Sunday, September 25, 2011

काली साडी


बहुत दिन हो गए कोई पोस्ट नहीं लिखी.सोचते सोचते एक महिना बीत गया ,ऐसा नहीं इस बीच कोई विचार मन में न आया हो लेकिन बस लिखा ही नहीं गया.हम महिलाएं छोटी छोटी कितनी बातें सोचती रहती है और उनको किन किन बातों से जोड़ लेती है और बस बातों ही बातों में वाकये बन जाते है.एक छोटी सी घटना  है कम से कम हमारे इंदौर में तो काफी प्रचलित है की वार के अनुरूप कपडे पहने जाये.खास कर वृहस्पतिवार को पीले और शनिवार को काले या नीले .तो कल शनिवार को जब स्कूल जाने के लिए साडी निकालने लगी तो हाथ काली साड़ी पर ठहर गया .शनिवार के दिन काली साड़ी.शनि महाराज का रंग.बस वही निकाल ली.स्कूल पहुँच कर रजिस्टर  में साइन  किये ही थे की पीछे से आवाज़ आयी.
अरे आज में भी बिलकुल ऐसी ही काली साडी पहनने वाली थी .
फिर पहनी क्यों नहीं ?अच्छा लगता हम दोनों एक जैसी साड़ी में होते .
सोच कर ही अच्छा लगा की अरे एक सा  विचार दो लोगो के मन में आया .
अरे यार पहनने वाली थी लेकिन आज मेरे बेटे का पेपर है इसलिए आज काला पहने का मन नहीं हुआ. 
ओह्ह ..हम्म ये भी ठीक है अब शनि महाराज बेटे से बढ़ कर थोड़े ही है.
बस अपनी क्लास की तरफ बढ़ रही थी सामने से एक दूसरी कलीग हँसते हुए आयी और कहने लगी कविता आज सुबह मैंने पता नहीं क्यों सोचा की तुने बहुत दिनों से ये वाली साड़ी नहीं पहनी है आज तुझे ये ब्लैक एंड रेड साड़ी पहननी चाहिए .और देख तूने आज वही साड़ी पहनी है. 
मैंने भी हँसते हुए जवाब दिया देख तेरे मन की बातें मैंने घर में बैठे ही जान लीं .
तभी एक और कलीग आयी और कहने लगी अरे ऐसी साड़ी तो गीतू(जो सबसे पहले ऐसी साड़ी पहनने की बात कर रही थी ) के पास भी है  .
खैर महिलाओं का साड़ी पुराण कभी ख़त्म नहीं होता. हम हँसते हुए अपनी अपनी कक्षाओं में चले गए .
ब्रेक में सब बैठे बात कर रहे थे की हमारी हिंदी टीचर बोली गीतू ने आज काली साड़ी नहीं पहनी क्योंकि उसके बेटे का पेपर है.अब हम हिंदी इंग्लिश वाले ऐसी बातों पर विश्वास करें तो समझ आता है लेकिन साइंस मैथ्स वाले भी ऐसी बातें मानते है??उन्हें तो ऐसे अन्धविश्वास नहीं मानना चाहिए .
क्या साड़ी का वार से या बेटे के पेपर से कोई सम्बन्ध हो सकता है???
मैंने कहा सम्बन्ध है या नहीं ये तो नहीं पता लेकिन हाँ वह माँ है और माँ  का पहनना औढ्ना खाना पीना  अपने बच्चे के इर्द गिर्द ही होता है.  उसे विज्ञानं की कसौटी पर नहीं परखा जा सकता है. एक टीचर के रूप में भले वो इन बातों को न माने लेकिन माँ के रूप में सारे तर्क बेकार हो जाते है. और सभी इस तर्क से सहमत थे.   

21 टिप्पणियाँ:

  1. सही कहा आपने ....माँ का सबकुछ बच्चों के ही इर्द -गिर्द होता है

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  2. माँ कि सोच के सामने सभी तर्क व्यर्थ होते हैं ..सटीक बात

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  3. आदरणीया कविता वर्मा जी
    सादर अभिवादन !

    रोचक भी , सच भी …
    मां का पहनना ओढ़ना खाना पीना अपने बच्चे के इर्द गिर्द ही होता है । उसे विज्ञानं की कसौटी पर नहीं परखा जा सकता ।
    एक टीचर के रूप में भले वो इन बातों को न माने लेकिन मां के रूप में सारे तर्क बेकार हो जाते है ।


    अच्छा लगा साड़ी पुराण :)

    नवरात्रि पर्व की बधाई और शुभकामनाओं सहित
    -राजेन्द्र स्वर्णकार

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  4. इसीलिए बच्चे शायद माँ के ज्यादा करीब होते हैं...

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  5. बहुत खूब कहा है आपने >>>>>>>

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  6. लेकिन वो मां ही है जो इसी तरह से अपने बेटे को अंधविश्‍वासी बनाती है और आगे चलकर उसे कदम कदम पर ठगा जाता है।

    ------
    आप चलेंगे इस महाकुंभ में...?
    ...खींच लो जुबान उसकी।

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  7. der se aayin aur kitni saarthak soch de gayin

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  8. बहुत ही सार्थक व सटीक लेखन ।

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  9. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है! आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो
    चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  10. आदरणीया कविता जी
    नमस्कार !
    ...........सही कहा आपने रशंसनीय सटीक बात

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  11. मैं भी आपकी बात से सहमत.

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  12. सुन्दर प्रस्तुति पर
    बहुत बहुत बधाई ||

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  13. विश्वास और अंधविश्वास के बीच विरोधाभास को प्रकट करती सुंदर लघु कथा . सराहनीय प्रस्तुतिकरण . आभार.

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  14. रोज़मर्रा की सोच को बड़े ही सार्थक तरीके से प्रस्तुत किया है...बधाई|

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  15. सुंदर प्रस्‍तुति।
    मां का मुकाबला कोई कर ही नहीं सकता....

    मां हमेशा अपने बच्‍चों के सुख में सुखी होती है और बच्‍चों के गम में दुखी।

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  16. बहुत सार्थक लेखन...
    सादर...

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  17. आपकी रचना में "हमारा इंदौर" पड़कर मन खुश हो गया. दिल्ली में इंदौर की बहुत याद आती है. :)

    साड़ियाँ और रंग, श्रद्धा और अंधविश्वास - बहुत कुछ है आपकी रचना में. छोटी छोटी घटनाएं और विस्तृत दृष्टिकोण - अच्छी ससन्देश रचनाओं की सटीक "रेसिपी" है :)

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  18. काले वसन में धवल मन.....ममता की ही रीत...
    ममता के सम्मुख विवश.......कोई हार या जीत....
    कोई हार या जीत..........यही संबल निर्बल के.....
    सुख दुःख दोनों में सदा.......नैन माता के छलके.....
    माना सच है ये कहा.........माता सदा ही ख़ास....
    लेकिन उसकी आड़ में ......गढ़ा अन्धविश्वास......

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  19. आपको सपरिवार
    नवरात्रि पर्व की बधाई और शुभकामनाएं-मंगलकामनाएं !

    -राजेन्द्र स्वर्णकार

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  20. आपको नवरात्रि की ढेरों शुभकामनायें.

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