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Wednesday, September 28, 2011

खबर का असर


न्यूज चेनल और न्यूज  पेपर में आये दिन पढ़ते सुनते है खबर का असर.तब इसे एक मुस्कान के साथ पलट दिया जाता है ..व्यावसायिक कसरत,हर और हर कोई ये बताने की कोशिश में है की उसके द्वारा दिखाई या  छापी गयी खबर का ही नौकरशाही या राजनितिक गलियारों में असर होता है .हालाँकि इन ख़बरों को जो आम आदमी पढता है उस पर इन ख़बरों का क्या और कैसा असर होता है इसकी परवाह जो की जानी चाहिए वो शायद ही कोई करता है. 
हम आये दिन पेपर में अच्छी और बुरी ख़बरें पढ़ते है.कुछ ख़बरों से मन व्यथित होता है तो कुछ को पढ़ कर चिंतित .कुछ ही ख़बरें होती है जो ख़ुशी से चहकने पर मजबूर कर देती है और कुछ सच में सोचने पर .ज्यादातर ख़बरों को हम ख़बरों की तरह पढ़ते है और भूल जाते है .कुछ ख़बरें दिमाग के  किसी कोने में अटक जाती है और उनका असर कितना गहरा और कितनी देर तक होता है ये तब पता चलता है जब ऐसी ही किसी परिस्थिति से रूबरू होना पड़ता है. 
कुछ दिनों पहले समाचार पत्र में एक खबर पढ़ी.किसी पोलिसे इंस्पेक्टर ने रात में अकेले घर लौटती एक लड़की को किसी सुनसान स्थान पर ले जा कर उसके  फोटो खींच लिए और फिर उसे ब्लेकमेल  करने लगा .वो तो लड़की ने समझदारी की की घर वालों को ये बात बता दी और जब उसके साथियों ने पैसों के लिए फ़ोन किया तो सब पकड़ा गए. उस इंस्पेक्टर को तो तुरंत प्रभाव से निलंबित किया गया.लेकिन उसके बाद कई और लोग भी उसके खिलाफ ऐसी ही शिकायतों के साथ आगे आये .दो - तीन दिन लगातार इस बारे में ख़बरें आती रही ,लेकिन बस पढ़ा और पन्ना पलट दिया. पोलिसे डिपार्टमेंट में ऐसी घिनौनी शर्मनाक हरकत.लेकिन आजकल कहीं भी कुछ भी संभव है की सोच ने इसे ज्यादा तूल नहीं दिया. 
लेकिन खबर का असर तो इस खबर के ८-१० दिन बाद सामने आया. हुआ यूं की बड़ी बेटी कॉलेज की और से खेलने बाहर गयी थी. लौटते में उसकी वापसी का समय रात में ३-४ बजे के बीच का था. पतिदेव बाहर गए हुए थे इसलिए रात में उसे घर लाने  का प्रबंध मुझे ही करना था.हमारा  इंदौर शांत  शहर है हालाँकि आजकल ये भी महानगरों से होड़ करने के चक्कर में कई नए शौक पाले हुए है लेकिन फिर भी आम तौर पर यहाँ महिलाएं सुरक्षित है .मुझे याद है जब हम छोटे थे तब रात ९ से १२ बजे का फिल्म का शो देखना वो भी पूरे परिवार के साथ आम बात थी अभी भी है. फिल्म के बाद लोग सराफा जाते थे  वहां गरमा गरम दूध जलेबी का नाश्ता और पान खाए बिना वापस नहीं लौटते थे. कई बार देर रात वापस लौटते हुए अकेली महिला को स्कूटी या लुना पर जाते हुए भी देखा है. सो रात में बिटिया को लेने अकेले जाना बड़ी बात नहीं थी ,लेकिन घर से निकलने से पहले दिमाग के किसी कोने में अटकी पड़ी एक खबर ,पोलिसे इंस्पेक्टर ने लड़की को ब्लाकमेल किया जाने कैसे कौंध गयी. दिमाग में आने जाने वाले विचारों की गति सीमा तो तय नहीं की जा सकती.