Friday, September 30, 2016

अब हमारी बारी

  
देश की सरहदों पर तैनात हमारे जवान हमेशा अपनी जान हथेली पर लिये देश की रक्षा में लगे रहते हैं। जान देने की बारी आने पर एक पल के लिए भी नहीं सोचते ना खुद के बारे में ना अपने परिवार के बारे में। जिस तरह हम अपने घरों में इस विश्वास के साथ चैन से सोते हैं कि सरहद पर सैनिक हैं उसी तरह वे विश्वास करते हैं कि पीछे से देश की जनता और सरकार है जो उनके परिवार की देखभाल करेगी। किसी भी जवान की शहादत पर लोगों में भावनाओं का ज्वार उठता है उसकी अंतिम यात्रा में पूरा गाँव शहर उमड़ता है सरकार तुरंत मदद घोषित कर देती है। हर प्रदेश सरकार अपनी सोच की हैसियत के अनुसार मदद घोषित करती है। अब जिनकी सोच में ही दिवालियापन हो वह उसी के मुताबिक मदद घोषित करते हैं। हाँ लोगों के गुस्से मीडिया की लानत मलानत से कभी कभी सोच परिष्कृत हो जाती है और स्तर बढ़ जाता है सोच का भी और मदद का भी। 
खैर मुद्दा प्रदेश सरकार या राजनैतिक पार्टी की सोच का नहीं है मुद्दा है इन सैनिक परिवारों की सच्ची मदद और उनके सही हाथों में पहुँचने का। कई बार होता यह है कि भावनाओ के अतिरेक में घोषणाएं तो हो जाती हैं पर उनपर अमल कब और कितना होता है इसे जाँचने वाला कोई नहीं होता। 
हाल ही में उरी में और इसके पहले भी सीमा पर होने वाली घटनाओं के कारण मारे गये सैनिकों की अंतिम यात्रा के प्रसारण को देखते हुए महसूस हुआ कि अधिकतर सैनिक सुदूर ग्रामीण इलाके के हैं और उनकी सामाजिक आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। अधिकतर के परिवार में माता पिता , पत्नी या तो पढ़े लिखे नहीं हैं  बहुत कम पढ़े लिखे हैं। ऐसे में सरकारी और कानूनी पेचीदगियों को समझना और मदद पाने के लिए सही द्वार तक पहुँचना इनके लिए मुश्किल होता है। ऐसे में कोई रिश्तेदार कोई बिचौलिया मदद के नाम पर इनके साथ हो लेता है और वह मदद इन तक पहुँचने के पहले ही हड़प ली जाती है या उसके हिस्से हो जाते हैं। एक साथ मिली रकम का यथोचित उपयोग और इंवेस्टमेंट करने में वे लोग असफल होते हैं और मतलबपरस्त की धोखाधड़ी का शिकार हो सकते हैं।
अगर पत्नी दूसरी शादी कर ले तो बूढ़े माता पिता बुढ़ापे में आर्थिक परेशानियों से घिर जाते हैं भाईबहन का भविष्य अंधकार में डूब जाता है। जब परिवार की भूखों मरने की स्थिति आती है और वे भटकते हुए मीडिया तक पहुँचते हैं तो बिना जमीनी सच्चाई जाने सरकार को कोसना शुरू हो जाता है। 

दरअसल अब ऐसी मदद या मुआवजे को शहीद के परिवार की जरूरत का ध्यान रखते हुए पूरी योजना बना कर  देने की जरूरत है। होना यह चाहिये कि सैनिक पर निर्भर परिजनों की पूरी जानकारी सेना के पास होनी चाहिये। जिसमे भाई बहनों की जिम्मेदारी का एवरेज टाइम पीरियड शामिल हो। जैसे अगर भाई 18 साल का है और पिता की कोई आय नहीं है आगे कितने साल में अपनी पढाई पूरी कर अपने पैरों पर खड़ा हो सकता है या बहन की शादी कितने साल में करने का इरादा है। ऐसे ही बच्चों की उम्र उनकी जिम्मेदारी जरूरतों का मोटा हिसाब होना चाहिए। 

प्रदेश सरकारों द्वारा दी गई मदद मुआवजे का कुछ हिस्सा माता पिता को और कुछ पत्नी और बच्चों के नाम से बराबरी से बाँटी जाना चाहिए जो तुरंत मदद के लिए हो और यह बहुत ज्यादा नहीं होना चाहिये। बाकी पैसा अलग अलग हिस्सों में बाँट कर उसकी एफ डी बनवाना चाहिये जो उन्हें अगले बीस बाइस सालों तक ब्याज और मूल देती रहे जब तक बच्चे अपने पैरों पर ना खड़े हो जाएँ। पत्नी को मृत्युपर्यंत पेंशन तो मिलना ही चाहिये। 
ये ध्यान रखना बहुत जरूरी है कि ये सैनिक हमारे और सरकार के भरोसे अपने परिवार को हमारे भरोसे छोड़ जाते हैं उनके लिए हमारे दिलों में बहुत मान सम्मान है उनके परिवार से सहानुभूति है और उसे सही दिशा दे कर हमें अपना फ़र्ज़ निभाना है। 
कविता वर्मा 


