उस अनपढ़ पिता की "परेंटिंग स्किल" को सराहती हुई अन्दर आ गयी।     

Friday, December 25, 2009

पोल सर ; एक विनम्र श्रधांजलि,


कल पुराने पपेर्स इकठ्ठा करते हुए कोने में छपी एक छोटी सी खबर पर नज़र गयी."गणित को सरल बनाने वाले "सर"। पड़ते ही जेहन में पोल सर का नाम कौंधा.गणित को सरल बनाने वाले उसे दिलचस्प बनाने वाले,हमारे अपने श्री विश्वनाथ मार्तंड पोल सर। उनका निधन १६ दिसंबर को चेन्नई में हो गया.इंदौर के इंदिरा विद्या मंदिर में क्लास ८ में हमें गणित पढ़ने वाले सर सदा सा पहनावा,चहरे पर स्निग्ध मुस्कान,और गणित के कठिन से कठिन सवालों को सरल से सरल नम्बरों के उदाहरनो से आसन बनाने वाली उनकी शैली। मैं सिर्फ एक वर्ष ही उनकी विद्यार्थी रही पर उनके पढ़ाने की जो अमित छाप मेरे ऊपर पढ़ी उसने मुझे भी गणित का शिक्षक बना दिया.आज भी कोई भी कठिन सवाल समझाते हुए एक बार सर को याद कर सोचती हूँ ,की वो इसे कैसे समझाते?
इस ब्लॉग का उद्देश्य उनके सभी विद्यार्थियों को उनके निधन की दुखद सूचना देना है.साथ ही बिछड़े साथियों से मिलने की एक उम्मीद भी .धन्यवाद श्री प्रभाकर नारायण उंडे का जिन्होंने इस खबर को दे कर सर के पुराने विद्यार्थियों को उन्हें श्रद्धांजलि  देने का मौका दिया.

Thursday, December 3, 2009

क्यूँ छीना मेरा चीर

मेरे पिता ने बड़े नाजों से पला मुझे ,सदा सजा संवार कर रखा ,मुझे हरी नीली ओढ़नी पहराई
उस पर अनगिनत रंगबिरंगे फूल सजाये ।मेरी चोटी में बर्फ से सफ़ेद फूलोंकी माला गुथी । में बहुत खुश थी इठलाती फिरती थी लहरों के साथ उछलती रहती थी दिन रत अपनी नीली ओधनी को हवा में उड़ाते हुए ।वैसे तो कई दोस्त थे मेरे पर वो बड़े शांत थे मैं चाहती थी एक ऐसा दोस्त जो मुझसे बात करे ।मेरे पिता भला मेरी इच्छा कैसे टालते ।मुझे एक दोस्त मिला भी मैंने उसे अपना समझा खूब खुश थी मैं . उसे मेरी हरी ओढ़नी में लगे फूल अच्छे लगे मैंने उसे दिए ,मेरी ओढनी से भी कई टुकडे उसे दिए ,पर उसके लालच का तो जैसे कोई अंत ही न ही था ,वो और -और मांगता रहा मैं देती रही ।आज मेरा असीमित चीर टुकडे -टुकडे हो कर बमुश्किल मेरा तन ढक पा रहा है ।उसका नीला रंग मटमैला हो गया है , और तो और मेरे बालों में गुथी सफ़ेद फूलों की वेणी भी मसल कुचल दी गयी है ।हाँ अब मेरा तन ढकने के लिए उसने मुझ पर लाल , हरेपीले कुछ टुकडे जरूर फ़ेंक दिए हैं जिन्होंने मेरी बची -खुची सुन्दरता को भी हर लिया है ।अब मेरा ये दुखवा मैं कासे कहूँ ?  
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ममता

रोज़ की तरह सुबह घर से स्कूल जाते हुए रस्ते में बनने वाले एक घर को देखती। वहां देखभाल कराने वाले चौकीदार के परिवार में दो छोटे -छोटे बच्चे भी हैं जो सड़क पर खेलते रहते हैं .जब भी कोई गाड़ी निकलती उनकी माँ उन बच्चों को किनारे कर लेती .वहां से गुजरते हुए चाहे कितनी भी देर क्यूँ न हो रही हो गाड़ी की गति धीमी कर लेती.पता है बच्चे सड़क पर ही खेल रहे होंगे.हमेशा उनकी माँ को ही उनके साथ देखा.आज सुबह दोनों बच्चे सड़क पर बैठे थे उनकी माँ वहां नही थी पर उनके पिता पास ही खड़े थे। जैसे ही गाड़ी का हार्न बजा पिता ने गाड़ी की और देखा और तुंरत ही उनकी नज़र बच्चों की तरफ़ घूम गई ।बच्चों को किनारेबैठा देख कर वह फ़िर बीडी पिने में मशगूल हो गया। लापरवाह से खड़े पिता की ये फिक्र मन को छू गई।

