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Showing posts from March, 2012

एहसास

उस पुरानी पेटी के तले में 
बिछे अख़बार के नीचे  पीला पड़ चुका वह लिफाफा.
हर बरस अख़बार बदला  लेकिन बरसों बरस  वहीँ छुपा रखा रहा वह लिफाफा.
कभी जब मन होता है  बहुत उदास  कपड़ों कि तहों के नीचे  उंगलियाँ टटोलती हैं उसे 
उसके होने का एहसास पा  मुंद जाती है आँखे  काँधे पर महसूस होता है  एक कोमल स्पर्श  कानों में गूंजती है एक आवाज़  में हूँ हमेशा तुम्हारे साथ 
बंद कर पेटी  फिर छुपा दिया जाता है उसे  दिल कि अतल गहराइयों में  फिर कभी ना खोलने के लिए  उसमे लिखा रखा है  नाम पहले प्यार का.

यूं मन का बागी हो जाना...

आज सुबह स्कूल में टी टाइम में एक कलीग आये ओर कहने लगे मैडम प्रसार भारती तीन दिवसीय साहित्यिक कार्यक्रम कर रहा है वासांसि के नाम से जिसमे कई नामी साहित्यकार आ रहे है.अगर हो सके तो आप भी आइये.कई अच्छे रचनाकारों को सुनने का मौका मिलेगा. अभी दो दिन पहले ही तो मैंने अपनी एक कविता उन्हें सुनाई थी.स्कूल में काम के बीच में अपनी रची दो पंक्तियाँ कभी में कभी वो एक दूसरे को सुना देते है जिससे दिन भर काम के बाद सृजन का उत्साह बाकी बच रहता है. कहने लगे उसके पास तो में आज नहीं लाया लेकिन कल ला दूंगा पर आप आज भी जाइये .इंदौर में साहित्यिक कार्यक्रम होते रहते है जिनमे जाने कि इच्छा कभी अकेले होने के संकोच में तो कभी दूर ,रात का समय या किन्ही ओर कारणों से टल जाता है.फिर भी मैंने कहा जी सर में जरूर जाउंगी. हालाँकि ये भी पूछने का समय नहीं मिला कि कार्यक्रम का स्वरुप होगा कैसा?? बस यूंही कह दिया कि जाउंगी लेकिन तब भी ये ना मालूम था कि चली ही जाउंगी.   
शाम साढ़े छ बजे उन्हें फ़ोन करके पूछा कार्यक्रम कितने बजे से है?जवाब मिला ठीक सात बजे से ओर प्रसार भारती के कार्यक्रम समय से शुरू होते है तो आप ठीक टाइम से…