Wednesday, June 19, 2013

उत्तराखंड यात्रा ..एक याद

      (केदारनाथ की ताज़ा तस्वीरें देख कर मन द्रवित हो गया .मंदिर के आस पास बने मकान उन पंडों पुजारियों के है जो पीढ़ियों से कुटुंब विशेष के पुरोहित हैं उनके पास कई पीढ़ियों के यजमानों का लेखा जोखा  है बिना किसी कम्पूटर के चंद  मिनिटों में आपके कुटुंब का पुरोहित आप के पास पहुँच कर अपनी बही में केदारनाथ आये आपके पूर्वजों के नाम,स्थान गोत्र सब बता देते हैं .
इस तबाही में कई ( या सभी ) कुटुम्बों के पीढ़ियों के ये रिकॉर्ड भी नष्ट हो गए होंगे ,लगभग हर भारतीय की विरासत है ये . )

लगभग पच्चीस साल पहले की बात है उत्तराखंड के चारों  धाम यमुनोत्री गंगोत्री केदारनाथ बद्रीनाथ जाने का प्रोग्राम बना . लम्बा सफ़र पंजाब की गर्मी ,आतंकवाद का डर सब पार करके हरिद्वार पहुंचे .मई के महीने में भी गंगा के बर्फ जैसे ठन्डे पानी में स्नान करके मन आध्यात्मिक आस्था से भर गया . शाम के समय घाट पर गंगा जी की आरती धर पर तैरते दीपक जैसे आँखों में स्थायी रूप से बस गये . 
ऋषिकेश का लक्ष्मण झूला पार करते मन जहाँ रोमांचित था वहीं थोडा डरा हुआ भी . 

