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Showing posts from 2009

"परेंटिंग स्किल"

घर के पास ही एक आदिवासी परिवार रहता है.पति-पत्नी और उनके ५ बच्चे.सारा दिन गाय-बकरियां चराते हुए यहाँ-वहां घूमते रहते है। मां-बाप सुबह से ही काम पर निकल जातेऔर बच्चे अपने काम पर,घर का दरवाजा ऐसे ही अटका दिया जाता.जब भी कोई बच्चा वहां से निकालता एक नज़र घर पर डाल , पानी पी कर कुछ देर सुस्ता कर फिर गाय-बकरियों को इकठ्ठा करने लगता. बच्चों की आत्मनिर्भरता देख कर आश्चर्य होता.कभी-कभी सोचती ये अनपढ़ आदिवासी कैसे इन बच्चों को सिखाता होगा,फिर सोचती शायद इतना मजबूत बनना इनके खून में ही है। 
एक दिन सुबह-सुबह किसी छोटे बच्चे के चीखने की आवाज़ सुन कर घर से बाहर निकली,तो देखा उसकी सबसे छोटी  मुश्किल से ३-४ साल की लड़की मैदान में खड़ी है और ३-४ कुत्ते उसके आस-पास खड़े जोर-जोर से भौक रहे है.वह लड़की डर कर चीख रही है,उसके बड़े भाई-बहन और पिताजी पास ही खड़े देख रहे है,पर कोई भी न तो कुत्तों को भगा रहा है न ही उस लड़की को उठा कर घर ला रहा है। 
कुछ देर चिल्लाने के बाद जब उस लड़की को ये समझ आया की उसे ही इस स्थिति से निबटना है ,उसने पास पड़े पत्थर उठाये और उन कुत्तों को मारने लगी। उसे सामना करता देख उसका पि…

पोल सर ; एक विनम्र श्रधांजलि,

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कल पुराने पपेर्स इकठ्ठा करते हुए कोने में छपी एक छोटी सी खबर पर नज़र गयी."गणित को सरल बनाने वाले"सर"। पड़ते ही जेहन में पोल सर का नाम कौंधा.गणित को सरल बनाने वाले उसे दिलचस्प बनाने वाले,हमारे अपने श्री विश्वनाथ मार्तंड पोल सर। उनका निधन १६ दिसंबर को चेन्नई में हो गया.इंदौर के इंदिरा विद्या मंदिर में क्लास ८ में हमें गणित पढ़ने वाले सर सदा सा पहनावा,चहरे पर स्निग्ध मुस्कान,और गणित के कठिन से कठिन सवालों को सरल से सरल नम्बरों के उदाहरनो से आसन बनाने वाली उनकी शैली। मैं सिर्फ एक वर्ष ही उनकी विद्यार्थी रही पर उनके पढ़ाने की जो अमित छाप मेरे ऊपर पढ़ी उसने मुझे भी गणित का शिक्षक बना दिया.आज भी कोई भी कठिन सवाल समझाते हुए एक बार सर को याद कर सोचती हूँ ,की वो इसे कैसे समझाते?
इस ब्लॉग का उद्देश्य उनके सभी विद्यार्थियों को उनके निधन की दुखद सूचना देना है.साथ ही बिछड़े साथियों से मिलने की एक उम्मीद भी .धन्यवाद श्री प्रभाकर नारायण उंडे का जिन्होंने इस खबर को दे कर सर के पुराने विद्यार्थियों को उन्हें श्रद्धांजलि  देने का मौका दिया.

