Monday, November 7, 2016

जिंदगी भर कमाओ और मरने के लिये बचाओ

सिक्किम यात्रा (नाथुला पास ) 

 नाथुला पास वाले ट्रिप में तीन ही पॉइंट्स होते हैं छंगू लेक नाथुला पास और बाबा मंदिर।  अब वापसी का समय था। मौसम बहुत ठंडा हो गया था। सेना के कैंटीन की चाय समोसे जम चुके थे। ठंडी हवा हड्डियों को भी जमा चुकी थी।  दरअसल गंगटोक दिन में पहुँचे थे तब मौसम गरम था शाम को थोड़ी ठण्ड हो गई थी और हम उसी हिसाब से साधारण ठण्ड  के कपडे पहने थे जो अब और गरम रखने में असमर्थ साबित हो रहे थे। 
वापसी का सफर शुरू हो गया थोड़ी ही देर बाद गाड़ी फिर रुक गई चाय नाश्ते के लिये। हमारा पेट तो भरा ही था और ज्यादा चाय पीने की आदत नहीं है इसलिए हमने फिर कदमताल करने का विचार बना लिया। ड्राइवर को बताया और निकल पड़े। रास्ता उतार का था तो मेहनत भी नहीं करना पड़ रही थी और मज़ा भी आ रहा था। शहर में गाड़ियों की भीड़ से त्रस्त लोगों के लिए खाली साफ सुथरी सड़कें किसी वरदान से कम नहीं लगतीं। 
तभी एक गाड़ी पास आकर रुकी ड्राइवर ने कहा आगे मिलिट्री एरिया है वहाँ की फोटो ना खींचें। सच अभिभूत हो गई स्थानीय लोगों की अपनी सामाजिक जिम्मेदारी के प्रति सजगता देखकर। अगर यही सजगता हर प्रदेश में हर नागरिक में हो तो देश की आधी से ज्यादा समस्याएं खुद बखुद ख़त्म हो जाएँ। हमने भी अच्छे नागरिक होने की जिम्मेदारी समझी और कैमरा अंदर रख दिया। चलते चलते गर्मी आ गई थी और रुकने का मन ही नहीं हो रहा था कब डेढ़ दो किलोमीटर तय कर लिए पता ही नहीं चला जब हमारी गाड़ी आकर रुकी तो ड्राइवर ने पूछा बैठोगे या पैदल ही आ जाओगे ? मन तो वाकई नहीं था गाड़ी में बैठने का पर पचास किलोमीटर चलने की हिम्मत भी नहीं थी। 
रास्ते में फिर छंगू झील के पास से निकले पानी को बादलों ने ढँक लिया था। अब चढ़ाई शुरू हो गई और थोड़ी ही देर में हम बादलों के बीच से गुजर रहे थे। ट्रेकिंग की भाषा में इसे व्हाइट आउट होना कहते हैं जिसमे आप बादलों से इस तरह घिरे हों कि आगे पाँच दस किलोमीटर भी न दिखे। उस समय यही हाल था सड़क किस ओर मुड़ रही है यह भी नहीं दिख रहा था घाटी बादलों से भर गई थी लेकिन गाड़ी उसी रफ़्तार से चल रही थी। ये तो मानना पड़ेगा वहाँ ड्राइवर्स बेहद एक्सपर्ट हैं। बिना हॉर्न टेड़े मेढे संकरे रास्ते पर गाड़ी चलाना ओवरटेक करने साइड देने में नियमों का पालन करना। ये तो बाद में पता चला कि तय समय में मिलिट्री एरिया से बाहर नहीं आने पर ड्राइवर पर पाँच हजार का जुर्माना होता है। 
थोड़ा और नीचे उतर आये थे व्हाइट आउट ख़त्म हो गया अब आपस में बातें शुरू हुई। चार अलग अलग प्रदेशों से आये दस लोग अब एक मित्र मंडली से हो गए थे। 
मैंने ड्राइवर रुस्तम खवासी से पूछा इस रास्ते पर कभी कोई हादसा हुआ है जैसे गाड़ियों की टक्कर या कोई गाड़ी खाई में गिरी हो ? 
ऐसा तो कुछ नहीं हुआ लेकिन 2011 की बात है मैं टूरिस्ट लेकर नाथुला पास आया था आठ टूरिस्ट को लेकर आया था वो साउथ के थे उन्हें मेरी भाषा समझ नहीं आती थी। कुछ कुछ समझते थे तो मानते नहीं थे। घूमने आये हैं तो पूरा पैसा वसूल कर लें। 
उस दिन मौसम अजीब हो चला था बाबा मंदिर पर मैंने कहा जल्दी करो वो नहीं माने। रास्ते में गाड़ी के सामने चट्टान गिरी पीछे देखा तो पीछे भी चट्टान गिरी थी गाड़ी बीच में फंस गई। थोड़ी देर में अंधेरा हो गया गंगटोक शहर की लाइट बंद थी। न कोई आर्मी का ट्रक न जवान कुछ समझ नहीं आया क्या हुआ। सारी रात गाड़ी में बैठे रहे टूरिस्ट रोते रहे। सुबह सात बजे सबको गाड़ी से निकाला चारों तरफ पहाड़ गिरे हुए थे रास्ते बंद थे। पैदल चलना शुरू किया और शाम को सात बजे सभी के साथ गंगटोक पहुंचे तब पता चला भूकंप आया है और बहुत लोग मारे गये हैं। 2011 के उस भूकंप के निशान बाद में भी सिक्किम में कई जगह देखने को मिले। 
पहाड़ों पर कई जगह रंगबिरंगी झंडियाँ लगी थीं जो बौद्ध मतावलंबी लगाते हैं। इन झंडियों पर मंत्र लिखे होते हैं और मान्यता है कि जब ये हवा से लहराते है मंत्र भी हवा की लहरों पर सवार हो दूर दूर तक पहुँचते हैं। एक पहाड़ पर एक कतार में सफ़ेद झंडे लगे थे। पता चला जब किसी की मृत्यु हो जाती है उसके नाम पर उसके परिवार वाले 108 सफ़ेद झड़े लगाते हैं इन पर भी मंत्र लिखे होते हैं और ये मृत आत्मा की शांति के लिये हैं। रंगीन झंडियां घर की शांति के लिए लगाई जाती हैं। मैंने पूछा बौद्ध धर्म में मृतक का अंतिम संस्कार कैसे होता है ? दाह संस्कार ही होता है पर बौद्ध धर्म में मरना बहुत मंहगा होता है। मरने के समय के अनुसार साइत देखी जाती है उसके अनुसार निर्णय होता है कि संस्कार कितने दिन बाद होगा। तीन पांच सात ग्यारह दिन बाद या कभी कभी कभी तो महीने भर बाद। तब तक शव घर में रहता है और बौद्ध भिक्षु को रोज़ बुलाकर मंत्र पाठ करवाया जाता है। दो से पाँच सात भिक्षु रोज़ आते हैं एक भिक्षु का एक दिन का खर्च दो से पांच हजार तक होता है। बौद्ध धर्म में मरने का खर्च बहुत होता है। मैंने कहा इसका मतलब है जिंदगी भर कमाओ और अपने मरने के लिये जमा करो। 
हाँ शादी का खर्च ज्यादा नहीं होता। शादी घर में या मोनेस्ट्री में हो जाती है। कोई जब तक साथ रहना चाहे ठीक है नहीं तो अपना साथी बदल ले या अलग हो जाये। 
दिसंबर में सिक्किम में बौद्ध उत्सव होता है जिसमे याक का गोश्त और वहाँ के अन्य व्यंजन बनते हैं। स्थानीय रहवासी हिंदी इंग्लिश बंगाली भूटिया भाषा बोलते और समझते हैं। 
एक बड़ी दिलचस्प चीज़ हर गाड़ी में देखी। गाड़ी के डेश बोर्ड पर बौद्ध हनुमान शंकर या किसी अन्य देवी देवता की मूर्ती हो उसमे एक या दो नोट (रुपये ) फंसा कर रखते हैं शायद मान्यता हो रूपया रूपये को खींचता है। खैर मैंने पूछा नहीं कभी कभी आस्थाओं की व्याख्या ना करना ना पूछना ही ठीक होता है। 
शाम साढ़े पाँच तक हम लोग गंगटोक वापस पहुँच गये थे। इतने जल्दी होटल जा कर भी क्या करते तो टहलते हुए एम जी रोड चले गये। नाथुला पास एक यादगार सफर की यादों को संजोते हुए देर तक माल रोड की रौनक देखते रहे। 
कविता वर्मा 
क्रमशः 

