Thursday, December 22, 2011

मातृत्व


ब्लॉग जगत में आये मुझे लगभग ढाई साल हो गए है.इस समय में जो भी लिखा वो आप सभी लोगो ने सराहा.जिससे मुझे ओर लिखने की हिम्मत मिली .बीच बीच में कुछ रुकावटें भी आयी जिससे लिखना कम हुआ लेकिन लिखने का शौक ओर आपका प्रोत्साहन मुझे फिर यहाँ खींच लाया. आज में अपनी १०० वीं पोस्ट डाल रही हूँ.आशा है आप लोगो को पसंद आएगी . 

रामदे से आती सिसकी की आवाज़ सुन कर स्नेहा का दिल बिंध सा गया .उसकी जेठानी की बेटी पिंकी को शायद आज फिर डांट पड़ी.
पता नहीं भाभी कैसे फूल सी बच्ची से ऐसा व्यव्हार कर पाती है. पिंकी उनकी दूसरी बेटी है.उसके जन्म के समय सभी को बेटे की आस थी इसलिए उसे वह प्यार कभी नहीं मिला जिसकी वह हकदार है. 
भाभी जब भी पिंकी को बेवजह डांटती स्नेहा का दिल तड़प उठता .निस्संतान स्नेहा का मातृत्व एक किलकारी के लिए खून के आंसू बहता .
उसने पिंकी को चुपके से अपने कमरे में बुलाकर सीने से लगा लिया.
आज फिर भाभी का अवसाद पिंकी पर ज्वाला बन फूट पड़ा. उन्होंने पिंकी को चार -पांच तमाचे भी जड़ दिए. गुस्से में शब्द अंगारे बन कर बरस रहे थे. स्नेहा से रहा न गया .वह कमरे से बाहर निकली ओर भाभी के हाथ से पिंकी को छुड़ा कर अपने सीने से लगा लिया ओर रोते हुए बोली बस करो भाभी ये बेटी बन कर पैदा हुई इसमें इसका क्या कुसूर है अगर आपको इससे कोई लगाव नहीं है तो इसे मेरी झोली में डाल दो लेकिन इस मासूम से इतनी नफरत तो न करो. 
नफरत?? भाभी जैसे अचानक होश में आयीं में अपनी बेटी से नफरत करूंगी?
लेकिन भाभी प्यार भी तो नहीं करती न?
पिंकी स्नेहा के पैरों को अपने नन्हे हाथों से घेरे सिसक रही थी. 
भाभी ने पिंकी को खींच कर अपने  सीने से लगा लिया .उसका चेहरा चुम्बनों से भर दिया .बेटी को खुद से अलग कर देने के ख्याल से ही उनका मातृत्व तड़प उठा. बेटे की चाह में अपनी ही बेटी के साथ किये अन्याय को महसूस कर उनका मन ग्लानी से भर गया. 
स्नेहा ने सुकून की साँस ली. उसका मातृत्व संतुष्ट था . एक बच्ची को उसकी माँ का प्यार जो मिल गया . 

Wednesday, December 21, 2011

बस यूँ ही ....



देर रात तक तारों संग ,
खिलखिलाने को जी चाहता है.
चांदनी के आँचल को खुद पर से,
 सरसराते गुजरते जाने को जी चाहता है. 
पीपल की मध्धिम परछाई से छुपते छुपाते ,
खुद से बतियाने को जी चाहता है. 
चलते देखना तारों को ओर खुद ,
ठहर जाने को जी चाहता है .
रात के सन्नाटे में पायल की आहट दबाते,
 नदी तक जाने को जी चाहता है .
दिल में छुपा कर रखे अरमानों को ,
खुद को बताने को जी चाहता है. 
तेरी मदहोश कर देने वाली बातों को सुन,
 जी जाने को जी चाहता है 
तू नहीं आस पास फिर भी ,
तेरे होने के एहसास को ओढ़
 सो जाने को जी चाहता है .
कविता वर्मा 

Monday, December 12, 2011

इंतजार १२ ( समापन किश्त )

मधु से मंदिर में मिल कर मधुसुदन को कई पुरानी बातें याद आ गयीं .कैसे उसकी मधु से मुलाकात हुई कब वो प्यार में बदली और फिर समय ने कैसी करवट की .उस रिश्ते का क्या हुआ ?मधु से मिलकर उसे सारी बात बताने के बाद भी वह शांत थी ...उसके बाद वह फिर नहीं मिली मुझसे .आज मंदिर में मुलाकात हुई मुलाकातें बढ़ती गयीं और एक आशा ने फिर सर उठाया क्या हम फिर साथ नहीं हो सकते. इस बीच कुछ अप्रत्याशित घट गया मधु का क्या जवाब होगा पढ़िए समापन किश्त में )
रिटायरमेंट का दिन भी आ गया ,माला का फ़ोन आया आप कितने बजे फ्री होंगे?
ऑफिस के बाद एक छोटा सा कार्यक्रम है यही कोई सात बजे .
ठीक है कह कर उसने फ़ोन रख दिया.
विदाई चाहे कैसी भी हो भावपूर्ण ही होती है. मेरा भी गला रुंध गया जब मैंने विदाई भाषण दिया . करीब सात बजे जब बाहर आया देखा माला और आरती खड़ी है .उन्होंने मुझे बधाई दी और गाड़ी माला के घर की और घुमा दी.
मेरे लिए डिनर का इंतजाम किया था .मधु भी वहीँ थी .सब कुछ सामान्य था मधु शांत थी पर खामोश नहीं. उसने अपने को संभाल लिया था. मेरा प्रश्न मेरी आँखों में आ कर ठहर जाता पर पूछने का समय नहीं था .
खाने के बाद सबने शाहपुर का पता लिया और हमेशा संपर्क में रहने का वादा लिया .मेरे लिए एक छोटा सा गिफ्ट भी लाया गया .मेरी नानुकुर को माला की ठिठोली ने उड़ा दिया .
ये इसलिए है की आपको वहां हमारी याद दिला सके . हम अपने को भुलाये जाना पसंद नहीं करते .

