सूर्योदय सूर्यास्त और पीस पगोडा


 सुबह गाड़ियों के हॉर्न की आवाज़ों से नींद बहुत जल्दी खुल गई ये सब सुबह टाइगर पॉइंट पर जाने वाली गाड़ियाँ थीं जो कंचनजंघा पर सूर्योदय देखने जा रही थीं। हमने भी टैक्सी की बात की थी तो ड्राइवर ने कहा कोई फायदा नहीं है साब सुबह बादल हो जाते हैं कुछ दिखाई नहीं देता क्यों अपनी नींद ख़राब करते हैं। यह सुन कर हमने जाने  इरादा बदल दिया था पर अब नींद खुल ही गई थी और खिड़की से कंचनजंघा की चोटी दिख ही रही थी तो स्वेटर शॉल पहन कर खिड़की में खड़े हो गये। गहरे नीले जामुनी आसमान में धवल शिखर शान से सिर उठाये खड़ा था देखते ही देखते धुऐं की एक काली लकीर ने उसे ढँक लिया आसमान का रंग गहरे नीले से चमकीले नीले में बदलता जा रहा था और धवल शिखर कालिमा के आगोश में छुपता जा रहा था और देखते देखते पूरी तरह गायब हो गया। बहुत निराशा हुई सिर्फ इसलिए नहीं कि सूरज की पहली किरण से सुनहरी हुई चोटी को नहीं देख पाई बल्कि इसलिए भी कि जितना हम ज्ञान और जानकारी से लैस होते जा रहे हैं उतने ही कर्तव्यों से लापरवाह भी। लगातार चलती डीजल गाड़ियाँ उनके हॉर्न का शोर हमारा शोर धूल कचरा सुदूर प्राकृतिक स्थानों को भी इस कदर प्रदूषित कर चुका है इसके बाद कहाँ पनाह मिलेगी समझ नहीं आता। 
सुबह हो चुकी थी आसमान में धुएँ की धुंध थी अब सोने का मन ना था तो सोचा चलो सैर कर आयें बस तैयार हुए और पहुँच गये ओपन थियेटर वाले चौक में। सफाई चल रही थी लोग टहल रहे थे कुछ लोग बेंच पर बैठे थे। तभी एक व्यक्ति ने जेब से एक रोटी निकाली और बारीक़ टुकड़े कर बिखेर दिये। कबूतरों का एक झुण्ड तुरंत रोटी खाने पहुँच गया। इसके बाद तो  एक के बाद एक लोग आते गये और रोटी बाजरा बिस्किट के टुकड़े कर डालने लगे। थोड़ी ही देर में चिड़िया कबूतर और कुत्ते सभी अघा गये और उन्होंने खाना बंद कर दिया सफाई करने वालों ने बचा खाना झाड़ कर डस्टबिन के हवाले कर दिया। हमारी आस्थाएं भावनाएँ गलत नहीं हैं बस उनको नियंत्रित करने में कहीं चूक जाते हैं। 
टैक्सी टाइम से आ गई पहला स्थान था जापानी मोनेस्ट्री पीस पगोडा। मुख्य सड़क से काफी अंदर भव्य सफ़ेद स्तूप जिसपर बुद्ध की सुनहरी मूर्ति बगल के पहाड़ को टक्कर देते ऊँचे ऊँचे पेड़ साफ सुथरी खुली खुली जगह जिसमे करीने से लगा छोटा सा बगीचा अर्ध वृत्ताकार सीढियाँ और एक दूसरे से मुखातिब कंचनजंघा और बुद्ध। एक नज़र में प्यार हो जाये ऐसी जगह से। लेकिन यहाँ ढम ढम की आवाज़ क्यों ? शहर का शोर कुछ इस कदर कानों में भरा हुआ है कि कोई भी आवाज़ अब सहन नहीं होती। मोनेस्ट्री में अंदर गये भव्य मूर्ति के सामने एक बड़े ड्रम पर मंत्र उच्चार के साथ बीट दी जा रही थी एक बूढी महिला ने बैठने का इशारा किया फिर वहीँ रखे रैकेट जैसे ड्रम और ड्रम स्टिक उठाने का इशारा किया। बोर्ड पर एक मंत्र लिखा था जिसे पढ़ कर उसके अनुसार ड्रम बजाना