Monday, October 24, 2011

धनतेरस

कल यानि २४ अक्तूबर यानि धन तेरस ....ठीक ग्यारह साल पहले भी धनतेरस २४ तारिख को ही थी ठीक ग्यारह साल पहले अपने नए बने आशियाने में हम रहने आये थे. जी हाँ कल हमारे मकान जो अब हमारा घर है उसकी ग्यारहवी सालगिरह है. समय कब कैसे निकल जाता है पता ही नहीं चलता. बीच में कई साल बिना इस सालगिरह को याद किये भी निकल गए. लेकिन इस बार ये सालगिरह बहुत याद आ रही है.शायद इसलिए भी क्योंकि अब फिर से मकान का काम चल रहा है ओर हम पल पल उसके पूरे होने का इंतजार कर रहे है. 
आज भी याद है हमारे नए बने मकान की वास्तु शांति के पहले वाला दिन सारा दिन हम अपनी छोटी गाड़ी से सामान ढोते रहे. उस समय यहाँ का रास्ता भी बहुत उबड़ खाबड़ था गाड़ी दायें चलाओ तो पत्थरों पर लुदकती  हुई बाएं पहुँच जाती थी. दूर दूर तक कोई पंचर वाले की दुकान नहीं थी हमारे घर से लगभग ३ -४ किलोमीटर दूर तक कुछ भी नहीं था. वास्तु शांति के बाद रात में नए घर में ही सोना था. उस समय तक मकान में दरवाजे भी नहीं लगे थे. आज भी याद है रात में बिस्तर के साथ मच्छरदानी लाना नहीं भूले थे ओर बच्चों को बड़े ध्यान से सुलाया था क्योंकि उस समय यहाँ बिच्छू ओर सांप बहुत थे. सुबह जब नींद खुली तो पूरा कमरा सूरज की तेज़ रोशनी में नहाया हुआ था. ये मेरा अपने कमरे से  पहला साक्षात्कार था.अब जब ऊपर नया मकान बन रहा है मेरे बेडरूम में पूर्व दिशा में खिड़की नहीं निकल रही थी तो मन खिन्न सा था पिछले ५ महीनों से खुद को बिना सुबह की रोशनी वाले कमरे में सोते जागते देखने ओर महसूसने की कोशिश कर रही हूँ लेकिन ....सुबह हो ही नहीं पा रही है.अंतत बाहरी लुक में थोडा परिवर्तन करवा कर एक छोटी सी खिड़की पूर्व दिशा में निकलवाई तब जा कर सुबह निश्चिन्तता से जागती हूँ.
हमारा ये घर बनाने से पहले हम किराये के मकान में थे धनतेरस का दिन पतिदेव को ड्यूटी पर जाना था .दो कमरों का मकान था .उन्होंने कहा की में ट्रक लगवा देता हूँ ६-७ किलोमीटर तो जाना ही है सामान बस ऐसे ही बोरों में भर देंगे बस घंटे भर में सब सामान पैक हो जायेगा. मैंने कहा भी की मुश्किल है लेकिन...खैर  ट्रक आ कर खड़ा हुआ ओर समान की लदाइ  शुरू हुई लेकिन ये क्या सामान तो निकलता ही जा रहा है.थक गए बुरी तरह कितना सामान है ख़त्म ही नहीं होता. घर में जमाया हुआ सामान दिखता नहीं है.खैर जैसे तैसे सामान लादा ओर नए घर में पहुंचे शाम होने को थी लेकिन दिए...वो तो पता नहीं किस बोरे में रखे थे. बाहर एक बल्ब लगाया ओर मन ही मन भगवन से माफ़ी मांगी की आज अभी दिए नहीं लग पाएंगे.ओर सामान खोलना ओर जमाना शुरू किया. खैर दिए जल्दी ही मिल गए .शुक्र था खाना पहले ही बना लिया था. 
दूसरे दिन सुबह पुराने मकान में जा कर बचा हुआ सामान लाना था ओर घर की सफाई करके मकान मालिक को चाबी देना थी .मैंने बच्चों को घर के अन्दर किया ओर  मेन दरवाजे पर बाहर से ताला डाल दिया कहा की तुम अन्दर खेलो हम अभी आते है.हम बड़े निश्चिन्त हो कर चले गए की बच्चे घर के अन्दर है तो सुरक्षित है.थे ही कितने बड़े बड़ी बेटी सिर्फ ९ साल की थी ओर छोटी ५ की .हमने इत्मिनान  से सब काम  निबटाया सफाई शौपिंग सब कर के जब घर आये तो दूर से ही घर के बाहर बरांडे में कोई नज़र आया( उस समय करीब २ किलोमीटर   दूर से घर दिख जाता था )  पता नहीं कौन है बच्चे घर में अकेले है गाड़ी की स्पीड बढ गयी जब घर पहुंचे तो देखा बच्चे बाहर खेल रहे है .अरे तुम लोग बाहर कैसे आये ?हमने तो ताला लगाया था बाहर से .मम्मी हम दूसरा दरवाजा खोल कर बाहर आ गए .छोटी बेटी ने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया .हे भगवन घर से बाहर आने के ५ रास्ते है हमने एक पर बाहर से ताला डाला था लेकिन ये सोचा ही नहीं की बच्चे भी अपना दिमाग चलाएंगे. शुक्र है उस समय वहां कोई नहीं था सब सुनसान ..जब कोई है ही नहीं तो डर किससे??? उस दिन सामान जमाते हुए बाकी चार दरवाजे बंद किये उनके सामने सामान लगाया ताकि बच्चे उन्हें अकेले में खोल न सकें .वो आज भी बंद है. 
शाम को जब पतिदेव ड्यूटी पर चले गए ,दिन भर से आने वाली हवा चलने की आवाज़ चिड़ियों के चहचहाने की आवाजें भी आना बंद हो गयी तब ये शांति सन्नाटे सी चुभने लगी. तब सब काम छोड़ कर पहले रेडियो की व्यवस्था की ओर उसे चालू किया तब थोडा ठीक लगा. हमारे अलावा भी कोई है यहाँ. 
घर के आसपास कम से कम ५ फीट ऊँची घास लगी थी  खेती की जमीन पर बारिश के बाद घास ने अपना पूर्ण आकर ले लिया था. दिन में जब घास हवा के साथ लहराती तो घंटों उसे देखते निकल जाते. लेकिन इसमें सांप बिच्छू भी  बहुत थे. पहले साल में ही घर में १३ बिच्छू निकले. लगभग हर महीने एक. तब एक नियम बनाया गया की कोई भी सामान ऊपर से पकड़ कर उठाया जायेगा नीचे से नहीं क्योंकि उसके नीचे बिच्छू  हो सकता है. एक बार तो पलंग के अन्दर की पेटी में रजाइयों के बीच से बिच्छू की केंचुली निकली. उसी दिन रात में  लाईट जलाने की व्यवस्था की ताकि रात में कभी उठना पड़े तो जमीन पर पैर रखने से पहले नीचे देखा जा सके. दिन में आस पास के गाँव वाले गाय चराने आते थे. दिन में गाय के गले में बंधी घंटी का मीठा  स्वर जब हवा पर सवार हो कर कानों तक आता एक सुरीला रस घोल जाता. सुबह पक्षियों की मधुर तान से होती तो रात आसमान पर चाँद तारों को देखते बीत जाती. दूर दूर तक कोई कृत्रिम रोशनी न होने से आसमान में ढेर सारे तारे दिखते .ओर हम उनमे सप्त ऋषि ,शुक्र मंगल बृहस्पति ढूँढते  रहते. उस समय रात  में १ घंटे बिजली की कटौती होती थी. ये हमारा स्वर्णिम समय होता था.हम माँ बेटियां बाहर बैठ कर खूब बातें करते. discovary पर देखे गए कार्यक्रमों की बातें उन्हें बच्चों को  समझाना .ऐसे ही एक शाम छोटी बेटी ने पूछा मम्मी कुछ सालों में सूरज का आकर बड़ा हो जायेगा ,वो आधी पृथ्वी को ढँक लेगा तब कितनी गर्मी होगी न तब हम कैसे रहेंगे यहाँ?
मैंने उसे समझाते हुए कहा ऐसा होगा लेकिन उसमे कई लाख करोड़ साल लगेंगे .तब तक तो हम तुम फिर तुम्हारे बच्चे बच्चों के बच्चे ओर उनके बच्चे ओर........कई पीढियां निकल जाएँगी.समझो तुम्हारे  बाद कम से कम १०० पीढियां.कहने को तो कह दिया लेकिन ऐसा लगा जैसे किसी ने दिल मुठ्ठी में भींच लिया हो...चाहे कितनी ही पीढियां लेकिन वो होगा तो मेरा ही खून न?? मेरी बेटियों का भी अंश होगा उनमे.वो बात आज भी भुलाये नहीं भूलती.ओर उस बात का दर्द आज भी महसूस होता है.ऐसे कैसे कह दिया मैंने?बस तभी से सोच लिया चाहे जो हो अपनी अगली पीढ़ी के लिए रहने लायक एक पृथ्वी जरूर छोड़ कर जाना है जिसमे शुध्ध  हवा हो पानी हो ओर साफ सुथरी रहने लायक जगह हो. 
हमारी कालोनी में कुल १२-१५ परिवार थे ओर प्लाट लगभग ३५०० .सभी अकेले थे .इसलिए सब एक दूसरे के बहुत करीब थे. एक दूसरे का खूब ध्यान रखते हुए. रास्ते में यदि कोई पैदल आते दिखता तो तुरंत गाड़ी रोक ली जाती ओर लिफ्ट दी जाती. कोई नयी गाड़ी दिखाती तो कोलोनी के लडके तुरंत अपनी मोटर सायकल  पर निकल जाते देखने की किस के यहाँ जा रही है.?अगर कोई चंदा  मांगने वाला आ जाता तो कौन है क्या है ओर कितना चंदा देना है इसके बारे में तुरंत सबको फोन करके खबर की जाती.
ऐसे ही एक दिन में बैठक में बैठी थी दरवाजा खुला था की एक बुजुर्ग आये उन्होंने बाहर से आवाज़ लगाई ओर कहने लगे बेटा तुम्हारे यहाँ का दरवाजा हमेशा खुला रहता है दूर से दिखता है ऐसे में अगर कोई टोह ले रहा हो तो इसे बंद रखा करो .बात तो सच थी.फिर हमने सामने जाली का दरवाजा लगवाया.  
उस समय का शांत वातावरण हमारे भैया को खूब लुभाता था.वो अक्सर कहते थे यहाँ ध्यान में जाना बहुत अच्छा लगता है.एक बार वो आये तो कुर्सी सामने लगे बबूल के पेड़ के नीचे रख कर ध्यान मग्न हो गए .वहीँ उन्होंने पानी भी मंगवा कर पिया ओर गिलास वहीँ रख कर भूल गए. लगभग ३ दिन बाद एक गाय चराने वाली लड़की वो गिलास ले कर आयी बोली ये पेड़ के नीचे रखा था आपका होगा.यही बबूल इसके नीचे जाने कितनी बार बाफले बनाये है..समय के साथ बहुत कुछ बदलता है लेकिन यादें नहीं...यादें तो बहुत है बाकी फिर किसी ओर बात के बहाने.अभी तो कल की सालगिरह की तैय्यारी  करना है.आप सभी को दीपावली की शुभकामनायें.