मधु ने कहा की वह मुझे अपनी गाड़ी से घर छोड़ देगी .गाड़ी से उतरते हुए मैंने कहा -मधु एक एक कॉफी हो जाये.
कॉफी पीते हुए मधु ने बताया उस दिन मम्मी ने तुम्हारी बात सुन ली थी वह खुश थी और चाहती थी में तुम्हारी बात तुरंत मान लूं. उनकी हमेशा से एक ही चिंता रही थी उनके बाद मेरा क्या होगा ?मैंने बात ३-४ दिन यूं ही टाल दी फिर कहा सोच कर बताउंगी तो वह अचानक गुस्सा हो पड़ीं .
सारी जिंदगी सोचने में बिता दी और सोचना अभी बाकी है ?उसी गुस्से में उन्हें अस्थमा का अटेक आया और उसी गुस्से में वो मुझे छोड़ कर चलीं गयीं .
ओह्ह मेरे कारण..
नहीं तुम्हारे कारण नहीं. तुम किसी को जिंदगी दे नहीं सकते तो ले कैसे सकते हो. बस उनका समय पूरा हो गया था.
थोड़ी देर ख़ामोशी छाई रही फिर मैंने पूछा -मधु तुमने क्या सोचा?
मधुसुदन में भी तुमसे यही बात करना चाहती थी देखो मुझे गलत मत समझना .शाहपुर से जब में यहाँ आयी थी तो बुरी तरह टूटी हुई थी .किसी तरह मैंने अपने को संभाला और नौकरी में व्यस्त किया .लेकिन ८-१० साल बाद फिर मुझे अवसाद ने घेर लिया .उस समय आरती पुष्प और माला से मेरी दोस्ती हो चुकी थी .उन लोगो ने एक परिवार से भी ज्यादा मुझे संभाला .फिर तो हम एक दूसरे के लिए सब कुछ हो गए. हमने हमेशा साथ रहने की और हमेशा सुख दुःख बांटने की कसम खाई है. तुमने देखा ही है मम्मी के लिए उन लोगो ने अपनों से बढ़ कर किया है .
मधुसुदन परिवार सिर्फ पति पत्नी ,बच्चे ,भाई बहिन ही नहीं होते .परिवार मतलब प्यार एक दूसरे का संबल आज हम चारों अलग अलग रहते हुए भी एक परिवार से बढ़ कर हैं .पर तुम ही सोचो जब मुझे परिवार की जरूरत थी मेरी सहेलियों ने मेरा साथ दिया और आज जब मेरी जरूरत कम हो गयी में उनका साथ छोड़ दूं क्योंकि मुझे मेरा पुराना प्यार बुला रहा है. मेरा मन नहीं मानता.
में मधु की बातों पर विचार करता रहा गलत क्या है एक दिन मैंने अपने परिवार के लिए एक निर्णय लिया था आज मधु अपने परिवार के लिए एक निर्णय ले रही है.
अच्छा एक बात पूछूं ?
तुम्हारी सहेलियां हमारे बारे में जानती हैं ?
मधु हंस दी हाँ तुमसे मिलने के पहले से जानती हैं . हमारी जिंदगी एक दूसरे के लिए खुली किताब की तरह है.
और इस बात के बारे में?
मधु गंभीर हो गयी. नहीं इस बारे में सिर्फ में तुम और मम्मी जानती थीं .अगर उन्हें पता भी चला तो वो मेरे पीछे पड़ जाएँगी. पर में उन्हें नहीं छोड़ सकती.
मधु में तुम्हारे फैसले से सहमत हूँ फिर भी में तुम्हारा इंतजार करना चाहता हूँ जीवन के किसी भी पड़ाव पर अगर ये इंतजार ख़त्म होगा तो मुझे ख़ुशी होगी .
मधुसुदन, मधु के स्वर में उलझन थी. तुम परेशान मत होवो .तुम्हारे साथ यहाँ बिताया गया समय मेरे जीवन का अनमोल समय रहा है .में खुश हूँ की तुम अकेली नहीं हो बस इन यादों के साथ में तुम्हारा इंतजार करूंगा .तुम न भी आयीं तो कोई शिकायत नहीं करूंगा .बस इस इंतजार का हक मुझसे न छीनो.

ट्रेन ने सीटी दे दी ,प्लेटफार्म पर खड़ी मधु धीरे धीरे आँखों से ओझल हो गयी में नहीं जानता ये इंतजार कभी ख़त्म होगा या नहीं लेकिन फिर भी में इस भ्रम के साथ रहना चाहता था.में अपनी सीट पर आकर बैठ गया .गाड़ी ने अपनी गति पकड़ ली. समाप्त.

(ब्लॉगर मित्रों ने इस कहानी के लिए मुझे बहुत प्रोत्साहन दिया में इसके लिए आभारी हूँ. यदि आपके सुझाव भी मिले तो आगे की कहानियों में में और अच्छा लिख पाउंगी. अगर आपकी कोई जिज्ञासा है इस कहानी के सम्बन्ध में या किसी घटना क्रम के संबंद में तो कृपया मुझे बताये जिससे में और बेहतर कर सकों और यथा संभव समाधन कर सकूं. आप मुझे मेल भी कर सकते है kvtverma27 @gmail .com पर .)