Wednesday, November 25, 2009

"हेलो मर जाओगे"

कहते है इन्दौर दिल वालो का शहर है.यहाँ कि हवाओ मे अपनेपन की महक है.यहाँ  हर व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की चिन्ता करता है,उसके लिये फ़िक्रमन्द है.अब ये ही लीजिये ,एक बार मे डाक्टर को दिखाने के लिये समय लेने गयी.समय मेरी सुविधा के अनुसार नही मिल रहा था तो मे बाहर आ गयी .मेरे पीछे पीछे एक सज्जन जो वही बैठे सारी बाते सुन रहे थे आये और कहने लगे "भाभीजी आज डाक्टर साहब जो समय दे रहे है वही ले लीजिये फ़िर अगर आप आ सके तो ठीक है नही तो मत आइयेगा".अब बताइये बिना जान-पहचान के इतनी फ़िक्र करते हुए लोग इन्दौर के अलावा कही मिलेगे?और जब ऐसे लोगो से आपका सम्पर्क होता है तो दूसरो की फ़िक्र करना आप का भी फ़र्ज़ बन जाता है.पर कभी-कभी ये फ़िक्र और चिन्ता इतनी हावी हो जाती है कि कब चिन्ता गुस्से मे बदल जाती है,और कब गुस्सा झिड्की से अधिक कठोर होकर फ़ूट पडता है पता ही नही चलता.
इन्दौर का मालवा उत्सव बहुत प्रसिद्ध है.बात करीब ४-५ वर्ष पुरानी है.पतिदेव की बहुत इच्छा थी मालवा उत्सव देखने जाने की.वैसे तो मॆ अपनी शान्त सी कालोनी की सुहानी शाम छोड कर कही जाना, खास कर भागते ट्राफ़िक,क्रत्रिम रोशनी और शहर की चिल्लपो मे जाना पसन्द नही करती .परन्तु उस दिन मैंने मन बना ही लिया.
मालवा उत्सव गाँधी  हाल मे चल रहा था .कृष्णपुरा पुल पार करके आगे बडे ही थे कि नज़र आगे मोटर बाइक पर बैठी लडकी पर पडी.लाल रंग  पर सुनहरी लाइनो वाला सूट और उस पर लाल सुनहरे काम वाली चुन्नी .अरे ये चुन्नी तो काफ़ी लम्बी है नीचे लटकती चुन्नी पर नज़रे फ़िसलती चली गयी और छोर तक पहुचते दिल धक से रह गया.चुन्नी का एक सिरा पिछ्ले पहिये की चेन के करीब बार-बार टकराता और दूर हट जाता.अरे अगर फंस गया तो? उसे बोलूं  पर बोलूं  कैसे?गाडी के कांच  तो बन्द है .शहर की हवा मे धूल और धुँआ इतना है कि घर पर किये मेकअप पर धूल की एक परत चढ जाती है.ये तो चिढते भी है इतनी गर्मी मे भी तुम खिड़कियाँ बन्द रखती हो. पर थोडी गर्मी मुझे सुहाती है.
कार के कांच  खोलते -खोलते वह मोटर बाईक आगे निकल गयी.लगता है नई -नई शादी हुई है,लडकी आगे को झुक कर बैठी है पीछे खुद का ही ध्यान नही है.दोनों बातो मे व्यस्त है या लड्की का ध्यान भी सडक पर है मे कुछ तय नही कर पायी.ध्यान आया जब हम मोटर बाइक पर चलते थे,मेरा पूरा ध्यान सडक पर होता था जैसे अगर नज़र हटाई तो कोई दुर्घट्ना हो जायेगी.
इन्दोर मे एम जी रोड पर शाम को साढे सात बजे एक दुपहिया वाहन का कार से पीछा करना आसान तो नही हॆ .मन मॆ अजीब से ख्याल उठे,दुपट्टे गाडी मे फंसने  से हुए कई हादसे जेहन मे कौंध  गये.नही-नही उसे तो बताना ही पडेगा,अरे चुन्नी कभी भी पहिये मे लिपट सकती है.पतिदेव भी अपनी जिम्मेदारी समझ कर गाडी की गति बढा कर बाईक का पीछा कर रहे थे.अचानक चौराहे पर उन्होने गाडी को जोरदार ब्रेक लगाये,साईड से एक गाडी अचानक कार के सामने आ गयी थी .विचारो ने तुरन्त करवट ली,क्या करते हो?ध्यान से चलो.