मैदानी इलाका पार करके जब यमुनोत्री जाने के लिए सफर शुरू हुआ जानकी चट्टी पहुँचते हम लोग बुरी तरह भीग गए थे वहाँ लगभग हर रोज़ शाम को बारिश हो जाती है .दूसरे दिन सुबह से बारिश हो रही थी भीगते हुए चढ़ाई शुरू की रास्ते बहुत संकरे और खतरनाक थे .मम्मी के लिए एक टट्टू किया था लेकिन उस पर बैठना भी आसान नहीं था .रास्ते भर सड़क के ऊपर निकले चट्टानों के नुकीले सिरों से बचते दम निकल गया . बारिश और ठण्ड से टट्टू पर बैठे वे अकड़ सी गयीं . यमुनोत्री के गर्म पानी के कुंद में डुबकी लगा कर राहत मिली .लौटते हुए फिर बारिश शुरू हो गयी किसी तरह एक बसेरा मिला .
दूसरे दिन सुबह गंगोत्री की यात्रा शुरू की .ये यात्रा खतरनाक रास्तों से होती हुई लेकिन मंदिर तक पहुँची .सुबह से चले हम अँधेरा घिरने पर पहुँचे . उस समय वहाँ बिजली नहीं थी .दूसरे दिन सुबह जब दुबकी लगाई बर्फ से पानी में मानों रक्त जम गया एक के बाद दूसरी दुबकी लगाने की हिम्मत ही नहीं हुई . मंदिर के दर्शन करके वह से चले तो हमारे पास गीले कपड़ों का ढेर था जिन्हें गाड़ी में सुखाते जा रहे थे . रास्ते में एक जगह मोड़ पर एक गाडी सामने  आ गयी . उसका ड्राईवर अड़ गया कि उसकी गाडी चढ़ रही है इसलिए हमें अपनी गाडी पीछे लेना होगी .हमारे पीछे तीखा मोड़ था और सैकड़ों मीटर गहरी खाई इसलिए उससे कहा तुम थोडा सा पीछे ले लो तुम्हारे पीछे सीधी सड़क है लेकिन वह तस से मास नहीं हुआ . ट्राफिक काफी कम था इसलिए दोनों अड़े खड़े रहे .हमने गीले कपडे निकाल लिए और हवा में लहरा कर सुखाने लगे साथ लाया नाश्ता निकाल कर पिकनिक का मज़ा लेने लगे . कुछ देर में एक दो गाड़ियाँ और आ गयीं तब लोगों ने उस ड्रायवर को समझाया तब गाड़ियाँ निकली . 
 रात्रि विश्राम कर दूसरे दिन सुबह केदारनाथ के लिए चढ़ाई शुरू की 
गौरी कुंड से केदारनाथ का रास्ता बहुत खूबसूरत है ( अब था ) हरी भरी पहाड़ियाँ रस्ते के किनारे पर उगे फूल दूर तक फैली चोटियाँ .ऐसे ही किसी चोटी पर धूप देखा कर हम सब ख़ुशी से चिल्लाने लगे तीन दिन लगभग गीले रहने से ये धूप  लग रही थी . केदारनाथ से करीब दो तीन किलोमीटर पहले से कुछ स्थानीय लोगों ने पूछना शुरू कर दिया की आप लोग कहाँ से आये हैं .हमने इसे मजाक में लिया किसी को इंदौर किसी को मद्रास किसी को बम्बई बताया .थोड़ी ही देर में चार पांच पंडों ने हमें घेर लिया तब हमें समझ आया कि ये पण्डे कुटुंब विशेष के हैं तब हमने अपने पैतृक गाँव का नाम और अपना गोत्र बताया चंद मिनिटों में हमारे खानदान का पंडा  हम तक पहुँच गया . ( उस समय मोबाइल नहीं हुआ करते थे ) वह हमें अपने साथ अपने घर ले गया हमारी रहने खाने सोने की व्यवस्था की फिर हमारे परिवार की बही खोल कर बताया कि आज से बारह साल पहले मेरी दादी केदारनाथ आयीं थीं उसके बाद मेरे ताऊ जी अपने बेटे बहू के साथ आये थे .उस बही में सबके नाम और तारीख लिखी थी . उसने बताया की हर कुटुंब गोत्र के अलग अलग पण्डे हैं और कोई किसी दूसरे के यजमान से बात नहीं करते .यहाँ पीढ़ियों का हिसाब दर्ज है .इतना तो शायद परिवार में नहीं रहता होगा . और ये फूलप्रूफ व्यवस्था है .हमारे आश्चर्य का ठिकाना नहीं था . 
शाम होने में कुछ ही देर थी .दोनों भाई सामने दिख रहे पहाड़ पर चढने की जिद करने लगे उनकी उम्र होगी 15-17 साल .उन्हें पहाड़ों की बर्फ लुभा रही थी .मम्मी ने तो साफ़ मना  कर दिया पापा असमंजस में थे और मैं सोच रही थी की यहाँ बार बार थोड़ी आना है .पापा को थोड़ा सा मनाया और दोनों को जाने की इजाज़त मिल गयी . मैं और पापा मंदिर के दर्शन करने चले गये और मम्मी आराम करने लगीं .जब हम लौटे तो मम्मी ने दोनों भाइयों का पूछा तो हम चौंक गए वे अभी तक वापस नहीं आये अँधेरा घिरने लगा था .घबराहट के कारन मेरी और पापा की हालत खराब हो गयी मम्मी तो रोने लगीं .हमने लोगों से पूछना शुरू किया तो जवाब मिला की आसपास दिखने वाली पहाड़ियाँ बहुत खतरनाक हैं जरा फिसले की   हजारों फीट नीचे खाई में यहाँ तो लाश भी कोई नहीं निकालता क्योंकि पत्थरों से टकराने के बाद वो निकालने लायक ही नहीं रहती . 
मैं लगातार भगवान् से मनाती रही की वे सही सलामत हों .करीब आठ बजे दोनों लौटे .उन्होंने बताया की वे बहुत ऊपर तक चले गए थे वहाँ एक पगडण्डी सी बनी थी उसपर आगे बढ़ते उन्हें एक गुफा मिली .उसपर एक बोर्ड लगा था की ये गुफा अभिमंत्रित है बिना इज़ाज़त प्रवेश न करें .तभी उन्हें वहाँ एक साधू दिखा उससे परमिशन ले कर वे अन्दर गये वहाँ एक साधु ध्यान मग्न थे इतनी ठण्ड में भी वे सिर्फ एक भगवा पहने थे .उन्हें देख कर उन्हें इतनी श्रध्दा उमड़ी की उन लोगों ने अपनी जेब में जो भी था वहीँ चढ़ा दिया . 
ये सुन कर विश्वास हुआ की सच में हिमालय में साधू तपस्या करते हैं . दूसरे दिन सुबह केदारनाथ मंदिर के दर्शन किये सामने दूर आदि शंकराचार्य की समाधी थी वहां तक जाने आने में बहुत समय लग जाता इसलिए दूर से दर्शन करके वापस आ गए . हमारे पण्डे को हमारा वर्तमान पता लिखवाया उसकी बही में हमारा नाम लिखवाया और वापसी की .रास्ते में खिले फूलों को इकठ्ठा किया ताकि अपनी हरबेरिअम की फ़ाइल में लगा सकूँ . 
अगले पूरे दिन का सफर करके बद्रीनाथ पहुँचे .बद्रीनाथ तक बस जाती है .केदारनाथ और बद्रीनाथ में सांस लेने में थोड़ी तकलीफ होती है .सुबह गर्म कुंड में स्नान कर मंदिर में दर्शन  किया फिर वही नदी किनारे दादा दादी का तर्पण किया .बद्रीनाथ आखरी धाम है यहाँ से होकर ही युधिष्ठिर स्वर्ग के लिए गए थे . यहाँ से कुछ दूरी पर इस सीमा का आखरी गाँव है माणा जहाँ सेना की चौकियाँ हैं .वहाँ सैनिकों से बात की वे यात्रियों के आवाजाही से खुश थे की कोई तो दिख रहा है बारिश होते ही सब चले जायेंगे गाँव खली हो जायेंगे फिर वे अकेले अपने टेंट में या ड्यूटी पर .सुन कर उनकी कठिन जिंदगी का अंदाज़ा हुआ . 