Sunday, December 11, 2011

.दुखवा कासे कहूँ ???



वह  उचकती  जा  रही  थी
  अपने  पंजों  पर .
लहंगा  चोली  पर  फटी चुनरी
बमुश्किल  सर  ढँक  पा  रही  थी
हाथ    भी  तो  जल  रहे  होंगे .
माँ  की  छाया  में
छोटे  छोटे  डग  भरती ,
सूख  गए  होंठों  पर  जीभ  फेरती ,
माँ  मुझे  गोद  में  उठा  लो
की  इच्छा  को
सूखे  थूक  के  साथ
 हलक  में  उतारती .
देखा  उसने  तरसती  आँखों  से  मेरी  और ,
अपनी   बेबसी  पर  चीत्कार  कर  उठा .
चाहता  था  देना  उसे
टुकड़ा  भर  छाँव
पर  अपने  ठूंठ  बदन  पर
जीवित  रहने  मात्र
दो  टहनियों  को  हिलते  देख
चाहा  वही  उतार  कर  दे  दूँ  उसे
 न  दे  पाया .
जाता  देखता  रहा  विकास  की  राह  पर
एक  मासूम  सी  कली  को  मुरझाते  हुए . 

Sunday, November 27, 2011

डर २

जैसे जैसे रास्ता सुनसान होता गया में ओर अधिक चौकन्नी हो कर बैठ गयी.मोबाइल हाथ में ले लिया ओर साइड मिरर से उस लड़की पर नज़र रखे हुए थी. हे भगवन बस ठीक से पहुँच जाएँ .अचानक गाड़ी के सामने एक कुत्ता आ गया गाड़ी में ब्रेक लगते ही में मेरे नकारात्मक विचारों को भी विराम मिला.मन ने खुद को धिक्कारा,छि ये क्या सोच रही हूँ  में, ११ साल पहले जब हम इस कोलोनी में रहने आये थे तब कितनी ही बार इसी सड़क  पर कितनी ही रात गए लोगो को लिफ्ट दी है.अगर कोई लिफ्ट न भी मांगे तो भी उसके पास गाड़ी रोक कर पूछ लेते थे कहाँ जाना है किसके घर जाना है आइये गाड़ी में बैठ जाइये हम भी उसी ओर जा रहे है. ओर आज एक लड़की से इतना डर.दुनिया इतनी भी बुरी नहीं है फिर कर भला हो भला का ये विश्वास आज डगमगा क्यों रहा है?लेकिन....मन यूं ही तो हार नहीं मानता ,जब उसके डर पर प्रहार होता है तो उसके अपने तर्क शुरू हो जाते है.संभल कर चलना ओर दूसरों की गलतियों से सीख लेना कोई बुरी बात तो नहीं है.फिर रोज़ इतनी ख़बरें पढ़ते है दूसरों को कोसते है आज जान बूझ कर खुद को मुसीबत में फंसा देना कहाँ की अकलमंदी है? फिर इस लड़की ने शराब पी रखी है भले वह भले घर की हो,लेकिन शराब के शौक पूरे करने के लिए तो माता पिता पैसे नहीं भेजते होंगे न?चेन खींचने की घटनाओं में अधिकतर कॉलेज  जाने वाले लडके ही पकड़ाते है.जब घर से भेजे पैसे में खर्चे पूरे नहीं होते तो ये शोर्ट कट अपना लेते है. 
अब तक हम तीनों ही खामोश बैठे थे. पतिदेव गाड़ी चला रहे थे ,में विचारों के झंझावत  में फंसी थी ओर वह...पिछली सीट के अँधेरे में में देख नहीं पाई की वह क्या कर रही है या उसके क्या हाव भाव है. लेकिन मुझे लगा शायद वह कुछ सोच रही है,या शायद वह इतने नशे में है की कुछ सोच ही नहीं पा रही है. 
टेक्सी स्टैंड आने को था तभी उसने अपनी चुप्पी तोड़ी अंकल प्लीज आप मुझे कही छोड़ दीजिये .शायद उसे भी अब  रात गए अकेले टेक्सी से जाने में डर लग रहा था. 
मैंने उससे कहा बेटा हमें पास ही कहीं कुछ काम है तुम टेक्सी से चली जाओ वो तुम्हे घर तक छोड़ देगा.तब तक हम चौराहे पर आ गए थे.