Saturday, November 5, 2016

ललचाता झरने का ठंडा ठंडा पानी

(9th day )नाथुला पास।  

अगले दिन सुबह नाथुला पास जाना था भारत चाइना बॉर्डर जो पूर्व सिक्किम गंगटोक जिले में पड़ती है। गंगटोक से 80 किलो मीटर दूर लगभग 14140 फ़ीट की ऊंचाई पर है जहाँ जाने के लिये शेयर्ड टैक्सी भी मिलती हैं और प्राइवेट टैक्सी भी। लगभग हर होटल में टूरिस्ट एजेंसी के एजेंट मौजूद होते हैं जो बुकिंग करते हैं। बुकिंग के साथ ही दो फोटो और पहचान पत्र की एक कॉपी देना होती है। वहाँ जाने के लिए पहले परमिट बनवाना पड़ता है जो एजेंट करवा देते हैं। 
गंगटोक का टैक्सी स्टैंड जो शहर के बीचों बीच है बहुत ही बढ़िया लगा। कम जगह में बेहतरीन व्यवस्था। यह एक तीन मंजिला टैक्सी स्टैंड है हर मंजिल पर जाने के मेन रोड से अलग अलग रास्ते जो अंदर भी सीढ़ियों से जुड़ा है। हर मंजिल पर एक रेस्टॉरेंट और टॉयलेट। 
परमिट बनते बनते 10 /11 बज ही जाते हैं। साढ़े ग्यारह तक स्टैंड लगभग खाली हो जाता है और लोकल टैक्सी या प्राइवेट गाड़ियों की पार्किंग के काम आता है। शाम को जो टैक्सी जल्दी आती हैं यहीं सवारी उतारती हैं पर रात में यहाँ कोई गाड़ी खड़ी नहीं रहतीं सब अपने मालिक या ड्राइवर के घर के सामने सड़क किनारे लेकिन व्यवस्थित तरीके से खड़ी होती हैं। रात आठ बजे तक हर सड़क के एक किनारे गाड़ियों की कतार मिलती है जो सुबह साढ़े सात बजे तक हटा कर फिर स्टैंड पर पहुँचा दी जाती हैं। गंगटोक में टैक्सी ड्राइवर का पार्किंग सेंस इतना अनुशासित है कि आप प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाते। खास कर विशाल मैदानी इलाकों में रहने वाले जो जगह और पार्किंग की कमी की शिकायत करते हैं पर ना नियमो का पालन करते हैं ना ही अपनी आदतें सुधारते हैं। 

शहरी सीमा पार करते ही गाड़ी खुले पहाड़ी रास्ते पर बढ़ चली। एक ओर आसमान में फख्र से सिर उठाये ऊँचे पहाड़ तो दूसरी ओर अपनी विनम्रता की मिसाल देती गहरी खाईयाँ। पहाड़ों से झरते झरने अपनी ओर ललचा रहे थे। एक चेकपोस्ट पर गाड़ी रुकी तो पानी की बोतल लेने का विचार किया। कीमत तीस रुपये सुन कर रुक गई। मेरा मन तो झरने का शुद्ध शीतल जल पीने का हो रहा था लेकिन उन तक पहुँचना मुश्किल था। फिर सोचा अभी तो आधी बॉटल पानी है जब ज्यादा पैसे देना ही है तो ऊपर ही देंगे इतनी दूर संभालना नहीं पड़ेगा। 
चाय नाश्ते के लिये गाड़ी रुकी तो सामने ही बहुत बड़ा एक झरना था लेकिन बहाव तेज़ और पहुँचने का रास्ता उबड़ खाबड़ इसलिए मन मसोस कर रह जाना पड़ा। अच्छी बात ये है कि पूरे सिक्किम में पेड टॉयलेट हर जगह हैं और उसके अलावा कहीं गाड़ी रोकने से ड्राइवर मना कर देते हैं। अपने टूरिस्ट की बात के ऊपर अपने प्रदेश की साफ सफाई को तरजीह देना बहुत बड़ी बात हैं। वैसे अपवाद सभी जगह देखने को मिलते हैं वही आदत से लाचार लोग।
साफ़ सुथरी सड़कें नीला आसमान मिलिट्री एरिया की सुरक्षा मन मचल ही गया पैदल चलने को। हमने ड्राइवर से कहा हम पैदल चलते हैं आप चलोगे तो रास्ते से हमें ले लेना। ड्राइवर हंसमुख था बोला आप छूट गये तो मेरी जिम्मेदारी नहीं। 
मैंने हँसते हुए कहा "आपने परमिट चेक करवाया था ना आठ लोगों को लेकर आये थे छह को वापस लेकर जाओगे तो सेना आपको पकड़ लेगी कि आपने दो लोगों को बॉर्डर पार करवा दी। " 
थोड़ी दूर ही चले होंगे कि एक और झरना मिल गया यह कम प्रवाह वाला और कुछ आसान पहुँच वाला था। मैंने झट से बॉटल निकली उसमे बचा पानी ख़त्म किया और थोड़ी मशक्कत के बाद पतिदेव बॉटल भर लाये। ठंडा मीठा पानी जो किसी भी कंपनी के पैक पानी को मात करता है। हवा ठंडी थी पर धूप की गुनगुनाहट उसे भला बना रही थी क्यों न हो आखिर प्रकृति के अवयव एक दूसरे के हाथ में हाथ डाले ही चलते हैं। हम लगभग आधे पौन किलोमीटर आ गए थे कई गाड़ियाँ निकलती जा रही थीं और अब हमें डर लगा कहीं सच में हम छूट तो नहीं गये ? वहाँ से कोई खाली गाड़ी कोई टैक्सी भी नहीं मिलने वाली थी सब गिनती के पैसेंजर लेकर आती हैं और किसी के पास खाली सीट नहीं होती। ओवर लोडिंग वहाँ होती नहीं। आगे खड़ी चढ़ाई थी इसलिये अब हम रुक कर अपनी गाड़ी का इंतज़ार करने लगे। 

