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Showing posts from October, 2014

इरादा

उसकी सारी कोशिशे सारी जिद अनसुनी कर दी गईं। लाख सिर पटकने पर भी उसकी माँ ने उसे तैरना सीखने की अनुमति नहीं दी। मछुआरे का बेटा तैरना ना जाने , बस्ती के लोग हँसते थे पर वो डरी हुई थीं। ये समुन्द्र उनके जीवनसाथी को निगल चुका था अब वो अपने बेटे को उसके पास भेजने से भी डरती थीं।उसके साथी बच्चे जब लहरों की सवारी करते वह गुमसुम सा उन्हें देखा करता। एक दिन शायद समुन्द्र ही उसकी उदासी से पिघल गया और ऐसा बरसा कि उसके आँगन तक पहुँच गया। उसने भी कहाँ देर की कूद पड़ा उथले पानी में और लगा हाथ पैर चलाने। समुन्द्र और मछुआरे का मिलन हो ही गया। 
कविता वर्मा

जमींदार

मॉल में घूमते हुए चकाचौंध देखते उसके मुँह से एक आह निकल गई। कितना पैसा होता है इन शहर के लोगो के पास। 
वैसे तो गाँव में भी कुछ लोगो के पास बहुत पैसा है। उसे गाँव के जमींदार के ठसके याद आ गए। 
बचपन में एक बार उसने अपने दादाजी से पूछा था, "दादाजी जमींदारो के पास इतना पैसा कहाँ से आता है ?" 
दादाजी ने ठंडी सांस भरकर जवाब दिया था ,"बेटा गरीबो का खून बहुत कीमती होता है अमीर चूसते हैं तो सोना बन जाता है। "खून सोना कैसे बनता है वह समझ न सका था। 
माल से बाहर आते हुए उसकी नज़र सड़क किनारे रेहड़ी लगाये खड़े मैले कुचैले आदमी पर पड़ी। दो अौरतें उससे पाँच रुपये के लिए मोलभाव कर रही थीं। उसने एक नज़र मॉल पर डाली दूसरे ही पल खून का सोना बनना , समझते हुए वह शहरी जमींदारों की संख्या का अनुमान लगाता घर की ओर चल दिया। 
कविता वर्मा