Thursday, September 22, 2016

जीने दे मुझे तू जीने दे


सामाजिक बदलावों में फिल्मो की भूमिका पर अक्सर सवाल उठते रहते हैं। हमारे यहाँ फिल्मो को विशुद्ध मनोरंजन का साधन माना जाता है ऐसे में कोई फिल्म अगर सोचने को विवश करती है तो उस पर चर्चा की जाना चाहिए। हाल ही में शुजीत सरकार की फिल्म पिंक रिलीज हुई। महिलाओं के प्रति समाज के नज़रिये पर सवाल उठाती इस फिल्म ने हर आयु वर्ग के चैतन्य लोगों को झकझोरा है और इस पर चर्चा जोर शोर से जारी है। दिल्ली के निर्भया कांड के बाद पूरे देश में एक लहर उठी थी जिसमे बड़ी संख्या युवकों की थी। उस घटना ने युवकों की विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लगाया था और स्वयं को सदैव शक के दायरे में पाना उनके लिए असह्यनीय था। कभी लड़कियों के बारे में सोचा है जो हमेशा समाज की निगाहों की चौकसी में रहती हैं और उनके क्रिया कलाप हमेशा ही शक़ के दायरे में। 
फिल्म की कहानी तीन मध्यम वर्गीय कामकाजी लड़कियों के आसपास घूमती है जो दिल्ली में एक फ्लैट किराये पर लेकर रहती हैं। उनके साथ हुए एक हादसे के बाद उनकी जिंदगी बदल जाती है तब एक बूढा वकील उनका केस लड़ता है और अदालती कार्यवाही के दौरान समाज की लड़कियों के प्रति मानसिकता पर उठाये सवालों के द्वारा पूरे समाज को सोचने पर मजबूर कर देता है। फिल्म में रसूखदार नेता परिवार और लड़कों की मानसिकता, सोसायटी के तथाकथित आधुनिक लोगों की सोच, पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली, दोस्ती, रिश्ते, इंसानियत सभी को बखूबी दर्शाया गया है। हर बात इतने सहज स्वाभाविक ढंग से आती है और अचानक एक बड़ा प्रश्न छोड़ जाती है की हम भौचक रह जाते हैं। 
लड़कियों के लिये हर समाज में कई अलिखित नियम हैं। अब मोहल्ला प्रथा तो रही नहीं और हम सब तथाकथित आधुनिक हो गये हैं इसलिये आते जाते किसी पर सीधे कटाक्ष नहीं करते लेकिन पीठ पीछे किसी पर टैग तो लगा ही देते हैं और अपने लगाये टैग को सही साबित करने के लिये उसकी चर्चा भी खूब करते हैं।
इस स्थिति से समाज में हर लड़की को जूझना पड़ता है। लड़की देर रात घर आती है डिस्को पब में जाती है अकेली रहती है लड़कों से मिलती है उनसे हँस हँस कर बात करती है कैसे कपड़े जूते पहनती है बाल कितने स्टाइल में कटवाती है ये सब बातें उसका  चरित्र निर्धारित करती हैं। इसी के आधार पर उसे चालू आवारा और सहज उपलब्ध मान लिया जाता है। समाज द्वारा लगाए गये इन टैग के सामने कोई तर्क कोई स्पष्टीकरण नहीं चलते। अगर लड़की पर परिवार की जिम्मेदारी है वह कामकाजी है तो उसे सिर्फ काम करना चाहिये उसके आगे अपने लिए सोचना अपने लिए जीना समाज को खटकता है। लड़कियों को आज़ादी भी एक तय चौखटे में ही दी गई है। ऐसे कोई चौखटे लड़कों के लिये निर्धारित नहीं हैं वे जो चाहे करें सब मान्य है। 
फिल्म के एक दृश्य में जब लोग मीनल को देख उसके बारे में बात करते हैं तो वह अपने सिर पर हुड लगा लेती हैं तब अमिताभ बच्चन उस हुड को हटा देते हैं। प्रतीकात्मक रूप से बहुत बड़ी बात यहाँ कही गई है। अब समय आ गया है कि लड़कियाँ खुद को छुपाना परदे के पीछे छुपना बंद कर दें।  कहने दें लोगों को जो कहना है उसका खुल कर सामना करें। 
फिल्म के एक दृश्य में कीर्ति कुल्हारी चीख चीख कर कबूल करती हैं कि उनने और उनकी सहेलियों ने पैसे लिये हैं। उनका बयान केस कमजोर कर सकता है लेकिन बार बार यह सुन कर वे आपा खो बैठती हैं। अगले दृश्य में वे कहती हैं मना करते रहने से भी क्या होता जब सबने मान ही लिया है। लड़कियों के बारे में यही सोच काम करती है। यही स्थिति है उनकी। उनकी सफाई उनके स्पष्टीकरण को कोई नहीं मानता समझता लोग वही सोचते हैं जो वो सोचना चाहते हैं। 
 रिश्ते भारतीय समाज की पहचान है और रिश्तों के लिये जितने नाम हमारे यहाँ हैं उतने शायद किसी और संस्कृति में नहीं हैं। दोस्ती का रिश्ता खून के सभी रिश्तों से ऊँचा रिश्ता है जिसकी अवधारणा हमारे पुराणों में भी मिलती है। कृष्ण सुदामा, कर्ण दुर्योधन, राम सुग्रीव ऐसे ही कुछ उदाहरण हैं। लेकिन लड़के और लड़की की दोस्ती को आज भी सम्मान की नज़रों से नहीं देखा जाता। उनका साथ उठना बैठना खाना पीना हंसना बोलना लड़की को हर बात के लिए तैयार है ऐसा माना जाता है। इस फिल्म में हर तरह के रिश्ते हैं। एक दोस्ती का वह रिश्ता जो इन तीन लड़कियों के बीच है जिसके दम पर वे कठिन से कठिन समय में एक दूसरे का साथ देती हैं तो एक वह रिश्ता जो अपनी सुविधा के साथ चलता है पर बुरे वक्त में साथ छोड़ देता है। एक रिश्ता है मकान मालिक और किरायेदार का जो व्यावसायिक होते हुए भी इन सब से ऊपर उठ इंसानियत का सबूत देता है और एक छोटा सा पर सबसे महत्वपूर्ण वह खूबसूरत रिश्ता जो एक पडोसी का है जो मददगार बन कर उभरता है। 