रास्ते में कई जगह सेना के कैंप हैं जहाँ फोटोग्राफी निषिद्ध है। परमिट चेक करने के लिए गाड़ियों को थोड़ी ज्यादा देर रुकना पड़ता है। पहाड़ों के बीच जहाँ भी थोड़ी जगह थी वहाँ टीन के शेड और बैरक बने थे। गाड़ियाँ हथियार से लैस। कई जगह रास्ते में बोर्ड लगे थे चीनी निगरानी क्षेत्र। गलबंद गरम कपड़ों से लैस जवान मुस्तैदी से अपने काम में जुटे थे। लगातार ठंडी हवाओं ने चेहरे की त्वचा को झुलसा कर काला कर दिया था लेकिन ड्यूटी के आगे इसकी चिंता किसे है ? मैं सोचने लगी जब ये जवान छुट्टी में घर जाते होंगे तब ही शायद ध्यान जाता होगा इस ओर। 

यात्रा का पहला पड़ाव था छंगू लेक (झील ) Tsomgo lake जो 14310 फ़ीट ऊँचाई पर है। पहाड़ों से घिरी इस प्राकृतिक झील तक पहुँचते बादल छाने लगे थे ठण्ड बढ़ गई थी। इतनी ऊंचाई पर पहाड़ों पर वनस्पति कम होने लगी थी। झील को जगह देने के लिए यहाँ पहाड़ पीछे खिसक गए हैं और बीच में झील और पर्यटकों के लिए बड़ी सी जगह छोड़ दी गई है। झील में मछलियाँ हैं और 51 फ़ीट गहरी यह झील ठंडों में पूरी तरह जम जाती है। यहाँ सजे धजे याक लिये स्थानीय रहवासी याक पर फोटो खिंचवाने का आग्रह करते हैं। 
आगे बढते ऊपर हुए बार बार झील दिखती है और हम देखते जाते हैं साफ सुथरे स्थिर पानी पर पहाड़ों का प्रतिबिम्ब मन मोह लेता है। पचास साठ फ़ीट ऊपर से भी उथली सतह के पत्थर दिखते हैं तब अनछुई प्रकृति की सुंदरता गहराई से महसूस होती हैं। 
नाथुला पास करीब आ रहा था ठण्ड बढ़ने लगी थी गाड़ी में भी हाथ में मोबाइल और कैमरे की अनुमति नहीं थी। पास के करीब हर मोड़ पर चार बाय चार के केबिन के बाहर मुस्तैदी से मशीनगन थामे जवान खड़ा था। संभवतः लोगों को फोटो खींचने से रोकने के लिए यह तैनाती थी। यह इलाका चीनी निगरानी क्षेत्र में आता है इसलिए यह सावधानी जरूरी है। 
गाड़ी से उतरते ही ड्राइवर ने कहा अपने मोबाइल कैमरे गाड़ी में छोड़ जाइये जवानों ने देख लिए तो जब्त हो जायेंगे फिर वापस नहीं मिलेंगे। मैंने बैग से सिर्फ पानी की बॉटल निकाली और बैग भी गाड़ी में छोड़ दिया। पार्किंग से लगभग ढाई तीन सौ फ़ीट चल कर बार्डर थी। ठण्ड बहुत बढ़ गई थी बादल आसपास उतर आये थे हवा में ऑक्सीजन की कमी थी। ड्राइवर ने कह दिया था ज्यादा देर मत रुकना नहीं तो तबियत ख़राब हो जाएगी अधिकतम एक घंटे। कई महिलाएं और बच्चे हांफ रहे थे कई अपर्याप्त गरम कपड़ों में थे तो कइयों ने पर्याप्त कपड़ों के बावजूद उन्हें ठीक से नहीं पहना था। जैकेट की जिप खुली थी सिर नहीं ढँका था साँस लेने में तकलीफ के बावजूद लोग बच्चों को चढ़ा रहे थे या उनके मुँह पर स्कार्फ नहीं लपेटा था। 
जहाँ दोनो  देशों के दरवाजे हैं उनके बीच महज पंद्रह बीस फ़ीट की दूरी है इसे देखने के लिए खुली टैरेस जैसी जगह है। टैरेस पर दीवार ऐसी है जैसे दो छतों के बीच दीवार होती है। दो जवान दुश्मन देश पर नज़र रखे तैनात थे तो पाँच छह जवान भारतीय पर्यटकों पर नज़र रखे थे जो किसी न किसी तरह नज़र बचा कर फोटो लेने की फ़िराक में थे। जब वे पकडे जाते अजीब अजीब तर्क देने लगते हम इतनी दूर से इतना खर्च करके आये हैं ,अपने दोस्तों को दिखाने के लिए फोटो चाहिये और कई तो अपने पद पैसे और पहुँच की धौस देने से भी नहीं चूके। जिस ठण्ड में हम बमुश्किल घूम पा रहे थे और एक घंटे बाद वापस चले जाने वाले थे वहाँ उन जवानों की लोगों से बहस मशक्कत देख सिर शर्म से झुक गया। सिविलियन को सिविक सेन्स सीखने की बहुत जरूरत है सिर्फ मंहंगे कपडे जूते गाड़ियाँ इस्तेमाल करने से ही सभ्य नहीं कहलाया जा सकता। पिंक फिल्म की तर्ज पर No को विस्तार से परिभाषित करने की आवश्यकता है। मैंने हंसते हुए एक जवान से कहा जितनी चौकसी आपको दुश्मन देश चीन की नहीं करनी पड़ती उससे ज्यादा तो अपने देश के लोगों की करना पड़ती है। वहाँ दो जवान काफी हैं यहाँ पांच जवान लगे हैं। 
चाइना बॉर्डर में ख़ामोशी छाई थी मैंने वहाँ मौजूद जवान से पूछा चाइनीज़ लोग नहीं आते बॉर्डर देखने ? 
कभी कभी आते है पर सिर्फ 40 /50 लोग ही आते हैं। अब पता नहीं ऐसा कम आकर्षण के कारण है या नीतियों के कारण। 
लगभग चालीस मिनिट में ही ठण्ड से हमारी हालत ख़राब थी। वहीँ दो टेंट में सेना ने मेडिकल हेल्प और कैंटीन बनाया हुआ था। कैंटीन में गरमा गरम कॉफ़ी समोसे और मोमो मिल रहे थे। तीन चार टेबल कुर्सी लगी थीं लोग ठंड से राहत पाते खाते चाय-कॉफी पीते और चल देते। 
सेना का एक जवान बार बार लोगों से आग्रह कर रहा था कि डस्टबिन का उपयोग करें। 
लोग खुद से यह भी नहीं सोच सकते कि इतनी ऊंचाई पर बार्डर पर उनके कप प्लेट उठाने के लिए कौन नौकर लगे होंगे?
गरम कॉफ़ी पी कर थोड़ी राहत मिली हम लोग वापस गाड़ी पर आ गये। अगला पड़ाव था बाबा मंदिर यानि बाबा हरभजन श्रीन का मंदिर। बाबा हरभजन सेना में थे जो रसद ले जाते हुए पहाड़ी झरने में बह गए थे और घटना स्थल से दो किलोमीटर दूर उनका शव मिला। कहते हैं उन्होंने अपने साथियों को सपने में दर्शन दे कर अपने शव की स्थिति बताई थी। सेना ही मंदिर की व्यवस्था देखती है। यहाँ पास की एक पहाड़ी पर एक बड़ी सी शिव प्रतिमा स्थापित है जिसके पीछे बड़ा सा झरना बहता है। पहाड़ों में जो जगह बड़े पास दिखती हैं वो पहुँचने में बड़ी दूर होती हैं। हमने वहाँ जाना कैंसिल किया और ठंडी हवा उतरते बादल के बीच फोटोग्राफी का मज़ा लिया। 
कविता वर्मा 
क्रमशः