उसकी कातरता देख कर एक मन तो हुआ की उसे उसके घर तक छोड़ दिया जाये. लेकिन उसका घर कम से कम १० किलोमीटर दूर तो था ही ओर वह स्थान भी सुनसान था.
टेक्सी स्टैंड पर गाड़ी रुकते ही वह उतर गयी.लेकिन मैंने उसका पता पूछा टेक्सी वाले को समझाया ओर उससे कहा भैया इसे ठीक से इसके घर पहुंचा देना. उसकी चिंता भी हो रही थी.अजीब उलझन थी. टेक्सी वाला भी भला आदमी लगा उसने पता समझ कर मुझे आश्वस्त किया की वह जगह मुझे पता है में भी उसी इलाके में रहता हु आप चिंता न करें में इन्हें  छोड़ दूंगा .
मैंने उससे कहा -जाओ बेटा आराम से चली जाओगी.वह गाड़ी के बिलकुल करीब आ गयी मेरा हाथ खिड़की पर रखा हुआ था ,मेरा हाथ पकड़ कर वह रो पड़ी.थेंक्यु  आंटी  आई ऍम सॉरी मैंने आपको  बहुत परेशान किया  आंटी मेरी शादी हो गयी है ये देखिये.उसने कुरते में दबा हुआ उसका मंगलसूत्र बाहर निकाला,मेरा अपने हसबंड से झगडा हो गया था सॉरी आंटी  मैंने शराब पी हुई है .आप बहुत अच्छी है आंटी आपने मेरी इतनी मदद की.तभी मेरे पतिदेव भी वहां आ गए.वह उनकी ओर मुखातिब हुई अंकल प्लीज़ मुझे माफ़ कर दीजिये मैंने आपको बहुत तकलीफ दी. 
बेटा अगर आपकी कोई परेशानी है तो आप अपने माता पिता को क्यों नहीं बताती?
आंटी वो मुझसे बहुत नाराज़ है.में उन्हें नहीं बता सकती. 
नहीं ऐसा नहीं है,वो चाहे कितने भी नाराज़ है, है तो माता पिता ,उनसे ज्यादा आपका भला ओर कोई नहीं सोच सकता. ओर फिर इस तरह अकेले रह कर शराब पी कर खुद को परेशानी में डालने से तो कोई हल नहीं निकालने वाला .तुम मेरी बेटी जैसी हो तुम्हे इस तरह शराब के नशे में देख कर दुःख हो रहा है.बेटा कोई भी परेशानी हो अपने माता पिता को जरूर बताओ.हो सकता है वो गुस्से में तुम्हे डांट दे शायद दो थप्पड़ भी लगा दे लेकिन फिर भी वो तुम्हारी परेशानी को दूर करने के लिए कुछ न कुछ जरूर करेंगे. वह मेरा हाथ पकडे हुए थी मैंने उसे गले लगा लिया. उस २० मिनिट के असमंजस के बाद   मात्र ३ मिनिट में उसके साथ एक ऐसा सम्बन्ध सा बन गया ऐसी आत्मीयता हो गयी,उसका अकेलापन महसूस कर के बहुत दुःख हो रहा था.मुझे नहीं पता था की उसकी असली परेशानी क्या थी?मुझे नहीं लगता की जान कर भी में उस परेशानी को हल करने के लिए कुछ कर सकती थी ,लेकिन अब मुझे अफ़सोस हो रहा था.काश में उसे उसके घर तक छोड़ देती उससे कुछ बात कर लेती वह बहुत अकेली थी शायद उसका मन कुछ हल्का हो जाता,ओर उसके बाद वह खुद ही कोई हल ढूंढ लेती. 
टेक्सी वाला इंतजार में खड़ा था,मुझे हॉस्पिटल  जाने में देर  हो रही थी आज मेरा डर मुझे एक अकेली लड़की की मदद करने से रोक चुका था.वह टेक्सी में बैठ कर चली गयी. में ओर पतिदेव गाड़ी में दो मिनिट ऐसे ही बैठे रहे..मेरा डर भाग   चुका  था,लेकिन उसकी जगह एक खाली पन था पिछली  सीट के खालीपन से भी ज्यादा खालीपन लेकिन क्षणिक में ही  एक अफ़सोस ने वह जगह भर ली थी जो हमेशा हमेशा रहेगा..काश में अपने डर पर काबू पा लेती. 