था। थोड़ी ही देर में हम उस लय में आ गये और फिर उसमे ऐसे रमे कि थोड़ी देर के लिये सब कुछ भूलकर सिर्फ मंत्रमय ध्यान में पहुँच गये। उठने का मन तो नहीं था लेकिन अगले स्पॉट पर भी जाना था  मसोस कर उठना ही पड़ा। इसके बाद स्तूप पर गये। इतनी ऊँचाई पर एक तरफ पहाड़ की दीवार और दूसरी तरफ विशाल नीला आसमान जिसकी हद तय करती कंचनजंघा की चोटी। सिक्किम के आदिम जन कंचनजंघा की पूजा करते हैं इसलिए भारत की इस सबसे ऊँची चोटी पर भूटान या चीन की तरफ से ही चढ़ा जाता है। कंचनजंघा नेशनल पार्क में और इसके बेस कैंप में लोग हर नियम का बिना किसी चौकसी के पालन करते हैं। स्तूप के चारो तरफ चार विशाल सुनहरी मूर्ति और उनके बीच चार लकड़ी की नक्काशी के भित्ति चित्र थे। 
अगला पड़ाव था बतिस्ता लूप। दार्जिलिंग प्रसिद्द है अपनी टॉय ट्रेन के लिये। अंग्रेजों के ज़माने से शुरू हुई यह ट्रैन अभी भी दार्जिलिंग से सिलीगुड़ी के बीच चलती है। बतिस्ता लूप ट्रेन की दिशा बदलने के लिये एक स्थान है। सुबह साढ़े दस बजे यहाँ एक ट्रैन आती है। कोयले से चलने वाली छोटी सी छुकछुक गाड़ी जब आई हवा में कोयले की कनि बिखर गई। सबने खूब फोटो खींचे कुछ खाली डब्बे में चढ़ गये। यहाँ बेहद खूबसूरत बगीचा भी है गुनगुनी धूप खूबसूरत फूल छोटी सी रेलगाड़ी एक स्वप्नलोक सी दुनिया। सड़क के दूसरी और दो तीन रेस्टॉरेंट हैं। हम बिना नाश्ते के चल दिए थे रेस्टॉरेंट की पहली मंजिल पर कांच की दीवारों के परे बिखरे अनंत आसमान और धवल शिखर को निहारते कॉफी के घूँट भरना एक सपने के पूरा होने जैसा है। 
अगला पड़ाव था एक और मोनेस्ट्री। परिसर में छोटे छोटे बच्चे बुद्धिस्ट ड्रेस पहने खेल रहे थे। ये बच्चे यहीं रह कर अपनी शिक्षा पूरी करते हैं इसके बाद कुछ अपनी भौतिक दुनिया में वापस लौट जाते हैं और कुछ आजीवन अविवाहित रहने का फैसला कर मठ में ही रहते हैं। ये अपनी गहरी मैरून बौद्ध ड्रेस के ऊपर एक सुनहरी जैकेट पहनते हैं। हर टूरिस्ट स्पॉट के बाहर स्थानीय लोग ऊनी कपड़े मोज़े टोपी शॉल लिये नज़र आते हैं। पर्यटक ही उनकी कमाई का साधन है। पुरुष टैक्सी गाइड एजेंट जैसे काम करते हैं महिलायें व्यवस्था दुकानदारी जैसे काम संभालती हैं। 
ज़ू चिड़ियाघर और हिमालयन पर्वतारोहण संस्थान दोनों एक ही कैंपस में हैं। जानवरों के प्राकृतिक आवास पहाड़ी ढलान को ज्यों का त्यों रख कर उसमे अनगढ़ सा आवास बना कर प्राकृतिक रूप दिया गया है। ऊँची नीची पहाड़ी जगह में जानवर भी जंगल सा ही महसूस करते होंगे। यहीं है हिमालयीन पर्वतारोहण संस्थान जिसमें माउंट एवेरेस्ट के पहले एक्सपिडिशन में पहने कपडे जूते उपयोग किये औजार टेंट आदि सामान रखे हैं। इन्हें देख कर मुँह आश्चर्य से खुला रह जाता है। आज तो इस दिशा में बहुत तरक्की हो गई है। मौसम बर्फ ठण्ड के अनुसार सभी साजोसामान की क्वालिटी बहुत सुधर गई है। पानी की बॉटल रस्सी खाने पीने की सुविधा गैस आदि। पर उस समय के साजो सामान को देख कर उन पर्वतारोहियों की हिम्मत दंग करती है। इस संग्रह में पर्वतारोहण की पूरी विकास यात्रा प्रभावी रूप से प्रदर्शित की गई है। समय कम था अभी रोप वे पर जाना था इसलिए जू का कुछ हिस्सा जल्दी जल्दी पार किया। 
