Sunday, May 10, 2009

.दुखवा कासे कहूँ ???

वह  उचकती  जा  रही  थी
  अपने  पंजों  पर .
लहंगा  चोली  पर  फटी चुनरी 
बमुश्किल  सर  ढँक  पा  रही  थी
हाथ    भी  तो  जल  रहे  होंगे .
माँ  की  छाया  में
छोटे  छोटे  डग  भरती ,
सूख  गए  होंठों  पर  जीभ  फेरती ,
माँ  मुझे  गोद  में  उठा  लो 
की  इच्छा  को 
सूखे  थूक  के  साथ
 हलक  में  उतारती .
देखा  उसने  तरसती  आँखों  से  मेरी  और ,
अपनी   बेबसी  पर  चीत्कार  कर  उठा .
चाहता  था  देना  उसे
टुकड़ा  भर  छाँव 
पर  अपने  ठूंठ  बदन  पर
जीवित  रहने  मात्र 
दो  टहनियों  को  हिलते  देख
चाहा  वही  उतार  कर  दे  दूँ  उसे
 न  दे  पाया .
जाता  देखता  रहा  विकास  की  राह  पर
एक  मासूम  सी  कली  को  मुरझाते  हुए . 

10 comments:

  1. These are good thoughts. I hope you find time to transliterate them in Hindi. (I may suggest Lipikaar Add-in in FireFox browser for Hindi typing.)

    Waiting for more original thoughts from you!

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  2. बहुत अच्छा है

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  3. "सूख गये होठो पर जीभ फेरती" अच्छा चित्रण है। पूरी की पूरी रचना बहुत ही खूबसूरत है।

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  4. 2007 से मेरा सफ़र शुरू हुआ था
    तब से अब तक जारी है
    बधाई

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  5. behad bhavpoorn.. congratulation.. keep writing

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  6. बधाई आपको ...लिखती रहें

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  7. बहुत -बहुत बधाई ! लेखन का सफ़र ऐसे ही चलता रहे !

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  8. bahut bahut mubarak , bahut sari shubhkaanaye aap aise hi likhte rahen .....:)

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  9. kam shabdo main kafi vistarit aur vyathit karne wali baat kahi aapne

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  10. बहुत सुंदर सटीक और मार्मिक लेखन,बधाई
    Keep it up

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