Wednesday, October 19, 2011

.पचमढ़ी यात्रा ४


rajat prapat...sorry ise seedha nahi kar pa rahi hu. कैप्शन जोड़ें
rajat prapat ka rasta कैप्शन जोड़ें
शरद पूर्णिमा आने वाली थी आसमान में चाँद बादलों के साथ अठखेलियाँ कर रहा था.ठंडी हवा के झोंके कह रहे थे की थोड़ी देर हमारे साथ भी बतकही कर लो. पचमढ़ी एक छोटा सा शहर है. यहाँ के मूल निवासी भोले भाले हैं .पचमदी  की आबादी लगभग ३००० है ,यहाँ सेना,पोलिसे ओर स्काउट के ट्रेनिंग सेण्टर है जिसमे सरकारी अधिकारी ओर कर्मचारी की स्थापना मिला कर यहाँ की आबादी लगभग ५००० है. इस लिहाज से यह एक सुरक्षित शहर है.रात लगभग १२ बजे में ओर मेरी एक कलीग बाहर घूमने गए . यहाँ की मेन रोड पर लगभग आधे घंटे चहलकदमी करते रहे. एक बार ख्याल भी आया की ये बहादुरी कहीं महँगी न पड़ जाये लेकिन एक तरह से ये ठीक ही हुआ. लगातार उबड्खाबाद रास्ते पर चलते ओर बस ओर जिप्सी में बेठे  घुटने चलते हुए लोंक  हो रहे थे. इससे ये समझ आ गया की कल रजत प्राप्त की कठिन चढाई उतरना ओर चदना संभव नहीं है.इसका कोई इंतजाम करना ही होगा. जब वापस लौटे तो पता चला की होटल का मेन डोर बंद हो चुका है ओर सब लोग सो चुके है. बाहर खड़े हो कर आवाज़ लगाई लेकिन दिन भर के थके हारे वर्कर ,मेरी कलीग के पास मोबाइल था लेकिन यहाँ  सिग्नल आसानी से नहीं मिलते. एक ओर तरीका था की मेन गेट पर चढ़ कर उस पार कूदा जाये.लेकिन लोंक होते घुटने के साथ ये कोई बुध्धिमता पूर्ण बात नहीं होती. बाहर से आवाजें लगाते रहने के सिवाय ओर कोई चारा नहीं था. तभी वहां से गुजरते एक भले मानस ने रुक कर पूछा क्या हुआ मेडम?? फिर उसने आवाजें लगाई ओर दरवाजा खुला.  
दूसरे दिन सुबह तैयार होकर सबसे पहले मेडिकल स्टोर जा कर नी कैप लिया फिर पहुंचे बायसन  लोज .यह पचमढ़ी की सबसे पहली इमारत है. जिसे एक ब्रिटिश अधिकारी ने बनवाया था.(सॉरी उसका नाम भूल गयी ).यहाँ के जंगलों में इंडियन गौर या बायसन पाए जाते है इन्ही के नाम पर इस इमारत का नाम रखा गया.  अब ये एक संग्रहालय है .यहाँ लाल मुंह  के बन्दर बहुत है इसलिए हाथ में कुछ भी लटका कर नहीं घूम सकते यहाँ तक की पर्स भी नहीं .
बायसन लाज के बाद पहुंचे रजत प्रपात.इसे बी फाल के नाम से भी जाना जाता है. लगभग १०० फीट की ऊंचाई से गिरते झरने का पानी चाँदी की तरह चमकता है शायद इसीलिए इसका नाम रजत प्रपात है.यहाँ जाने के लिए लगभग २ किलोमीटर का रपट वाला रास्ता है जिसे अभी पक्का कांक्रीट का बनाया जा रहा है .यह जहाँ ख़त्म होता है वहां पहाड़ी नदी बहती है जो पहाड़ से नीचे गिर कर प्रपात बनती है. यहाँ रुक कर थोड़ी देर सुस्ताये बच्चे अन्य टीचर्स के साथ आगे बढ़ चुके थे. हमने यहाँ रुक कर नीबू पानी का आनंद  लिया.
bee fall se loutate hue ek gufa  कैप्शन जोड़ें
 ऊपर से ही हमने ६ वनरक्षक ले लिए थे जो सारे रास्ते बच्चों के साथ चलते हुए उनका मार्गदर्शन कर रहे थे,इसलिए हम अपनी चाल से आराम से चल सकते थे वैसे भी अन्य  टीचर्स साथ थे ही. यहाँ से रास्ता खड़ा पहाड़ी रास्ता था जिसमे कच्ची सीढियां बनी थी. ऊपर से देखने पर ये सीधा गहरी खाई सामान था. इस पर उतरते हुए दम फूल गया. घुटना कैप के सपोर्ट के बिना काम नहीं कर पाता इसलिए जहाँ जहाँ रुके मैंने खुद की समझदारी के लिए अपनी पीठ थपथपाई .दशहरे की छुट्टियाँ होने से कई सारे स्कूल कॉलेज के बच्चे आये थे.हमें ऊपर