Thursday, November 3, 2016

जब पाँच बजे आसमान तारों से भर गया

पंद्रह दिन के अपने टूर में गुवाहाटी दार्जिलिंग और सिक्किम गये थे। लिखना तो सभी के बारे में है पर कुछ यादें ज्यादा याद आती हैं और उन्हें लिखने की इच्छा हो जाती है। ये यात्रा वृतांत थोड़ा बेतरतीब लगेगा पर उम्मीद है आपको अच्छी सैर भी करा देगा। 
  
19 अक्टूबर 2016 (8th day )
सिक्किम की राजधानी गंगटोक के बारे में काफी सुना था।  धुल धुंए रहित बिना शोर शराबे के एक शांत पहाड़ी शहर जो राजधानी भी है। हम गंगटोक पहुंचे दोपहर करीब दो बजे। होटल की लॉबी में पहुँच  तबियत जितनी खुश हुई कमरे में पहुँचते ही मूड ख़राब हो गया। सजा धजा साफ़ सुथरा रूम लेकिन बाहर की तरफ कोई खिड़की नहीं और बंद कमरे रहना मानो सज़ा। दार्जिलिंग में भी होटल का रूम पसंद नहीं आया था तब make my trip फ़ोन करके उसे अपग्रेड करवाया था जिसमे करीब आधा पौन घंटा लग गया। अब यहाँ फिर वह सब दोहराने की हिम्मत नहीं बची थी। एक तो पहाड़ी रास्ते का चार घंटे का सफर और साथ में चार घंटे लगातार बजते गानों ने सारी शक्ति छीन ली थी अब तो बस फ्रेश होकर खाना खाकर आराम करने का मन था। फिर सोचा सिर्फ रात में सोना ही तो है तो क्या फर्क पड़ता है ?
खाने का मेन्यू देखा कुछ खास पसंद नहीं आया फिर सोचा सिर्फ दाल रोटी आर्डर करते हैं शाम को बाहर खाएंगे। जब खाना आया रोटी इतनी छोटी छोटी थीं कि एक रोटी दो तीन कौर में ही ख़त्म हो गई और बुलवाते तो पता नहीं कितनी देर लगती इसलिए साथ लाये नाश्ते में से कुछ निकाला और उदरस्थ किया। ठण्ड तो थी खाने के बाद और तेज़ लगने लगी तो थोड़ी देर लेट गए रजाई कम्बल की गर्मी मिलते ही नींद लग गई। 
शाम साढ़े चार बजे घडी देखी तो सोचा थोड़ी देर और फिर एम जी रोड (माल रोड ) चलते हैं। तैयार हो कर बाहर आये तो पाँच बजकर दस मिनिट हुए थे और अँधेरा हो चुका था आसमान में तारे टिमटिमा रहे थे। कमरे से बाहर का कोई नज़ारा दिख नहीं रहा था बस घडी के हिसाब से समय देखा। ( जी हाँ वहाँ पता चला समय सिर्फ घड़ी में नहीं खुले आसमान पर भी दिखाई देता है। ) सुदूर पूर्व में सूर्योदय भी जल्दी होता है और सूर्यास्त भी। एम जी रोड करीब ढाई तीन किलोमीटर दूर था टैक्सी का इंतज़ार करते एक गाड़ी को हाथ दिया और वह रुक भी गई लेकिन वह टैक्सी नहीं थी। सिक्किम का बंदा था शायद उसे भी अजनबियों से बात करने का शौक था (मुझे भी है ) . उसने सिक्किम और गंगटोक के बारे में कई बातें बताई जैसे वहाँ हॉर्न बजाना पब्लिक प्लेस पर सिगरेट पीना मना है पर लिकर (शराब ) कोई भी कभी भी कहीं भी पी सकता है। ज्यादातर लोग पर्यटन पर निर्भर हैं। सिक्किम के चार जिले हैं उनमे से हमें कहाँ कहाँ घूमना चाहिये वगैरह वगैरह। बातचीत में ही पता चला कि जैसे हमें सुदूर पूर्वी प्रदेशों के बारे में बहुत कम जानकारी है वैसे ही वहाँ के लोगों को भी देश के अन्य प्रदेशों के बारे में कोई विशेष जानकारी नहीं है। दुःख हुआ कि इतने सालों में हम अपने देश के हर प्रदेश को और उनके बाशिंदों को ही एक दूसरे से नहीं जोड़ पाये। 
माल रोड या एम जी रोड के शुरुआत में गाँधी जी की बड़ी सी प्रतिमा है। वहाँ वाहन प्रतिबंधित है। रोड डिवाइडर से दो भागों में विभक्त है और काफी चौड़ा साफ सुथरा और चौकोर पत्थरों से जड़ा है। दोनों तरफ सुसज्जित दुकानें कई नई और पुरानी जगमगाती इमारतें। बीच में डिवाइडर पर हरियाली बैठने के लिये बेंचेस और हर पचास मीटर पर डस्टबिन। ऐसा लग रहा था जैसे विदेशी धरती पर हों। ( यकीन मानिये ऐसा लिखना मुझे भी बुरा लग रहा है लेकिन ऐसी साफ़ सफाई और अनुशासन कम ही जगहों पर देखने को मिलता है। ) काफी देर वहीँ बैठे रहे टूरिस्ट इनफार्मेशन सेंटर से घूमने के लिए कुछ जानकारी जुटाई। वैसे तो अब कई ब्लोग्स हैं जिनपर सभी कमी खूबियों के साथ ज्यादा अच्छी जानकारी मिल जाती और हम वह लेकर गए थे। वहाँ दो वेज रेस्टॉरेंट दिखे उन्हीं में से एक 'परिवार रेस्टॉरेंट' में बिरियानी खाई। हरी सब्जियाँ वहाँ कम ही मिलती हैं रोटी मिल जाती है पर दिन की पूरी के आकार की रोटी के बाद मन नहीं हुआ। ज्यादा भूख नहीं थी इसलिए गर्मागर्म बिरियानी ही खाई। 
एम रोड के लगभग आखिर में थोड़ा नीचे उतर कर लाल बाजार है जो थोड़ा सस्ता है। आठ बजे तक बाजार बंद होने लगता है। लौटते हुए आइसक्रीम खाई। मैं आइसक्रीम लेकर बाहर आ गई तो दुकान के सामने डस्टबिन में मैंने रैपर डाल दिया जबकि हस्बैंड ने दुकानदार को पैसे देकर वहीँ रैपर खोला जिसे दुकानदार ने लेकर अपने काउंटर पर एक डब्बे में रख लिया। 
सिक्किम में हर नागरिक अपने शहर अपने राज्य की साफसफाई के लिये खुद को जिम्मेदार मानता है इसका पहला प्रत्यक्ष उदाहरण सामने था। 
क्रमशः 
कविता वर्मा 

