Posts

Showing posts from September, 2014

पत्थरों में फूल

छोटे से गाँव की छोटी सी सीमा सी ही तो सोच थी उसके माता पिता की जब उन्होंने आठवी के बाद उसे आगे पढ़ाने से मना  कर दिया था। किसी तरह खुद को बाल विवाह की त्रासदी से बचा कर वह शहर भाग गई थी। कितनी जद्दोजहद कितने संघर्ष के बाद वह अपनी पढ़ाई पूरी कर पाई। माँ बाबा का लाड पीछे खींचता ज्ञान की रोशनी आगे। पत्थर ही तो कर लिया था उसने अपने मन को जिसपर प्यार का कोई अंकुर न फूटने पाये सारे नाते तोड़ दिए ताकि उन पहाड़ों से , ताकि अपना सर ऊँचा उठा सके, लेकिन पहाड़ों से ऊँचे पत्थर हो सके है भला ? आज पत्थरों को भी पहाड़ों की गोद याद आ गई मन दौड़ कर वहाँ पहुँचा लेकिन वक्त के थपेड़ों ने सब छितरा दिया। बचे है तो सिर्फ खंडहर वह अपनी रुलाई ना रोक पाई। समझ नहीं पा रही है ऊपर उठने की चाह गलत थी या आगे बढ़ने की। बेड़ियाँ तोड़ने की या नई मंजिल पाने की ?  सूनी आँखों से एक बार फिर देखा पत्थरों में भी कोपले फूटी हुई हैं। उसके होंठों पर एक मुस्कान आई एक नए संकल्प के साथ वह उठ खड़ी हुई।   कविता वर्मा