क्यूँ छीना मेरा चीर

मेरे पिता ने बड़े नाजों से पला मुझे ,सदा सजा संवार कर रखा ,मुझे हरी नीली ओढ़नी पहराई
उस पर अनगिनत रंगबिरंगे फूल सजाये ।मेरी चोटी में बर्फ से सफ़ेद फूलोंकी माला गुथी । में बहुत खुश थी इठलाती फिरती थी लहरों के साथ उछलती रहती थी दिन रत अपनी नीली ओधनी को हवा में उड़ाते हुए ।वैसे तो कई दोस्त थे मेरे पर वो बड़े शांत थे मैं चाहती थी एक ऐसा दोस्त जो मुझसे बात करे ।मेरे पिता भला मेरी इच्छा कैसे टालते ।मुझे एक दोस्त मिला भी मैंने उसे अपना समझा खूब खुश थी मैं . उसे मेरी हरी ओढ़नी में लगे फूल अच्छे लगे मैंने उसे दिए ,मेरी ओढनी से भी कई टुकडे उसे दिए ,पर उसके लालच का तो जैसे कोई अंत ही न ही था ,वो और -और मांगता रहा मैं देती रही ।आज मेरा असीमित चीर टुकडे -टुकडे हो कर बमुश्किल मेरा तन ढक पा रहा है ।उसका नीला रंग मटमैला हो गया है , और तो और मेरे बालों में गुथी सफ़ेद फूलों की वेणी भी मसल कुचल दी गयी है ।हाँ अब मेरा तन ढकने के लिए उसने मुझ पर लाल , हरेपीले कुछ टुकडे जरूर फ़ेंक दिए हैं जिन्होंने मेरी बची -खुची सुन्दरता को भी हर लिया है ।अब मेरा ये दुखवा मैं कासे कहूँ ?  
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ममता

रोज़ की तरह सुबह घर से स्कूल जाते हुए रस्ते में बनने वाले एक घर को देखती। वहां देखभाल कराने वाले चौकीदार के परिवार में दो छोटे -छोटे बच्चे भी हैं जो सड़क पर खेलते रहते हैं .जब भी कोई गाड़ी निकलती उनकी माँ उन बच्चों को किनारे कर लेती .वहां से गुजरते हुए चाहे कितनी भी देर क्यूँ न हो रही हो गाड़ी की गति धीमी कर लेती.पता है बच्चे सड़क पर ही खेल रहे होंगे.हमेशा उनकी माँ को ही उनके साथ देखा.आज सुबह दोनों बच्चे सड़क पर बैठे थे उनकी माँ वहां नही थी पर उनके पिता पास ही खड़े थे। जैसे ही गाड़ी का हार्न बजा पिता ने गाड़ी की और देखा और तुंरत ही उनकी नज़र बच्चों की तरफ़ घूम गई ।बच्चों को किनारेबैठा देख कर वह फ़िर बीडी पिने में मशगूल हो गया। लापरवाह से खड़े पिता की ये फिक्र मन को छू गई।

"हेलो मर जाओगे"

कहते है इन्दौर दिल वालो का शहर है.यहाँ कि हवाओ मे अपनेपन की महक है.यहाँ  हर व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की चिन्ता करता है,उसके लिये फ़िक्रमन्द है.अब ये ही लीजिये ,एक बार मे डाक्टर को दिखाने के लिये समय लेने गयी.समय मेरी सुविधा के अनुसार नही मिल रहा था तो मे बाहर आ गयी .मेरे पीछे पीछे एक सज्जन जो वही बैठे सारी बाते सुन रहे थे आये और कहने लगे "भाभीजी आज डाक्टर साहब जो समय दे रहे है वही ले लीजिये फ़िर अगर आप आ सके तो ठीक है नही तो मत आइयेगा".अब बताइये बिना जान-पहचान के इतनी फ़िक्र करते हुए लोग इन्दौर के अलावा कही मिलेगे?और जब ऐसे लोगो से आपका सम्पर्क होता है तो दूसरो की फ़िक्र करना आप का भी फ़र्ज़ बन जाता है.पर कभी-कभी ये फ़िक्र और चिन्ता इतनी हावी हो जाती है कि कब चिन्ता गुस्से मे बदल जाती है,और कब गुस्सा झिड्की से अधिक कठोर होकर फ़ूट पडता है पता ही नही चलता.
इन्दौर का मालवा उत्सव बहुत प्रसिद्ध है.बात करीब ४-५ वर्ष पुरानी है.पतिदेव की बहुत इच्छा थी मालवा उत्सव देखने जाने की.वैसे तो मॆ अपनी शान्त सी कालोनी की सुहानी शाम छोड कर कही जाना, खास कर भागते ट्राफ़िक,क्रत्रिम रोशनी और शहर की …