Friday, September 30, 2016

अब हमारी बारी

  
देश की सरहदों पर तैनात हमारे जवान हमेशा अपनी जान हथेली पर लिये देश की रक्षा में लगे रहते हैं। जान देने की बारी आने पर एक पल के लिए भी नहीं सोचते ना खुद के बारे में ना अपने परिवार के बारे में। जिस तरह हम अपने घरों में इस विश्वास के साथ चैन से सोते हैं कि सरहद पर सैनिक हैं उसी तरह वे विश्वास करते हैं कि पीछे से देश की जनता और सरकार है जो उनके परिवार की देखभाल करेगी। किसी भी जवान की शहादत पर लोगों में भावनाओं का ज्वार उठता है उसकी अंतिम यात्रा में पूरा गाँव शहर उमड़ता है सरकार तुरंत मदद घोषित कर देती है। हर प्रदेश सरकार अपनी सोच की हैसियत के अनुसार मदद घोषित करती है। अब जिनकी सोच में ही दिवालियापन हो वह उसी के मुताबिक मदद घोषित करते हैं। हाँ लोगों के गुस्से मीडिया की लानत मलानत से कभी कभी सोच परिष्कृत हो जाती है और स्तर बढ़ जाता है सोच का भी और मदद का भी। 
खैर मुद्दा प्रदेश सरकार या राजनैतिक पार्टी की सोच का नहीं है मुद्दा है इन सैनिक परिवारों की सच्ची मदद और उनके सही हाथों में पहुँचने का। कई बार होता यह है कि भावनाओ के अतिरेक में घोषणाएं तो हो जाती हैं पर उनपर अमल कब और कितना होता है इसे जाँचने वाला कोई नहीं होता। 
हाल ही में उरी में और इसके पहले भी सीमा पर होने वाली घटनाओं के कारण मारे गये सैनिकों की अंतिम यात्रा के प्रसारण को देखते हुए महसूस हुआ कि अधिकतर सैनिक सुदूर ग्रामीण इलाके के हैं और उनकी सामाजिक आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। अधिकतर के परिवार में माता पिता , पत्नी या तो पढ़े लिखे नहीं हैं  बहुत कम पढ़े लिखे हैं। ऐसे में सरकारी और कानूनी पेचीदगियों को समझना और मदद पाने के लिए सही द्वार तक पहुँचना इनके लिए मुश्किल होता है। ऐसे में कोई रिश्तेदार कोई बिचौलिया मदद के नाम पर इनके साथ हो लेता है और वह मदद इन तक पहुँचने के पहले ही हड़प ली जाती है या उसके हिस्से हो जाते हैं। एक साथ मिली रकम का यथोचित उपयोग और इंवेस्टमेंट करने में वे लोग असफल होते हैं और मतलबपरस्त की धोखाधड़ी का शिकार हो सकते हैं।
अगर पत्नी दूसरी शादी कर ले तो बूढ़े माता पिता बुढ़ापे में आर्थिक परेशानियों से घिर जाते हैं भाईबहन का भविष्य अंधकार में डूब जाता है। जब परिवार की भूखों मरने की स्थिति आती है और वे भटकते हुए मीडिया तक पहुँचते हैं तो बिना जमीनी सच्चाई जाने सरकार को कोसना शुरू हो जाता है। 

दरअसल अब ऐसी मदद या मुआवजे को शहीद के परिवार की जरूरत का ध्यान रखते हुए पूरी योजना बना कर  देने की जरूरत है। होना यह चाहिये कि सैनिक पर निर्भर परिजनों की पूरी जानकारी सेना के पास होनी चाहिये। जिसमे भाई बहनों की जिम्मेदारी का एवरेज टाइम पीरियड शामिल हो। जैसे अगर भाई 18 साल का है और पिता की कोई आय नहीं है आगे कितने साल में अपनी पढाई पूरी कर अपने पैरों पर खड़ा हो सकता है या बहन की शादी कितने साल में करने का इरादा है। ऐसे ही बच्चों की उम्र उनकी जिम्मेदारी जरूरतों का मोटा हिसाब होना चाहिए। 