चढ़ते केरल का स्काउट का दल भी मिला. इतने कठिन रास्ते के बाद जब नीचे पहुँच कर जल प्रपात के दर्शन किये तो मन प्रसन्न हो गया. रास्ते में कई बार साथी कहते रहे की नहीं उतरना था बीच में ही रुक जाते लेकिन नीचे आ कर लगा की ठीक ही किया.बच्चे ५-५ के ग्रुप में झरने के नीचे जा रहे थे.वहां स्पोर्ट्स टीचर उन्हें सँभालने के लिए खड़े थे.इतनी ऊंचाई से गिरता पानी ठंडी  हवा के संपर्क में आ कर  बहुत ठंडा हो गया था जिसमे १० मिनिट से ज्यादा नहीं रहा जा सकता था. कई बच्चे तो भीड़ ओर पानी की ऊंचाई देख कर नहाये ही नहीं. हमने यहाँ कुछ फोटो लिए ओर नहा कर तैयार हो गए बच्चों को ले कर वापस चढ़ाई शुरू की.

पहाड़ों पार चढाने का सबसे अच्छा तरीका होता है छोटे छोटे कदमों से चढ़ा जाये,यानि एक दम किसी ऊँची सीढ़ी पर चढ़ने के बजाय साइड के छोटे पत्थरों से कई स्टेप्स बना लीं जाएँ .इस तरह ऊपर चढना उतरने से ज्यादा आसान लगा. बीच की नदी पर सबने थोडा आराम किया इतनी मेहनत के बाद बच्चे थक चुके थे उनके लिए नाश्ते ओर कोल्ड ड्रिंक का इंतजाम था .आगे का रास्ता रपट वाला था यहाँ भी साथ में पहाड़ी नदी चल रही थी .दूर दूर फैले हरे भरे पहाड़ बहुत लुभावने लग रहे थे. बच्चे आगे बढ़ गए थे ओर हम उनके कुछ ही पीछे फोटो ग्राफी करते चले जा रहे थे. जिप्सी तक पहुँचते सभी थक गए थे बच्चे बहुत भूखे भी हो गए थे होटल पहुंचते ही सभी ने भरपेट भोजन किया. फिर बच्चे भी कुछ देर सो गए. 

शाम को हमें रीच गढ़ ओर धूप गढ़ जाना था.रीच गढ़ बड़ी बड़ी चट्टानों से मिलकर बनी बहुत बड़ी गुफा है यहाँ आप प्रकृति को इसके विराट रूप में देखते हैं .इस गुफा में एक स्थान पर पानी की एक बूँद गिरती है लेकिन ऊपर पानी कहीं नज़र नहीं आता. इस स्थान को आप फोटोस के माध्यम से घूमिये. 

 धूपगढ़  मध्यप्रदेश की सबसे ऊँची चोटी है.यहाँ से सूर्योदय ओर सूर्यास्त देखने की बात ही ओर है.यहाँ जाने के लिए हर गाड़ी का रजिस्ट्रेशन करवाना जरूरी होता है. यहाँ जाने का रास्ता बहुत ही खतरनाक है कहीं कहीं तो ३०-४०   डिग्री की चढाई है. ऊपर जाने का एक निश्चित समय होता है जिसके बाद ऊपर जाने वाली गाड़ियों को परमिशन नहीं होती क्योंकि गाड़ियाँ नीचे आना शुरू कर देती हैं. रास्ता इतना चौड़ा नहीं है की दो गाड़ियाँ आसानी से क्रोस हो सकें . हम बिलकुल टाइम से ही पहुंचे थे फोटोग्राफी करने के बाद लगभग दौड़ते हुए हम सन सेट  पॉइंट पहुंचे. बादलों की ओट ले कर सूरज अपने दिन भर का सफ़र समाप्त करने से

पहले अपना शांत सौम्य रूप धारण कर चुका था. हम सब मंत्र मुग्ध से सूर्य की आभा निहार रहे थे.इतनी ऊँची चोटी पर यह स्थान एक विशाल मैदान  सा है. यहाँ सेकड़ों लोग जमा थे इसलिए हम थोड़ी देर रुक गए. बच्चों ने कुछ खाया पिया फिर हम अपनी जिप्सी  में सवार हो गए. ये हमारा आखरी पड़ाव था. कल सुबह हमें वापस लोटना है.बच्चों को होटल में छोड़ कर होटल का मेन गेट लगवा कर एक साथी टीचेर की


तैनाती कर हम सब पास ही रजिस्टर्ड  आयुर्वेदिक दुकान पर यहाँ का शहद ओर आयुर्वेदिक जड़ी बूटियाँ लेने पहुंचे. बच्चों को रात में ही सामान पैक करने को कह दिया .रात करीब ९ बजे हमने उनके कमरे चेक किये जिससे कोई सामान पैक होने से रह न जाये. सुबह हमें ६ बजे निकलना है. रात में बच्चों ने फिर डी  जे का आनंद  लिया खूब डांस किया .सुबह सबको ५ बजे उठा दिया चाय दूध पी कर बच्चों ने अपना सामान कमरों से बाहर निकाला ओर हम सब टीचर्स फिर उनके कमरे  का निरिक्षण करने पहुंचे ताकि उनका कोई सामान छूट न जाये. 
घाट में मटकुली से लगभग १५ किलोमीटर पहले एक स्थान आता है" देनवा दर्शन " यहाँ से पचमढ़ी में बहने वाली देनवा नदी के दर्शन किये जाते हैं .यह एक विशाल घाटी है जिसके दोनों ओर सीधे खड़े पहाड़ है ओर नीचे लगभग समतल मैदान  में नदी बहती है. गर्मियों में यह  दुबला जाती है लेकिन इस समय यह अपने पूरे यौवन पर थी. यह घाटी अमेरिका की किसी खूबसूरत घाटी सी दिखती है .यहाँ भी बन्दर बहुत है.घाटी देखने के लिए सड़क पार करना था ओर सुबह के समय गाड़ियों की आवक बहुत थी इसलिए बच्चों को गाड़ी (बस ) में रहने को कह कर ओर बस के सारे कांच बंद करवा कर में नीचे उतरी ओर इस दृश्य को अपनी आँखों ओर कैमरे में कैद कर पाती इसके पहले ही बच्चों का शोर सुनाई दिया .भाग कर बस में चढ़े तो देखा किसी बन्दर ने  कांच पर पत्थर फेंक दिया था ओर कांच फूट चुका था कांच की एक किरच एक बच्चे की नाक पर लगी ओर वह खूनखान हो गया. किसी तरह बच्चों को चुप करवाया ,बंदरों को भगाया  ओर कांच की सफाई करवाई .लेकिन इसके बाद फिर फोटो लेने जाने का मन ही नहीं हुआ .घाट नीचे मटकुली में नाश्ता किया ओर रास्ते में खाना नाश्ता करते सोते जागते बोरे होते ,बतियाते बेहद थके हुए लेकिन एक अच्छी यात्रा की समाप्ति कर लगभग रात ९ बजे इंदौर पहुंचे. 
वैसे तो पचमढ़ी में ओर भी कई दर्शनीय स्थान है लेकिन छोटे बच्चों के साथ बहुत बिज़ी कार्यक्रम नहीं बन पाता. इसलिए कुछ स्थान आपके घूमने के लिए छोड़ दिए है.उम्मीद है आप लोग जल्दी ही इस स्थान को देखने जायेंगे. 
ओर हाँ ब्लॉग पर आते रहिएगा क्योंकि पचमढ़ी यात्रा के बाद बहुत सारी बातें चिंतन मनन के लिए बाकी रह गयी.उन्हें अगली पोस्ट में...