अब उस लडकी की फ़िक्र अपने ऊपर  गुस्से मे बदल गयी.मुझे ही क्या पडी हैचिन्ता करने की?इतने लोग भी तो है जो आ जा रहे है.क्या इनमे से कोई भी उसे नही बता सकता?क्या उन्हे उसका दुपट्टा नही दिख रहा?मुझे भी परायी पीर मे जान हलकान करने की बुरी आदत है.अब इन्हे रोकना नामुमकिन है.अब तो ये उसे बता कर ही दम लेगे .अभी अगर एक्सीडेन्ट हो जाता तो?मर ही गये थे .पर अब इन्हे कैसे समझाउं ? कि उनकी छोडो अपनी सोचो, आखिर ये भी तो इसी इन्दोर के हवा पानी मे रहते है.
ये दिमाग भी अजीब चीज है एक सेकेन्ड से भी कम समय मे इसमे इतने विचार आ जाते है,अच्छे भी और बुरे भी .हो सकता है अगल-बगल मे चलने वाले सभी लोग इस व्यस्त सडक पर अपने को सुरक्षित  पहुचाने मे ही लगे है.किसी का ध्यान उस ओर गया ही नही है.पर मेरा ध्यान तो जा चुका है ,अब भी अगर मे उसे आगाह नही करती और अगर यदि चुन्नी पहिये मे उलझ गयी तो? उस लड्की के गले मे फ़न्दा बन गयी तो? वो गिर गयी तो?इतना ट्राफ़िक ,तेज़ गति से चलती गाडिया,तेज़ गति से चलती गाडी से गिरना,और..............नही-नही मुझे उसे बताना ही पडेगा ,अब भी अगर मैने उसे नही बताया तो जिन्होने उसे नही देखा वो तो निर्दोष है पर मै मेरी अनदेखी से किसी की जान पर बन आये इस ख्याल ने ही मुझे बैचेन कर दिया.
आखिर एक और चौराहा पार कर थोडे आगे बढ्ते ही उस गाडी के समीप पहुँच गये .अब तक दिमाग मे विचारो का पुलाव पक गया था.ढेरो विचारो का घालमेल हो गया था.उनमे फ़िक्र थी,किसी का भला करने की इच्छा थी,तो भलाई के इस विचार पर खीझ भी थी.एक अच्छे नागरिक होने का भाव था,तो इस जिम्मेदारी से उपजे तनाव का गुस्सा भी था.पर उस लडकी को आगाह करने का विचार अब भी अन्य सभी विचारो पर हावी था. कार मोटर-बाईक के बगल मे पहुचते ही मैने जोर से आवाज़ लगायी,"हेलो मर जाओगे" और हाथ से चुन्नी कि और इशारा किया.लड्के ने तुरन्त बाईक को ब्रेक लगाया,और घूर कर मेरी और देखा.पतिदेव ने कार की रफ़्तार तेज़ कर दी,और भुनभुनाये,ऐस कहने की क्या जरूरत थी?सिर्फ़ चुन्नी का कह देना था.अब सारी फ़िक्र तनाव और गुस्सा पतिदेव पर फ़ूट पडा .अपनी चिन्ता किये बगैर कब से पीछाकर रहे हो अगर कुछ हो जाता तो?अब जो दिमाग मे चल रहा था वो ही जुबान से निकल गया,कोइ जान बूझ कर तो नही बोला ना .
अब तक गाडी गाँधी  हाल तक पहुँच  गयी थी.गाडी की गति धीमी हुई तभी वही बाईक ओवर टेक कर के आगे बढी,पीछे बैठी लडकी ने घूर कर मेरी और देखा.
मालवा उत्सव मे मेरे ही शब्द मेरे कानो मे गूंजते  रहे,"हेलो मर जाओगे"जिस पर मुझे हंसी  भी आती रही और गुस्सा भी.
कविता. 