समाज के रिश्तों के बदलाव की बात सभी करते हैं पर क्या कभी हम खुद में झांक कर देखते हैं कि अपने रिश्तों में हम कितने ईमानदार हैं ? 
फिल्म में पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली को लगभग वैसा ही दिखाया गया है जैसी वह है। आम इंसान के लिये न्याय की आशा अभी भी आकाश कुसुम है। हमारे देश में त्वरित न्याय या इतने काबिल वकील मिलते हैं या नहीं या एक रसूखदार परिवार के लड़कों को इतने संगीन जुर्म का आरोपी बनाया जा सकता है या नहीं यह इस फिल्म का मकसद नहीं है। सबूत कहाँ से कैसे जुटाये गये जैसी रोमांचकता इसमें नहीं जोड़ी गई है लेकिन सबूत हैं और जब वे सबूत बोलते हैं तब उनके तर्क अकाट्य होते हैं। अदालती कार्यवाही के सबूत और जिरह लड़कियों को एक इंसान समझे जाने की वकालत करते हैं। उनकी इच्छा अनिच्छा को सामाजिक मान्यता दिलाने की जिरह करते हैं। उनको मूक कठपुतलियों से बढ़कर एक इंसान समझा जाना ही अभी जद्दोजहद का विषय है। 
फिल्म के बारे में बात करते हुए शुजीत सरकार ने बताया कि उनकी पत्नी ने एक बार उनसे कहा कितना अजीब है ना कि आजादी के सत्तर वर्षों बाद भी हमें स्त्री सशक्तिकरण की बात करना पड़ रही है। ये स्टेटमेंट अपने आप में बहुत बड़ा प्रश्न खड़ा करता है। 
फिल्म का क्लाइमेक्स अमिताभ बच्चन के झकझोरने वाले स्टेटमेंट से होता है जब वे कहते है की NO एक शब्द नहीं एक पूरा वाक्य है और इसे इसी तरह समझा जाना चाहिये। नो मतलब सिर्फ नहीं होता है और कुछ नहीं फिर वह नहीं कोई लड़की कहे बेटी बहन सेक्सवर्कर या फिर पत्नी कहे इसका मतलब सिर्फ नहीं होता है। 
लड़कों की परवरिश में इस NO शब्द का इस्तेमाल बहुधा नहीं होता। उनकी इच्छा अनिच्छा जरूरते सबके लिये हाँ ही होती है। किसी बात के लिए ना होती भी है तो वह क्षीण प्रतिरोध होता है जिसे आसानी से हाँ में बदलवा लिया जाता है। इसीलिए लड़कियों की ना को भी हाँ समझना या उसे बलपूर्वक हाँ में बदलवा लेना आम मानसिकता होती है। परिवार की मानसिकता भी यही होती है। ये फिल्म लड़कियों को एक इंसान के रूप में देखे जाने की पुरजोर कोशिश करती है। उन्हें उनकी जिंदगी उनके तरीके से जीने के स्पेस देने की मांग करती है उन पर अपने विचार अपने बनाये टैग ना लगाए जाने की  गुजारिश करती है। 
फिल्म बना लेना उसे लोगों तक पहुँचाना और दिखाना एक बात हो सकती है लेकिन लोग अभी भी अपनी पूर्वाग्रह ग्रस्त मानसिकता के साथ ही फिल्म देख रहे हैं। मेरे पास कई महिलाओं के स्टेटमेंट आये की कुछ भी हो लड़कियों का शराब पीना देर रात तक बाहर रहना उनकी सुरक्षा के लिए ठीक नहीं है अंत में नुकसान तो उन्ही को होता है। 
इस बारे में मेरा कहना है जिस तरह लड़के शराब पिए या डांस करें देर रात तक बाहर रहे उन्हें ये डर नहीं रहता कि उनकी मर्जी के खिलाफ उनके साथ कुछ गलत होगा। यही माहौल लड़कियों को क्यों नहीं दिया जाता सकता ? मैं शराब पीने की वकालत नहीं कर रही पर कोई लड़की कब तक बाहर रहेगी कहाँ जाएगी कब आएगी ये सब उसकी मर्जी होना चाहिये और उसे एक सुरक्षित माहौल मिलना चाहिये जैसे बेफिक्र लड़के रहते हैं वैसे ही उन्हें भी बेफिक्री हो कि वे सुरक्षित हैं। युवा लड़कों को इसी बात ने बहुत ज्यादा प्रभावित भी किया है। समानता का यह अर्थ अभी तक ठीक से सामने आया ही नहीं था। 
फिल्म के एक सीन में तापसी पन्नू कहती हैं बहुत बुरा लगता है घिन आती है जब कोई आपको आपकी इच्छा के खिलाफ छूता है। हमारे यहाँ लड़कियाँ महिलायें आये दिन इस बुरे स्पर्श से जूझती हैं। कोई लड़की एक या अधिक बार अपनी मर्जी से संबंध बना चुकी हो तब भी एक और बार उसकी मर्जी के खिलाफ उसे छूने का हक़ किसी को नहीं है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता की इस मानसिकता को बदलने की बहुत बड़ी जरूरत है और इस सीन ने शायद लड़कों में भी उस जबरजस्ती के स्पर्श के प्रति जुगुप्सा पैदा की होगी ऐसा मेरा मनना है। 
फिल्म देखते समय आसपास कई लड़के थे लेकिन हाल में कहीं कोई कमेंट नहीं हुआ कोई सीटी नहीं बजी। विषय की गंभीरता ने सभी को अवाक् कर रखा था। 
कई लोगों ने मुझे बताया कि वे इस फिल्म की चर्चा से इतने प्रभावित हुए हैं कि अपने बेटों को यह फिल्म दिखाना चाहते हैं। यह बेहद अच्छी सोच है और नयी पीढ़ी की सोच विकसित करके ही बदलाव लाया जा सकता है। 
फिल्म का एक गीत 
जीने दे जीने दे मुझे 
यार हट जा जरा 
देख ले मैं हूँ यहाँ 
मेरी जिंदगी है ये मेरा जहाँ 
तू समझे यहाँ तू ही है बादशाह 
जीने दे मुझे तू जीने दे 
जिंदगी का जाम तू पीने दे 
जैसे भी हूँ मुझको तू रहने दे 
दिल में जो है वो मुझे कहने दे  
कविता वर्मा 

