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Showing posts from August, 2015

गणपति उत्सव

मुंबई इंदौर से होते हुए देश के अनेक शहरों में फैले गणपति उत्सव को लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने इस उद्देश्य से शुरू किया था कि धार्मिक माहौल में इस तरीके से लोगों को एकजुट किया जा सकता है।  ये परंपरा मुख्य रूप से आज़ादी की लड़ाई के लिए लोगों को संगठित करने और उसकी विभिन्न गतिविधियों से लोगो को परिचित करवाने के लिए थी। कालांतर में यह जन जन का उत्सव तो बना लेकिन इसका मूल उद्देश्य ही इसमें से गायब हो गया जो था एकजुटता। पहले जहाँ एक गाँव या शहर में एक गणपति विराजते थे वहीँ आज हर गली मोहल्ले में दो तीन गणपति की स्थापना होने लगी है। और तो और एक कुटुंब के हर परिवार में गणपति स्थापना होने लगी। कहीं कहीं तो घर के अंदर पूजा के लिए एक और बाहर झाँकी के लिये एक गणपति होते है जो बच्चों की जिद या बड़ों की शान का प्रतीक होते हैं। 
बड़ी संख्या में गणपति स्थापना ने मिट्टी के बजाय पी ओ पी से बनी मूर्तियों के बाज़ार को बढ़ावा दिया। कई बरस ये मूर्तियाँ नदियों तालाबों में विसर्जित की जाती रहीं और इन्हे प्रदूषित करती रहीं। अब जब पर्यावरणविदों का ध्यान इस ओर गया और इन पर रोक लगाने की माँग उठने लगी तब तक ये मूर्तिकार …

क्या समय के साथ बदलना जरूरी नहीं है ?

आज राष्ट्र कवि मैथलीशरण गुप्त के जन्मदिवस पर आयोजित एक कार्यक्रम में जाने का मौका मिला।  कार्यक्रम हिंदी साहित्य समिति में हिंदी परिवार और मैथलीशरण गुप्त स्मारक एवम पारमार्थिक ट्रस्ट द्वारा आयोजित था। इसी कार्यक्रम में शहर के पाँच वरिष्ठ साहित्यकारों का सम्मान भी किया गया। कार्यक्रम में बैठे हुए कुछ बातों पर ध्यान गया जो आपके साथ साझा करना चाहती हूँ। 
 जयंती और सम्मान कार्यक्रम के आयोजक का स्टेज पर बड़ा सा बैनर लगा था मैथलीशरण गुप्त (गहोई वैश्य समाज ) स्मारक एवम पारमार्थिक ट्रस्ट। स्वाभाविक है मैथली शरण जी गहोई वैश्य समाज के रहे होंगे समाज उनके नाम को अपने गौरव के रूप में प्रचारित करना चाहता था इसलिए उनके नाम के आगे गहोई वैश्य समाज लिख कर दर्शाना चाह रहा था। लेकिन मुझे लगा ऐसा करके राष्ट्र कवि की छवि को सिर्फ एक समाज जो असल में जाति का द्दोतक थी में बाँध दिया गया। राष्ट्र कवि पूरे देश के होते हैं क्या उनके नाम के आगे गहोई वैश्य समाज लिखा जाना जरूरी था ? क्या इसके कोई और मायने थे जो मैं समझ नहीं पा रही हूँ ? 
मुझे आश्चर्य होता है साहित्यकारों के समारोह में इस तरह की सोच प्रकट की जा रही …