Tuesday, November 17, 2009

विरासत

गर्मियों की एक दोपहर गर्म हवाओं के थपेड़ों को घर में घुसने से रोकने के लिए दरवाजे खिड़की बंद कर बैठी थी ,कि दरवाजों कि संध को रास्ता बना कर एक आवाज़ भीतर तक घुस आयी ,घी ले लो -घी लेलो.
अलसाई दुपहरी में ये कौन आ गया ,बुदबुदाते हुए थोड़ी सी खिड़की खोल कर बाहर झाँका ,तो हाथ में एक छोटी सी मटकी पकडे ,लहंगा पहने ,एक औरत को खड़े देखा.
बाई सा घी ले लो.चोखो घी है, हाँथ को बन्यो ,उसने कहा.
घी तो चाहिए ही नही ,इसलिए उसे टरकाने कि गरज से कहा, नही हम घी नही लेते घर पर ही बनाते है,अभी जाओ.
अरे बाई देखि लो घर को बन्यो चोखो घी है.पैसा कि जरूरत है काम आयेगो.
अब तक मेरा आलस छूट गया था इसलिए उस के बारे में और पता करने कि गरज से मैंने पूछा कहाँ से आयी हो?
राजस्थान से आयी हूँ बाई .यहाँ ढोर चराने आए है .एक बार घी देख लो ,चोखो लगे तो ले लीजो.
उसके सरल आग्रह को मैं इनकार न कर सकी और गर्म थपेड़ों कि परवाह न करते हुए दरवाजा खोल के बाहर आ गयी.मटकी में देखा करीब एक किलो घी होगा .कितने का है ?नही लेना था फिर भी पूछा .
एक सेर है पचास और दस रूपया दे दीजो। 
अब चौकाने कि बारी मेरी थी एक किलो घी आधा किलो कि कीमत में ? पर ये तो एक किलो है,इसकी कीमत तो एक सौ बीस रुपये होनी चाहिए.गाँवों में आधा किलो को एक सेर कहते है इसलिए ये कम कीमत लगा रही है.पर उसकी सरलता ने मुझे मोह लिया था ,मैं नही चाहती थी कि वो ठगी जाए इसलिए कहा ,ये तो एक किलो है इसकी कीमत कम क्यो बता रही हो ?पर मेरी खड़ी बोली उसके ज्यादा पल्ले नही पड़ी,तब अपनी भाषा को तोड़-मरोड़ कर उसे समझाया इतने घी के सौ ऊपर बीस रूपया लेना.
अब उसे कुछ समझ आया तो बोली ,ना बाई म्हारी सास ने गाँव से आते समय बोल्यो थो ,सहर में नी मिले तो भूखो राइ ले जो पण बेईमानी को पैसो मत कमाजो ,यो घी तो एक सेर है नि तुम तो पचास ऊपर दस रूपया दी दो,इतना कहते हुए उसने वो घी कि मटकी मेरे हाथ में पकड़ा दी.
और मैं अवाक् खड़ी ये समझने की कोशिश करती रही कि ६० रुपये में घी के साथ-साथ किस सरलता से संस्कारों कि कितनी बड़ी विरासत भी वो मुझे दिए जा रही है. 

Sunday, November 8, 2009

छुट्टी

एल टी सी लेने का समय दिसम्बर तक ही है.अभी कहीं  नही गए तो निरस्त हो जायेगी,पति ने कहा तो वो सोच में में पड़ गयी.पिछले तीन सालों से कहीं घूमने नही जा पाए,क्या करे क्या न करे.जाने में घर की व्यवस्था करने में कोई दिक्कत नही है पर छुट्टी लेना बहुत मुश्किल काम है.फिर भी अब सोच लिया अभी समय ठीक है बच्चों की एक्साम भी नही है,ऑफिस में भी ज्यादा लोड नही है,६-७ दिन तो निकाले  जा सकते है,रिजर्वेशन भी इत्तफाक से मिल गया.उसने लीव ऍप्लिकेशन भरी कारण क्या लिखूं सोचते सोचते भी उसने सही लिखा,गोवा घूमने जा रहे है .
सुनते ही बॉस की भ्रुकती  तन गयी भी ये कोई समय है,आप को सोच समझ कर प्रोग्राम बनाना चाहिए आदी आदी.
उसने कहा भी मैंने पिछले तीन महीनों से कोई छुट्टी नही ली है पिछले दो सालों से सी एल इनकैश करवा रही हूँ ,यहाँ तक की बीमार होने पर भी कभी छुट्टी नही ली .पर बॉस ने साइन नही किया तो नही किया,थोडी बहस भी हुई आख़िर शर्त रखी गयी की इन छुट्टियों में आपका काम कौन और कैसे सम्हालेगा इसकी रूपरेखा बना कर जाइये,ठीक है ये भी सही सोच कर उसने हाँ कर दी.
इस बारे में पतिदेव को बताया तो बोले तुमने कहा क्यों की गोवा घूमने जा रही हो बोलना  था भाई के घर कार्यक्रम है ,तारीख निश्चित हो गयी है इसलिए जाना जरूरी है.सही बात बता कर कभी छुट्टी मिलती है .
खैर जो होना था सो हो गया .
पिछले दिनों एक और सहकर्मी भी तो घूमने गयी थी उससे पूछा तो उसने बताया मैंने तो कहा था की "मौसी सास के यहाँ शादी है उसके बाद कुलदेवी के दर्शन को जाना है" तूने सच क्यों कहा ?आजकल सच बोलने का जमाना नही रहा.
दूसरे दिन सारी रूपरेखा ले कर बॉस के ऑफिस में गयी ऍप्लिकेशन दी रूपरेखा दी ,मुंह  बनाते हुए उन्होंने साइन किया ,उठते  हुए उसकी नजर बॉस के पीछे टंगी गांधीजी  की फोटो पर गयी ,और वह एक उन्सास लेते हुए कमरे से बाहर निकल गयी .कविता वर्मा     

Monday, November 2, 2009

तसल्ली


अरे बेटा यहाँ आ भैया को चोट लग जायेगी. कहते हुए मांजी  ने मिनी को अपनी गोद मे खींच  लिया. मम्मी के पास भैया है ना ,थोडे दिनो मे वो मिनी के पास आ जायेगा,उसके साथ खेलेगा, मिनी उसे राखी बांधेगी  मांजी के स्वर मे पोते के आने की आस छ्लक रही थी.नेहा को भी बस उसी दिन का इंतजार  था.