Monday, September 19, 2016

'आइना सच नहीं बोलता'

मातृभारती मातृभारती पर प्रकाशित हो रहे धारावाहिक उपन्यास 'आइना सच नहीं बोलता' की इस पहली और दूसरी कड़ी की लेखिका हैं नीलिमा शर्मा और कविता वर्मा... नंदिनी की इस कहानी को पढ़िए और सुझावों व् प्रतिक्रियाओं से अवगत कराइये..


http://matrubharti.com/book/6191/ 


http://matrubharti.com/book/6337/

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Monday, September 12, 2016

हँसते हँसते कट जायें रस्ते भाग 1


रोजमर्रा की जिंदगी में कितनी ही बातें ऐसी होती हैं जिन्हें जब याद करो हंसी फूट पड़ती है। ये छोटी छोटी बातें घटनायें हमें जीने की ऊर्जा देती हैं। कुछ घटनायें गहरी तसल्ली दे जाती हैं कुछ खुद की पीठ थपथपाने का मौका। ऐसी ही घटनाओं को कलमबद्ध करने का मन आज हो आया। आप भी पढिये और मुस्कुराइये। 

सिटी बस से सफर करना हमेशा ही रोमांचक होता है और अगर आसपास एक दो सहयात्री भी मजेदार या नोटंकीबाज मिल जाएँ तो फिर कहना ही क्या। बेटी रोज़ सिटी बस से कॉलेज जाती है कभी बैठने की जगह मिल जाती है कभी नहीं। कभी कभी बीच के स्टॉप पर कोई उतरने वाला होता है तो आसपास वालों में उस सीट को हथियाने की होड़ लग जाती है। अब सफर रोज़ का ही है इसलिए बिना वजह की सदाशयता भी कोई नहीं दिखाता सब अपने में मगन अपने लिए थोड़ी सी जगह और सुकून जुटाने भर की चिंता करते हैं। एक दिन एक लड़की दो सीट के बीच की जगह में खड़ी थी। सीट पर बैठी लड़की अगले स्टॉप पर उतरने वाली थी। एक स्टॉप पहले एक महिला चढ़ीं और उस सीट से थोड़ी दूर खड़ी थीं। जैसे ही स्टॉप आया वह लड़की उठी तो उन महिला ने अपना पर्स खाली हुई सीट पर फेंक दिया क्योंकि वहाँ तक तुरंत पहुँचना मुश्किल था बस में काफी भीड़ थी। वह लड़की जो सीटों के बीच में खड़ी थी उसने उनका पर्स उठा कर उन्ही की ओर बढ़ाया और कहा आंटी शायद आपका पर्स गिर गया है और खुद उस सीट पर बैठ गई। 

एक और वाकया हुआ एक आंटी और उनकी मम्मी हाय हाय करते भीड़ भरी बस में चढ़ीं। आंटी जोर जोर बोल रहीं थी हाय मेरे पैर में चोट लगी है देखो संभल कर बहुत दर्द हो रहा है। माँ बेटी दोनों माहौल बनाती रहीं कि शायद कोई उन्हें बैठने की जगह दे दे लेकिन सब अपने में मगन थे।  फिर उन्होंने एक एक से पूछना शुरू कहाँ उतरोगे। आखिर तंग आकर एक लड़की खड़ी हो गई कहते हुए कि आंटी आप बैठ जाइये और सीट खाली होते ही उनकी मम्मी सीट पर बैठ गई। 

छुट्टे पैसे ना होने पर टॉफियाँ तो हम सभी को कभी ना कभी मिली होंगी। कभी हंस के तो कभी मुँह बनाते हम उन्हें रख ही लेते हैं और करें भी क्या दुकानदार तो अकड़ के खड़ा हो जाता है कि छुट्टे दो जैसे छुट्टे ना होने पर भी सामान लेने आकर हमने कोई गुनाह कर दिया हो। 
एक बार मोबाइल का रेट कटिंग वॉउचर लेने गई जो अड़तीस रुपये का था और खुल्ले थे सिर्फ छत्तीस रुपये। एक हाथ में खुल्ले पैसे पकडे दूसरे हाथ से सौ का नोट आगे बढ़ा दिया। दुकानदार बोला छुट्टे दीजिये मैंने कहा सिर्फ छत्तीस रुपये हैं चलेंगे। वह असमंजस में पड़ गया क्या करे वह दुकान में नोकर था। उसे असमंजस में देख कर मैंने कहा दो रुपये की टॉफी दे दूँ और दो टॉफी निकाल कर काउंटर पर रख दी। दुकान का मालिक वहीँ बैठा था वह बोला तो कुछ नहीं पर उसे इतनी हंसी आई की क्या कहें। पहली बार कोई उसकी टोपी उसी के सिर पहना गया। 

ऐसे ही एक बार रेस्टॉरेंट में खाने के बाद बिल चुकाया तो दस के नोट की जगह दस टॉफी देख दिमाग ख़राब हो गया। वेटर को टिप भी देनी थी तो उन दस टॉफी के साथ दो नोट और मिलाये और वेटर से कहा इसके बदले काउंटर से पैसे ले लेना। अभी राजस्थान टूर पर पांच के सिक्के की जगह मिंट की छोटी डिब्बी मिली किसी एपल मिंट फ्लेवर की जो हमें पसंद नहीं था। बिटिया उसे लेकर काउंटर पर गई और बोली इसकी जगह मिंट पुदीना फ्लेवर दे दो। दुकानदार ने बदल कर दे दिया। तब मैंने उससे कहा ऐसा लग रहा है जैसे तुम कोई फटा नोट बदलवा कर ले आई हो। 
कविता वर्मा 

Tuesday, August 9, 2016

कौन कहता है आंदोलन सफल नहीं होते ?


बात तो बचपन की ही है पर बचपन की उस दीवानगी की भी जिस की याद आते ही मुस्कान आ जाती है। ये तो याद नहीं उस ज़माने में फिल्मों का शौक कैसे और कब लगा जबकि उस समय टीवी नहीं हुआ करते थे। उस पर भी अमिताभ बच्चन के लिए दीवानगी। मुझे लगता है इसके लिए वह टेप रिकॉर्डर जिम्मेदार है। थोड़ा अजीब है अमिताभ बच्चन और फिल्मो की दीवानगी के लिए टेप रिकॉर्डर जिम्मेदार पर है तो है। 
बात है सन 79 की है तलवार तीर कमान ले कर कोई  क्रांति नहीं हुई थी पर क्रांति तो हुई थी। झाबुआ जिले के उस छोटे गाँव में रेडियो भी नहीं चलता था तब पापाजी ने टू इन वन खरीदा था और अपने मनपसंद गानों की लिस्ट बना कर कुछ कैसेट रिकॉर्ड करवा ली थीं। उन्हीं में से एक कैसेट में मिस्टर नटवरलाल का गाना था शेर की कहानी वाला।  जिसे पापा रोज़ सुबह से लगा कर हम बच्चों को जगाया करते थे। तो ये पहला परिचय था हमारा अमिताभ बच्चन से उनकी आवाज़ के मार्फ़त। जब वे कहते थे 'लरजता था कोयल की भी कूक से बुरा हाल था उसपे भूख से ' और 'ये जीना भी कोई जीना है लल्लू ' और तभी से वे हमारे मनपसंद हीरो थे। फेवरेट उस ज़माने में ईजाद नहीं हुआ था। 