बस वो अपनी पूरी रफ़्तार से चलने शुरू हो गए. पर्स रखा उसमे ड्राइविंग  लायसेंस,पैसे, मोबाइल गाड़ी के शीशे चदा कर ही जाउंगी.इस समय तो सारे रास्ते सुनसान होंगे तो डरने की कोई बात नहीं है वैसे तो कोई नहीं होगा और अगर किसी ने लिफ्ट के लिए हाथ दिया तो ?? नहीं जी इस रात में किसी को लिफ्ट देने की जरूरत नहीं है .वो तो ठीक है लेकिन अगर कहीं पोलिसे ने ही चेकिंग  के लिए रोक लिया तो???? बस यही आकर विचारों  की गति लस्त पड़ गयी .अगर किसी पोलिसे वाले ने चेकिंग  के लिए हाथ दिखा कर गाड़ी रोकी तो??गाड़ी तो रोकना ही पड़ेगी.गाड़ी रुकी तो बात भी करना पड़ेगी.बात करने के लिए कार के शीशे भी खोलना पड़ेंगे ,और शीशे खोलने के बाद ...अगर किस्मत ठीक हुई तो कोई शरीफ आदमी होगा और अगर....निकलते निकलते ये क्या ख्याल आ गए. क्या करूंगी ऐसी स्थिति में?? 
बिटिया का फ़ोन आ चुका था मम्मी में यहाँ चौराहे पर इंतजार कर रही हूँ जल्दी आओ साथ वाले सब निकलने की तय्यारी  में है .अब जो होगा देखा जायेगा..बिटिया वहां अकेली न रह जाये उसे कहा बेटा २-३ दोस्तों  को रोक के रखो अकेले नहीं खड़े रहना वहां . हुआ तो हम उन्हें छोड़ देंगे.सारे रास्ते गाड़ी चलाते हुए बस यही विचार मन में आता रहा बस भगवन कोई पोलिसे वाला न मिले ..फिर सोचा अगर कही रुकना भी पड़ा तो शीशे सिर्फ थोड़े से खोलूँगी और लाईट जला कर गाड़ी चेक करवा दूँगी. खबर का कैसा और कितना गहरा असर होता है ये आज जाना. 
खैर नींद के आगोश में सिमटे सोते शहर को देखते हुए में बिटिया को लेकर सकुशल घर आ गयी. लेकिन एक बात जो मन पर गहरा असर छोड़ गयी. हम रोज़ इतनी नकारात्मक ख़बरें पढ़ते है हमें आगाह करने के लिए शायद इनका छापा जाना जरूरी भी है लेकिन क्या इन नकारात्मक ख़बरों के बीच सकारात्मक ख़बरें भी नहीं छापी जा सकती??? क्या ऐसी नकारात्मक ख़बरों से लोगो की मानसिकता पर  गलत प्रभाव नहीं पड़ता होगा??रोज़ चोरी लूट हत्या बलात्कार की ख़बरें पढ़ते हुए कुछ लोग इन्हें रोजमर्रा की जिंदगी के वाकये मान कर खुद को भी इस तरह की घटनाओं में शामिल नहीं कर लेते होंगे???सनसनी फ़ैलाने के लिए इन ख़बरों को जिस तरह से हाईलाईट किया जाता है उससे लोगो का लोगो पर से, व्यवस्था से ,इंसानियत से भरोसा ख़त्म नहीं होता जा रहा है. में ये नहीं कहती ऐसी ख़बरें नहीं छापी या दिखाई जाना चाहिए अगर ऐसी खबर में न पढ़ती तो उस रात बाहर जाने से पहले खुद को इस तरह से मानसिक रूप से तैयार नहीं कर पाती.खुद के लिए इतनी सावधानियां  निर्धारित नहीं कर पाती .लेकिन मेरा ये कहना है की जहाँ समाज में इतने अपराध हो रहे है वहां कई अच्छे लोग भी तो अच्छे कामों में लगे है क्या उन लोगो के कार्य समाज के सामने लाने के लिए  अखबारों में थोड़ी जगह नहीं दी जा सकती और थोडा समय न्यूज चेनल पर .फिर शायद इतनी बुरी ख़बरें आना ही बंद हो जाएँ लोगो पर खबर का असर तो होगा ही न लेकिन अच्छी खबर का. 