विरासत

गर्मियों की एक दोपहर गर्म हवाओं के थपेड़ों को घर में घुसने से रोकने के लिए दरवाजे खिड़की बंद कर बैठी थी ,कि दरवाजों कि संध को रास्ता बना कर एक आवाज़ भीतर तक घुस आयी ,घी ले लो -घी लेलो.
अलसाई दुपहरी में ये कौन आ गया ,बुदबुदाते हुए थोड़ी सी खिड़की खोल कर बाहर झाँका ,तो हाथ में एक छोटी सी मटकी पकडे ,लहंगा पहने ,एक औरत को खड़े देखा.
बाई सा घी ले लो.चोखो घी है, हाँथ को बन्यो ,उसने कहा.
घी तो चाहिए ही नही ,इसलिए उसे टरकाने कि गरज से कहा, नही हम घी नही लेते घर पर ही बनाते है,अभी जाओ.
अरे बाई देखि लो घर को बन्यो चोखो घी है.पैसा कि जरूरत है काम आयेगो.
अब तक मेरा आलस छूट गया था इसलिए उस के बारे में और पता करने कि गरज से मैंने पूछा कहाँ से आयी हो?
राजस्थान से आयी हूँ बाई .यहाँ ढोर चराने आए है .एक बार घी देख लो ,चोखो लगे तो ले लीजो.
उसके सरल आग्रह को मैं इनकार न कर सकी और गर्म थपेड़ों कि परवाह न करते हुए दरवाजा खोल के बाहर आ गयी.मटकी में देखा करीब एक किलो घी होगा .कितने का है ?नही लेना था फिर भी पूछा .
एक सेर है पचास और दस रूपया दे दीजो। 
अब चौकाने कि बारी मेरी थी एक किलो घी आधा किलो कि कीमत में ? पर ये त…

छुट्टी

एल टी सी लेने का समय दिसम्बर तक ही है.अभी कहीं  नही गए तो निरस्त हो जायेगी,पति ने कहा तो वो सोच में में पड़ गयी.पिछले तीन सालों से कहीं घूमने नही जा पाए,क्या करे क्या न करे.जाने में घर की व्यवस्था करने में कोई दिक्कत नही है पर छुट्टी लेना बहुत मुश्किल काम है.फिर भी अब सोच लिया अभी समय ठीक है बच्चों की एक्साम भी नही है,ऑफिस में भी ज्यादा लोड नही है,६-७ दिन तो निकाले  जा सकते है,रिजर्वेशन भी इत्तफाक से मिल गया.उसने लीव ऍप्लिकेशन भरी कारण क्या लिखूं सोचते सोचते भी उसने सही लिखा,गोवा घूमने जा रहे है .
सुनते ही बॉस की भ्रुकती  तन गयी भी ये कोई समय है,आप को सोच समझ कर प्रोग्राम बनाना चाहिए आदी आदी.
उसने कहा भी मैंने पिछले तीन महीनों से कोई छुट्टी नही ली है पिछले दो सालों से सी एल इनकैश करवा रही हूँ ,यहाँ तक की बीमार होने पर भी कभी छुट्टी नही ली .पर बॉस ने साइन नही किया तो नही किया,थोडी बहस भी हुई आख़िर शर्त रखी गयी की इन छुट्टियों में आपका काम कौन और कैसे सम्हालेगा इसकी रूपरेखा बना कर जाइये,ठीक है ये भी सही सोच कर उसने हाँ कर दी.
इस बारे में पतिदेव को बताया तो बोले तुमने कहा क्यों की गोवा घूमन…

तसल्ली

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अरे बेटा यहाँ आ भैया को चोट लग जायेगी. कहते हुए मांजी  ने मिनी को अपनी गोद मे खींच  लिया. मम्मी के पास भैया है ना ,थोडे दिनो मे वो मिनी के पास आ जायेगा,उसके साथ खेलेगा, मिनी उसे राखी बांधेगी  मांजी के स्वर मे पोते के आने की आस छ्लक रही थी.नेहा को भी बस उसी दिन का इंतजार  था.