Monday, October 17, 2011

पचमढ़ी यात्रा ३

पता नहीं बच्चों में इतनी ताकत कहाँ से आती है?? सारे समय बच्चे कोरिडोर में चक्कर लगाते रहे कुछ ने तो दरवाजा खटखटा कर बता भी दिया मम हम तैयार है कब निकलना है?? खैर आधे घंटे में क्या तो नींद आनी थी? तैयार हो कर नीचे आ गए. हमारा अगला पड़ाव था जटा शंकर. जटा शंकर  गहरी घाटी में  शिव मंदिर है. जहाँ जाने के लिए सीढियां बनी है. कहीं कहीं घाटी इतनी संकरी है की दोनों तरफ के पहाड़ सर मिलाते से लगते है. यह लगभग ३ किलो मीटर  लम्बी घाटी है.यहाँ एक बड़ी गुफा है जिसमे एक पानी का कुण्ड है .जब आसपास की पहाड़ियों से बहता हुआ पानी यहाँ आता है तो वह आगे घाटी में नहीं बहता बल्कि  इस कुण्ड के नीचे से ही जमीन में समां जाता है ओर लगभग १४ किलो मीटर दूर एक अन्य घाटी में निकालता है. रास्ते में जड़ी बूटियों की दुकाने है लेकिन ये जड़ी बूटियाँ कितनी असली है ये तो पहचानने वाले ही बता सकते है. सालों से बहने वाले पानी के साथ  कचरा प्लास्टिक ओर रेत कुण्ड में जमा होते गए .तब एक साधू ने इस कुण्ड की सफाई करवाई ओर टनों कचरा ओर रेत यहाँ से निकली गयी. प्लास्टिक तो खैर आजकल सर्वत्र है.जहाँ भगवन नहीं पहुँच सकते शायद वहां भी प्लास्टिक की पहुँच है. लेकिन ये सुन कर अच्छा लगा की एक साधू ने एक पौराणिक महत्त्व के स्थान को बचाने  के लिए प्रयास किये.  आज उस स्थान पर उस साधू का नाम कहीं भी अंकित नहीं है. हाँ वहां सीढियां बनवाने वालों के नाम जरूर सीढ़ियों पर खुदे है जिन पर चलते हुए हम नीचे पहुंचे. लेकिन उस साधू का नाम जानने की सच में इच्छा हुई.जो वास्तव में सन्यासी था. जिसने प्रकृति में ही भगवन को पाया.     यहाँ कुण्ड के मुहाने पर एक गुफा है जिसमे करीब ५०० मीटर जाया गया है लेकिन इसका अंतिम छोर कहाँ है ये कोई नहीं जानता. इसी गुफा में से हो कर भगवन शिव भस्मासुर से बचते हुए भागे थे.यहाँ उन्होंने अपने सर्प ओर मकर को छोड़ दिया था भस्मासुर को रोकने के लिए.कहा जाता है  भागते हुए शिव जी की जटाएं यहाँ गिरी थी इसलिए इस स्थान का नाम जटा शंकर है.  गुफा में लाइन से शिवलिंग बने है जो मकर की पीठ की आकृति है  इस  चट्टान का सिरा मकर मुख की आकृति का है. एक चट्टान का आकर शेषनाग की आकृति का है ओर यही यहाँ का मुख्य मंदिर है. यहाँ किसी भी मंदिर में पण्डे पुजारियों की भीड़ नहीं है .न अभिषेक करवाने की जिद्द न चढ़ावे की .हम तो खैर बच्चों के साथ गए थे लेकिन ये स्थान सारा दिन शांति से बैठ कर चिंतन मनन करने के लिए सर्वोत्तम है.खैर पचमढ़ी में ऐसे  कई स्थान है जहाँ   भगवन के साथ खुद को भी पाया जा सकता है. यहाँ चेक पोस्ट के अंदर गाड़ी ले जाने की अनुमति लेनी पड़ती है टेढ़े मेधे कटीले घाटों में फॉर व्हील द्रैवे   वाली गाड़ियाँ ही जा पाती है .लेकिन आप अपनी कार भी ले जा सकते है बशर्ते आप अच्छे ड्राईवर हों. 
हमने वहां से वापसी शुरू की.तभी एक बच्चा रोता हुआ आया उसका पर्स कहीं गिर गया था .उसमे उसके पूरे पैसे थे. जटा शंकर के बाद हमें मार्केट जाना था जहाँ बच्चे अपनी फॅमिली के लिए गिफ्ट लेने जाने वाले थे. खैर उसे तो क्या समझाया जा सकता था जैसे तैसे उसे चुप करवा कर चढ़ाना शुरू किया. तभी हमारे एक साथी सर ने एक पर्स  मुझे दिया.ये कहते हुए की आपकी जिप्सी के ड्राइवर ने दिया है .जिप्सी में जा कर उस ड्राइवर को धन्यवाद दिया  बच्चे के मुख पर मुस्कान देख कर बड़ा सुकून मिला.  


हम वापस होटल पहुंचे वहां बच्चों ने अपना बेग रखा ओर १० -१० बच्चों के ग्रुप के साथ उनके इन्चार्जे  टीचर मार्केट के लिए रवाना हो गए. बच्चों का अपने परिवार के लिए पहली बार अकेले शोपिंग करने का उत्साह देखते ही बनता था. लगभग हर बच्चे ने सबसे पहले अपनी मम्मी के लिए कुछ न कुछ खरीदा. मुझे याद है जब मेरी बेटी पहली बार अकेले गयी थी मेरे लिए एक सूट लाई थी.वह आज भी कितने संभाल कर पहनती हूँ .फिर छोटी बहन भाई दादी.लेकिन पापा के लिए क्या लें ये सबसे बड़ा प्रश्न था?दुकानों पर पापा के लिए कुछ खास नहीं था.वही पेन स्टैंड ,पर्स बस. दादी के लिए छोटे से बालगोपाल,गणेश चूड़ियाँ उनको शोपिंग करते देख कर मन खुश हो गया. खुद के लिए तो शायद ही किसी ने कुछ लिया हो. ओर कई तो ऐसे थे जिन्हें पापा के लिए कुछ लेना है लेकिन सिर्फ १० रुपये  बचे है.अब १० रुपये की चीज़ ढूंढ़ रहे हैं या दुकानदार से मोल भाव कर रहे हैं. या जिसके पास रुपये बचे है उससे उधार ले रहे है. देख कर बड़ा अच्छा लगा. वापसी में भी यही बातें होती रहीं ओर देर रात भी बच्चों के गिफ्ट कमरों में  फैले रहे .कल सुबह रजत प्राप्त जाना है.क्रमश  