प्रदेश सरकारों द्वारा दी गई मदद मुआवजे का कुछ हिस्सा माता पिता को और कुछ पत्नी और बच्चों के नाम से बराबरी से बाँटी जाना चाहिए जो तुरंत मदद के लिए हो और यह बहुत ज्यादा नहीं होना चाहिये। बाकी पैसा अलग अलग हिस्सों में बाँट कर उसकी एफ डी बनवाना चाहिये जो उन्हें अगले बीस बाइस सालों तक ब्याज और मूल देती रहे जब तक बच्चे अपने पैरों पर ना खड़े हो जाएँ। पत्नी को मृत्युपर्यंत पेंशन तो मिलना ही चाहिये। 
ये ध्यान रखना बहुत जरूरी है कि ये सैनिक हमारे और सरकार के भरोसे अपने परिवार को हमारे भरोसे छोड़ जाते हैं उनके लिए हमारे दिलों में बहुत मान सम्मान है उनके परिवार से सहानुभूति है और उसे सही दिशा दे कर हमें अपना फ़र्ज़ निभाना है। 
कविता वर्मा 


Thursday, September 22, 2016

जीने दे मुझे तू जीने दे


सामाजिक बदलावों में फिल्मो की भूमिका पर अक्सर सवाल उठते रहते हैं। हमारे यहाँ फिल्मो को विशुद्ध मनोरंजन का साधन माना जाता है ऐसे में कोई फिल्म अगर सोचने को विवश करती है तो उस पर चर्चा की जाना चाहिए। हाल ही में शुजीत सरकार की फिल्म पिंक रिलीज हुई। महिलाओं के प्रति समाज के नज़रिये पर सवाल उठाती इस फिल्म ने हर आयु वर्ग के चैतन्य लोगों को झकझोरा है और इस पर चर्चा जोर शोर से जारी है। दिल्ली के निर्भया कांड के बाद पूरे देश में एक लहर उठी थी जिसमे बड़ी संख्या युवकों की थी। उस घटना ने युवकों की विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लगाया था और स्वयं को सदैव शक के दायरे में पाना उनके लिए असह्यनीय था। कभी लड़कियों के बारे में सोचा है जो हमेशा समाज की निगाहों की चौकसी में रहती हैं और उनके क्रिया कलाप हमेशा ही शक़ के दायरे में। 
फिल्म की कहानी तीन मध्यम वर्गीय कामकाजी लड़कियों के आसपास घूमती है जो दिल्ली में एक फ्लैट किराये पर लेकर रहती हैं। उनके साथ हुए एक हादसे के बाद उनकी जिंदगी बदल जाती है तब एक बूढा वकील उनका केस लड़ता है और अदालती कार्यवाही के दौरान समाज की लड़कियों के प्रति मानसिकता पर उठाये सवालों के द्वारा पूरे समाज को सोचने पर मजबूर कर देता है। फिल्म में रसूखदार नेता परिवार और लड़कों की मानसिकता, सोसायटी के तथाकथित आधुनिक लोगों की सोच, पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली, दोस्ती, रिश्ते, इंसानियत सभी को बखूबी दर्शाया गया है। हर बात इतने सहज स्वाभाविक ढंग से आती है और अचानक एक बड़ा प्रश्न छोड़ जाती है की हम भौचक रह जाते हैं। 
लड़कियों के लिये हर समाज में कई अलिखित नियम हैं। अब मोहल्ला प्रथा तो रही नहीं और हम सब तथाकथित आधुनिक हो गये हैं इसलिये आते जाते किसी पर सीधे कटाक्ष नहीं करते लेकिन पीठ पीछे किसी पर टैग तो लगा ही देते हैं और अपने लगाये टैग को सही साबित करने के लिये उसकी चर्चा भी खूब करते हैं।
इस स्थिति से समाज में हर लड़की को जूझना पड़ता है। लड़की देर रात घर आती है डिस्को पब में जाती है अकेली रहती है लड़कों से मिलती है उनसे हँस हँस कर बात करती है कैसे कपड़े जूते पहनती है बाल कितने स्टाइल में कटवाती है ये सब बातें उसका  चरित्र निर्धारित करती हैं। इसी के आधार पर उसे चालू आवारा और सहज उपलब्ध मान लिया जाता है। समाज द्वारा लगाए गये इन टैग के सामने कोई तर्क कोई स्पष्टीकरण नहीं चलते। अगर लड़की पर परिवार की जिम्मेदारी है वह कामकाजी है तो उसे सिर्फ काम करना चाहिये उसके आगे अपने लिए सोचना अपने लिए जीना समाज को खटकता है। लड़कियों को आज़ादी भी एक तय चौखटे में ही दी गई है। ऐसे कोई चौखटे लड़कों के लिये निर्धारित नहीं हैं वे जो चाहे करें सब मान्य है। 
फिल्म के एक दृश्य में जब लोग मीनल को देख उसके बारे में बात करते हैं तो वह अपने सिर पर हुड लगा लेती हैं तब अमिताभ बच्चन उस हुड को हटा देते हैं। प्रतीकात्मक रूप से बहुत बड़ी बात यहाँ कही गई है। अब समय आ गया है कि लड़कियाँ खुद को छुपाना परदे के पीछे छुपना बंद कर दें।  कहने दें लोगों को जो कहना है उसका खुल कर सामना करें। 
फिल्म के एक दृश्य में कीर्ति कुल्हारी चीख चीख कर कबूल करती हैं कि उनने और उनकी सहेलियों ने पैसे लिये हैं। उनका बयान केस कमजोर कर सकता है लेकिन बार बार यह सुन कर वे आपा खो बैठती हैं। अगले दृश्य में वे कहती हैं मना करते रहने से भी क्या होता जब सबने मान ही लिया है। लड़कियों के बारे में यही सोच काम करती है। यही स्थिति है उनकी। उनकी सफाई उनके स्पष्टीकरण को कोई नहीं मानता समझता लोग वही सोचते हैं जो वो सोचना चाहते हैं। 
 रिश्ते भारतीय समाज की पहचान है और रिश्तों के लिये जितने नाम हमारे यहाँ हैं उतने शायद किसी और संस्कृति में नहीं हैं। दोस्ती का रिश्ता खून के सभी रिश्तों से ऊँचा रिश्ता है जिसकी अवधारणा हमारे पुराणों में भी मिलती है। कृष्ण सुदामा, कर्ण दुर्योधन, राम सुग्रीव ऐसे ही कुछ उदाहरण हैं। लेकिन लड़के और लड़की की दोस्ती को आज भी सम्मान की नज़रों से नहीं देखा जाता। उनका साथ उठना बैठना खाना पीना हंसना बोलना लड़की को हर बात के लिए तैयार है ऐसा माना जाता है। इस फिल्म में हर तरह के रिश्ते हैं। एक दोस्ती का वह रिश्ता जो इन तीन लड़कियों के बीच है जिसके दम पर वे कठिन से कठिन समय में एक दूसरे का साथ देती हैं तो एक वह रिश्ता जो अपनी सुविधा के साथ चलता है पर बुरे वक्त में साथ छोड़ देता है। एक रिश्ता है मकान मालिक और किरायेदार का जो व्यावसायिक होते हुए भी इन सब से ऊपर उठ इंसानियत का सबूत देता है और एक छोटा सा पर सबसे महत्वपूर्ण वह खूबसूरत रिश्ता जो एक पडोसी का है जो मददगार बन कर उभरता है। 