"बेटी हुई है" नर्स ने कहा,तो मांजी  का चेहरा बुझ गया.नेहा से तो उन्होने कुछ नही कहा पर उनके हाव-भाव ने काफी कुछ कह दिया. मिनी से उनका बात करना बन्द हो गया. नेहा अनजाने ही अपराधबोध से ग्रस्त हो गयी.विनय ने भी तो कुछ नही कहा,बस चुपचाप उसकी हर जरूरत का ध्यान रखते रहे.मांजी  की चुप्पी देखकर विनय की चुप्पी तुड्वाने का उसका साह्स नही हुआ.
अस्पताल से घर आकर दरवाजे पर ठिठकी कि शायद मांजी  घर की लक्ष्मी की आरती उतारे,पर घर मे पसरी निशब्दता देखकर चुपचाप अपने कमरे मे चली गयी.
मिनी छोटी बहन के आने से अचानक बडी हो गयी. उसने अपने आप को गुड़ियों के संसार  मे गुम कर दिया,वहां बोझिलता कम थी.
विनय आजकल अपने काम मे ज्यादा ही व्यस्त थे, उनसे बात करने का समय ही नही मिलता था.घरवालो की खामोशी ने उसके दिल-दिमाग को अजीब सी बॆचेनी…

एक सुबह

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रविवार की सुबह, हलकी गुलाबी ठण्ड एक बार तो सोचा एक झपकी और ले लूँ .लेकिन रविवार की सुबह जैसी सुकूनदाई सुबह नही होती ये सोच कर सारा आलस रजाई के साथ झटक के दूर फेंका और उठ खड़ी हुई.खिड़की से झाँका तो नव आदित्य को भी कुहासे के लिहाफ को परे खसका कर उठते देखा .मुझे देखते ही उसनेआँखे मिचका कर गुलाबी किरणों की मुस्कान मुझ पर फेंकी,और जैसे अपने साथ अठखेलियाँ करने का आमंत्रण दिया। अब भला इस आमंत्रण को मैं कैसे ठुकराती,धीरे से दरवाजा खोला और बहार आयी तब मुझे इस मुस्कराहट का राज़ समझ में आया.शरद ऋतू में ठंडी बयार की पिचकारी लेकर वो जैसे मेरे स्वागत में ही खड़ा था.बाहर आते ही सारोबार कर दिया.पर अब भीतर भागने से भी क्या होता,वैसे भी पीठ दिखाना मुझे पसंद नही है.मैंने भी सोचा ठीक है आज तुम ही खुश हो लो.मेरा हाल देख कर अब तक बाल भानु अट्टहास कर उठा .और उसकी हँसी तरुण कोपलोंपर मोतियों की तरह बिखर गयी. इतने सारे मोती कैसे चुनु,सोच ही रही थी कि चुनमुन गिलहरी ने चू चू कर मेरा धयान खीचा.मेरे ही किचेन कि तान पर घर बनाया है और मुझे ही आँख दिखाती है,पर फिर सोचा इसने कहाँ मैंने ही इसके आजाद परिवेश पर कब्जा कर …

युवा पीढी के बारे में एक विचार

kabhi-kabhi sochati hu kya hamari yuva peedi aalsi ho gayee hai?kya unme apane se bado ke liye samman ki bhavana khatm ho rahi hai?kuchh aise hi udaharano se aaye din do-char hoti hu,ek library mein kuchh ladakiyan khadi hai ,unhe upar vale shelf se kuchh pustake chahiye.vo intazar karti hai library assistent ka .par vo vyast hai ,unki madam aa kar poochhati hai koun si pustak chahiye?aur vo upar ke shelf ki aur ishara kar deti hai. madam table par chad kar pustak nikalati hai ,par un ladakiyon ko koi shikan nahi hoti.isi tarah ke udaharano se rozana hi do-char hoti hu.lagata hai aaj ki yuva peedi bahut practical ho gayee hai.badon ke liye samman hai par vo unki jarurat ke hisab se ghatata badata hai.jisse jaroorat padane vaali ho uska bhar- poor samman karo aur jab jaroorat nikal jaye chuppi saadh lo.aaj kal ke bachche samay se pahale hi duniyadari seekh rahe hai.unme naisargik bholapan khatm ho raha hai. iske liye kai karan jimmedar hai,doosron ko kya dosh de shayad hum hi unhe uchi…