Friday, October 14, 2011

पचमढ़ी यात्रा २

हम टीचर्स भी गप्पें मारने बैठ गए. अभी सो पाना तो संभव नहीं था. बच्चों के सो जाने के बाद उनके कमरों का चक्कर लगाना था .रात करीब १२ बजे हमने चक्कर लगाया ,तो पता चला २-३ कमरों में टी वी चल रहा है  ओर बच्चे सो चुके है २ कमरों में अंदर से सांकल नहीं लगी है ओर बच्चे बेसुध पड़े है . धीरे से एक बच्चे को जगाकर उससे कहा की अंदर से बंद कर ले.जब सारे कमरे चेक हो गए तब करीब १ बजे हम अपने कमरों में पहुंचे. सुबह ६ :३० पर बच्चों को जगाना था. 
सुबह  चाय  आने से १५ मिनिट पहले ही नींद खुल गयी. चाय आयी तब तक फ्रेश हो कर हम फिर अपने राउंड के लिए तैयार थे. कई बच्चों को तो खूब देर तक उठाना पड़ा तो एक दो उत्साही लाल तो उठ चुके थे. जिसको भी जो पीना था चाय दूध कॉफ़ी ओर ८  बजे  तैयार हो कर नाश्ते के लिए ऊपर पहुँचने के लिए कहा. नीचे  पहुंचे  तो  जिप्सी  आ  गयी  थी . अब  दो  दिन  हमें  जिप्सी  से  घूमना  था . करीब ९ बजे हम जिप्सी से रवाना हुए . 
हमारा  पहला स्पोट था हांड़ी खोह.हांड़ी खोह पचमढ़ी की सबसे गहरी घाटी है. ये इतनी गहरी है की आप इसका तल नहीं देख सकते. इस घाटी में घना जंगल है जिसमे कई ओषधिय  वनस्पतियाँ  पाई जाती है. आदिवासी इन गहरी घनी घाटियों में उतर कर जड़ी बूटियाँ एकत्र करते है. यहाँ १-२ दूरबीन वाले भी बैठे मिले जो घाटी में आदिवासियों के उतरने का रास्ता दूरबीन से दिखाते है. पचमढ़ी के जंगलों में शहद खूब होता है ओर ये शहद अधिक स्वास्थ्य वर्धक माना जाता है क्योंकि ओषधिय  पोधों  के पराग से बनता है.  इसी घाटी के सामने चौरागढ़ की पहाड़ी है.ये मध्य प्रदेश की दूसरी सबसे ऊँची चोटी  है .इस का सम्बन्ध शिव ओर भस्मासुर की कथा से जुड़ा है. कहते है जब भस्मासुर को शिव का वरदान मिला तो उसने शिव के सर पर हाथ रख कर उन्हें भस्म करने के लिए उनका पीछा किया .तब शिवजी भागते हुए इस चोटी पर पहुंचे ओर उन्होंने अपना त्रिशूल उठाया.लेकिन तब तक भस्मासुर वहां पहुँच गया ओर शिवजी को वहां से भागना पड़ा. इस चोटी पर शिव मंदिर है जहाँ लोग अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए त्रिशूल चढाते है. इस समय यहाँ साढ़े तीन लाख त्रिशूल है जिनमे सबसे भरी त्रिशूल ५२१ किलो का है. ओर ये सारे त्रिशूल लोगों ने अपने कंधो पर रख कर ऊपर चढ़ाये है. यहाँ जाने के लिए करीब १५०० सीढियां है जिनमे से करीब २५० सीढियां   बिलकुल खडी है. वैसे हांड़ी खोह सबसे सफल आत्महत्या स्थल भी कहलाता है क्योंकि यहाँ से कूदने वाला अगर जिन्दा बच भी गया तो बाहर नहीं निकाला जा सकता है इसलिए ...खैर यहाँ फोटो खिंचवाते हुए थोडा ओर पीछे जाने का आग्रह सब एक दूसरे से करते रहे. बच्चों को दूरबीन से घाटी ओर चोटी दिखने की व्यवस्था कर दी इसलिए उनका ज्यादा ध्यान नहीं रखना पड़ा. यहीं एक गुलेल वाला भी बैठा था जो १० रुपये में १० कंचे एक पेड़ पर बंधी बोतल में मारने दे रहा था .मैंने भी १० कंचे ले लिए.निशाना तो एक नहीं लगा लेकिन गुलेल हाथ में ले कर फोटो जरूर खिंचवा लिया...आखिर अब ये लुप्त प्राय हथियार है. ए.के ४७ भले आसानी से मिल जाती हो लेकिन गुलेल देखे तो बरसों बीत गए. 
यहाँ से अगला स्पोट था प्रियदर्शनी. ये स्थान सड़क से थोडा अंदर है करीब ३०० -४०० मीटर .यहाँ एक फ़र्न का पौधा हमारे गाइड ने दिखाया जिसकी पत्ती को हाथ पर रख कर थोडा सा दबाओ तो उसका टेटू बन जाता है. बस फिर क्या था बच्चे तो लग गए वह पत्ती ढूंढ कर टेटू बनाने .किसी तरह सबको साथ कर पहुंचे. ये स्थान एक घाटी का किनारा है जहाँ दूर दूर तक चोटियाँ है जो खुली धूप में भी नीली धुंधली दिख रहीं थी. ये एको पॉइंट है .जब आप जोर से आवाज़ देते है तो आवाज़ सुदूर पहाड़ियों से टकरा कर आपके पास  वापस पहुँचती है. यहाँ सब बच्चों से एक साथ अपने स्कूल का नाम लेने को कहा गया.जो वापस हमारे पास पहुँच गया. खैर नहीं भी पहुँचता तो हम वापस स्कूल तो पहुँचने ही वाले थे. गाइड भी व्यावसायिकता को समझते है ओर..खैर कई बातें ओर विचार मन में आते है ओर अलग अलग कोण से इसे देख जा सकता है बस बच्चों को मजा आया. 
यहाँ से हम पहुंचे गुप्त महादेव. भस्मासुर से भागते हुए शिवजी इस संकरी गुफा में प्रवेश कर गए .ये करीब १०० मीटर लम्बी संकरी गुफा है.जिसमे आड़े चलना पड़ता है अंदर एक शिव मंदिर है.बाहर हनुमानजी की बड़ी सी प्रतिमा. जिसपर लाल मुंह  के बन्दर उछल कूद करते रहते है. जिप्सी  से उतर कर करीब आधे किलोमीटर का पैदल रास्ता है . एक बार में १० लोग अंदर जाते हैं  सबके बाहर आने के बाद अगले १० लोग. यहाँ बहुत देर लग गयी. यहाँ बच्चों से हर हर महादेव का जयकारा लगवाया.ये कहते हुए की जोर से बोलो ताकि फोटो में आवाज़ आये. अब बच्चों को व्यस्त  रखना था न.यहाँ पगडण्डी के किनारे आदिवासी बेर,अमरुद ओर ककड़ी ले कर बैठे थे. मैंने भी एक अमरुद में नमक मिर्च लगवा लिया एक हाथ में अमरुद ले कर दूसरे से खाते हुए चली जा रही थी की पीछे से बच्चों के चिल्लाने की आवाज़ आयी पीछे मुड़ के देखती उसके पहले  ही एक बंदर ने धीरे से आ कर मेरे हाथ से अमरुद ले लिया.  अब तो बच्चे मैडम आपका अमरुद??मैंने भी कहा बेटा ले जाने दो मैंने उसमे खूब तेज़ मिर्च डलवा रखी थी उसे भी मज़ा आ जायेगा. खैर बंदर का तो नहीं पता लेकिन बच्चों को बड़ा मजा आया. उस रास्ते में बहुत सारे बच्चों से बंदरों ने ककड़ी अमरुद छीने . यहाँ से करीब आधे किलो मीटर की दूरी पर बड़े महादेव की गुफा है .जब शिवजी गुफा में छुप गए तो विष्णुजी ने सुंदरी का रूप धारण कर भष्मासुर को आकर्षित किया ओर उसे नृत्य करने का न्योता दिया ओर जब वह नृत्य में लीन हो गया तो भूलवश उसने खुद का हाथ ही अपने सर पर रख दिया ओर भस्म हो गया .जिस स्थान पर वह भस्म हुआ वहां अभी एक कुण्ड है जिसमे साल भर पानी रहता है.इस गुफा में भी शिव मंदिर है. गुफा की छत से साल भर पानी टपकता है. यहाँ के रास्ते में एक बहुत पुराना विशाल बड़ ओर आम का पेड़ है.इन पेड़ों के साथ फोटो खिंचवाने का मोह न रोक पाई.बहुत याद आते है इंदौर के वो पुराने पेड़ जिनके नीचे कभी खेला करते थे या जिनकी छाँव में साईकिल चलाया करते थे.   
इसके पहले भी ३ बार पचमढ़ी जा चुकी हूँ लेकिन इन पेड़ों से ऐसा मोह नहीं हुआ लेकिन अब जबकि आस पास ऐसे पेड़ देखने को नहीं मिलते पता नहीं क्यों आते जाते दोनों समय इनके पास थोड़ी देर रुकने का मन किया. बच्चों को भूख लग आयी थी.सब वापस अपनी पानी जिप्सी में सवार हुए.ये स्थान बहुत नीचे पर है यहाँ का घाट तीखे मोड़ वाला है .होटल पहुंचे तो खाना तैयार था. खाना खा कर बच्चों को ४ बजे फिर तैयार होने का कह कर सब आराम करने चले गए. क्रमश

