Tuesday, June 28, 2011

कुछ ....


.सूरज की सुनहरी धुप
 छूती  है जो गालों को 
 पर कुनकुनी नहीं लगती
 कुछ सर्द सा है. 

बारिश की रिमझिम बूँदें
 पड़ती जो तन पर 
पर मन को नहीं भिगोती
 कुछ सूखा सा है. 

भीड़ भरे बाज़ार में 
चीखती आवाजें
 कुछ सुनाई नहीं देता
 कुछ सूना सा है. 

दोस्ती प्रेम प्यार के
 एहसासों से भरे जीवन में
 नहीं होता कोई एहसास 
कुछ रीता सा है. 

एक तुम्हारा स्पर्श
 एक  तुम्हारी नज़र 
 जो मिल जाये मुझे
फिर सब अपना सा है. 

11 comments:

  1. सुंदर भावाभिव्यक्ति।

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  2. भीड़ भरे बाज़ार में
    चीखती आवाजें
    कुछ सुनाई नहीं देता
    कुछ सूना सा है.
    bheed me bhi sannata

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  3. बहुत खूबसूरत एहसास लिखे हैं ...

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  4. खूबसूरत कविता कविता जी...सच है कि जो बूँदें मन को गीला ना सकेवे सूखे ही होंगे...मन को छूती कविता...

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  5. सिर्फ एक के लिए...सबको नज़रंदाज़ करना ठीक नहीं...मौसम, बाज़ार और दोस्तों की भी ज़रूरत है...वैसे भी मिलने के बाद चीजों का अवमूल्यन बहुत तेज़ी से होता है...

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  6. बारिश की रिमझिम बूँदें
    पड़ती जो तन पर
    पर मन को नहीं भिगोती
    कुछ सूखा सा है.

    बहुत खूब कहा है ।

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  7. एक तुम्हारा स्पर्श
    एक तुम्हारी नज़र
    जो मिल जाये मुझे
    फिर सब अपना सा है.


    बहुत सुंदर अहसास,
    भावपूर्ण रचना

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  8. एक तुम्हारा स्पर्श
    एक तुम्हारी नज़र
    जो मिल जाये मुझे
    फिर सब अपना सा है.

    इसी मे तो सब समाहित है।

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  9. कवीता जी इसी लिए ढाई अक्षर प्रेम का महत्त्व अभी भी है ! बहुत चुटीली कविता !

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  10. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति.
    सुन्दर शब्द रचना.

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  11. बहुत ही सटीक भाव..बहुत सुन्दर प्रस्तुति
    शुक्रिया ..इतना उम्दा लिखने के लिए !!


    संजय भास्कर
    आदत....मुस्कुराने की
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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