Tuesday, October 15, 2013

मेला दिलों का …

कल फेस बुक पर दशहरा मेले का एक फोटो  डाला बहुत सारे लोगों ने इसे पसंद  किया।  अपने बचपन  को  याद करते हुए  बचपन के मेलों को याद किया। कुछ लोगों ने तुलना  कर डाली  उस समय के मेले , उनकी बात ही कुछ और थी , इसी बात ने सोचने को मजबूर कर दिया। 

उस समय के मेले मतलब बीस पच्चीस साल पहले के मेले जिनमे  हिंडोले थे ,चकरी वाले झूले थे। गुब्बारे चकरी वाले ,प्लास्टिक के मिट्टी के खिलोने वाले ,मिट्टी  के बर्तन , नकली फूल ,छोटे मोटे बर्तनों वाले, सस्ते कपड़ों वाले ,खाने पीने की दुकानों में जलेबी इमरती मालपुए वाले ,गुड़िया के बाल ,सीटी, कार्ड बोर्ड पर रंगीन पन्नी लगा कर बनाये गयीं तलवार ,गदा, धनुष बाण वाले। यही सब तो था। 
आज भी कमोबेश वही सब है दूरदराज़ के गावों में तो बहुत कुछ नहीं बदला , बड़े शहरों के पास वाले गाँवों में आधुनिकता का असर पड़ा है लोगों की रुचियाँ बदली हैं इसीलिए मेलों का स्वरुप भी बदला है। यही बात शहरों के मेलों के साथ है।  
माल संस्कृति के चलते शहरी बच्चों में मेलों का बहुत ज्यादा आकर्षण नहीं रह गया है। मॉल में गाहे बगाहे कई इवेंट्स होते रहते हैं जिनमें बच्चे मेलों की तरह ही शामिल होते हैं झूले लगाने की जगह वहाँ नहीं है उनकी जगह हवा भरी जंपिंग माउस ,छोटे से टब में चलती नाव, रेसिंग कार आदि ने ले ली  हैं जो सारे साल उपलब्ध हैं।  
कपडे सिर्फ त्योहारों पर खरीदे जायेंगे वाली बात अब नहीं रही।  वैसे भी ब्रांडेड कपडे जूते पहनने वाली पीढ़ी मेलों की दुकानों से कपडे खरीदने से रही और तो और उनके माता पिता जिन्होंने पूरा बचपन मेलों से खरीदे कपडे पहन कर बिताया होगा वे भी ऐसे कपडे मेलों में देख कर नाक भोंह सिकोड़ लेंगे , इसलिए इन दुकानों का तो मेलों से बाहर होना निश्चित ही था। मिठाई के बारे में पसंद अब बदलती जा रही है इसलिए जलेबी, इमरती बाहर ,वैसे भी लोग खुद की साफ़ सफाई के बारे में सजग हुए हैं इसलिए धूल  भरे माहौल में बिकने वाली मिठाइयाँ खाना पसंद नहीं करेंगे हाँ इसकी जगह चाट ,भेल जैसी चीज़ें पसंद की जाती हैं ये पूरी तरह साफ़ सुथरी तो नहीं कही जा सकती लेकिन फिर भी कुछ हद तक , फिर जबान के चटकारे के सामने सब ताक पर। 
कुल मिला कर देखा जाये तो मेले आधुनिक हो गए हैं वृहद हो गए हैं , उनमे वही परिवर्तन आ रहे हैं जो लोगों को पसंद हैं फिर क्या है ऐसा जिसके लिए लोग नॉस्टेलजिक हो जाते हैं ?
वह है मेलों में मौजूद अजनबीपन। जी यही वह बात है जो आधुनिक हो रहे मेलों में है जो उस जमाने के मेलों में नहीं थी और जो लोगों के सर चढ़ जाती है। आपके बगल में खड़ा परिवार शायद शहर के दूसरे कोने से आया हो और आप उसे नहीं जानते , दो घंटे मेले में घूमने के बाद भी आपको शायद ही कोई रिश्तेदार या परिचित दिखाई देता है। इस बड़े से मेले में आपका छोटा सा परिवार कुल जमा तीन चार लोग आपमें अकेलापन भर देते हैं। ऐसे में अगर आपके बगल में कोई संयुक्त परिवार खड़ा हो या कुछ लोग जो अपने ढेर सारे रिश्तेदारों या मित्रों के साथ आये हों हंसी ठिठोली चल रही हो तो आप एक सौ एक फुट के रावन के बजाय उनकी और ही देखते रह जाते हैं।  
मेलों से आकर लोग अपने ज़माने के मेलों को याद नहीं करते बल्कि अकेलेपन से घिर कर उस अपनेपन को याद करते हैं और इसीलिए उस ज़माने के मेले बहुत याद आते हैं।  