Friday, November 25, 2011

डर

पता नहीं कैसे कैसे बेवकूफ लोग है??अख़बार नहीं पढ़ते या पढ़ कर भी समझते नहीं है,या समझ कर भी भूल जाते है ओर हर बार एक ही तरह से बेवकूफ बनते जाते है.टेबल पर अख़बार पटकते हुए पतिदेव झल्लाए .
ऐसा क्या हुआ ?चाय के कप समेटते हुए मैंने पूछा .
होना क्या है फिर किसी बुजुर्ग महिला को कुछ लोगो ने लूट लिया ये कह कर की आगे खून हो गया है मांजी अपने गहने उतार दीजिये .अरे खून  होने से गहने उतारने  का क्या सम्बन्ध है.ओर खून तो हो चुका उसके बाद ख़ूनी वहां खड़े थोड़ी होंगे. लेकिन पता नहीं क्यों लोग लोजिकली सोचते ही नहीं है. बस आ गए बातों में ओर गहने उतार कर दे दिए. 
अरे तो वो बूढी महिलाओं को निशाना बनाते है .घबरा जाती है बेचारी.नहीं समझ पाती, आ जाती है झांसे में.
अरे बूढी नहीं अब ५० -५५ साल की कामकाजी महिलाएं ओर उनमे भी कई तो अच्छी पोस्ट पर भी है. कैसे नहीं समझ पाती. समझ नहीं आता. ओर खैर मान लिया महिलाएं है लेकिन  कितने ही आदमी भी तो ठगे जाते है,लड़कियाँ लिफ्ट लेती है ओर सुनसान रास्ते पर गाड़ी रुकवा कर लूट लेती है.जब पता है की आपके रास्ते सुनसान है तो क्यों देते है लोग लिफ्ट ? 
अब बेचारे नहीं मना कर पाते लड़कियों को मदद करने से..क्या करें,मैंने हँसते हुए कहा. 
हाँ  जी तुम्हे तो मौका मिल गया न हम मर्दों को कोसने का. हम तो बस...
अरे आप इतना नाराज़ क्यों होते है अब शायद परिस्थितियां ऐसी होती होंगी इंसानियत भी तो कोई चीज़ है. फिर किसी के माथे पर थोड़े  लिखा है की जिसकी मदद कर रहे है वो धोखेबाज है. चलिए अब नहा लीजिये ओफ़िसे के लिए देर हो जाएगी. मैंने बात ख़त्म करते हुए कहा. 
वैसे बात तो सही है,रोज़ तो एक जैसी घटनाएँ होती है ,पैदल चलती महिलायों की चेन खींचना मोबाइल छुड़ा लेना गहने उतरवा लेना,लिफ्ट ले कर लूट लेना. लेकिन पता नहीं क्यों लोग सीख ही नहीं लेते. 