जब हम लोग इंदौर आये तब कभी कभार टाकीज में फिल्म देखने लगे। अमिताभ बच्चन की पहली फिल्म कौन सी देखी ये तो याद नहीं पर उससे उनके हमारे दिलो दिमाग पर छाये जादू पर कोई फर्क नहीं पड़ा। उसी समय उनकी एक फिल्म आई लावारिस। 

हमारा बड़ा मन था लावारिस देखने का जिस आवाज़ को कैसेट में सुनते आये थे उसे बड़े परदे पर अपने सामने सुनने का। सुना था उसमे भी एक गाना अमिताभ बच्चन की आवाज़ में है और वो गाना रोज़ रेडियो पर सुनते थे। स्कूल में कुछ दोस्त देख चुके थे जिसकी जानकारी दोनों भाई देते रहते थे। उससे उनकी दीवानगी में इजाफा ही हुआ था। हमने पापाजी से कहा हमें लावारिस फिल्म देखना है। सुनते ही उन्होंने कहा लावारिस ये कैसा नाम है ? बेकार होगी वो फिल्म कोई अच्छी फिल्म आएगी तब दिखाएंगे। अब क्या कहते थोड़ी बहुत पैरवी की इस दोस्त ने देखी है उसने बताया है पर पापाजी को तो नाम ही पसंद नहीं आया था इसलिए साफ़ इंकार हो गया। 
फिल्म लगे काफी दिन हो गये थे जल्दी ही वह उतरने वाली थी।  एक दिन दोनों भाइयों ने सलाह की हम भूख हड़ताल करते हैं। थोड़ा मुश्किल था लेकिन फिल्म तो मुझे भी देखना थी।  अब भूख हड़ताल कोई चुपचाप तो की नहीं जाती तो बाकायदा टोपी बनाई गई तख्तियाँ बनीं उन पर भूख हड़ताल लिखा गया और पापाजी के आने से पहले हम तीनों भाई बहन बाहर वाले कमरे में पलंग पर बैठ गए। 

जब पापाजी आये छोटे भाई ने नारे लगाये जिसमे हमने साथ दिया 'पापाजी की तानाशाही नहीं चलेगी नहीं चलेगी। ' पापाजी ने एक नज़र हम सब पर डाली और अंदर चले गये मम्मी से पूछा क्या माजरा है उन्होंने बता दिया लावारिस फिल्म देखना है। उन्होंने हमसे कुछ नहीं कहा मुँह हाथ धो कर खाना खाया तब तक हम बीच बीच में चुपके से अंदर झांकते रहे पर वहाँ कोई असर होता दिख नहीं रहा था। क्रांतिकारियों के हौसले पस्त होते जा रहे थे। पेट के चूहों ने उम्मीदों को कुतर दिया था। दो चार नारे और लगे फिर हम इशारों में बातें करके अगले कदम के बारे में विचार करने लगे थे। हमने तो इतनी तैयारीं की थी और हमें अपने आंदोलन की सफलता पर पूरा यकीन था पर हाय री किस्मत। ऐसा पता होता तो कोई अगला कदम सोच कर रखते। खैर थोड़ी देर में अंदर से पापाजी की आवाज़ आई कविता प्रवीण योगेश चलो खाना खा लो और थोड़े बुझे मन से ही सही हमें अपना अगला कदम मिल गया जो किचन की ओर बढ़ रहा था। 

भरे पेट और उम्मीद से खाली हम अपने बिस्तरों पर पड़ गये। 'बुदबुदाते हुए 'ये जीना भी कोई जीना है लल्लू '
फिल्म कल उतर जायेगी आज बुधवार है उस दिन हम ये सोच कर ही स्कूल गए थे। महीना जुलाई का था या अगस्त का ये तो याद नहीं पर उस दिन मूसलधार बारिश हो रही थी। हम स्कूल से वापस आये तो देखा पापाजी घर पर हैं। पापाजी आज आप जल्दी घर आ गये ? 
क्यों हम जल्दी घर नहीं आ सकते क्या ? जल्दी से कुछ खा पी लो और तैयार हो जाओ। 
कहाँ जाना है ? 
कहा न तैयार हो जाओ। 
इशारे से मम्मी से पूछा तो पता चला फिल्म देखने छह से नौ वाले शो में।  फिर क्या था जल्दी जल्दी सब तैयार हो गए पर बारिश इतनी तेज़ थी कि मोटर साइकिल से तो जा नहीं सकते थे। तय हुआ छाता ले कर चौराहे तक जायेंगे वहाँ से ऑटो ले लेंगे। आज तो सब में राजी थे। तेज़ हवा का पानी था कुछ पैदल जाते भीगे कुछ ऑटो में। जब पहुंचे पहला गाना बस ख़त्म ही हुआ था लेकिन अमिताभ बच्चन की एंट्री हमारी एंट्री के बाद ही हुई। टाकीज में पापाजी ने गरमा गर्म कचोरियाँ खिलाई कि ठण्ड ना लगे पर हम तो फिल्म में ऐसे डूबे थे कि काँपते हुए भी परदे से नज़र नहीं हट रही थी। अंदर अमिताभ बच्चन के घूंसे चल रहे थे बाहर जोर शोर से बारिश लौटते में रात नौ बजे सड़के सुनसान हो गई थीं।  दूंढने पर भी ऑटो नहीं मिला तो हमने मार्च पास्ट शुरू किया आखिर को आंदोलन की सफलता के बाद परेड सलामी तो बनती ही है ना। 

(कौन बनेगा करोड़पति के लिए कुछ फोन मैंने भी किये थे पर करोड़ों रुपये जीतने से ज्यादा चाव तो ये किस्सा खुद अमिताभ बच्चन को सुनाने का था। अब जब लग रहा है कोई मौका नहीं बचा तो सोचा लिख ही डालूँ इस किस्से को।)
कविता वर्मा 