निदान

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ऊउउऊ ............ मोनू के रोने की आवाज़ सुन कर सुनीति चोंक गयी.क्या हुआ बेटा ?
मम्मा दादी ने सोनू को ज्यादा जामुन दी मुझे कम दी .दादी हमेशा ऐसा ही करती है। सोनू को हर चीज ज्यादा देती है। मोनू की आवाज़ में दिल को छलनी कर देने वाली कातरता थी। नहीं  बेटा ऐसा नही है दादी सबको बराबर देती है तुम्हे ऐसा लगा होगा । दादी तो मोनू को भी बहुत प्यार करती है,कहते-कहते सुनीति ख़ुद ही सकपका गयी। अब पाँच साल के बच्चे को क्या समझाए वो भी जानती है मोनू झूठ नही बोल रहा है। अगले महीने राखी है दोनों ननद आने वाली हैं। मांजी की इच्छा है इस बार उन्हें पूरे कपडे करने के साथ ही सोने के कंगन भी दिए जाए.जेठजी अच्छी कंपनी में ऊँचे पद पर हैं उनके लिए कुछ हजारों का खर्चा निकलना कुछ ज्यादा मुश्किल नही है,पर पति की नौकरी में इस समय कुछ भी ठीक नही चल रहा है ,ऐसे में ये खर्च .परसों ही सुबोध ने मांजी  से पैसे का इंतजाम न होने की बात की थी तभी से उनका मूड उखडा हुआ है । 
मोनू रोते-रोते सो गया,उसे चादर उड़ाते  हुए सुनीति ने अपनी आंखों की कोरे पोंछी,और काम में लग गयी।
शाम को सुबोध ऑफिस से आए तो सोनू को सोते देख कर पूछा ये अभी क…

भीड़ तंत्र

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स्कूली दिनों में शायद मेरी नागरिक शास्त्र की शिक्षिका बहुत अच्छी थीं या मैं ही बहुत लगन से पदती थी जो मैंने आम भारतीय के मौलिक अधिकारों के बारे में बहुत अच्छे से न सिर्फ़ पढ़ा बल्कि कंठस्थ भी कर लिया। इसीलिए अपने अधिकारों के प्रति सजग रहते हुए ग़लत बात के लिए बोल पड़ती हूँ .अब देखो न कालोनी के बाहर जाने वाला एकमात्र रास्ता खुदा पड़ा है कालोनी के करीब पन्द्रह बच्चे रोज गिरते-पड़ते वहां से निकलते हैं , मेरे भी बच्चे रोज ही करतब करते हैं .एक और रास्ता भी है पर उसे तो करीब छ महीनों से उस रोड पर बनने वाली कालोनी के मालिक ने बंद कर रखा है । सभी के बच्चे घूम कर गिरते पड़ते जा रहे हैं .
सिर्फ़ मेरा ही नागरिकबोध जाग पड़ा पहुँच गयी एक दिन सरपंच के पास सारी समस्या सुनाने। बड़ा भला आदमी है सरपंच भी तुंरत मुझे कुर्सी दी चाय मंगवाई पूरी  बात ध्यान से सुनी और तुंरत मुरम के डम्पर वाले को फ़ोन किया .कालोनी वाले को भी फ़ोन पर कहा भैया सड़क खोल दो लोगों को तकलीफ होती है .
मैडम दो तीन दिन में आपका काम हो जाएगा यदि न हो तो मुझे बताना।
 दसियों बार धन्यवाद दिया उन्हें, कितना भला आदमी है अब तो रोड खुल ही जायेगी…

ख़बर

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चार साल की मासूम से बलात्कार , खबर  देखते ही मन कसैला  हो गया.
दीदी दरवाजा लगा लो,बाई ने जाते हुए आवाज़ दी तो टीवी के सामने से उठना ही पड़ा.बाहर  आते हुए बिटिया के कमरे में नज़र गयी वो अपनी किताबों में सर झुकाए बैठी थी. बाहर  ठंडी हवा के झोंकों ने रोक लिया तो वंही झूले पे बैठ गयी.सामने चोकीदार के बच्चे बबूल के पेड़ पर टायर का झूला बाँध कर झूल रहे थे.उनके उस झूले पर झूलने की किलक उन्हें अनमोल खजाना मिलने की खुशी बरसा रही थी. तभी एक हाथ में एक लकडी पकडे साइकिल के टायर  के साथ दौड़ते एक बच्चे ने उनके मन को दौडा कर उस छोटे से गाँव की गलियों में पहुँचा दिया .कच्ची सड़क पर नदी पहाड़ खेलता लड़कियों का वो झुंड ,खेलते खेलते गाँव की सीमा पर पहुँच  जाया  करता था ,वहां कबड्डी खेलते लड़कों को देखते ,अपना खेल भूल कर उनके खेल के जोश में शामिल हो जाता था,कभी खेलते खेलते नदी तक पहुँच कर शिव मन्दिर में जंगली फूल चढ़ा कर पास होने से ले कर नयी ड्रेस मिलने की और सहेली की दीदी की शादी तक की मन्नत मांग ली जाती थी.न घर जाने की जल्दी होती थी न चिंता .कभी मन करता तो कंचे छुपा कर नदी तक लाये जाते और वहीं खेले जा…

