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अपने सारथी हम खुद
अपने सारथी हम खुद अगले दिन सुबह उठे तो कहीं जाने की हड़बड़ी नहीं थी। आज हमें उन्हीं जगह पर जाना था जहाँ अपनी गाड़ी से जाया जा सकता था। कि...
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खरगोन इंदौर के रास्ते में कुछ न कुछ ऐसा दिखता या होता ही है जो कभी मजेदार विचारणीय तो कभी हास्यापद होता है लेकिन एक ही ट्रिप में तीन चार ऐ...
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बात तो बचपन की ही है पर बचपन की उस दीवानगी की भी जिस की याद आते ही मुस्कान आ जाती है। ये तो याद नहीं उस ज़माने में फिल्मों का शौक कैसे और ...
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बात सन 80 की है। पापाजी का झाबुआ जिले के राणापुर से इंदौर ट्रांसफर हुआ था। इंदौर में खुद का मकान था जिसमें कभी रहे नहीं थे। हम तो बहुत छोटे...
कविता जी आप तो चिट्ठियों पर मेहरबान हैं. आपके ब्लॉग पर चिट्ठी से जुडी यादें रोज ताजा हो रही हैं. आपकी चिट्ठियों में रिश्तों की सोंधी खुशबू है, जो भीना-भीना अहसास दे जाती है. अब आपकी चिट्ठियाँ डाकिया बाबू नहीं बांचे तो भला कौन बांचेगा. तो आप भी अपनी इन सभी चिट्ठियों को "डाकिया डाक लाया" ब्लॉग पर देखें और चिट्ठियाँ लिखती रहें, ताकि हम उन्हें पहुंचाते रहें.
ReplyDeletethank you dakiya baabu jis tarah sabhi ka response in chiththiyon ke liye mila hai mujhe lagata hai mera likhana sarthak raha.
ReplyDeleteबधाई
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