कविता वर्मा 

13 comments:

  1. बहुत सुंदर . मेलों का प्राचीन स्वरूप अब बदल रहा है.गांवों से शहरों में प्रवास होने के कारण उनमें आधुनिकता घर कर जाती है और वही मेले अब गंवई लगने लगते हैं .
    नई पोस्ट : रावण जलता नहीं

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  2. अब तो सब कुछ ही बदल गया है..बस यादें ही नही बदली..

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  3. बहुत सुन्दर..उस ज़माने के मेलों की बात कुछ और थी..लोगों के लिए आपस में मिलना खुशियाँ मानना मकसद होता था..आज सब कुछ अजनबी सा लगता है..

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  4. बिलकुल यूं भी अपना-अपना बचपन सभी को याद रहता है और ऐसे मौकों पर खासा ही याद आता है इसलिए अक्सर लोग ऐसा ही कहते मिलेंगे की हमारे जमाने के मेले की बात ही कुछ और थी।

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  5. बचपन याद दिला दिया कविता जी।
    सौभाग्य से मेरे गाँव में अब भी मेला भरता है और बिल्कुल वैसा ही भरता है जैसे मैं अपने बचपन में देखा करता था। बस कुछ ही चीजें बदली है जैसे हाथ से चलने वाली चार सीटों वाली चकरी और डोलर की जगह बड़ी बड़ी बिजली से चलने वाली चकरियां आ गई है।
    चार पाँच साल पहले जब ( लगभग बीस साल बाद) मेला देखने गये तब पापाजी से मेला खर्ची के दस रुपए भी मांग लिये।
    अब भी गाँव के लोग वैसे ही हुड़दंग मचाते "पुंपाड़ियों" से शोर मचाते, पानी वाले गुब्बार से थप-थप करते दिख जाते हैं।
    लेकिन अब पता नहीं कब फिर से मेला देखने कामौका मिलेगा। क्यों कि हमारे लिए तो अब गाँव में घर ही नहीं रहा और ना ही मेला खर्ची देने वाले ...

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  6. sab kuchh yaad aa gaya... kaise chhote papa ke cycle ke dande par mela ham ghumte the..........:)

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  7. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (16-10-2013) "ईदुलजुहा बहुत बहुत शुभकामनाएँ" (चर्चा मंचःअंक-1400) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  8. आपने बचपन के गुजरे दिनों की याद दिला दी !

    RECENT POST : - एक जबाब माँगा था.

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  9. पुराने समय और नए समय में बहुत परिवर्तन आ गया है..
    अपनापन अब कहाँ...

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  10. समय के साथ बहुत कुछ बदलता है। वही बदलाव आज भी जारी है। हमारे घर में दुर्गा पूजा से टेलर मशीन लेकर बैठ जाता था और दीवाली तक सभी के कपड़े सीता था। टेलर के घर का खर्च एक घर के कपड़ों की सिलाई से निकल जाता था। जब बच्चे घर से बाहर निकलते थे तो पता चल जाता था कि कोन-कोन भाई बहन हैं। बच्चे बड़े हो गए, पर याद नहीं कभी उनके कपड़े सिलवाए हों। सबके कपड़े बाजार से खरीदी जाते हैं।

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  11. बचपन अपने आप में एक बेहतरीन शय होती है, लेकिन क्या करें परिवर्तन ही तो नियम है संसार का....

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  12. विचारणीय पक्ष रखा है आपने। मार्मिक प्रस्तुति अपने दौर के मेले क्यों याद आते हैं। तब गर्माहट थी सम्बन्धों की। अब हर तरफ बर्फ है।

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  13. sach aapne to pichla sabkuch yad dila diya....Sonpur Mela humlog ghumne jate then....abhi bhi kamobesh wahi sabkuch to hai par nazriye or apne utsah me parivertan ho gaye hain...

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