देर हो रही है जल्दी चलिए न हॉस्पिटल दूर है.किसी को देखने जाना हो ओर वो भी इतनी देर से. ठीक नहीं लगता. फिर लोटने में भी तो देर हो जाएगी.मैंने हड़बड़ी मचाते हुए कहा .
हाँ भाई चलो अभी बहुत देर भी नहीं हुई है,पतिदेव ने गाड़ी स्टार्ट करते हुए कहा .
घर से थोड़े ही दूर मोड़ पर एक लड़की खडी थी.लगभग गाड़ी के सामने ही खड़े हो कर उसने हाथ दिया तो गाड़ी रोकना ही पड़ी.
अंकल प्लीज  मेरी मदद कीजिये प्लीज मेरी गाड़ी स्टार्ट नहीं हो रही है. 
सड़क के किनारे एक कार खडी थी ऐसा लगा की कच्ची सड़क की गीली मिटटी में फंस गयी है. अब मना तो किया नहीं जा सकता था.सो पतिदेव तुरंत गाड़ी से उतर गए ओर उसकी गाड़ी में बैठ कर गाड़ी स्टार्ट कर दी. गाड़ी निकालने की बड़ी कोशिश की लेकिन ये क्या गाड़ी तो हिली ही नहीं फिर गाड़ी रिवर्स की तो हो गयी लेकिन आगे लेने पर एक इंच भी नहीं हिली. अब तक में भी गाड़ी से नीचे उतर आयी.इस सुनसान रास्ते पर एक अकेली लड़की की मदद करने का एहसास सुखद था.  वह लड़की भी मेरे पास आ कर खडी हो गयी.ओर उसके साथ आया शराब की गंध का जोरदार भभका. में दो कदम पीछे हट गयी.
ओह इसने तो शराब पी रखी है.लगता है नशे में गाड़ी कहीं ठोंक दी. अब मैंने गाड़ी को ध्यान से देखा तो पता चला की गाड़ी का अगला हिस्सा दबा हुआ है जिसकी वजह से पहिया आगे को नहीं घूम पा रहा है. तभी एक गाड़ी वहां से निकली लेकिन हमारी गाड़ी तो बीच रास्ते में खडी थी. खैर गाड़ी को साइड में कर के में फिर जल्दी से बाहर आ गयी.तब तक पतिदेव भी गाड़ी से बाहर आ गए थे. 
कहाँ रहती हो?कहाँ जाना है? मैंने पूछा. अब ये गाड़ी कहीं नहीं जा सकती बिना मेकेनिक  के ये तो तय था. समय निकाला जा रहा था .हमें हॉस्पिटल जाना है ये कहाँ की मुसीबत में फंस गए. मैंने मन ही मन सोचा. 
अंकल प्लीज़ कुछ करिए न ,मुझे मूसाखेड़ी जाना है मेरी गाड़ी को पता नहीं क्या हो गया है. प्लीज़ अंकल. 
लेकिन तुम यहाँ आयी किसके घर हो ?मूसाखेड़ी तो बहुत दूर है यहाँ से .
आंटी में अपनी एक सहेली के यहाँ आयी थी वो यहीं इसी कालोनी  में रहती है .
तो तुम अपनी उसी सहेली के यहाँ चली जाओ.गाड़ी लोक कर दो .सुबह किसी मेकेनिक को फोन कर के बुला लेना वो गाड़ी ले जायेगा.मैंने किसी तरह पीछा छुड़ाने की गरज से कहा. 
आंटी मेरा उस सहेली से झगडा हो गया है.अब में उसके घर नहीं जा सकती .आप लोग कहाँ जा रहे है??आंटी प्लीज़ मुझे लिफ्ट दे दीजिये.प्लीज़ आंटी .
कहाँ रहती है तुम्हारी सहेली? 
उसने दूर एक घर की तरफ इशारा कर दिया.
हे भगवन इस मकान में ,इसमें तो न जाने ....उस मकान के बारे में कई किससे सुन रखे थे ये वहां से आ रही है .
बेटा सहेलियों में झगडा तो होता रहता है लेकिन वो सहेली है तुम्हे परेशानी में देख कर जरूर मदद करेगी .मैंने फिर कोशिश की .
आंटी में अच्छे घर से हूँ मेरे पापा बहुत अच्छी पोस्ट पर है.प्लीज़ आंटी मेरी मदद करिए .में यहाँ से कैसे जाउंगी ??
तुम्हारे घर से किसी को बुला लो वो आ कर तुम्हे ले जायेंगे ओर गाड़ी का भी कुछ इंतजाम कर देंगे. में  हर तरह से इस बिन बुलाई मुसीबत से पीछा छुड़ाना चाहती थी. 
आंटी में होस्टल में रहती हूँ. यहाँ कोई फॅमिली मेंबर नहीं है. 
आप कहाँ तक जा रहे है मुझे किसी टेक्सी  स्टैंड तक छोड़ दीजिये प्लीज़. 
हे भगवन ये क्या वही हुआ जिसका डर था. कालोनी के बाहर सुनसान रास्ता ,रात का समय एक अकेली लड़की को लिफ्ट देना ,अख़बार में पढ़ी ख़बरें ,जानबूझ कर बेवकूफ बनना बहुत सारी बातें दिमाग में घूम गयीं. 
दिल तो मेरा भी पिघलने लगा .ये लड़की रात के इस समय इस जंगल में ( हमारी कालोनी रात में जंगल सा आभास कराती है) अकेले कैसे कहीं जाएगी. लेकिन सुनसान रास्ते पर उसे गाड़ी में बैठा कर ले जाना भी तो खतरे से खाली नहीं है.कहीं कुछ हो गया तो??घर में बच्चे इंतजार कर रहे है. लेकिन अगर इसे अकेले यहाँ छोड़ दिया तो ?नहीं नहीं ये तो कोई बात नहीं की अपने डर की वजह से किसी अकेली लड़की की मदद न की जाये. लेकिन कहीं लेने के देने पड़ गए तो?ऐसे तो बड़ी होशियारी दिखाते है .मैंने मदद के लिए पतिदेव की ओर देखा.वैसे पता था वहां तो मदद का जज्बा ज्यादा ही जोर मार रहा होगा. लेकिन हॉस्पिटल के लिए देर हो रही है. 
देखो बेटा हमें तो यही पास में जाना है लेकिन हम तुम्हे पास के टेक्सी स्टैंड पर छोड़ सकते है .लेकिन तुम्हारी गाड़ी?
अब उसने मेरे पतिदेव की तरफ देखा. 
गाड़ी तो यहाँ से हिल भी नहीं पायेगी.ऐसा करो यहीं लोक  कर दो हम तुम्हे पास के टेक्सी स्टैंड तक छोड़ देते है. 
गाड़ी ठीक से लगा कर लोक की उसे हमारी गाड़ी में बैठाया .पूरी गाड़ी शराब की गंध से भर गयी.महक इतनी तेज़ थी की शीशे खोलने पड़े.मैंने पतिदेव की तरफ देखा.समझ तो वह भी रहे थे लेकिन बिना मदद किये वहां से आगे बढ़ जाना ठीक भी नहीं लग रहा था. 
गाड़ी ने कालोनी का रास्ता तय कर मोड़ लिया ओर बिलकुल सुनसान रास्ता शुरू हो गया इसी के साथ मेरे दिल की धड़कने भी तेज़ हो गयी. हे भगवन यहाँ अगर २-४ लोग सड़क पर खड़े हो कर रास्ता रोक ले तो कुछ किया भी नहीं जा सकता. उनपर गाड़ी तो कम से कम नहीं चढ़ाई जा सकती. पता नहीं हम सही कर रहे है या नहीं?.क्रमश 

