Tuesday, November 17, 2009

विरासत

गर्मियों की एक दोपहर गर्म हवाओं के थपेड़ों को घर में घुसने से रोकने के लिए दरवाजे खिड़की बंद कर बैठी थी ,कि दरवाजों कि संध को रास्ता बना कर एक आवाज़ भीतर तक घुस आयी ,घी ले लो -घी लेलो.
अलसाई दुपहरी में ये कौन आ गया ,बुदबुदाते हुए थोड़ी सी खिड़की खोल कर बाहर झाँका ,तो हाथ में एक छोटी सी मटकी पकडे ,लहंगा पहने ,एक औरत को खड़े देखा.
बाई सा घी ले लो.चोखो घी है, हाँथ को बन्यो ,उसने कहा.
घी तो चाहिए ही नही ,इसलिए उसे टरकाने कि गरज से कहा, नही हम घी नही लेते घर पर ही बनाते है,अभी जाओ.
अरे बाई देखि लो घर को बन्यो चोखो घी है.पैसा कि जरूरत है काम आयेगो.
अब तक मेरा आलस छूट गया था इसलिए उस के बारे में और पता करने कि गरज से मैंने पूछा कहाँ से आयी हो?
राजस्थान से आयी हूँ बाई .यहाँ ढोर चराने आए है .एक बार घी देख लो ,चोखो लगे तो ले लीजो.
उसके सरल आग्रह को मैं इनकार न कर सकी और गर्म थपेड़ों कि परवाह न करते हुए दरवाजा खोल के बाहर आ गयी.मटकी में देखा करीब एक किलो घी होगा .कितने का है ?नही लेना था फिर भी पूछा .
एक सेर है पचास और दस रूपया दे दीजो। 
अब चौकाने कि बारी मेरी थी एक किलो घी आधा किलो कि कीमत में ? पर ये तो एक किलो है,इसकी कीमत तो एक सौ बीस रुपये होनी चाहिए.गाँवों में आधा किलो को एक सेर कहते है इसलिए ये कम कीमत लगा रही है.पर उसकी सरलता ने मुझे मोह लिया था ,मैं नही चाहती थी कि वो ठगी जाए इसलिए कहा ,ये तो एक किलो है इसकी कीमत कम क्यो बता रही हो ?पर मेरी खड़ी बोली उसके ज्यादा पल्ले नही पड़ी,तब अपनी भाषा को तोड़-मरोड़ कर उसे समझाया इतने घी के सौ ऊपर बीस रूपया लेना.
अब उसे कुछ समझ आया तो बोली ,ना बाई म्हारी सास ने गाँव से आते समय बोल्यो थो ,सहर में नी मिले तो भूखो राइ ले जो पण बेईमानी को पैसो मत कमाजो ,यो घी तो एक सेर है नि तुम तो पचास ऊपर दस रूपया दी दो,इतना कहते हुए उसने वो घी कि मटकी मेरे हाथ में पकड़ा दी.
और मैं अवाक् खड़ी ये समझने की कोशिश करती रही कि ६० रुपये में घी के साथ-साथ किस सरलता से संस्कारों कि कितनी बड़ी विरासत भी वो मुझे दिए जा रही है. 

8 comments:

  1. घी और साठ रुपये?
    आज तो दौ सौ चालीस में भी असली घी नहीं मिलता कविताजी। एक बार घी को गर्म कर देख लीजियेगा सब पता चल जायेगा।
    और हां! साठ नहीं दो सौ रुपये में तो गांव में ही बिक जायेगा, ठेठ शहर तक आकर बेचने की कोई जरूरत नहीं उन्हें।
    आजकल गाँवों वाले भी बड़े होशियार हो गये हैं थोड़ा शुद्ध घी थोड़ा डेयरी का घी और थोड़ा डालडा कुछ आलू... बस फिर आप जैसी भली-भोली महिला को बरगलाने में समय ही कितना लगता है।
    :)
    और अगर वाकई में बढ़िया घी है तो अगली बार वह महिला आये तो पांच दस किलो मेरे लिये भी ले लीजियेगा, इस भाव में तो हैदराबाद से इंदौर आकर खरीदना महंगा नहीं पड़ेगा। आप से मिलना भी हो जायेगा और घमंडी की लस्स्सी भी.. :)

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  2. sagarji ye baat tabhi ki hai jab ghee 120 rupaye hi tha vaise asali-nakali ka fark batane ka shukriya.aap indore aaye to sahi lassi ke saath dal-bafale bhi ho jayege.

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  3. ''और मैं अवाक् खड़ी ये समझने की कोशिश करती रही कि ६० रुपये में घी के साथ-साथ किस सरलता से संस्कारों कि कितनी बड़ी विरासत भी वो मुझे दिए जा रही है.''

    कविता जी ,

    हम सोचते है दुनिया सारी मक्कार है और बे ईमानो का बसेरा है मगर नहीं दुनिया में आज भी ईमान को सब कुछ समझने वाले लोगो का जम कर बसेरा है जो गाहे बगाहे सामने आकर हममे राह दिखा जाते है / आपके सुन्दर विचारों से मै अत्यधिक प्रभावित हूँ अतः आपके ब्लॉग का फोल्लोवेर बन रहा हूँ ताकि आपके विचारों जबतब लुफ्त उठा सकू / थैंक्स/

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  4. tamareji ,aap ne itana bada protsahan diya hai kin shabdo mein dhanyavad karu,samajh nahi paa rahi hu.bahut-bahut shukriya.

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  5. तेरे सर्व-कामत से इक कद्द-ए-आदम,
    कयामत के फितने को कम देखते है |
    बना कर फकीरो का हम भेष गालिब,
    तमाशा-ए-अहले करम देखते है |

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  6. सरलता देख अब विश्वास सा नहीं होता...हम सब मक्कारी देखने के ऐसे आदी हो गये हैं कि सरलता में भी छलावा ही नजर आता है.

    सुन्दर संस्मरण!!!

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  7. How to write a comment in Hindi?
    The site dz nt provide facility of transliteration for writing cmmnts. I dnt know how other ppl have been able to put commnts on yr blog in hindi.
    Since you r an old blogger u can assist me in this direction. thanks.

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  8. Download Lipikaar extention for Firefox.

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