समाज के रिश्तों के बदलाव की बात सभी करते हैं पर क्या कभी हम खुद में झांक कर देखते हैं कि अपने रिश्तों में हम कितने ईमानदार हैं ? 
फिल्म में पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली को लगभग वैसा ही दिखाया गया है जैसी वह है। आम इंसान के लिये न्याय की आशा अभी भी आकाश कुसुम है। हमारे देश में त्वरित न्याय या इतने काबिल वकील मिलते हैं या नहीं या एक रसूखदार परिवार के लड़कों को इतने संगीन जुर्म का आरोपी बनाया जा सकता है या नहीं यह इस फिल्म का मकसद नहीं है। सबूत कहाँ से कैसे जुटाये गये जैसी रोमांचकता इसमें नहीं जोड़ी गई है लेकिन सबूत हैं और जब वे सबूत बोलते हैं तब उनके तर्क अकाट्य होते हैं। अदालती कार्यवाही के सबूत और जिरह लड़कियों को एक इंसान समझे जाने की वकालत करते हैं। उनकी इच्छा अनिच्छा को सामाजिक मान्यता दिलाने की जिरह करते हैं। उनको मूक कठपुतलियों से बढ़कर एक इंसान समझा जाना ही अभी जद्दोजहद का विषय है। 
फिल्म के बारे में बात करते हुए शुजीत सरकार ने बताया कि उनकी पत्नी ने एक बार उनसे कहा कितना अजीब है ना कि आजादी के सत्तर वर्षों बाद भी हमें स्त्री सशक्तिकरण की बात करना पड़ रही है। ये स्टेटमेंट अपने आप में बहुत बड़ा प्रश्न खड़ा करता है। 
फिल्म का क्लाइमेक्स अमिताभ बच्चन के झकझोरने वाले स्टेटमेंट से होता है जब वे कहते है की NO एक शब्द नहीं एक पूरा वाक्य है और इसे इसी तरह समझा जाना चाहिये। नो मतलब सिर्फ नहीं होता है और कुछ नहीं फिर वह नहीं कोई लड़की कहे बेटी बहन सेक्सवर्कर या फिर पत्नी कहे इसका मतलब सिर्फ नहीं होता है। 
लड़कों की परवरिश में इस NO शब्द का इस्तेमाल बहुधा नहीं होता। उनकी इच्छा अनिच्छा जरूरते सबके लिये हाँ ही होती है। किसी बात के लिए ना होती भी है तो वह क्षीण प्रतिरोध होता है जिसे आसानी से हाँ में बदलवा लिया जाता है। इसीलिए लड़कियों की ना को भी हाँ समझना या उसे बलपूर्वक हाँ में बदलवा लेना आम मानसिकता होती है। परिवार की मानसिकता भी यही होती है। ये फिल्म लड़कियों को एक इंसान के रूप में देखे जाने की पुरजोर कोशिश करती है। उन्हें उनकी जिंदगी उनके तरीके से जीने के स्पेस देने की मांग करती है उन पर अपने विचार अपने बनाये टैग ना लगाए जाने की  गुजारिश करती है। 
फिल्म बना लेना उसे लोगों तक पहुँचाना और दिखाना एक बात हो सकती है लेकिन लोग अभी भी अपनी पूर्वाग्रह ग्रस्त मानसिकता के साथ ही फिल्म देख रहे हैं। मेरे पास कई महिलाओं के स्टेटमेंट आये की कुछ भी हो लड़कियों का शराब पीना देर रात तक बाहर रहना उनकी सुरक्षा के लिए ठीक नहीं है अंत में नुकसान तो उन्ही को होता है। 
इस बारे में मेरा कहना है जिस तरह लड़के शराब पिए या डांस करें देर रात तक बाहर रहे उन्हें ये डर नहीं रहता कि उनकी मर्जी के खिलाफ उनके साथ कुछ गलत होगा। यही माहौल लड़कियों को क्यों नहीं दिया जाता सकता ? मैं शराब पीने की वकालत नहीं कर रही पर कोई लड़की कब तक बाहर रहेगी कहाँ जाएगी कब आएगी ये सब उसकी मर्जी होना चाहिये और उसे एक सुरक्षित माहौल मिलना चाहिये जैसे बेफिक्र लड़के रहते हैं वैसे ही उन्हें भी बेफिक्री हो कि वे सुरक्षित हैं। युवा लड़कों को इसी बात ने बहुत ज्यादा प्रभावित भी किया है। समानता का यह अर्थ अभी तक ठीक से सामने आया ही नहीं था। 
फिल्म के एक सीन में तापसी पन्नू कहती हैं बहुत बुरा लगता है घिन आती है जब कोई आपको आपकी इच्छा के खिलाफ छूता है। हमारे यहाँ लड़कियाँ महिलायें आये दिन इस बुरे स्पर्श से जूझती हैं। कोई लड़की एक या अधिक बार अपनी मर्जी से संबंध बना चुकी हो तब भी एक और बार उसकी मर्जी के खिलाफ उसे छूने का हक़ किसी को नहीं है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता की इस मानसिकता को बदलने की बहुत बड़ी जरूरत है और इस सीन ने शायद लड़कों में भी उस जबरजस्ती के स्पर्श के प्रति जुगुप्सा पैदा की होगी ऐसा मेरा मनना है। 
फिल्म देखते समय आसपास कई लड़के थे लेकिन हाल में कहीं कोई कमेंट नहीं हुआ कोई सीटी नहीं बजी। विषय की गंभीरता ने सभी को अवाक् कर रखा था। 
कई लोगों ने मुझे बताया कि वे इस फिल्म की चर्चा से इतने प्रभावित हुए हैं कि अपने बेटों को यह फिल्म दिखाना चाहते हैं। यह बेहद अच्छी सोच है और नयी पीढ़ी की सोच विकसित करके ही बदलाव लाया जा सकता है। 
फिल्म का एक गीत 
जीने दे जीने दे मुझे 
यार हट जा जरा 
देख ले मैं हूँ यहाँ 
मेरी जिंदगी है ये मेरा जहाँ 
तू समझे यहाँ तू ही है बादशाह 
जीने दे मुझे तू जीने दे 
जिंदगी का जाम तू पीने दे 
जैसे भी हूँ मुझको तू रहने दे 
दिल में जो है वो मुझे कहने दे  
कविता वर्मा 

