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Showing posts from September, 2012

यूं विलुप्त हो जाने देना...

http://lalitdotcom.blogspot.in/2012/09/blog-post_17.html?showComment=1347968550352#क८८६१५१९९४७९१३८६६१९०
ललित शर्मा जी का ये आलेख पढ़ कर आज एक घटना याद आ गयी.स्कूल में महिलाओं का पसंदीदा विषय होता है साड़ियाँ..हंसिये मत ये बहुत संजीदा विषय है और इसकी संजीदगी आपको ये घटना पढ़ कर समझ आएगी. तो हुआ ये की मेरी एक साड़ी जिसमे बहुत ही खूब सूरत कढ़ाई थी उसका कपडा ख़राब हो गाया.लेकिन उसकी कढाई का कुछ नहीं बिगड़ा .इतना सुन्दर हाथ का काम उसे यूं ही फेंक देने की इच्छा ही नहीं हुई.कई साल तक उसे पेटी में रखे रही फिर एक आइडिया आया क्यों ना इसका काम किसी और साड़ी पर लगा कर इसे फिर नया कर दूं.बस फिर क्या था एक दो सहेलियों से इस बारे में सलाह  की और फिर उस के मेचिंग की साड़ी ढूँढने में लग गयी. जल्दी ही खोज पूरी हुई ओर उस पर काम शुरू हुआ.नया हो कर वह काम खिल उठा  और सबके आकर्षण का केंद्र भी बना.जो भी उसे देखता उस काम की साड़ी की तारीफ किये बिना नहीं रह पता और में भी गर्व से बताती की इसमें क्या समझदारी दिखाई है मैंने. ऐसे ही एक दिन एक कलीग को जब अपनी कलाकारी बताई तो वह बोली ऐसी ही एक साड़ी मेरे पास भी है कश्…

सूखी रेत के निशान

उठ कर चल दिए
 मुझे छोड़ कर यूँ  बिना अलविदा कहे  दूर तक दिखता रहा  तुम्हारा धुंधलाता अक्स  सोचती रही क्या होंगे  उन आँखों में आंसूं  या एक खुश्क ख़ामोशी  जैसे कुछ हुआ ही ना हो.
बिखरी पड़ी यादों को  अकेले संभालना है मुश्किल  एक गठरी में बाँध  लोटना चाहती हूँ तुम्हे  कि ये शिकवा ना कर सको  चुपके से रख लीं मैंने 
रास्ते पर ढूँढती हूँ  तुम्हारे कदमों के निशान  लेकिन मिलते है  सूखे पानी के रेले रेत पर 
आंसुओं के निशान पर चल कर  यादों कि गठरी लौटाई नहीं जाती  अब भी सहेजे हुए हूँ उसे  उस दिन के इंतजार में  जब तुम आ कर ले जाओगे अपनी यादें  ओर कौन जाने मेरी यादें  तुम भी सहेजे रखे  हो अब तक.

मन का क्लेश

ये कविता मेरे भाई योगेश वर्मा ने अपने कौलेज के दिनों में लिखी थी


मन का क्लेश  समाप्त हुआ अब वह अध्याय नित-सौरभ-संचन औ' काव्य व्यवसाय  नूतन से विषयों ने आज किया है मन व्यथित और प्रिय यायावरी से भी हुआ अब तन थकित 
तब लेखनी में भी हुआ करती थी एक पावन रसधार  और हम स्वप्नों को बुनते थे लेकर मन के तार|  क्या कविता महज तुकबंदी थी और गीतों में शेष तान ही था?  शब्दों का वह खेल भावुक मन का गान नहीं था?
अब भुला चला वो प्रेम स्मृतियाँ -घुटनों पर है सिर रखा  पर्वत हिलाने में सक्षम मनुष्य हिय बोझ से है थका अनुभूति गयी,आल्हाद गया,अब अश्रु रह गए शेष! स्नेह क्षणिक तड़ित था मन में,स्थाई है क्लेश!