इस तरह ये यात्रा पूरी हुई . उन आठ दिनों में हम कम से कम अस्सी किलोमीटर पैदल चले होंगे लेकिन मज़ा बहुत आया .मैदानों में रहने वालों के लिए वो जगह स्वर्ग है ये अलग बात है की वहाँ की दुश्वारियाँ अपनी जगह हैं . 

अभी उत्तराखंड में भारी बारिश और बादल फटने से जो तबाही हुई है उसे देख कर मन काँप गया और सालों पुरानी यादों ने फिर अंतस से झाँका . 

कविता वर्मा 

21 comments:

  1. आपसे सहमत हूँ कविता जी ..मैं तो पिछले साल जून में वहीँ थी ..बारह जून को लौटी थी ....यात्रियों के कष्ट का ध्यान कर रूह काँप जाती है .....

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    1. ji nisha ji yadon ki tasveere or abhi ki tasveeron me koi talmel hi nahi ban pa raha hai ..bas log sakushal vapas aa jayen..

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  2. बहुत रोचकता पूर्ण ढंग से आपने उतराखंड यात्रा का वृतांत लिखा, वहां का आनंद ही ऐसा है कि शरीर को थकान मालूम ही नही पडती. शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  3. वर्तमान में उतराखंड में मची तबाही ने दिल दहला दिया है, क्या पता कितने जान पहचान वाले भी इनमें शामिल होंगे, ईश्वर सबको खैरियत से सकुशल रखें, यही कामना करते हैं.

    रामराम.

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    1. ji .ishvar se sabki khairiyat chahte hain...abhar

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  4. उतराखंड में मची तबाही से,ईश्वर सबको सकुशल रखे यही प्रार्थना करते हैं.

    रोचकता पूर्ण सुंदर यात्रा का वृतांत ,,,

    RECENT POST : तड़प,

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    1. ji yatriyon ki takleefon ko soch kar man kaanp jata hai ...ishvar sabko kushal rakhe..

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  5. बढिया यात्रा वृतांत.
    आज तो वाकई वहां हालात बहुत खराब है।
    पर हमारी आस्था में कमी नहीं आने वाली।

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    1. ji aastha to kabhi kam nahi hogi .lekin ye samy ishvar ke diye gaye ishare ko samjhane ka bhi hai ..abhar ..

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  6. prakriti ki ajeeb leela...
    shiv ke ghar ko hi matiyamet kar diya :(

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    1. ji mukeshaji ye bhi shiv ka hi koi sanket hai kis tarh unke ghar ko ham pradushit kar rahe hai ...ise samjhana hoga ..

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  7. कविता जी बेहद सलीके से आपने यात्रा वृतांत लिखा मगर आज जो स्थितियाँ हो गयीं हैं उनसे हम सभी व्यथित हैं।

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  8. कल जो हुआ वो आज सबके सामने है ...आज के सच को कोई नहीं बदल सकता

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  9. मनुष्य ईश्वर की कृति से छेड़-छाड कर रहा है ...तो ईश्वर का यूँ इस तरह बदला लेना लाज़मी है

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    1. sach kaha anju ji ye sab insano ka hi kiya dhara hai aur dosh ham bhagvaan ko dete hai ...abhar

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  10. आदरणीया कविता जी यह सच है कि हमारी पीढ़ियों का लेखा जोखा नष्ट हो गया होगा, और यह आज के आधुनिक समय को देखते हुए हमारी बहुत बड़ी क्षति साबित होगी !
    chitranshsoul

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  11. बहुत ही रोमांचित रही आपकी यात्रा ... आपने सजीव बाँधा है इसे ...
    पर कितना बदला हुआ है आज का दृश्य ... और शायद इन्सान से ज्यादा कोई और जिम्मेवार नहीं इसके लिए ...

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    1. ji digambar ji ..aaj ki sthiti ko dekhate hue vahi drushy baar baar aankhon ke aage ghoom jate hai ...abhar

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  12. mai bhi 15may ko janewali thi nahi ja pai,ghar ke sabhi gaye the,sabhi esitarah ki anubhutiyon se bhare hain....aapne behud sahzta se yatra ko apne shabdon me bandha......

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