यह पाँच किलोमीटर की रोप वे है ढाई किलोमीटर जाना ढाई आना। एक ट्रॉली में छह लोग बैठते हैं हम दो थे लाइन के आखिर में खड़े तभी वहाँ का कर्मचारी आया और हमें लाइन में सबसे आगे आने को कहा। दरअसल चार लोगों के ग्रुप के साथ बैठने के लिए दो लोग चाहिए इसलिए हमारा नंबर जल्दी आ गया। हमारे साथ थे चार लड़के उनकी बातों में कई गलत जानकारियाँ थीं जिन्हें मैंने ठीक कर दिया और फिर बातों का सिलसिला शुरू हुआ। पता चला वो स्टूडेंट्स हैं और बांग्लादेश से आये हैं। आगे जाने का कोई फिक्स प्लान नहीं है और यहाँ वहाँ से जानकारी ले रहे हैं कि आगे कहाँ जायें ? रोप वे खूबसूरत चाय के बागानों के ऊपर से गुजरता है नीचे एक स्कूल एक छोटा सा गाँव पगडण्डी जैसे रास्ते दिखते हैं। स्कूल के बाहर बच्चे खेल रहे थे लौटते हुए बच्चे उछलते कूदते घर जाते हुए दिखे। दूर तक पहाड़ों की श्रृंखला और दूर पहाड़ पर दिखता एक मंदिर एक बड़ी मूर्ति। पता चला यह जगह दक्षिण सिक्किम में है। 
यहाँ से टी स्टेट जाने के बीच में पड़ती है तेनसिंग रॉक। लगभग 30 /40 फ़ीट ऊँची एक चट्टान जिस पर माउंटेन क्लाइम्बिंग का शौक पूरा किया जा सकता है। यह अनुभव शानदार था। आखरी स्टॉप था टी स्टेट। यहाँ दूरबीन लेकर बैठे लोग दक्षिण सिक्किम की वह मूर्तियाँ और मंदिर दिखाते हैं। चाय बागान के बाहर छोटे छोटे स्टाल जहाँ चाय दालचीनी लौंग इलायची आदि मिलती है। हमने भी थोड़ा बहुत सामान लिया और वापसी में फिर मॉल रोड पर घूमते हुए सूर्यास्त देखते चहल पहल देखते रहे। यह दार्जिलिंग की आखरी शाम थी हम देर तक वहाँ बैठे रहे फिर हेस्टी टेस्टी में खाना खा कर वापस होटल आ गये। 
टैक्सी ड्राइवर टैक्सी के मालिक ही थे और शांत और हँसमुख भी। कई जानकारियाँ वो देते रहे। उन्ही से कहा कि अगले दिन सुबह हमें गंगटोक जाना है अगर कोई ड्राप आउट वाली टैक्सी हो तो बताना और रात ही उनका फोन आ गया एक टैक्सी है जो गंगटोक जा रही है पर जाम से बचने के लिए सुबह जल्दी निकलना होगा। आते हुए जाम देख चुके थे इसलिये सुबह जल्दी ही दार्जिलिंग को विदा कह दिया एक बार फिर आने का वादा करके। 
कविता वर्मा 


Comments

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शुक्रवार 23 दिसम्बर 2016 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुकर्वार (23-12-2016) को "पर्दा धीरे-धीरे हट रहा है" (चर्चा अंक-2565) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. बहुत सुन्दर
    नव वर्ष की मंगलकामनाएं
    http://savanxxx.blogspot.in

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