Friday, October 28, 2011

जीवन के रंग

जिंदगी के हर कदम हर पड़ाव हर मोड़ पर ,घटनाओं को अलग अलग कोण से देखते हुए बहुत कुछ सीखा जा सकता है.सच तो यही है की हर घटना कुछ सिखाने के लिए ही होती है ओर अगर थोडा रुक कर चीज़ों  को देखा जाये उन्हें महसूस किया जाये तो जिंदगी  जीने का एक नया नजरिया मिलता है या आपके नज़रिए में  बेहतरी के लिए कुछ न कुछ तबदीली जरूर आती है .पिछले १० दिन पर नज़र डालती हूँ तो यही महसूस होता है.एक छोटा सा निर्णय कहीं बहुत आत्मविश्वासी बना देता है तो उस डगर पर जब आत्मविश्वास डिगता है जो डर लगता है वह मजबूत ही बनाता है. वैसे भी मेरा यह मानना है की जीवन की हर घटना को सकारात्मक ढंग से लेने से हर काम सरल हो जाता है वहीँ अगर उनमे कमियां ढूँढने बैठ जाएँ तो चीज़ें कठिन हो जाती है. 
करीब १० दिन पहले फ़ोन आया की मम्मी (सासु माँ )की तबियत ठीक नहीं है उन्हें अस्पताल  ले गए है उम्र का तकाजा है कमजोरी भी रहती है सोचते हुए में अस्पताल  पहुंची. इसके पहले पतिदेव का फ़ोन आया की क्या हुआ वो शहर से बाहर थे मैंने कहा की अभी बताती हूँ अस्पताल  पहुँच कर .पता चला की उन्हें हार्ट अटक आया है.आई सी यु में है .उन्हें बहुत तेज़ दर्द हो रहा था. बार बार उठ कर बैठ जाती फिर लेटती  में कभी पीठ दबाती ,तो कभी हाथ सहलाती .उस दिन उन्हें दर्द में इस तरह तड़पते देख कर बहुत तकलीफ हुई.अभी तक जिस बुढ़ापे को किताबों में पढ़ा था फिल्मों में देखा था  उस की विवशता को अपने सामने इतने पास आज पहली बार देख रही थी. हाँ अपनी दादी को देखा था लकिन इस बात को समझने के लिए वह उम्र कम थी. 
कुछ जरूरी इंजेक्शन दवाएं मंगवानी थी लकिन वह अस्पताल के मेडिकल स्टोर पर उपलब्ध नहीं थी .भैया उन्हें लेने बाज़ार चले गए अब अस्पताल में में मम्मी के साथ अकेली थी.इस बीच इ सी जी मोनिटर पर उनकी धड़कन जिस तरह कलाबाजियां दिखाती रही ऐसे समय में उनके पास अकेले होने का वो एहसास एक सिरहन सी भर जाती है. एक पल के लिए ये भी सोचा की क्या सच में इस समय में अकेली हूँ मम्मी की ऐसी हालत में ....एक बारगी मन हुआ की पतिदेव को फ़ोन करके कहूं की जल्दी आ जाइये लकिन इतना समय ही कहाँ था.मम्मी को किसी भी करवट चैन नहीं था कभी उठ कर बैठती तो कभी दर्द से दोहरी हो फिर बिस्तर पर लुडक जाती ओर इतनी सारी नालियां ट्यूब जो लगी थी उन्हें भी व्यवस्थित करना था. खैर बुरा समय था निकल गया दूसरे दिन ये भी आ गए .४-५ दिन अस्पताल में रह कर मम्मी घर आ गयी. 
दीपावली सर पर थी स्कूल से छुट्टी तो खैर वैसे ही नहीं मिलती ओर अगर ले भी लो तो घर में मन कहाँ लगता है,कोर्स कैसे पूरा होगा की चिंता सताती है.दशहरे पर पचमढ़ी घूम आये अब दीवाली की तय्यारी ???घर की तय्यारी तो ठीक ही थी लकिन ऐन दीवाली के पहले इनका यूं ४-५ दिन छुट्टी पर होना...बिजली विभाग वालों के लिए तो दीवाली अग्नि परीक्षा होती है. हमारा दीवाली पर इनके पास जाना तय था लकिन हमें लेने आना...मतलब  एक पूरे दिन का खात्मा.अब ये तो संभव ही नहीं था.फिर मैंने सोचा की में खुद ही क्यों न चली जाऊ .अब तक इतनी ड्राइविंग तो आ ही गयी है. बस कर दिया एलान की आप हमें लेने मत आना हम खुद ही आ जायेंगे.हालाँकि हाँ इतनी आसानी से नहीं हुई.हाई वे पर पहली बार गाड़ी चलाना जहाँ स्पीड ही ८० से १०० के बीच होती है .अभी तक तो ज्यादातर सुनसान सडकों पर ही गाड़ी चलती आयी हूँ उसमे भी ५ वां  गेअर कभी लगाती ही नहीं हूँ. लकिन मैंने भी सोचा कभी तो पहली बार होता ही है न तो इस बार ही क्यों नहीं. बस कुछ नहीं सुना.फिर मेरे दोनों चंगु मंगू तो है ही मुझे सपोर्ट करने के लिए.
 हाँ पापा आप चिंता मत करो मम्मी चला लेंगी गाड़ी हम सब आ जायेंगे.  फिर हम है न साथ में .मेरी बेटियां मेरी सबसे बड़ी ताकत .पता नहीं क्यों लोग सोचते है की .....मुझे तो जीवन में आगे बढ़ने के लिए बेटियों से इतना सपोर्ट  मिला है फिर चाहे बड़ी क्लास पढ़ाने से पहले खुद पढ़ना हो या पेपर बनाने  में ये प्रश्न डालूँ या ये की असमंजस हो ,या क्लास की एक्टिविटी के लिए नए आईडिया चाहिए हों या किसी प्रेसेंटेशन  की तय्यारी हो बस बेटियों को बताओ ओर कह देंगी हम हैं न मम्मी आप चिंता मत करो.एक बार एक मित्र से चर्चा करते हुए मैंने कहा भी था मेरी बेटियों के साथ तो में दुनिया जीत सकती हूँ ओर ये सच भी है. हाँ गाड़ी तो ले कर आ जाउंगी बस उसमे पेट्रोल आप डलवा देना .मुझे पेट्रोल पम्प पर जाना अच्छा नहीं लगता. ओर जिस तरह हंसते हुए इन्होने मुझे देखा अब क्या कहूँ गुस्सा तो आया लकिन...मैंने भी हवा में उड़ा दिया हाँ न रहने दीजिये अगर आपको नहीं डलवाना हम डलवा लेंगे. 