Tuesday, July 5, 2016

विवेक पूर्ण उपयोग जरूरी है

विवेक पूर्ण उपयोग जरूरी है
सोशल नेटवर्क ने जिस तरह लोगों को जोड़ा है उन्हें मनोरंजन और जरूरी सूचनाओ से अवगत कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है वह न अनदेखी की जा सकती है न ही उसके महत्व को अस्वीकार किया जा सकता है।  फोन और फिर मोबाइल ने भी लोगों को जोड़ा लेकिन उसके साथ बड़े भारी बिल की चिंता भी जुडी रहती थी। लेकिन व्हाट्स एप ने इस चिंता को काफी हद तक कम किया है। लोग अपने परिवार के सदस्यों सहेलियों दोस्तों के ग्रुप बना कर आपसी बातें शेयर करते हैं जो सभी के बीच होती हैं। एकदम ड्राइंग रूम में बैठ कर होने वाली चर्चाओ जैसी बातें हंसी मजाक चुटकुले सभी कुछ तो होता है यहाँ। दोस्तों के ग्रुप में सूचनाओ का आदान प्रदान आसानी से होने लगा है तो स्टूडेंट्स अपने जरूरी डिस्कशन भी यहाँ कर लेते है आने जाने में टाइम बर्बाद किये बिना तो प्रोफेशनल्स अपनी कामकाजी उलझनें उपलब्धियाँ। साहित्य जगत में ब्लॉग के बाद व्हाट्स एप साहित्यिक गतिविधियों के लिए एक नया साइट बन गया है जिसमे साहित्यिक सामग्री पर लाइव चर्चा संभव हुई है। 
तकनीकि जब कुछ सुविधा देती है तो उस सुविधा के साथ कुछ सावधानियाँ रखने की जरूरत भी होती है। ये विडम्बना ही है कि हमारे यहाँ का प्रबुद्ध वर्ग भी ऐसी सावधानियों की ओर से बिलकुल लापरवाह होता है। 
मीना ने सहेलियों के ग्रुप पर आया सांप्रदायिक भड़काऊ मैसेज अपने फैमिली ग्रुप पर डाल दिया बिना ये सोचे की परिवार की बातों में ऐसे सांप्रदायिक मैसेज का क्या काम है? उस ग्रुप में बच्चे भी जुड़े थे उन्होंने भी उस मैसेज को बिना ठीक से पढ़े समझे अपने दोस्तों के ग्रुप पर फॉरवर्ड कर दिया। इसका क्या अौचित्य है ये जानने की या बताने की किसी ने जरूरत ही नहीं समझी। बस सब एक गलत सन्देश के वाहक बनते चले गए। किसी ने अपनी सामाजिक जिम्मेदारी के बारे में नहीं सोचा। 
राधा के पास किसी लड़की के किडनैप होने का मैसेज आया उसने बिना सोचे समझे उसे अपनी सहेलियों के ग्रुप पर भेज दिया।  उसमे एक फोन नंबर भी दिया गया था। अब नंबर सच था या गलत लड़की को सही में किडनैप किया गया था या उसे बदनाम करने की कोई साजिश थी ये जानने की किसी ने जहमत नहीं उठाई। अगर वह सन्देश गलत था तो उस सन्देश और फोन नंबर की वजह से उस परिवार को कितनी मानसिक तकलीफ उठानी पड़ी होगी। अगर किसी का अपहरण हुआ है तो वह यूं खुले आम सड़कों पर तो नहीं घूम रहा होगा की किसी की नज़रों में आ जाये और पुलिस को खबर हो जाये। 
विनीता के पास एक मैसेज आया दूर किसी शहर में किसी को किसी खास ग्रुप के ब्लड की जरूरत है उसने उस मैसेज को अपने शहर की सहेलियों के ग्रुप पर डाल दिया बिना ये सोचे की यहाँ बैठ कर कोई कैसे इतनी दूर अस्पताल में पड़े व्यक्ति की मदद कर पायेगा? बस वह मैसेज ऐसे ही एक ग्रुप से दूसरे ग्रुप तक घूमता रहा बिना किसी विचार या ठोस कार्यवाही के।  
धार्मिक राजनैतिक अन्धविश्वास युक्त मैसेज यहाँ तेज़ी से फैलते हैं जिसमे खुद की कोई खास विचारधारा नहीं होती बस हमारे पास आये हैं इसलिए हमें इन्हे आगे भेजना है यही सोच होती है। कई सन्देश तो इस धमकी के साथ आते हैं कि अगर इसे आगे नहीं भेजा तो आपका कोई अहित होगा। क्या हम मन से इतने कमजोर हैं कि कोई सन्देश हमारा हिट अहित कर सके ? लेकिन बस एक सोच रहती है भेज दो भेजने में क्या जाता है ? ऐसी चीज़े धीरे धीरे हमें धर्म भीरु दब्बू बनाती हैं। 
दुःख और अचरज तो तब होता है जब महिलाओ पर बने जोक्स सबसे ज्यादा महिलाये ही एक दूसरे को भेजती हैं। चलिए हँसने के लिए इन्हे भेजा जाता है और कोई इन्हे गंभीरता से नहीं लेता वहाँ तक तो ठीक है लेकिन कई सन्देश तो इतने अपमान जनक होते हैं कि उन्हें पढ़ कर भेजने वाले की अक्ल पर तरस आता है। 
कभी सोचा है कि क्या आपके ग्रुप के सभी मेंबर्स इन्हे पढ़ते भी हैं ? कभी ध्यान दीजिये एक ही ग्रुप पर एक ही मैसेज कई कई बार भेजा जाता है। किसी ने भेजा आपने नहीं पढ़ा आपने भेजा किसी और ने नहीं पढ़ा लेकिन फिर भी मोबाइल हमेशा हाथ में होता है हर दो मिनिट में चेक किया जाता है कोई नया मैसेज आया क्या ? 
एक और ट्रेंड है सुबह होते ही गुड मॉर्निंग करते फोटो भेजने का  अगर आप दो चार ग्रुप के मेंबर हैं तो समझ लीजिये सुबह सुबह आपके मोबाइल में ४० / ५० फोटो आ जायेंगे अब जब भी फुर्सत मिले उन्हें डाउन लोड करिये फिर डिलीट करिये बिना हिसाब लगाये की इसमे आपका कितना समय और नेट वाउचर का पैसा जाया होता चला जाता है। घर के लोगों के साथ सुबह बिना गुड मॉर्निंग बोले हो सकती है लेकिन समूह पर आप नज़र अंदाज हो जाएगी अगर आपने फूलों के गुलदस्ते या राधा कृष्ण साईं बाबा के फोटो नहीं भेजे। 
धार्मिक फोटो से साथ ही कर्मकांड फ़ैलाने का काम भी इन दिनों खूब हो रहा है। साईं बाबा का दुग्ध स्नान करता फोटो लाखों चूड़ियों से सुसज्जित देवी का चित्र और ऐसे ही कई। समझ नहीं आता जिन साईं बाबा ने फकीरी में जीवन जिया वे इस तरह दूध स्नान से कैसे प्रसन्न होंगे। लेकिन उनके भक्तों के पास इतना सोचने का समय ही कहाँ है वे तो बस अंध श्रद्धा वश फोट मैसेज आगे बढ़ाते जा रहे हैं। 
किसी सोशल या पर्सनल इवेंट के समय तो पढ़े लिखे प्रबुद्ध कहे जाने वाले लोग भी ऐसे मैसेज भेजते हैं कि उनके पढ़े लिखे होने पर शक होने लगता है। फिर चाहे विराट कोहली के आउट होने पर अनुष्का को पनौती कहने वाले मैसेज हों या शाहिद की शादी कम उम्र मीरा से होने और इसे करीना से बदला करार देने वाले मैसेज हों लोगों के दिमागी दिवालियेपन पर अफ़सोस होता है और ऐसे सन्देश ऐसी पढ़ी लिखी महिलाये भी आगे बढाती हैं जो स्वयं को सामाजिक सरोकारों की पुरोधा समझती हैं। 
नेपाल में भूकंप के दौरान वहाँ के कई फोटो तेज़ी से फैले जिनमे कई वहाँ बिखरी लाशों के बिलखते औरतों और बच्चों के थे तो कई संदेश अगले भूकंप के झटकों के बारे में। जबकि भूकंप की पूर्व चेतावनी नहीं की जा सकती है।  ऐसे संदेशों से वहाँ फंसे लोगों में बेवजह घबराहट फैली खाने पीने की  वस्तुओं के दाम अचानक कई गुना बढ़ गए और संदेश करने वाले अपने इस असामाजिक कृत्य से बेपरवाह ही रहे। 

