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Showing posts from December, 2011

नया साल.

नन्हे ,रफीक, मुन्नी आज सुबह जल्दी ही  कचरा बीनने घर से निकल गए. आज उनमे रोज़ जैसी मस्ती नहीं थी.उनकी निगाहें जल्दी जल्दी यहाँ वहां अपने काम की चीज़ें ढूंढ रही थीं.  रफीक आज नाले तरफ नहीं चलेंगे रे.दुपहर तक घर चले चलेंगे. क्यों आज क्या है?  नन्हे  ने कुछ सूखी लकड़ियाँ भी अपने बोरे में रख लीं तो रफीक को बड़ा अचम्भा हुआ. अरे तू ये लकड़ियाँ भी कबाड़ी को देगा क्या???ओर वह हो हो करके हंसने लगा. मुन्नी भी हंस दी.लगता है आज इसका दिमाग फिर गया है.  अरे दिमाग तो तुम दोनों का फिर गया है.तुम्हे पता नहीं आज नया साल है.आज जल्दी घर जा कर सो जायेंगे रात में सब जगह लोग नया साल मनाएंगे खायेंगे पियेंगे तब हम चोराहे पर जायेंगे रात के १२ बजे .वहां ढेर सारा कबाड़ा भी मिलेगा ओर खाने पीने की बची हुई चीज़ें भी. फिर लकड़ियाँ से आग तापेंगे ओर सो जायेंगे . नन्हे की आँखें नए साल के जश्न की ख़ुशी में चमक उठीं. 



कई दिनों से नए साल की पार्टी की तय्यारी चल रही थी .नयी ड्रेस खरीदी गए होटल में बुकिंग दोस्तों की फेहरिस्त उनको निमत्रण दे दिया गया. कौन किस के साथ आएगा ये भी तय था. पापा को बिजनेस में फायदा पहुँचाने  वाले लोगो के…

मातृत्व

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ब्लॉग जगत में आये मुझे लगभग ढाई साल हो गए है.इस समय में जो भी लिखा वो आप सभी लोगो ने सराहा.जिससे मुझे ओर लिखने की हिम्मत मिली .बीच बीच में कुछ रुकावटें भी आयी जिससे लिखना कम हुआ लेकिन लिखने का शौक ओर आपका प्रोत्साहन मुझे फिर यहाँ खींच लाया. आज में अपनी १०० वीं पोस्ट डाल रही हूँ.आशा है आप लोगो को पसंद आएगी . 
बरामदे से आती सिसकी की आवाज़ सुन कर स्नेहा का दिल बिंध सा गया .उसकी जेठानी की बेटी पिंकी को शायद आज फिर डांट पड़ी.
पता नहीं भाभी कैसे फूल सी बच्ची से ऐसा व्यव्हार कर पाती है. पिंकी उनकी दूसरी बेटी है.उसके जन्म के समय सभी को बेटे की आस थी इसलिए उसे वह प्यार कभी नहीं मिला जिसकी वह हकदार है.  भाभी जब भी पिंकी को बेवजह डांटती स्नेहा का दिल तड़प उठता .निस्संतान स्नेहा का मातृत्व एक किलकारी के लिए खून के आंसू बहता . उसने पिंकी को चुपके से अपने कमरे में बुलाकर सीने से लगा लिया. आज फिर भाभी का अवसाद पिंकी पर ज्वाला बन फूट पड़ा. उन्होंने पिंकी को चार -पांच तमाचे भी जड़ दिए. गुस्से में शब्द अंगारे बन कर बरस रहे थे. स्नेहा से रहा न गया .वह कमरे से बाहर निकली ओर भाभी के हाथ से पिंकी को छुड़ा कर अप…

बस यूँ ही ....

देर रात तक तारों संग , खिलखिलाने को जी चाहता है. चांदनी के आँचल को खुद पर से,  सरसराते गुजरते जाने को जी चाहता है.  पीपल की मध्धिम परछाई से छुपते छुपाते , खुद से बतियाने को जी चाहता है.  चलते देखना तारों को ओर खुद , ठहर जाने को जी चाहता है . रात के सन्नाटे में पायल की आहट दबाते,  नदी तक जाने को जी चाहता है . दिल में छुपा कर रखे अरमानों को , खुद को बताने को जी चाहता है.  तेरी मदहोश कर देने वाली बातों को सुन,  जी जाने को जी चाहता है  तू नहीं आस पास फिर भी , तेरे होने के एहसास को ओढ़  सो जाने को जी चाहता है . कविता वर्मा

इंतजार १२ ( समापन किश्त )

मधु से मंदिर में मिल कर मधुसुदन को कई पुरानी बातें याद आ गयीं .कैसे उसकी मधु से मुलाकात हुई कब वो प्यार में बदली और फिर समय ने कैसी करवट की .उस रिश्ते का क्या हुआ ?मधु से मिलकर उसे सारी बात बताने के बाद भी वह शांत थी ...उसके बाद वह फिर नहीं मिली मुझसे .आज मंदिर में मुलाकात हुई मुलाकातें बढ़ती गयीं और एक आशा ने फिर सर उठाया क्या हम फिर साथ नहीं हो सकते. इस बीच कुछ अप्रत्याशित घट गया मधु का क्या जवाब होगा पढ़िए समापन किश्त में )
रिटायरमेंट का दिन भी आ गया ,माला का फ़ोन आया आप कितने बजे फ्री होंगे?
ऑफिस के बाद एक छोटा सा कार्यक्रम है यही कोई सात बजे .
ठीक है कह कर उसने फ़ोन रख दिया.
विदाई चाहे कैसी भी हो भावपूर्ण ही होती है. मेरा भी गला रुंध गया जब मैंने विदाई भाषण दिया . करीब सात बजे जब बाहर आया देखा माला और आरती खड़ी है .उन्होंने मुझे बधाई दी और गाड़ी माला के घर की और घुमा दी.
मेरे लिए डिनर का इंतजाम किया था .मधु भी वहीँ थी .सब कुछ सामान्य था मधु शांत थी पर खामोश नहीं. उसने अपने को संभाल लिया था. मेरा प्रश्न मेरी आँखों में आ कर ठ…

.दुखवा कासे कहूँ ???

वह  उचकती  जा  रही  थी
  अपने  पंजों  पर .
लहंगा  चोली  पर  फटी चुनरी
बमुश्किल  सर  ढँक  पा  रही  थी
हाथ    भी  तो  जल  रहे  होंगे .
माँ  की  छाया  में
छोटे  छोटे  डग  भरती ,
सूख  गए  होंठों  पर  जीभ  फेरती ,
माँ  मुझे  गोद  में  उठा  लो
की  इच्छा  को
सूखे  थूक  के  साथ
 हलक  में  उतारती .
देखा  उसने  तरसती  आँखों  से  मेरी  और ,
अपनी   बेबसी  पर  चीत्कार  कर  उठा .
चाहता  था  देना  उसे
टुकड़ा  भर  छाँव
पर  अपने  ठूंठ  बदन  पर
जीवित  रहने  मात्र
दो  टहनियों  को  हिलते  देख
चाहा  वही  उतार  कर  दे  दूँ  उसे
 न  दे  पाया .
जाता  देखता  रहा  विकास  की  राह  पर
एक  मासूम  सी  कली  को  मुरझाते  हुए .