"बेटी हुई है" नर्स ने कहा,तो मांजी  का चेहरा बुझ गया.नेहा से तो उन्होने कुछ नही कहा पर उनके हाव-भाव ने काफी कुछ कह दिया. मिनी से उनका बात करना बन्द हो गया. नेहा अनजाने ही अपराधबोध से ग्रस्त हो गयी.विनय ने भी तो कुछ नही कहा,बस चुपचाप उसकी हर जरूरत का ध्यान रखते रहे.मांजी  की चुप्पी देखकर विनय की चुप्पी तुड्वाने का उसका साह्स नही हुआ.
अस्पताल से घर आकर दरवाजे पर ठिठकी कि शायद मांजी  घर की लक्ष्मी की आरती उतारे,पर घर मे पसरी निशब्दता देखकर चुपचाप अपने कमरे मे चली गयी.
मिनी छोटी बहन के आने से अचानक बडी हो गयी. उसने अपने आप को गुड़ियों के संसार  मे गुम कर दिया,वहां बोझिलता कम थी.
विनय आजकल अपने काम मे ज्यादा ही व्यस्त थे, उनसे बात करने का समय ही नही मिलता था.घरवालो की खामोशी ने उसके दिल-दिमाग को अजीब सी बॆचेनी से भर दिया.रात मे सोते-सोते अचानक नींद खुल जाती,दिमाग मे कभी बहुत से ख्याल गड्मग होते या कभी सोचने पर भी कोइ ख्याल नही होता.
इसी बेचेनी मे एक रात उसने नींद मे करवट बदली तो अधखुली आँखों से विनय को छोटी बिटिया के हाथ को अपने हांथों मे थामे स्नेह से उसे निहारते पाया.उसे लगा कमरे मे उजास भर गया,घर मे घंटियाँ  बजने लगी,उसकी बेचेनी अचानक खत्म हो गयी,उसके बाद वह चैन से सोयी.

Sunday, November 1, 2009

एक सुबह


रविवार की सुबह, हलकी गुलाबी ठण्ड एक बार तो सोचा एक झपकी और ले लूँ .लेकिन रविवार की सुबह जैसी सुकूनदाई सुबह नही होती ये सोच कर सारा आलस रजाई के साथ झटक के दूर फेंका और उठ खड़ी हुई.खिड़की से झाँका तो नव आदित्य को भी कुहासे के लिहाफ को परे खसका कर उठते देखा .मुझे देखते ही उसनेआँखे मिचका कर गुलाबी किरणों की मुस्कान मुझ पर फेंकी,और जैसे अपने साथ अठखेलियाँ करने का आमंत्रण दिया। अब भला इस आमंत्रण को मैं कैसे ठुकराती,धीरे से दरवाजा खोला और बहार आयी तब मुझे इस मुस्कराहट का राज़ समझ में आया.शरद ऋतू में ठंडी बयार की पिचकारी लेकर वो जैसे मेरे स्वागत में ही खड़ा था.बाहर आते ही सारोबार कर दिया.पर अब भीतर भागने से भी क्या होता,वैसे भी पीठ दिखाना मुझे पसंद नही है.मैंने भी सोचा ठीक है आज तुम ही खुश हो लो.मेरा हाल देख कर अब तक बाल भानु अट्टहास कर उठा .और उसकी हँसी तरुण कोपलोंपर मोतियों की तरह बिखर गयी. इतने सारे मोती कैसे चुनु,सोच ही रही थी कि चुनमुन गिलहरी ने चू चू कर मेरा धयान खीचा.मेरे ही किचेन कि तान पर घर बनाया है और मुझे ही आँख दिखाती है,पर फिर सोचा इसने कहाँ मैंने ही इसके आजाद परिवेश पर कब्जा कर लिया और बारह इंच जगह देने में भी इठलाती हूँ कितना अंहकार,छि-छि .पर अभी इतने विचारों के लिए फुरसत कहाँ थी गौरयों के झुंड ने आकर मुझे लताडा,रोज़ तो काम की जल्दी में भूल जाती हो कम से कम आज रविवार को तो समय से कुछ खाने को दो,रोज़ रोज़ इधर-उधर घूम कर खाना इकठ्ठा करने कि हमारी छुट्टी है.ठीक है बाबा ,चिल्लाओ मत,कहते हुए जल्दी से चावल और ज्वार के दाने उनके लिए डाले ,पानी भरा, और वो ,बिना मेरी और देखे अपनी सखिओं के साथ बतियाते हुए नाश्ते में मशगूल हो गयी. अब मेरा ध्यान फिर आसमान पर गया और देखो तो सूरज मुझे चिढा रहा था हा हा हा तुम तो फुरसत कि सुबह बिताना चाहती थी ना .मैंने मुस्कुरा कर उसकी तरफ़ देखा ,एक नज़र गपियाती चिडियों पर डाली नीम पर फुदकती गिल्हारिओं को देखा ,एक एक कर ओस कि बूंदों को चुनती किरणों पर नज़र डाली एक संतुष्टि कि साँस ली और चाय बनाने अन्दर चली गयी अब उसे कैसे समझाऊ जो सुकून इस काम में था उसके आगे तो सारे जहाँ कि फुरसत बेकार है.वैसे भी कई काम करने है ये सब समझाने का समय नही है मेरे पास.अब आप ये समझाना चाहे तो कल कि सुबह कोशिश कर लीजिये.

