Saturday, October 12, 2013

अभ्यस्त

 

घनघोर अँधेरे पथ पर 
कुछ बिखरे काँटे , कुछ 
फूलों जैसे पल 
अटपटी राह 
पर बढ़ते अकेले कदम।  

कठिन राह, घनघोर अन्धकार 
संवेदनाओं से रीता संसार 
मन ढूँढ रहा एक किरण 
एक आस , कोई एहसास 
टटोलते हाथ 
टकराते सघन निरास 
ठोकर खाते गिरते 
भीगते जज़्बात। 

नहीं समय करने का 
भोर का इंतज़ार 
न ही कोई साथ 
उठ खड़ा हो मिचमिचा कर आँख 
हो अभ्यस्त साध अन्धकार 
बढ़ा कदम न कर इंतज़ार।  

कविता वर्मा 

7 comments:

  1. मंगलवार 15/10/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    आप भी एक नज़र देखें
    धन्यवाद .... आभार ....

    ReplyDelete
  2. बहुत सुंदर, प्रभावित करती सुंदर रचना ...!
    नवरात्रि की शुभकामनाएँ ...!

    RECENT POST : अपनी राम कहानी में.

    ReplyDelete
  3. बहुत सुन्दर ....विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएँ .

    ReplyDelete
  4. badhate chalen ....prakash nikat hi hai ...!!vijayadashmi ki shubhkamnayen ....!!

    ReplyDelete
  5. udasi se ujale ki talash karti sundar rachna

    ReplyDelete
  6. आस की नए रिज़ोल्व की रचना -चल डर मत अन्धकार से बढ़ा चल।

    ReplyDelete
  7. बहुत सुन्दर ...

    ReplyDelete

आपकी टिप्पणियाँ हमारा उत्साह बढाती है।
सार्थक टिप्पणियों का सदा स्वागत रहेगा॥

संवेदना तो ठीक है पर जिम्मेदारी भी तो तय हो

इतिहास गवाह है कि जब भी कोई संघर्ष होता है हमारी संवेदना हमेशा उस पक्ष के लिए होती हैं जो कमजोर है ऐसा हमारे संस्कारों संस्कृति के कारण ...