Monday, September 12, 2016

हँसते हँसते कट जायें रस्ते भाग 1


रोजमर्रा की जिंदगी में कितनी ही बातें ऐसी होती हैं जिन्हें जब याद करो हंसी फूट पड़ती है। ये छोटी छोटी बातें घटनायें हमें जीने की ऊर्जा देती हैं। कुछ घटनायें गहरी तसल्ली दे जाती हैं कुछ खुद की पीठ थपथपाने का मौका। ऐसी ही घटनाओं को कलमबद्ध करने का मन आज हो आया। आप भी पढिये और मुस्कुराइये। 

सिटी बस से सफर करना हमेशा ही रोमांचक होता है और अगर आसपास एक दो सहयात्री भी मजेदार या नोटंकीबाज मिल जाएँ तो फिर कहना ही क्या। बेटी रोज़ सिटी बस से कॉलेज जाती है कभी बैठने की जगह मिल जाती है कभी नहीं। कभी कभी बीच के स्टॉप पर कोई उतरने वाला होता है तो आसपास वालों में उस सीट को हथियाने की होड़ लग जाती है। अब सफर रोज़ का ही है इसलिए बिना वजह की सदाशयता भी कोई नहीं दिखाता सब अपने में मगन अपने लिए थोड़ी सी जगह और सुकून जुटाने भर की चिंता करते हैं। एक दिन एक लड़की दो सीट के बीच की जगह में खड़ी थी। सीट पर बैठी लड़की अगले स्टॉप पर उतरने वाली थी। एक स्टॉप पहले एक महिला चढ़ीं और उस सीट से थोड़ी दूर खड़ी थीं। जैसे ही स्टॉप आया वह लड़की उठी तो उन महिला ने अपना पर्स खाली हुई सीट पर फेंक दिया क्योंकि वहाँ तक तुरंत पहुँचना मुश्किल था बस में काफी भीड़ थी। वह लड़की जो सीटों के बीच में खड़ी थी उसने उनका पर्स उठा कर उन्ही की ओर बढ़ाया और कहा आंटी शायद आपका पर्स गिर गया है और खुद उस सीट पर बैठ गई। 

एक और वाकया हुआ एक आंटी और उनकी मम्मी हाय हाय करते भीड़ भरी बस में चढ़ीं। आंटी जोर जोर बोल रहीं थी हाय मेरे पैर में चोट लगी है देखो संभल कर बहुत दर्द हो रहा है। माँ बेटी दोनों माहौल बनाती रहीं कि शायद कोई उन्हें बैठने की जगह दे दे लेकिन सब अपने में मगन थे।  फिर उन्होंने एक एक से पूछना शुरू कहाँ उतरोगे। आखिर तंग आकर एक लड़की खड़ी हो गई कहते हुए कि आंटी आप बैठ जाइये और सीट खाली होते ही उनकी मम्मी सीट पर बैठ गई। 

छुट्टे पैसे ना होने पर टॉफियाँ तो हम सभी को कभी ना कभी मिली होंगी। कभी हंस के तो कभी मुँह बनाते हम उन्हें रख ही लेते हैं और करें भी क्या दुकानदार तो अकड़ के खड़ा हो जाता है कि छुट्टे दो जैसे छुट्टे ना होने पर भी सामान लेने आकर हमने कोई गुनाह कर दिया हो। 
एक बार मोबाइल का रेट कटिंग वॉउचर लेने गई जो अड़तीस रुपये का था और खुल्ले थे सिर्फ छत्तीस रुपये। एक हाथ में खुल्ले पैसे पकडे दूसरे हाथ से सौ का नोट आगे बढ़ा दिया। दुकानदार बोला छुट्टे दीजिये मैंने कहा सिर्फ छत्तीस रुपये हैं चलेंगे। वह असमंजस में पड़ गया क्या करे वह दुकान में नोकर था। उसे असमंजस में देख कर मैंने कहा दो रुपये की टॉफी दे दूँ और दो टॉफी निकाल कर काउंटर पर रख दी। दुकान का मालिक वहीँ बैठा था वह बोला तो कुछ नहीं पर उसे इतनी हंसी आई की क्या कहें। पहली बार कोई उसकी टोपी उसी के सिर पहना गया। 

ऐसे ही एक बार रेस्टॉरेंट में खाने के बाद बिल चुकाया तो दस के नोट की जगह दस टॉफी देख दिमाग ख़राब हो गया। वेटर को टिप भी देनी थी तो उन दस टॉफी के साथ दो नोट और मिलाये और वेटर से कहा इसके बदले काउंटर से पैसे ले लेना। अभी राजस्थान टूर पर पांच के सिक्के की जगह मिंट की छोटी डिब्बी मिली किसी एपल मिंट फ्लेवर की जो हमें पसंद नहीं था। बिटिया उसे लेकर काउंटर पर गई और बोली इसकी जगह मिंट पुदीना फ्लेवर दे दो। दुकानदार ने बदल कर दे दिया। तब मैंने उससे कहा ऐसा लग रहा है जैसे तुम कोई फटा नोट बदलवा कर ले आई हो। 
कविता वर्मा 

4 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (14-09-2016) को "हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ" (चर्चा अंक-2465) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’हौसलों की उड़ान - ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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