Monday, January 11, 2010

प्रबुद्ध भारत के प्रति


स्कूल की प्रार्थनासभा के लिए स्वामी विवेकानंदजी पर सामग्री तलाश करते हुए उनकी लिखी एक कविता हाथ आयी,जो उन्होंने सन १८९८ में प्रबुद्ध भारत पत्रिका के मद्रास से स्वामीजी द्वारा स्थापित भ्रात्रमंडल के हाथों में अलमोधा को स्थान्तरित होने के अवसर पर लिखी थी। कल १२ जनवरी को उनका जन्मदिवस है.
"प्रबुद्ध भारत के प्रति"

जागो फिर एक बार !
यह तो केवल निद्रा थी,मृत्यु नहीं थी,
नव जीवन पाने के लिए,
कमल नयनों के विराम के लिए
उन्मुक्त साक्षात्कार के लिए।
एक बार फिर जागो।
आकुल विश्व तुम्हे निहार रहा है
हे सत्य!तुम अमर हो!

फिर बढ़ो,
कोमल चरण ऐसे धरो
कि एक राज कण की भी शांति भंग न हो
जो सड़क पर, नीचे पढ़ा है।
सबल,सुद्रढ़,आनंदमय,निर्भय और मुक्त
जागो,बढे चलो और उद्दात स्वर में बोलो!

तेरा घर छूट गया,
जहाँ प्यार भरे हृदयों ने तुम्हारा पोषण किया
और सुख से तुम्हारा विकास देखा,
किन्तु,भाग्य प्रबल है-यही नियम है-
सभी वस्तुएं उद्गम को लौटती हैं,जहाँ से
निकली थीं और नवशक्ति लेकर फिर निकल पड़ती हैं।

नए सिरे से आरम्भ करो,
अपनी जननी-जन्मभूमि से ही,
जहाँ,विशाल मेघ्राशी से बद्ध कटी
हिमशिखर तुममें नव शक्ति का संचार कर
चमत्कारों की क्षमता देता है,
जहाँ स्वर्गिक सरिताओं का स्वर
तुम्हारे संगीत को अमरत्व प्रदान करता है,
जहाँ देवदारु की शीतल छाया में तुम्हे अपूर्व शांति मिलती है।

और सबसे ऊपर,
जहाँ शैल-बाला उमा,कोमल और पावन,
विराजती हैं,
जो सभी प्राणियों की शक्ति और जीवन है,
जो सृष्टि के सभी कार्य-व्यापारों के मूल में है,
जिनकी कृपा से सत्य के द्वार खुलते हैं
और जो अनंत करुना और प्रेम की मूर्ति हैं;
जो अजस्त्र शक्ति की स्त्रोत हैं
और जिनकी अनुकम्पा से सर्वत्र
एक ही सत्ता के दर्शन होते हैं।

तुम्हे उन सबका आशीर्वाद मिला है,
जो महान द्रष्टा रहे हैं,
जो किसी एक युग अथवा प्रदेश के ही नहीं रहे है,
जिन्होंने जाती को जन्म दिया,
सत्य की अनुभूति की,
साहस के साथ भले-बुरे सबको ज्ञान दिया।
हे उनके सेवक,
तुमने उनके एकमात्र रहस्य को पा लिया है।

तब,बोलो,ओ प्यार!
तुम्हारा कोमल और पावन स्वर!
देखो,ये दृश्य कैसे ओझल होते हैं,
ये तह पर तह सपने कैसे उड़ाते हैं
और सत्य की महिमामयी आत्मा
किस प्रकार विकीर्ण होती है!

और संसार से कहो_
जागो,उठो,सपनों में मत खोये रहो,
यह सपनों की धरती है ,जहाँ कर्म
vicharon की सुत्रहीन मालाएं गुन्थ्ता है,
वे फूल, जो मधुर होते हैं या विषाक्त,
जिनकी न जड़े हैं,न ताने जो शुन्य में उपजते हैं,
जिन्हें सत्य आदि शुन्य में ही विलीन कर देता है।
साहसी बनो और सत्य के दर्शन करो,
उससे तादात्म्य स्थापित करो,
छायाभासों को शांत होने दो;
यदि सपने ही देखना चाहो तो
शाश्वत प्रेम और निष्काम सेवाओं के ही सपने देखो!

5 comments:

  1. बहुत आभार इस रचना को पढ़वाने का. स्वामी विवेकानन्द जी के जन्म दिवस पर पुण्य आत्मा को नमन!!

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  2. स्वामी विवेकानन्द को पुरी तरह समझ पाना कठिन है । लेकिन थोडी से समझ भी बहुत कुछ दे जाती है ।

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  3. बहुत प्रेरणाप्रद प्रस्तुति...स्वामी विवेकानंद जी को नमन..

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  4. उम्दा प्रस्तुति

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