Wednesday, October 12, 2011

पचमढ़ी यात्रा.१

 स्कूल की ओर से शैक्षणिक भ्रमण पर पचमढ़ी जाना था..मन तो बिलकुल नहीं था चार दिन की छुट्टी शहीद करना. कब से इंतजार में थी इन चार दिनों में ये काम करना है वो करना है ओर सबसे बड़ी बात की थकान उतरना है.कुछ कहानियां अधूरी है उन्हें पूरा करना है लेकिन ...खैर ५ तारिख को रात में बस से रवाना होना था करीब ९ बजे बस चल पड़ी .सच कहूँ तो आँखों में आंसू भरे थे जिन्हें अँधेरे में आसानी से छुपाया जा सका बार बार छोटी बिटिया की बात ही मन में गूंजती रही आप पिछले ३ सालों से हर बार दशहरे  पर घर से बाहर रहती हो दिवाली पर पापा नहीं रहते घर पर. हमारे सारे त्यौहार तो ऐसे ही चले जाते है .सोचती हूँ इन छोटी छोटी खुशियों को पाने के लिए इस नौकरी से छुटकारा पा लूं.लेकिन अब तो ये हाल है की एक दिन की छुट्टी भी  लो तो दिन ख़त्म नहीं होता..दिन भर यही सोचते निकल जाता है की कोर्स  पूरा करना है आज के कितने पीरियड चले गए .टीचिंग  जैसे दिनचर्या में समां गयी है. खैर अब तो बस रवाना हो गयी थी अब बेकार की बातें सोचने से क्या होना था तो यही सोचा की बस अब काम पर ध्यान दिया जाये. रास्ता लम्बा था ओर बहुत ख़राब.. नवमी का दिन था इंदौर से देवास के रास्ते में बहुत भीड़ थी देवास की चामुंडा माता के दर्शन के लिए लोग टोलियों में पैदल जाते है इसमें सभी उम्र के लोग थे बच्चे बड़े बूढ़े. कुछ सालों पहले तक हम भी साल में एक बार तो देवास हो ही आते थे अब तो व्यस्तता इतनी बढ़ गयी है या ...
अभी कुछ दिनों पहले ही होशंगाबाद जाना हुआ था भोपाल से होशंगाबाद का रास्ता इतना ख़राब था की हालत ख़राब हो गयी.ये बात में स्कूल में बताई भी थी लेकिन सारी बुकिंग हो गयी थी ओर छुट्टियों का यही सदुपयोग होता है  बाकी समय तो शैक्षणिक कैलेंडर इतना व्यस्त होता है की कहीं समय ही नहीं मिलता इसलिए इस बात को सुन कर भी अनसुना कर दिया गया. सबसे ज्यादा ख़राब रोड तो हमारे मुख्यमंत्री के गाँव में थी या कहा जाये की वहा रोड थी ही नहीं बस एक गढ्ढे की बौंड्री  ओर दूसरे गढ्ढे की बौंड्री...आशचर्य तो हुआ लेकिन फिर सोचा शायद मुख्यमंत्रीजी को अपने गाँव जाने का काम ही नहीं पड़ता होगा वैसे भी अभी चुनाव में समय है. 
खैर रात का समय था कब नींद लग गयी पता ही नहीं चला ..बस सोते जागते ही रास्ता कट गया सुबह करीब ४ बजे होशंगाबाद पार किया .अभी तो काफी लम्बा सफ़र बाकी था होशंगाबाद से पिपरिया ओर वहां से  मटकुली का घाट ओर फिर पचमढ़ी .सोचा था की सुबह जल्दी घाट चढ़ जाते तो ठीक रहता..बच्चे सोये रहते तो ज्यादा परेशानी नहीं होती नहीं तो घाट चढाने में होने वाली मितली...मुझे खुद घाट में तकलीफ होती है ऐसे में बच्चों को भी संभालना. किसी को दवा देना किसी को पानी. घाट चढ़ते चढ़ते सूरज चढ़ आया ओर वाही हुआ जिसका डर था बच्चों को बातों में बहलाना जिन्हें परेशानी हो रही थी उन्हें आगे की सीट पर जगह बना कर बैठाना...ओर खुद का सर चकराने को नज़र अंदाज करना ..रास्ता बहुत सुंदर  था घना जंगल बारिश के बाद जंगल की सुन्दरता अपने पूरे शबाब पर होती है . पहले भी पचमढ़ी जाना हुआ है लेकिन हर बार गर्मियों में इसलिए इस बार का दर्शन बहुत नया था . 
करीब ८ बजे हम पचमढ़ी पहुंचे होटल मेन रोड पर ही था वहा उतारते ही बच्चों को उनके दोस्तों के साथ कमरे अलोट  करना  था सब अपने दोस्तों के साथ रहें तो झगड़े क्म होते है अपने दोस्तों के साथ सब आसानी से समन्वय स्थापित कर लेते है लेकिन साथ ही कौन सा बच्चा किस कमरे में है ओर उस कमरे में कितने बच्चे है वह भी नोट करना था .टीचर  के कमरे भी एक -एक फ्लोर पर थे  ताकि बच्चों पर नज़र रखी जा सके.ओर उनकी परेशानियों के लिए हम आस पास ही रहें . यही करते करीब  आधा घंटा निकल गया.आखिर ८८ बच्चों को अडजस्ट करना था .करीब ९ बजे हम अपने कमरों में पहुंचे. फ्रेश हो कर पहला काम था बच्चों के कमरे का चक्कर लगाना.लेकिन ये क्या बच्चे तो बिस्तर पर पसरे हुए थे न जी थके नहीं थे बस टीवी चालू था ओर वो लगे थे टुकुर टुकुर देखने कमरे में सामान फैला हुआ था.नहाने के लिए कपडे निकाल कर बेग्स खुले छोड़ दिए थे जूते पूरे कमरे में फैले थे . बेटा जल्दी नहाओ फिर नाश्ता करके थोड़ी देर सोना है ताकि शाम तक फ्रेश रहो .हर कमरे में जा कर उनका सामान ठीक से लगवाया जूते लाइन से रखवाए छोटे बेग्स अलमारी में रखवाए .ओर जल्दी तैयार होने की हिदायत दे कर अपने कमरे में पहुंची.थोड़ी ही देर में नाश्ते के लिए पहुंचना था जल्दी से नहाया .होटल के ऊपर वाले माले पर एक बड़ा सा हॉल था वहीँ एक ओर किचेन भी था खाने पीने की सभी व्यवस्था हमारी ही थी. नाश्ता करते ११ बज गए अब तो बहुत जोर से नींद आ रही थी .लेकिन बच्चों की आँखों में नींद कहा ..वो तो सारा दिन टीवी देखते रहे सारे दिन कोरिडोर में इतनी हलचल थी की नींद लग ही नहीं पाई. फिर सोचा की बेहतर है उठ कर परीक्षा की कापियां चेक कर लूं. न न करते भी जाने क्यों उन्हें रख लाई थी .सो बस बैठ गयी ओर एक बैठक में ८-१० कापियां चेक भी हो गयी. तब तक खाने का समय हो चला था .जो बच्चे सो गए थे उन्हें उठाया खाना खाने के बाद हमें घूमने जाना था लेकिन अब थकान चढ़ रही थी इसलिए १० मिनिट कमर सीधी करने के लिए लेट लगाई ओर फिर हम तैयार हो          गए . 
नीचे पहुंची तो सब तैयार थे तब तक चाय भी आ गयी. चाय पी कर पहला स्पोट था चर्च  देखने जाना .लेकिन फादर बाहर गए थे इसलिए वहा अन्दर जाना नहीं हुआ. यह बहुत पुराना चर्च  है सन १८५६ में बन कर तैयार हुआ जिसमे बेल्जियम शीशे लगे है ढलवां कवेलू वाली छत इसे हर मौसम में ठंडा रखती है यहाँ  से पहुंचे पांडव गुफाएं देखने. ये चट्टानों में बनी गुफाएं है जिन का वास्तव में पांडवों से कोई सम्बन्ध नहीं है .ये करीब १५०० साल पुरानी है इस हिसाब से ये बौध कालीन हो सकती है. इसने कोई भित्ति चित्र भी नहीं है. पचमढ़ी सतपुरा की पहाड़ी पर बसा है . भूगर्भीय हलचल से यहाँ एक विशाल ज्वालामुखी बन गया जो ठंडा होने के बस  एक विशाल कटोरे के आकर का बन गया जिसमे वर्षा जल एकत्र होता गया ओर जब किसी भूगर्भीय हलचल से ये कटोरा फूटा तो यहाँ सालों नदियाँ बहती रहीं. इसलिए पचमढ़ी में रेतीली मिटटी है ओर मिटटी में नदियों में मिलने वाले गोल पत्थर पाए जाते है. इसलिए यहाँ घास नहीं होती. घास न होने से कीड़े मकोड़े नहीं होते.यहाँ खेती नहीं होती इस लिए खेत में पाए जाने वाले चूहे मेंढक भी नहीं है इसलिए सांप नहीं है .कीट पतंगे ओर अनाज न होने से  पक्षी बहुत क्म है .घर के मैदान  न होने से हिरन चीतल संभार नहीं है ओर इसलिए यहाँ के जंगलों में शेर भी नहीं है. वैसे सच पूछा जाये तो यहाँ का घना जंगल बहुत सूना लगता है. 
.खैर वहां से चले पचमढ़ी झील पर पहुंचे .यहाँ हमें बोटिंग करना थी. बच्चों को ५-५ करके नाव में बैठाया नाव वाले के साथ यहाँ पैडल बोट चलती है बच्चों के साथ  किसी बड़े का होना भी जरूरी था. कुछ शरारती बच्चों के साथ टीचर भी बैठे. बारिश के तुरंत बाद झील बहुत खूबसूरत थी .दूर क्षितिज पर सूरज ढलने को था. झील के एक ओर कहीं झाड़ियों के पीछे धुंआ उठ रहा था. दशहरे का दिन था .रास्ते में हमें कई जगह देवीजी की सवारी मिली जिन्हें विसर्जन के लिए ले जाया जा रहा था.उन्ही में से एक सवारी झील पर थी. इस इलाके में रावन दहन इतना प्रचलित नहीं है लेकिन ९ दिन देवीजी की स्थापना का ओर जवारे का बड़ा प्रचलन है .नवें दिन इन्हें विसर्जित किया जाता है .इसके साथ अखाडा चलता है जिसमे लडके करतब दिखाते चलते है .हमारे देखते ही देखते देवीजी की विशाल प्रतिमा को झील में विसर्जित कर दिया गया .श्रध्दा के सामने तो हमारे सारे कानून भी नतमस्तक है.इसलिए जल प्रदुषण जैसी बातें सोचना बेमानी ही था. बोटिंग के बाद बच्चों को नाश्ता करवाया  फिर उन्हें बस में चढ़ाया ओर हम चाय पीने पास की एक दुकान में चले गए .वहा बैठे ही थे की जोर से बारिश शुरू हो गयी. शुक्र था की बच्चे पानी से बाहर आ चुके थे नहीं तो उन्हें शांत रखना मुश्किल हो जाता. चाय पी कर हम भी भीगते भागते बस में सवार हो गए. होटल पहुंचे तब तक ऊपर हाल में डी जे लग चुका था बस बच्चे पहुँच गए ओर फिर २ घंटे जम कर डांस किया. डी जे लाइट में सब बहुत साफ नहीं दिखता इसलिए मैंने भी थोडा हाथ आजमा लिया. खाना लग चुका था खा कर सब अपने कमरे में चले गए .हमने भी बच्चों के कमरे में एक चक्कर लगाया.उनके सोने की व्यवस्था देखि ओर सुबह ६:३० पर उठाने का कह कर हम सब टीचर एक कमरे में बैठ गए ओर हमारी गप्पों का दौर शुरू हो गया. ......क्रमश 