Tuesday, October 27, 2009

युवा पीढी के बारे में एक विचार

kabhi-kabhi sochati hu kya hamari yuva peedi aalsi ho gayee hai?kya unme apane se bado ke liye samman ki bhavana khatm ho rahi hai?kuchh aise hi udaharano se aaye din do-char hoti hu,ek library mein kuchh ladakiyan khadi hai ,unhe upar vale shelf se kuchh pustake chahiye.vo intazar karti hai library assistent ka .par vo vyast hai ,unki madam aa kar poochhati hai koun si pustak chahiye?aur vo upar ke shelf ki aur ishara kar deti hai. madam table par chad kar pustak nikalati hai ,par un ladakiyon ko koi shikan nahi hoti.isi tarah ke udaharano se rozana hi do-char hoti hu.lagata hai aaj ki yuva peedi bahut practical ho gayee hai.badon ke liye samman hai par vo unki jarurat ke hisab se ghatata badata hai.jisse jaroorat padane vaali ho uska bhar- poor samman karo aur jab jaroorat nikal jaye chuppi saadh lo.aaj kal ke bachche samay se pahale hi duniyadari seekh rahe hai.unme naisargik bholapan khatm ho raha hai. iske liye kai karan jimmedar hai,doosron ko kya dosh de shayad hum hi unhe uchit mahol nahi de paa rahe hai.par jo bhi ho in karno par vichar karna hi hoga taki isi yuva peedi ko ek swasth samaj diya ja sake.
kavita

Monday, October 19, 2009

निदान


ऊउउऊ ............ मोनू के रोने की आवाज़ सुन कर सुनीति चोंक गयी.क्या हुआ बेटा ?
मम्मा दादी ने सोनू को ज्यादा जामुन दी मुझे कम दी .दादी हमेशा ऐसा ही करती है। सोनू को हर चीज ज्यादा देती है। मोनू की आवाज़ में दिल को छलनी कर देने वाली कातरता थी। नहीं  बेटा ऐसा नही है दादी सबको बराबर देती है तुम्हे ऐसा लगा होगा । दादी तो मोनू को भी बहुत प्यार करती है,कहते-कहते सुनीति ख़ुद ही सकपका गयी। अब पाँच साल के बच्चे को क्या समझाए वो भी जानती है मोनू झूठ नही बोल रहा है। अगले महीने राखी है दोनों ननद आने वाली हैं। मांजी की इच्छा है इस बार उन्हें पूरे कपडे करने के साथ ही सोने के कंगन भी दिए जाए.जेठजी अच्छी कंपनी में ऊँचे पद पर हैं उनके लिए कुछ हजारों का खर्चा निकलना कुछ ज्यादा मुश्किल नही है,पर पति की नौकरी में इस समय कुछ भी ठीक नही चल रहा है ,ऐसे में ये खर्च .परसों ही सुबोध ने मांजी  से पैसे का इंतजाम न होने की बात की थी तभी से उनका मूड उखडा हुआ है । 
मोनू रोते-रोते सो गया,उसे चादर उड़ाते  हुए सुनीति ने अपनी आंखों की कोरे पोंछी,और काम में लग गयी।
शाम को सुबोध ऑफिस से आए तो सोनू को सोते देख कर पूछा ये अभी क्यों सो रहा है ?
खेलते-खेलते थक गया था । 
वो पति की परेशानी और नही बढ़ाना चाहती थी,लेकिन  मोनू के गालों पर सूखे आंसुओं के निशान सुबोध की नज़रों से छुप न सके .में अभी आता हूँ कह कर वो घर से निकल गए. 
रात में सुबोध ने उसके हाथ में दस हज़ार रुपये रखे तो वह चौंक पड़ी । मैंने दिनेश से उधार ले लिए कल मांजी को दे दूंगा.कहते हुए उन्होंने मोनू के सर पर हाथ फेर कर उसका माथा चूम लिया।
कविता वर्मा

