Sunday, May 27, 2018

गुदगुदा गये बाल नाटक

गर्मी की छुट्टियां शुरू होते ही बच्चों के लिए बाल नाट्य शिविर लगना इंदौर में आम हो गया है। बच्चों को व्यस्त रखना उन्हें संवेदनशील बनाना और उनमें आत्मविश्वास के विकास में ऐसे शिविर बेहद सक्षम हैं। शिविर की समाप्ति पर बच्चों के द्वारा नाट्य प्रस्तुति इसके परिणाम को सामने लाती है। अनवरत संस्था ने इन्हीं बच्चों के साथ चार नाटक प्रस्तुत किये।
अनवरत संस्था के बाल नाट्य शिविर रंग बंदरा का पहला नाटक बाॅबी की कहानी एक ऐसी छोटी बच्ची की कहानी है जिसके मम्मी पापा दोनों कामकाजी हैं। स्कूल से आने के बाद वह बच्ची अकेले घर पर रहती है और अपने अकेलेपन में एक आभासी संसार रचती है। जिसमें वह अपने स्कूल के तनाव और अवसाद को निकालती है। किसी को डांटती है तो किसी को सजा देती है और किसी को अपना दोस्त बनाती है। रूपकथा सरकार ने अकेली बच्ची को साकार किया तो साथी बच्चों ने इस संसार को रचने में जी जान लगा दिया।
अशोका नाटक अशोक के जीवन की यात्रा को बेहद कसे हुए अंदाज में प्रस्तुत करती है। अशोक का चरित्र निभाया रुद्रांश खत्री ने लगभग पूरे समय मंच पर उपस्थित रह कर मंच को अपने कब्जे में किया। पार्श्व संगीत और लाइव गीत के बोल मन में रचबस जाते हैं। बानगी देखिए
सब हवा हो जायेगा मिट्टी में मिल जायेगा
जो सितारे तू बटोरे साथ न ले जायेगा।
अशोक की कुरूपता को बेहद रोचक तरीके से मिट्टी और प्रकृति से जोड़ा गया और अशोक का बुद्ध की शरण में जाने का दृश्य बहुत आकर्षक बन सका।
नाटक में अशोक के अपने भाइयों से युद्ध और कलिंग युद्ध के दृश्य बहुत सफाई से खेले गये। एक दस बारह साल का बच्चा शरीर के आरपार तलवार के दृश्य बिना किसी गलती के सही दूरी और संयोजन के खेले तो यह नाटक की रिहर्सल में की गई मेहनत को दर्शाता है।
तीसरा नाटक कठपुतली अपने पिता से उपेक्षित लड़की की कहानी है जिसे चारुता नांदेडकर और उसे पालने वाले पिता मग्दु उर्फ राहुल भदौरिया ने अपने भावपूर्ण अभिनय से ऊंचाइयाँ दीं। नाटक के उत्तरार्ध में कोर्ट के आदेश से लड़की को उसके जैविक पिता को सौंपा जाये या पालक पिता को इस फैसले से मन विचलित होता है पर अंत एक मुस्कान दे जाता है।
नाटक में तीन खूबसूरत कठपुतलियाँ जिनमें एक बेहद छोटी पाँच छह वर्ष की बच्ची थी जिसे बेहद खूबसूरती और बराबरी से डायलॉग दिये गये और उसने पूरी जिम्मेदारी से उसे निभाया।
हरिशंकर परसाई लिखित व्यंग्य नाटक भोलाराम का जीव बच्चों की उम्र और आज के समय में उपलब्ध तकनीक के संयोजन का खूबसूरत मेल है। मोबाइल फोन पर फीडबैक लेते यमराज और कंप्यूटर पर लेखा-जोखा रखते चित्रगुप्त अपनी कामेडी टाइमिंग के कारण हास्य को बेहतर तरीके से उभारा गया है। नारद मुनि का पृथ्वी पर आना और बहुत कम प्राॅप और दृश्य परिवर्तन के नाटक को पूरा माहौल प्रदान करना निर्देशकीय कौशल है। इसमें भी एक छोटे से बच्चे ने बाबू के पात्र में अपने अभिनय से जान फूंकी फिर चाहे वह पान की पीक थूकने का दृश्य हो या आफिस में बाबू के काम को टालमटोल करने का। नाटक में इंदौरी टच देते हुए सफाई अभियान का जिक्र और जुर्माने में नारद के खडताल जब्त कर लेना लुभा गया।
हर नाटक के बाद सहभागी बच्चों का परिचय और उन्हें प्रशस्ति पत्र दिया गया और इस समय का सदुपयोग दूसरे नाटक की तैयारी के लिए किया गया।
अंशुल जोशी राज लोगरे और सनत पाण्डेय का संगीत हमेशा की तरह जानदार रहा।
अनवरत थियेटर ग्रुप और नीतेश उपाध्याय की यह बेहतरीन प्रस्तुति रही।
कविता वर्मा

1 comment:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (29-05-2018) को "सहते लू की मार" (चर्चा अंक-2985) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    ReplyDelete

आपकी टिप्पणियाँ हमारा उत्साह बढाती है।
सार्थक टिप्पणियों का सदा स्वागत रहेगा॥

आँखों की गुस्ताखियाँ

बात सन 87 की है। पंजाब के बाद इंदिरा जी की हत्या और उसके बाद दिल्ली पंजाब और आसपास का इलाका बेहद अस्थिर दौर से गुजर रहा था। उसी समय हमारा व...