14 comments:

  1. सजग होना जरूरी है.
    ताकि हादसे रुक सकें.
    प्रेरणा चाहे बुरी खबरें ही दें.

    आपका संस्मरण बहुत अच्छा लगा.

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  2. खबर और उसका असर स्थिति पर करता है निर्भर .....लेकिन सचेत रहना जरुरी है ...!

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  3. सच कहा आपने , खबरें मस्तिष्क पर बहुत असर डालती हैं , सकारात्मक भी और नकारात्मक भी । संस्मरणात्मक और सजग करती हुई पोस्ट

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  4. सही कहा है आपने हमें सकारात्मक पक्षों को भी उजागर करना ही चाहिए

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  5. शायद यह नकारात्मक समाचार और खबर ही हैं जो सबकी भाषा, ज़िन्दगी और रहन-सहन में झलकने लगा है..
    अपने आस-पास के परिवेश का जितना असर होता है, उतना ही खबर का भी असर होता है.. यह बात तो आपने सही कही...
    पर एक वेबसाइट है जो भारत में हो रहे अच्छे कार्यों को ही जगह देता है..
    ज़रूर देखिएगा और दूसरों के साथ बांटिएगा भी.. बदलाव खुद से ही शुरू होती है!
    http://www.thebetterindia.com/

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  6. वाह जी, आपने अखबार और चैनल की खबरों के बीच खुद को शामिल करते हुए एक बेहतर समीक्षा की है।
    लेकिन आप तक हर छोटी बडी खबर पहुचाने का वादा भी तो हमें पूरा करना है।
    वैसे आपकी बातों से मैं पूरी तरह सहमत हूं।

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  7. aaj - kal achchhe logo ki pehachan karana , jara mushkil ho gaya hai ! aap ne practikaly feel kiya hai ! jo vajib hai ! swayam satark rahane me hi chaturayi hai !

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  8. ए टी पी के चक्कर मे मीडिया भी मशगूल है कोई मतलब नही है कौन सी खबर मखमली घास है और कौन सी पेड़ बबूल है…वैसे नफ़ा नुकसान दोनो है इस तरह की खबरों से……एक ओर जनता के सचेत हो जाने का उद्देश्य होता है तो दूसरी ओर अपराधियों के लिये एक नया नुस्खा…। बस खेद का विषय यह है कि नकारात्मक पहलुओं को, घटनाओं को बढ़ा चढ़ा कर प्रस्तुत करना। कुछ भी हो खबरों का असर तो होता है भाई………नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें

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  9. बिलकुल सही कहा आपने
    आप भी मेरे फेसबुक ब्लाग के मेंबर जरुर बने
    mitramadhur@groups.facebook.com

    MADHUR VAANI
    BINDAAS_BAATEN
    MITRA-MADHUR

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  10. वर्तमान के यही भूत हैं, जो दिन रात दिखाई देते हैं।
    जब टीवी चैनल नहीं थे तब गांव मोहल्ले के बुढे बच्चों को भूतों की कहानियां सुनाकर डराते थे अब ये काम टीवी चैनल वाले कर रहे हैं।

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  11. आप सही कह रही हैं कविता जी, आजकल अखबार तो इन ख़बरों से ही भरा रहता है. वह भी सुबह सवेरे से क्योंकि अखबार तो सुबह ही आता है. अब तो कई बार यह विचार भी आता है कि अखबार सुबह के बजाय शाम को पढ़ा जय जिससे दिन तो अच्छा गुजरे. फिर जिसके यहाँ लड़कियां हैं तो उनकी स्थिति और भी खराब रहती है, जबतक बच्चे वापस नहीं आते.

    नवरात्रि पर्व की बधाई और शुभकामनाएं.

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  12. आज कल दहशत की खबरों को सुर्खी में लाकर TRP बढ़ाना मीडिया के लिये आम हो गया है...अखबार भी इन्ही खबरों से भरे रहते हैं. ऐसे हालात में दहशत होना स्वाभाविक है. आवश्यकता है सचेत रहने की. आप का कहना सच है कि समाज में कुछ न कुछ सकारात्मक भी होता रहता है, ज़रूरत है उसको भी रेखांकित करने और प्रोत्साहित करने की. विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएं..

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  13. This is a really neatly written article. I will make sure to bookmark it and return to read more of your helpful information. Thank you for the post. I’ll certainly comeback.

    A few snaps dont belong to India, there's much more to India than this...!!!. take a look here Yeh Mera India

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