Wednesday, September 30, 2009

भीड़ तंत्र


 स्कूली दिनों में शायद मेरी नागरिक शास्त्र की शिक्षिका बहुत अच्छी थीं या मैं ही बहुत लगन से पदती थी जो मैंने आम भारतीय के मौलिक अधिकारों के बारे में बहुत अच्छे से न सिर्फ़ पढ़ा बल्कि कंठस्थ भी कर लिया। इसीलिए अपने अधिकारों के प्रति सजग रहते हुए ग़लत बात के लिए बोल पड़ती हूँ .अब देखो न कालोनी के बाहर जाने वाला एकमात्र रास्ता खुदा पड़ा है कालोनी के करीब पन्द्रह बच्चे रोज गिरते-पड़ते वहां से निकलते हैं , मेरे भी बच्चे रोज ही करतब करते हैं .एक और रास्ता भी है पर उसे तो करीब छ महीनों से उस रोड पर बनने वाली कालोनी के मालिक ने बंद कर रखा है । सभी के बच्चे घूम कर गिरते पड़ते जा रहे हैं .
सिर्फ़ मेरा ही नागरिकबोध जाग पड़ा पहुँच गयी एक दिन सरपंच के पास सारी समस्या सुनाने। बड़ा भला आदमी है सरपंच भी तुंरत मुझे कुर्सी दी चाय मंगवाई पूरी  बात ध्यान से सुनी और तुंरत मुरम के डम्पर वाले को फ़ोन किया .कालोनी वाले को भी फ़ोन पर कहा भैया सड़क खोल दो लोगों को तकलीफ होती है .
मैडम दो तीन दिन में आपका काम हो जाएगा यदि न हो तो मुझे बताना।
 दसियों बार धन्यवाद दिया उन्हें, कितना भला आदमी है अब तो रोड खुल ही जायेगी .जिनके बच्चे गिरते पड़ते जाते थे उन्हें भी आश्वासन दे दिया चिंता मत करो दो चार दिन में सब ठीक हो जाएगा.
आज छ  महीने बाद भी बच्चे गिरते-पड़ते स्कूल जाते हैं कालोनी का काम अपनी गति से चल रहा है रास्ता बंद है क्योंकि कालोनी के मालिक का भी तो मौलिक अधिकार है रोज याद करने की कोशिश करती हूँ मौलिक अधिकार हर व्यक्ति को होता है या  सिर्फ उस व्यक्ति का जिसके पीछे पच्चीस-पचास की भीड़ हो .

Thursday, August 6, 2009

ख़बर


चार साल की मासूम से बलात्कार , खबर  देखते ही मन कसैला  हो गया.
दीदी दरवाजा लगा लो,बाई ने जाते हुए आवाज़ दी तो टीवी के सामने से उठना ही पड़ा.बाहर  आते हुए बिटिया के कमरे में नज़र गयी वो अपनी किताबों में सर झुकाए बैठी थी. बाहर  ठंडी हवा के झोंकों ने रोक लिया तो वंही झूले पे बैठ गयी.सामने चोकीदार के बच्चे बबूल के पेड़ पर टायर का झूला बाँध कर झूल रहे थे.उनके उस झूले पर झूलने की किलक उन्हें अनमोल खजाना मिलने की खुशी बरसा रही थी. तभी एक हाथ में एक लकडी पकडे साइकिल के टायर  के साथ दौड़ते एक बच्चे ने उनके मन को दौडा कर उस छोटे से गाँव की गलियों में पहुँचा दिया .कच्ची सड़क पर नदी पहाड़ खेलता लड़कियों का वो झुंड ,खेलते खेलते गाँव की सीमा पर पहुँच  जाया  करता था ,वहां कबड्डी खेलते लड़कों को देखते ,अपना खेल भूल कर उनके खेल के जोश में शामिल हो जाता था,कभी खेलते खेलते नदी तक पहुँच कर शिव मन्दिर में जंगली फूल चढ़ा कर पास होने से ले कर नयी ड्रेस मिलने की और सहेली की दीदी की शादी तक की मन्नत मांग ली जाती थी.न घर जाने की जल्दी होती थी न चिंता .कभी मन करता तो कंचे छुपा कर नदी तक लाये जाते और वहीं खेले जाते .गाँव में उन्हें कंचे खेलते देख लड़कों का झुंड इकठ्ठा  हो जाता और उनके अनाडीपन का खूब मजाक बनाया जाता.एक मीठी से मुस्कराहट उनके होंठों पर फैल गयीऔर उनकी तंद्रा टूटी.उठ कर अन्दर आयी बिटिया अभी पढ़ रही थी उसे देख कर उन्हें अपनी सुहानी बचपन की यादों पर ग्लानी होने लगी अभी थोडी देर पहले ही तो उन्होंने उसे बाहर खेलने जाने को मना किया था आज की ख़बर देखते देखते. 
कविता वर्मा 