Wednesday, September 28, 2011

खबर का असर


न्यूज चेनल और न्यूज  पेपर में आये दिन पढ़ते सुनते है खबर का असर.तब इसे एक मुस्कान के साथ पलट दिया जाता है ..व्यावसायिक कसरत,हर और हर कोई ये बताने की कोशिश में है की उसके द्वारा दिखाई या  छापी गयी खबर का ही नौकरशाही या राजनितिक गलियारों में असर होता है .हालाँकि इन ख़बरों को जो आम आदमी पढता है उस पर इन ख़बरों का क्या और कैसा असर होता है इसकी परवाह जो की जानी चाहिए वो शायद ही कोई करता है. 
हम आये दिन पेपर में अच्छी और बुरी ख़बरें पढ़ते है.कुछ ख़बरों से मन व्यथित होता है तो कुछ को पढ़ कर चिंतित .कुछ ही ख़बरें होती है जो ख़ुशी से चहकने पर मजबूर कर देती है और कुछ सच में सोचने पर .ज्यादातर ख़बरों को हम ख़बरों की तरह पढ़ते है और भूल जाते है .कुछ ख़बरें दिमाग के  किसी कोने में अटक जाती है और उनका असर कितना गहरा और कितनी देर तक होता है ये तब पता चलता है जब ऐसी ही किसी परिस्थिति से रूबरू होना पड़ता है. 
कुछ दिनों पहले समाचार पत्र में एक खबर पढ़ी.किसी पोलिसे इंस्पेक्टर ने रात में अकेले घर लौटती एक लड़की को किसी सुनसान स्थान पर ले जा कर उसके  फोटो खींच लिए और फिर उसे ब्लेकमेल  करने लगा .वो तो लड़की ने समझदारी की की घर वालों को ये बात बता दी और जब उसके साथियों ने पैसों के लिए फ़ोन किया तो सब पकड़ा गए. उस इंस्पेक्टर को तो तुरंत प्रभाव से निलंबित किया गया.लेकिन उसके बाद कई और लोग भी उसके खिलाफ ऐसी ही शिकायतों के साथ आगे आये .दो - तीन दिन लगातार इस बारे में ख़बरें आती रही ,लेकिन बस पढ़ा और पन्ना पलट दिया. पोलिसे डिपार्टमेंट में ऐसी घिनौनी शर्मनाक हरकत.लेकिन आजकल कहीं भी कुछ भी संभव है की सोच ने इसे ज्यादा तूल नहीं दिया. 
लेकिन खबर का असर तो इस खबर के ८-१० दिन बाद सामने आया. हुआ यूं की बड़ी बेटी कॉलेज की और से खेलने बाहर गयी थी. लौटते में उसकी वापसी का समय रात में ३-४ बजे के बीच का था. पतिदेव बाहर गए हुए थे इसलिए रात में उसे घर लाने  का प्रबंध मुझे ही करना था.हमारा  इंदौर शांत  शहर है हालाँकि आजकल ये भी महानगरों से होड़ करने के चक्कर में कई नए शौक पाले हुए है लेकिन फिर भी आम तौर पर यहाँ महिलाएं सुरक्षित है .मुझे याद है जब हम छोटे थे तब रात ९ से १२ बजे का फिल्म का शो देखना वो भी पूरे परिवार के साथ आम बात थी अभी भी है. फिल्म के बाद लोग सराफा जाते थे  वहां गरमा गरम दूध जलेबी का नाश्ता और पान खाए बिना वापस नहीं लौटते थे. कई बार देर रात वापस लौटते हुए अकेली महिला को स्कूटी या लुना पर जाते हुए भी देखा है. सो रात में बिटिया को लेने अकेले जाना बड़ी बात नहीं थी ,लेकिन घर से निकलने से पहले दिमाग के किसी कोने में अटकी पड़ी एक खबर ,पोलिसे इंस्पेक्टर ने लड़की को ब्लाकमेल किया जाने कैसे कौंध गयी. दिमाग में आने जाने वाले विचारों की गति सीमा तो तय नहीं की जा सकती.बस वो अपनी पूरी रफ़्तार से चलने शुरू हो गए. पर्स रखा उसमे ड्राइविंग  लायसेंस,पैसे, मोबाइल गाड़ी के शीशे चदा कर ही जाउंगी.इस समय तो सारे रास्ते सुनसान होंगे तो डरने की कोई बात नहीं है वैसे तो कोई नहीं होगा और अगर किसी ने लिफ्ट के लिए हाथ दिया तो ?? नहीं जी इस रात में किसी को लिफ्ट देने की जरूरत नहीं है .वो तो ठीक है लेकिन अगर कहीं पोलिसे ने ही चेकिंग  के लिए रोक लिया तो???? बस यही आकर विचारों  की गति लस्त पड़ गयी .अगर किसी पोलिसे वाले ने चेकिंग  के लिए हाथ दिखा कर गाड़ी रोकी तो??गाड़ी तो रोकना ही पड़ेगी.गाड़ी रुकी तो बात भी करना पड़ेगी.बात करने के लिए कार के शीशे भी खोलना पड़ेंगे ,और शीशे खोलने के बाद ...अगर किस्मत ठीक हुई तो कोई शरीफ आदमी होगा और अगर....निकलते निकलते ये क्या ख्याल आ गए. क्या करूंगी ऐसी स्थिति में?? 
बिटिया का फ़ोन आ चुका था मम्मी में यहाँ चौराहे पर इंतजार कर रही हूँ जल्दी आओ साथ वाले सब निकलने की तय्यारी  में है .अब जो होगा देखा जायेगा..बिटिया वहां अकेली न रह जाये उसे कहा बेटा २-३ दोस्तों  को रोक के रखो अकेले नहीं खड़े रहना वहां . हुआ तो हम उन्हें छोड़ देंगे.सारे रास्ते गाड़ी चलाते हुए बस यही विचार मन में आता रहा बस भगवन कोई पोलिसे वाला न मिले ..फिर सोचा अगर कही रुकना भी पड़ा तो शीशे सिर्फ थोड़े से खोलूँगी और लाईट जला कर गाड़ी चेक करवा दूँगी. खबर का कैसा और कितना गहरा असर होता है ये आज जाना. 