Monday, September 19, 2016

'आइना सच नहीं बोलता'

मातृभारती मातृभारती पर प्रकाशित हो रहे धारावाहिक उपन्यास 'आइना सच नहीं बोलता' की इस पहली और दूसरी कड़ी की लेखिका हैं नीलिमा शर्मा और कविता वर्मा... नंदिनी की इस कहानी को पढ़िए और सुझावों व् प्रतिक्रियाओं से अवगत कराइये..


http://matrubharti.com/book/6191/ 


http://matrubharti.com/book/6337/

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Monday, September 12, 2016

हँसते हँसते कट जायें रस्ते भाग 1


रोजमर्रा की जिंदगी में कितनी ही बातें ऐसी होती हैं जिन्हें जब याद करो हंसी फूट पड़ती है। ये छोटी छोटी बातें घटनायें हमें जीने की ऊर्जा देती हैं। कुछ घटनायें गहरी तसल्ली दे जाती हैं कुछ खुद की पीठ थपथपाने का मौका। ऐसी ही घटनाओं को कलमबद्ध करने का मन आज हो आया। आप भी पढिये और मुस्कुराइये। 

सिटी बस से सफर करना हमेशा ही रोमांचक होता है और अगर आसपास एक दो सहयात्री भी मजेदार या नोटंकीबाज मिल जाएँ तो फिर कहना ही क्या। बेटी रोज़ सिटी बस से कॉलेज जाती है कभी बैठने की जगह मिल जाती है कभी नहीं। कभी कभी बीच के स्टॉप पर कोई उतरने वाला होता है तो आसपास वालों में उस सीट को हथियाने की होड़ लग जाती है। अब सफर रोज़ का ही है इसलिए बिना वजह की सदाशयता भी कोई नहीं दिखाता सब अपने में मगन अपने लिए थोड़ी सी जगह और सुकून जुटाने भर की चिंता करते हैं। एक दिन एक लड़की दो सीट के बीच की जगह में खड़ी थी। सीट पर बैठी लड़की अगले स्टॉप पर उतरने वाली थी। एक स्टॉप पहले एक महिला चढ़ीं और उस सीट से थोड़ी दूर खड़ी थीं। जैसे ही स्टॉप आया वह लड़की उठी तो उन महिला ने अपना पर्स खाली हुई सीट पर फेंक दिया क्योंकि वहाँ तक तुरंत पहुँचना मुश्किल था बस में काफी भीड़ थी। वह लड़की जो सीटों के बीच में खड़ी थी उसने उनका पर्स उठा कर उन्ही की ओर बढ़ाया और कहा आंटी शायद आपका पर्स गिर गया है और खुद उस सीट पर बैठ गई। 

एक और वाकया हुआ एक आंटी और उनकी मम्मी हाय हाय करते भीड़ भरी बस में चढ़ीं। आंटी जोर जोर बोल रहीं थी हाय मेरे पैर में चोट लगी है देखो संभल कर बहुत दर्द हो रहा है। माँ बेटी दोनों माहौल बनाती रहीं कि शायद कोई उन्हें बैठने की जगह दे दे लेकिन सब अपने में मगन थे।  फिर उन्होंने एक एक से पूछना शुरू कहाँ उतरोगे। आखिर तंग आकर एक लड़की खड़ी हो गई कहते हुए कि आंटी आप बैठ जाइये और सीट खाली होते ही उनकी मम्मी सीट पर बैठ गई। 

छुट्टे पैसे ना होने पर टॉफियाँ तो हम सभी को कभी ना कभी मिली होंगी। कभी हंस के तो कभी मुँह बनाते हम उन्हें रख ही लेते हैं और करें भी क्या दुकानदार तो अकड़ के खड़ा हो जाता है कि छुट्टे दो जैसे छुट्टे ना होने पर भी सामान लेने आकर हमने कोई गुनाह कर दिया हो। 
एक बार मोबाइल का रेट कटिंग वॉउचर लेने गई जो अड़तीस रुपये का था और खुल्ले थे सिर्फ छत्तीस रुपये। एक हाथ में खुल्ले पैसे पकडे दूसरे हाथ से सौ का नोट आगे बढ़ा दिया। दुकानदार बोला छुट्टे दीजिये मैंने कहा सिर्फ छत्तीस रुपये हैं चलेंगे। वह असमंजस में पड़ गया क्या करे वह दुकान में नोकर था। उसे असमंजस में देख कर मैंने कहा दो रुपये की टॉफी दे दूँ और दो टॉफी निकाल कर काउंटर पर रख दी। दुकान का मालिक वहीँ बैठा था वह बोला तो कुछ नहीं पर उसे इतनी हंसी आई की क्या कहें। पहली बार कोई उसकी टोपी उसी के सिर पहना गया। 

ऐसे ही एक बार रेस्टॉरेंट में खाने के बाद बिल चुकाया तो दस के नोट की जगह दस टॉफी देख दिमाग ख़राब हो गया। वेटर को टिप भी देनी थी तो उन दस टॉफी के साथ दो नोट और मिलाये और वेटर से कहा इसके बदले काउंटर से पैसे ले लेना। अभी राजस्थान टूर पर पांच के सिक्के की जगह मिंट की छोटी डिब्बी मिली किसी एपल मिंट फ्लेवर की जो हमें पसंद नहीं था। बिटिया उसे लेकर काउंटर पर गई और बोली इसकी जगह मिंट पुदीना फ्लेवर दे दो। दुकानदार ने बदल कर दे दिया। तब मैंने उससे कहा ऐसा लग रहा है जैसे तुम कोई फटा नोट बदलवा कर ले आई हो। 
कविता वर्मा 

प्यार के दो बोल

 म.प्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन के दो दिवसीय कथा क्रमशः आयोजन में देवास जाना हुआ। आग्रह था इसलिए मैं वहीं रुक गई। रात में रुकने का इंतजाम एक ह...