 इस माध्यम से जानकारी युक्त सन्देश भी भेजे जाते हैं लेकिन उन संदेशों की प्रमाणिकता की जाँच कोई नहीं करता।  आयुर्वेदिक नुस्खों की तो भरमार है यहाँ। आप किसी तकलीफ का जिक्र भर करिये और देखिये फटा फट दो चार उपाय बता दिए जायेंगे। इन पर विश्वास उतना ही होता है जितना ये उपाय बताने वाले पर आपका विश्वास है। उपाय काम कर गया तो ठीक नहीं किया तो कौन सा आपने फीस दी है बल्कि कुछ समय बाद तो ये भी भूल जायेंगे कि ये उपाय बताया किसने था आखिर तो ग्रुप में बहुत सारे लोग हैं। 

हाँ जो लोग नए नए इस माध्यम से जुड़ते हैं उन्हें तो आने वाले हर सन्देश नए लगते हैं उनकी सक्रियता से तो डर ही लगता है। मजे की बात ये है कि कई सन्देश इस टैग लाइन के साथ होते हैं कि मार्केट में नया है जल्दी आगे भेजो। ये एक तरह का मानसिक प्रभाव पैदा करता है खुद की पीठ थपथपाने को प्रोत्साहित करता है कि हमने इतना बढ़िया मैसेज सबसे पहले भेजा और फिर बार बार चेक करते हैं कि कितने लोगों ने इसे पढ़ा या इस पर वाह वाह की कितनी तालियाँ बजीं और कितने लाइक्स आये। देखा जाये तो ये बाजार वाद में आपको पूरी तरह जकड़ने का तरीका होता है जिसमे आप फंसते जाते हैं। अपना बहुमूल्य समय इस पर जाया करते हैं और अपने जरूरी काम या शौक का समय इस पर बर्बाद कर बैठते हैं और इन सबका अफ़सोस हावी होता जाता है। 
ऐसा नहीं है कि इसे बिलकुल बंद ही कर दिया जाना चाहिये। आपा धापी की इस जिंदगी में दोस्तों घर परिवार वालों के संपर्क में रहने का ये बहुत अच्छा साधन है बस जरूरत है इसके सदुपयोग की। 
* अपने व्हाट्स ऍप के समय को समूह के सभी साथियों की सहमति से सीमित करिये।  तय करिये ऐसा समय जब अधिकतर लोग फुर्सत में हो कर इस पर बात कर सकें। बाकि समय या तो इसे बंद करिये या अपने मन को कड़ा करिये कि आप बार बार मैसेज चेक नहीं करेंगी। 
* समूह में सबकी रूचि किस मे है ये तय करिये फोटो विडिओ चुटकुले या आपसी बातचीत उसके अनुसार समय सारिणी बनाइये। हफ्ते में एक दिन निश्चित समय पर सब चैट करेंगे ऐसा कुछ तय करिये ताकि आप अपनों से जुड़े रह सकें उनके हालचाल पता हों। 
* अपने समूह के नियम बनाइये जिसमे अश्लील सांप्रदायिक सामग्री महिलाओं के बारे में फूहड़ जोक्स जैसी सामग्री शेयर ना की जाये।  परिवार और दोस्तों के मन में महिलाओं के प्रति सम्मान भाव पैदा करना हम महिलाओं की ही जिम्मेदारी है। 
* व्यक्ति विशेष को निशाना बना कर होने वाली टिप्पणियों से बचिये।  
* सुनिश्चित करिये हफ्ते में कम से कम एक दिन कुछ रोचक ज्ञानवर्धक सामग्री साझा की जाएगी जिससे सभी लाभान्वित होंगे। उस पर चर्चा की जा सकती है। 