खैर दीवाली के एक दिन पहले चौदस के दिन हमें निकलना था सुबह उठते से तय्यारी  शुरू हो गयी थोडा थोडा करते इतना सामान हो गया की पीछे आधी सीट भर गयी .निकलने से पहले भगवन को भी मना लिया जैसे हंसी ख़ुशी जा रहें है वैसे ही लौटे. गाड़ी स्टार्ट करते ही बड़ी बिटिया ने कहा बाय   पास से चलते है लकिन अरे नहीं बाय पास से तो में रोज़ ही जाती हूँ कह कर गाड़ी रिंग रोड की तरफ घुमा ली. अब वहां इतना ट्राफिक  इतने गढ्ढे. अब क्या करते आधे से ज्यादा रास्ता तो कट ही गया.फिर एक डर मन पर हावी होने लगा अगर ऐसा ही रास्ता मिला तो??क्या वाकई इतनी दूर गाड़ी चला लूंगी?? फिर बेटियों से पूछा बेटा अपन पहुँच तो जायेंगे न?वैसे पतिदेव ने एक ट्रंप कार्ड दे दिया था ये कह कर की तुमसे जितनी दूर गाड़ी चले चला लेना फिर मुझे फ़ोन कर देना में आ जाऊंगा. लेकिन निकलते से फ़ोन थोड़े ही किया जा सकता है. अब कम से कम ५० किलोमीटर तो चले .रास्ता कुल १५० किलोमीटर का ही तो है.खैर जैसे ही नए बने हाई वे पर आये बढ़िया चौड़ी सड़क बीच में दिवाइदर   सड़क देख कर मजा आ गया..बेटा ऐसी सड़क पर तो मजे से चल सकते है है न?? पता नहीं उनसे पूछा या खुद को ही तसल्ली दी लेकिन जवाब में जो उत्साह झलका उसे महसूस कर लगा अब कोई डर नहीं है. 
गाड़ी चलाते हुए बहुत ज्यादा शोर शराबा न बाबा कहीं ध्यान भटक गया तो?ये बात ओर है की जब पतिदेव गाड़ी चलाते है तो पूरे समय उनसे बातें भी करती हूँ ओर जब कोई अच्छा गाना आता है तो तेज़ आवाज़ में सुनती भी जाती हूँ बच्चों के साथ मस्ती बातें लड़ाई नोक झोंक सब तो होती है लेकिन अभी...न जी बच्चे भी धीमी आवाज़ में बातें कर रहे है रेडियो भी विविध भारती ज्यादा धूम धड़ाका नहीं. 
गाड़ी में ५ वां गेअर लगते हुए एक बार फिर उसी अनजान  डर ने घेर लिया लगा लूं न ??कहीं स्पीड बहुत तेज़ तो नहीं हो जाएगी कहीं अचानक ब्रेक लगाना पड़ा तो?? लेकिन १० १५ किलोमीटर चलने के बाद ही समझ आ गया की ये डर बेबुनियाद है क्योंकि रोड में कहीं कोई क्रोसिंग  ही नहीं है ५ वां गेअर लगाकर जब स्पीड ८० के पार पहुंची पीछे से बिटिया बोली ये मम्मी क्या बात है  ऐसा स्पीड ....कहा न मेरी बेटियां मेरी सबसे बड़ी ताकत है. बस फिर क्या था पहले ५० किलोमीटर पार किये ओर पतिदेव को फ़ोन लगाया की हम मानपुर तक आ गए है. उन्होंने कहा की में खलघाट पार आ जाता हूँ...अरे क्यों??हम आ जायेंगे न नहीं पापा आप मत आओ मम्मी बढ़िया गाड़ी चला रही है. गर्व से सीना फूल गया. बेटियों ने तारीफ कर दी मतलब अब किसी की परवाह नहीं. 
अचानक बायीं ओर से एक कार सररर से निकल गयी अरे ये तो दिखी ही नहीं कहाँ से आयी...फिर एक अनजाना डर कहीं में गाड़ी दूसरी लें में ले जाती इसी समय तो???जहाँ आप बेफिक्र होने लगते है वहीँ कुछ ऐसा जरूर होता है की फिर चौकन्ने हो जाएँ ऐसा सिर्फ गाड़ी चलाने में ही नहीं होता बल्कि जीवन में संबंधों में हर जगह होता है .जिस रिश्ते को ले कर आप बहुत आश्वस्त होते है वहीँ चूक हो जाती है .बस एक चूक या एक आश्वस्ति ............खैर. 
अचानक बीच में सब खामोश हो गए. अरे ये क्या बेटा बातें करो ऐसे तो हमें नींद आ जाएगी ..मानपुर के आगे का घाट काट कर सड़क बिलकुल सीधी कर दी गयी है घाट से उतारते हुए कानों पार ऐसा प्रेशर पड़ा की थोड़ी देर को सबके कान सन्न हो गए. एकदम सीधा उतर वो तो अच्छा था की पहले ही सबक मिल गया था की गाड़ी ४ थे गेअर में डाल लेना .
पतिदेव का फिर फ़ोन आ गया की में आ जाता हूँ .हमें तो इसके आगे का रास्ता ही नहीं पता था .लेकिन पापा बैठेंगे कहाँ गाड़ी में तो जगह ही नहीं है .नहीं पापा हम आ जायेंगे. बेटियों ने फिर मना कर दिया. गाड़ी चलाते हुए करीब डेढ़ घंटा हो गया था .कहीं रुकने का मन हो रहा था लेकिन फिर वही गाड़ी में हम तीनो लड़कियां नहीं नहीं अकेले किसी ढाबे पार रुकना ठीक नहीं है.बच्चे कोल्ड ड्रिंक पीने का कह रहे थे लेकिन अब बाद में कह कर हम चलते रहे. लेकिन अब थकान हो गयी है पैर अकड़ गए है बेटा ऐसा करो पापा को फोन कर दो न की आ जाएँ अब तो थक गए. 
पापा तो इन्तेजार में ही बैठे थे जैसे ही फोन गया वो वहां से चल दिए.तब तक हम भी रास्ता पूछते हुए आगे बढ़ चले थे .हर गाड़ी को देखते हुए इसमें पापा है क्या??आखिर ओर १० १५ किलोमीटर बाद पतिदेव मिल गए. वो ऑफिस की गाड़ी में ड्राइवर  के साथ आ गए थे उनके आते ही झट से गाड़ी रोकी हाथ पैर सीधे किये ओर बगल वाली सीट संभल ली. जीवन का एक ओर नया अनुभव थोडा आत्मविश्वास जगाता हुआ थोडा डराता हुआ तो थोड़े डर को दूर भगाता हुआ. 
बेटियां भी किलक उठीं पापा अब तो हम गाड़ी से लेह लद्धाख  भी जा सकते है अब तो मम्मी भी बढ़िया गाड़ी चला  लेती है. बस ऐसे ही अनुभव से तो जीवन में रांग बिखरते है.
आप सभी को दीपावली की बहुत बहुत शुभकामनायें.

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