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Showing posts from November, 2014

गहरे हैं रंग ' कैनवास पर प्रेम ' के

विमलेश त्रिपाठी जी का उपन्यास 'कैनवास पर प्रेम ' के नाम ने ही मुझे आकर्षित किया था। नाम से कहानी का जो कुछ अंदाज़ा हुआ था वो ठीक ठीक होते हुए भी उससे बहुत अलग भी था।  कहानी अपने आप में ढेर सारी त्रासदियों घटनाओं दुविधाओं और दुश्चिंताओं को समेटे एक सम्मोहक माया जाल सा बुनती है जिसमे आप कभी कहीं खो जाते है तो कभी किसी पल पर ठिठक कर उसे महसूस करते रह जाते हैं।  कहीं एक बच्चे के दुःख से उपजते कलाकार को धीरे धीरे बड़ा होते देखते हैं तो कभी उस कलाकार को मौत की ओर कदम बढ़ाते देख काँप जाते हैं इस आशंका में कि ये कहानी पूरी होगी भी या नहीं। कई बार कहानी के अधूरा रह जाने की आशंका जल्दी जल्दी पढ़ कर तसल्ली कर लेना चाहती है लेकिन यकीन मानिये कि उस पल की कशिश आपको एक साथ कई पन्ने पलटने से रोक भी लेती है।  इसमें एक मासूम से प्यार की दास्ताँ है ,तो एक ऐसे दोस्त की कहानी जो बिना कहे सब समझ जाता है तो बिना पूछे सब कर भी जाता है। दोस्ती का ऐसा विश्वास है कि पढ़ते पढ़ते रुक कर आप अपने दोस्तों की फेहरिस्त पर एक नज़र डाल कर उनमे एक ऐसा दोस्त जरूर ढूंढेंगे।  वैसे जिंदगी में कई लोग ऐसे भी होते हैं जिन्हे हम अप…

देहरी

पढाई ख़त्म होते ही सोचा था कही अच्छी सी नौकरी कर के परिवार से रूठी खुशियों को वापस मना लाएगी लेकिन बिना अनुभव बिना सिफारिश कोई नौकरी आसानी से मिलती है क्या ?महीनो ठोकरे खाने के बाद आखिर उसने वह राह पकड़ी। कॉल सेंटर पर काम करने का कह कर शाम ढले घर से निकलती और पैर में घुँघरू बांधे अपने दुःख दरिद्र को पैरों से रौंदते अपने समय के बदलने की राह तकती। पैरों की हर थाप पर मन आशंकित रहता कहीं माँ बाबा को पता ना चल जाये नहीं तो वो जीते जी मर जायेंगे। मन खुद को ही समझाता कि वो जो कर रही है मज़बूरी में और परिवार के लिए ही कर रही है। लेकिन मन ही मानने को तैयार नहीं होता तो माँ बाबा कैसे समझेंगे यह आशंका सदा बनी रहती। मैं उन्हें कभी पता नहीं चलने दूँगी वह खुद से प्रण करती पर उनसे झूठ बोलने की कसक हमेशा बनी रहती। 
ऐसे ही एक शाम खबर आई बाबा को कुछ हो गया है होश ही कहाँ रहा उसे जैसी थी वैसे ही दौड़ पड़ी घर को। यहाँ उसने घुँघरू बंधे पैरो से देहरी लांघी वहाँ बाबा ने आखिरी हिचकी ली। वह वहीं थम गई समझ नहीं पाई उसने अभी देहरी लांघी है या बाबा ने उसी दिन दम तोड़ दिया था जिस दिन उसने घुँघरू बांधे थे। 
कविता वर्मा