Monday, June 15, 2009

फिक्र

रोज़ की तरह सुबह घर से स्कूल जाते हुए रास्ते  में बनने वाले एक घर को देखती। वहां देखभाल करने  वाले चौकीदार के परिवार में दो छोटे -छोटे बच्चे भी हैं जो सड़क पर खेलते रहते हैं .जब भी कोई गाड़ी निकलती उनकी माँ उन बच्चों को किनारे कर लेती .वहां से गुजरते हुए चाहे कितनी भी देर क्यूँ न हो रही हो गाड़ी की गति धीमी कर लेती.पता है बच्चे सड़क पर ही खेल रहे होंगे.हमेशा उनकी माँ को ही उनके साथ देखा.आज सुबह दोनों बच्चे सड़क पर बैठे थे उनकी माँ वहां नही थी पर उनके पिता पास ही खड़े थे। जैसे ही गाड़ी का हार्न बजा पिता ने गाड़ी की और देखा और तुंरत ही उनकी नज़र बच्चों की तरफ़ घूम गई ।बच्चों को किनारेबैठा देख कर वह फ़िर बीडी पीने  में मशगूल हो गया। लापरवाह से खड़े पिता की ये फिक्र मन को छू गई।

Sunday, May 10, 2009

.दुखवा कासे कहूँ ???

वह  उचकती  जा  रही  थी
  अपने  पंजों  पर .
लहंगा  चोली  पर  फटी चुनरी 
बमुश्किल  सर  ढँक  पा  रही  थी
हाथ    भी  तो  जल  रहे  होंगे .
माँ  की  छाया  में
छोटे  छोटे  डग  भरती ,
सूख  गए  होंठों  पर  जीभ  फेरती ,
माँ  मुझे  गोद  में  उठा  लो 
की  इच्छा  को 
सूखे  थूक  के  साथ
 हलक  में  उतारती .
देखा  उसने  तरसती  आँखों  से  मेरी  और ,
अपनी   बेबसी  पर  चीत्कार  कर  उठा .
चाहता  था  देना  उसे
टुकड़ा  भर  छाँव 
पर  अपने  ठूंठ  बदन  पर
जीवित  रहने  मात्र 
दो  टहनियों  को  हिलते  देख
चाहा  वही  उतार  कर  दे  दूँ  उसे
 न  दे  पाया .
जाता  देखता  रहा  विकास  की  राह  पर
एक  मासूम  सी  कली  को  मुरझाते  हुए . 

क्यूँ कोई नहीं रखवाला ?


पग -पग  नीर  डग -डग  रोटी  वाले  मालवा  की  हालत  रेगिस्तान  सी  हो  गयी .पंछियों  का  बसेरा  छिन  गया .हवा  भी  पत्तों  के  झुनझुनों  को  याद  कर  उदास  है  उसकी  तपिश  हरने    वाले ,उसकी  रफ़्तार  को  थाम  लेने  वाले  खुद  ही  बेजान  पड़े  है .हवा  की  हर  साँस  में  टनों  जहर  उगला  जा  रहा  है .माँ  के  आँचल  की  तरह  इस जहर  से  बचाने वाला कोई  नहीं  है .थके  पथिक  सूरज   से  ही  गुहार  करते  है  पथराई  आँखों  से  आसमान  को  ताकते  हैं .शायद  माँ  के  आँचल  की  तरह  कोई  बदली  थोडा सा  सुकून  देदे .जीवन  दायनी  धूप  चुभती  नहीं  छेद  देती  है .कहा   तो  था  नीम  और  ग्रीन  पर  सब  तो  बेबस  पड़े  है  चौक  जाते  है  हर  आहट  पर ,कही  अंत  तो  नहीं  आ  गया  .अब  किसका  दामन  थामें  किससे  करे  गुहार  क्या  कोई  नहीं  रखवाला ?
कविता वर्मा 

संवेदना तो ठीक है पर जिम्मेदारी भी तो तय हो

इतिहास गवाह है कि जब भी कोई संघर्ष होता है हमारी संवेदना हमेशा उस पक्ष के लिए होती हैं जो कमजोर है ऐसा हमारे संस्कारों संस्कृति के कारण ...