तकनीकि एक सुविधा हमें प्रदान करती है लेकिन उस सुविधा का विवेक पूर्ण उपयोग हमें ही सुनिश्चित करना है। 
व्हाट्स एप पर किसी भी तरह के धार्मिक राजनैतिक सामाजिक व्यवस्था को आहत करने वाले संदेश गंदे चित्र या वीडियो नहीं पोस्ट करें। 
किसी वर्ग संप्रदाय भौगोलिक क्षेत्र विशेष से संबंधित किसी भी प्रकार के भड़काऊ बहकाने वाले संदेश पोस्ट ना करें।  

क्या आप जानते हैं व्हाट्स एप विश्व की कुछ सबसे बड़ी कंपनियों में से एक है। 
व्हाट्स एप की कीमत जमैका , आइसलैंड उत्तरी कोरिया की जी डी पी से ज्यादा है। 
लगभग पचास करोड़ लोग व्हाट्स एप का उपयोग करते हैं। 
व्हाट्स एप में लगभग 55 कर्मचारी हैं जो सभी अरबपति हैं। 
हर रोज़ लगभग दस लाख लोग इससे जुड़ते हैं। 
लगभग पाँच करोड़ फोटो इस पर शेयर किये जाते हैं। 
इस कंपनी की कीमत नासा के साल भर के बजट जो लगभग १७ अरब डॉलर है उससे ज्यादा है। 

इस सबमे हम आप बिना सोचे समझे अपना समय और पैसा लगा रहे हैं जो हमारे किसी काम नहीं आ रहा है।  ये पैसा बाहर जा रहा है टेलीकॉम कम्पियों की जेब में जा रहा है और हम खुश हैं कि हम कितने सक्रिय हैं।  जरा रुकिए और सोचिये ये कितना जायज है।  

कविता वर्मा 

Tuesday, June 7, 2016

एक सार्थक दिन


समाज सेवा प्रकोष्ठ का तीन दिवसीय बाल व्यक्तित्व विकास शिविर देवास जिले के गंधर्व पुरी में लगा। आज दूसरा दिन था और मुझे बच्चों को कहानियों के माध्यम से साहित्य और शिक्षा से जोड़ना था। सुबह लगभग आठ बजे हम इंदौर से चले। गाँव की ही एक अधबनी धर्मशाला में शिविर लग रहा था। साफ सुथरी बिसात बिछी थी पंखे चल रहे थे जो गर्मी से राहत देने की भरसक कोशिश में लगे थे। 
इसके पहले एक शिविर में मैंने कहानियाँ सुनाई थीं पर वहाँ छोटे बच्चे थे यहाँ सभी उम्र के बच्चे थे आठ नौ साल से लेकर सत्रह अठारह साल तक के।  स्वाभाविक है अब कंटेंट में बदलाव करना जरूरी था।  कुछ देर बच्चों की गतिविधियों को देखते मैंने एक दिशा निर्धारित की। 





सामान्य बात चीत से शुरू हुई गोष्ठी बच्चों के ज्ञान पढ़ने की आदत और इंटरनेट के उपयोग तक पहुंची। इंटरनेट पर उपलब्ध ज्ञान और कथा कहानियों में उपलब्ध ज्ञान के अंतर को बताते हुए कहानियों के माध्यम से व्यक्तित्व निर्माण सोच और नज़रिए का विकास भाषा बोली का विकास जैसी बातें बच्चों को बताई। 
एक बात उभर कर आई कि ग्रामीण बच्चों में पढ़ने की आदत बिलकुल नहीं है ना ही उनके पास किताबें हैं और ना ही कोई प्रेरणा।  स्कूल में लाइब्रेरी है यह बात भी कई बच्चों को नहीं पता। जिन्हे पता है उन्होंने भी कभी वहाँ से पढ़ने के लिए पुस्तकें नहीं ली। अखबार पढ़ने की आदत भी बिलकुल नहीं है। हाँ कुछ बड़े बच्चे जो इंटरनेट का उपयोग करते हैं वे भी वहाँ से सिर्फ गाने डाउन लोड करते हैं या शायद कुछ ऐसी साइट्स देखते हैं जो वे बता नहीं सकते थे या व्हाट्स ऐप या फेस बुक चलाते हैं। यहाँ तक की बच्चों को नए फ़िल्मी गानों के अलावा पुराने फ़िल्मी या जनगीत भी नहीं पता। 

गाँव में हर घर पक्का है सड़के पक्की है बच्चों का रहन सहन पहरावा भी साफ सुथरा और व्यवस्थित दिखा।  ऊपरी तौर पर देखा जाए तो बहुत तरक्की दिखी लेकिन वैचारिक बौद्धिक तरक्की में कहीं बहुत पीछे छूट गए। ऐसा लगा कि इन बच्चों के साथ बैठ कर बेतकल्लुफी से बात करने की बहुत जरूरत है। कई ऐसी बाते हैं जिन्हे बताया जाना चाहिए कई ऐसे प्रश्न हैं जिन्हे सुलझाया जाना चाहिए। उनको दिशा देने की बहुत जरूरत है। 
एक और बात जो उभर कर आई बच्चे चाहे जिस भी उम्र के हों कहानियाँ बड़े ध्यान से सुनते हैं और उनमे निहित संदेशों को भी बखूबी समझ लेते हैं जो हम उन्हें देना चाहते हैं। गंधर्व पुरी एक ऐतिहासिक स्थल है यहाँ एक प्राचीन शिव मंदिर है। मंदिर से कई पुरानी मूर्तियाँ निकली हैं जिनमे से कई तो वहीं रखी हैं तो करीब ढाई तीन सौ मूर्तियाँ पुरातत्व विभाग के संग्रहालय में रखी हैं।  यहाँ घर बनाने के लिए नींव की खुदाई करने पर भी मूर्तियाँ निकलती हैं।  
चिलचिलाती धूप में 44 डिग्री टेम्प्रेचर में मंदिर संग्रहालय घूमकर रास्ते में भोजन करते हुए लगभग चार बजे घर पहुंचे। एक सार्थक दिन रहा जिसने बहुत कुछ सिखाया और बहुत कुछ सिखाने को प्रेरित किया।  
कविता वर्मा 

प्यार के दो बोल

 म.प्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन के दो दिवसीय कथा क्रमशः आयोजन में देवास जाना हुआ। आग्रह था इसलिए मैं वहीं रुक गई। रात में रुकने का इंतजाम एक ह...