फिक्र

रोज़ की तरह सुबह घर से स्कूल जाते हुए रास्ते  में बनने वाले एक घर को देखती। वहां देखभाल करने  वाले चौकीदार के परिवार में दो छोटे -छोटे बच्चे भी हैं जो सड़क पर खेलते रहते हैं .जब भी कोई गाड़ी निकलती उनकी माँ उन बच्चों को किनारे कर लेती .वहां से गुजरते हुए चाहे कितनी भी देर क्यूँ न हो रही हो गाड़ी की गति धीमी कर लेती.पता है बच्चे सड़क पर ही खेल रहे होंगे.हमेशा उनकी माँ को ही उनके साथ देखा.आज सुबह दोनों बच्चे सड़क पर बैठे थे उनकी माँ वहां नही थी पर उनके पिता पास ही खड़े थे। जैसे ही गाड़ी का हार्न बजा पिता ने गाड़ी की और देखा और तुंरत ही उनकी नज़र बच्चों की तरफ़ घूम गई ।बच्चों को किनारेबैठा देख कर वह फ़िर बीडी पीने  में मशगूल हो गया। लापरवाह से खड़े पिता की ये फिक्र मन को छू गई।

.दुखवा कासे कहूँ ???

वह  उचकती  जा  रही  थी
  अपने  पंजों  पर .
लहंगा  चोली  पर  फटी चुनरी 
बमुश्किल  सर  ढँक  पा  रही  थी
हाथ   भी  तो  जल  रहे  होंगे .
माँ  की  छाया  में
छोटे  छोटे  डग  भरती ,
सूख  गए  होंठों  पर  जीभ  फेरती ,
माँ  मुझे  गोद  में  उठा  लो 
की  इच्छा  को 
सूखे  थूक  के  साथ
 हलक  में  उतारती .
देखा  उसने  तरसती  आँखों  से  मेरी  और ,
अपनी   बेबसी  पर  चीत्कार  कर  उठा .
चाहता  था  देना  उसे
टुकड़ा  भर  छाँव 
पर  अपने  ठूंठ  बदन  पर
जीवित  रहने  मात्र 
दो  टहनियों  को  हिलते  देख
चाहा  वही  उतार  कर  दे  दूँ  उसे
 न  दे  पाया .
जाता  देखता  रहा  विकास  की  राह  पर
एक  मासूम  सी  कली  को  मुरझाते  हुए .

क्यूँ कोई नहीं रखवाला ?

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पग -पग  नीर  डग -डग  रोटी  वाले  मालवा  की  हालत  रेगिस्तान  सी  हो  गयी .पंछियों  का  बसेरा  छिन  गया .हवा  भी  पत्तों  के  झुनझुनों  को  याद  कर  उदास  है  उसकी  तपिश  हरने   वाले ,उसकी  रफ़्तार  को  थाम  लेने  वाले  खुद  ही  बेजान  पड़े  है .हवा  की  हर  साँस  में  टनों  जहर  उगला  जा  रहा  है .माँ  के  आँचल  की  तरह  इस जहर  से  बचाने वाला कोई  नहीं  है .थके  पथिक  सूरज   से  ही  गुहार  करते  है  पथराई  आँखों  से  आसमान  को  ताकते  हैं .शायद  माँ  के  आँचल  की  तरह  कोई  बदली  थोडा सा  सुकून  देदे .जीवन  दायनी  धूप  चुभती  नहीं  छेद  देती  है .कहा   तो  था  नीम  और  ग्रीन  पर  सब  तो  बेबस  पड़े  है  चौक  जाते  है  हर  आहट  पर ,कही  अंत  तो  नहीं  आ  गया  .अब  किसका  दामन  थामें  किससे  करे  गुहार  क्या  कोई  नहीं  रखवाला ?
कविता वर्मा