खैर नींद के आगोश में सिमटे सोते शहर को देखते हुए में बिटिया को लेकर सकुशल घर आ गयी. लेकिन एक बात जो मन पर गहरा असर छोड़ गयी. हम रोज़ इतनी नकारात्मक ख़बरें पढ़ते है हमें आगाह करने के लिए शायद इनका छापा जाना जरूरी भी है लेकिन क्या इन नकारात्मक ख़बरों के बीच सकारात्मक ख़बरें भी नहीं छापी जा सकती??? क्या ऐसी नकारात्मक ख़बरों से लोगो की मानसिकता पर  गलत प्रभाव नहीं पड़ता होगा??रोज़ चोरी लूट हत्या बलात्कार की ख़बरें पढ़ते हुए कुछ लोग इन्हें रोजमर्रा की जिंदगी के वाकये मान कर खुद को भी इस तरह की घटनाओं में शामिल नहीं कर लेते होंगे???सनसनी फ़ैलाने के लिए इन ख़बरों को जिस तरह से हाईलाईट किया जाता है उससे लोगो का लोगो पर से, व्यवस्था से ,इंसानियत से भरोसा ख़त्म नहीं होता जा रहा है. में ये नहीं कहती ऐसी ख़बरें नहीं छापी या दिखाई जाना चाहिए अगर ऐसी खबर में न पढ़ती तो उस रात बाहर जाने से पहले खुद को इस तरह से मानसिक रूप से तैयार नहीं कर पाती.खुद के लिए इतनी सावधानियां  निर्धारित नहीं कर पाती .लेकिन मेरा ये कहना है की जहाँ समाज में इतने अपराध हो रहे है वहां कई अच्छे लोग भी तो अच्छे कामों में लगे है क्या उन लोगो के कार्य समाज के सामने लाने के लिए  अखबारों में थोड़ी जगह नहीं दी जा सकती और थोडा समय न्यूज चेनल पर .फिर शायद इतनी बुरी ख़बरें आना ही बंद हो जाएँ लोगो पर खबर का असर तो होगा ही न लेकिन अच्छी खबर का. 

Sunday, September 25, 2011

काली साडी


बहुत दिन हो गए कोई पोस्ट नहीं लिखी.सोचते सोचते एक महिना बीत गया ,ऐसा नहीं इस बीच कोई विचार मन में न आया हो लेकिन बस लिखा ही नहीं गया.हम महिलाएं छोटी छोटी कितनी बातें सोचती रहती है और उनको किन किन बातों से जोड़ लेती है और बस बातों ही बातों में वाकये बन जाते है.एक छोटी सी घटना  है कम से कम हमारे इंदौर में तो काफी प्रचलित है की वार के अनुरूप कपडे पहने जाये.खास कर वृहस्पतिवार को पीले और शनिवार को काले या नीले .तो कल शनिवार को जब स्कूल जाने के लिए साडी निकालने लगी तो हाथ काली साड़ी पर ठहर गया .शनिवार के दिन काली साड़ी.शनि महाराज का रंग.बस वही निकाल ली.स्कूल पहुँच कर रजिस्टर  में साइन  किये ही थे की पीछे से आवाज़ आयी.
अरे आज में भी बिलकुल ऐसी ही काली साडी पहनने वाली थी .
फिर पहनी क्यों नहीं ?अच्छा लगता हम दोनों एक जैसी साड़ी में होते .
सोच कर ही अच्छा लगा की अरे एक सा  विचार दो लोगो के मन में आया .
अरे यार पहनने वाली थी लेकिन आज मेरे बेटे का पेपर है इसलिए आज काला पहने का मन नहीं हुआ. 
ओह्ह ..हम्म ये भी ठीक है अब शनि महाराज बेटे से बढ़ कर थोड़े ही है.
बस अपनी क्लास की तरफ बढ़ रही थी सामने से एक दूसरी कलीग हँसते हुए आयी और कहने लगी कविता आज सुबह मैंने पता नहीं क्यों सोचा की तुने बहुत दिनों से ये वाली साड़ी नहीं पहनी है आज तुझे ये ब्लैक एंड रेड साड़ी पहननी चाहिए .और देख तूने आज वही साड़ी पहनी है. 
मैंने भी हँसते हुए जवाब दिया देख तेरे मन की बातें मैंने घर में बैठे ही जान लीं .
तभी एक और कलीग आयी और कहने लगी अरे ऐसी साड़ी तो गीतू(जो सबसे पहले ऐसी साड़ी पहनने की बात कर रही थी ) के पास भी है  .
खैर महिलाओं का साड़ी पुराण कभी ख़त्म नहीं होता. हम हँसते हुए अपनी अपनी कक्षाओं में चले गए .
ब्रेक में सब बैठे बात कर रहे थे की हमारी हिंदी टीचर बोली गीतू ने आज काली साड़ी नहीं पहनी क्योंकि उसके बेटे का पेपर है.अब हम हिंदी इंग्लिश वाले ऐसी बातों पर विश्वास करें तो समझ आता है लेकिन साइंस मैथ्स वाले भी ऐसी बातें मानते है??उन्हें तो ऐसे अन्धविश्वास नहीं मानना चाहिए .
क्या साड़ी का वार से या बेटे के पेपर से कोई सम्बन्ध हो सकता है???
मैंने कहा सम्बन्ध है या नहीं ये तो नहीं पता लेकिन हाँ वह माँ है और माँ  का पहनना औढ्ना खाना पीना  अपने बच्चे के इर्द गिर्द ही होता है.  उसे विज्ञानं की कसौटी पर नहीं परखा जा सकता है. एक टीचर के रूप में भले वो इन बातों को न माने लेकिन माँ के रूप में सारे तर्क बेकार हो जाते है. और सभी इस तर्क से सहमत थे.   

प्यार के दो बोल

 म.प्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन के दो दिवसीय कथा क्रमशः आयोजन में देवास जाना हुआ। आग्रह था इसलिए मैं वहीं रुक गई। रात में रुकने का इंतजाम एक ह...